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हम ऊपर लिख आये हैं कि जमींदारों और सरदारों को कमेटी में से अपने तीनों साथियों और नाहरसिंह को साथ ले बीरसिंह की खोज में खड़गसिंह बाहर निकले और थोड़ी दूर जाकर उन्होंने जमीन पर पड़ी हुई एक लाश देखी। लालटेन की रोशनी में चेहरा देख कर उन लोगों ने पहिचाना कि यह राजा का आदमी है।

नाहरसिंह : मालूम होता है, इस जगह राजा के आदमियों और बीरसिंह से लड़ाई हुई है।

खड़गसिंह : जरूर ऐसा हुआ है, ताज्जुब नहीं कि बीरसिंह को गिरफ्तार करके राजा के आदमी ले गए हों।

नाहरसिंह : अगर इस समय हम लोग महाराज के पास पहुँचें तो बीरसिंह को जरूर पावेंगे।

खड़गसिंह : मैं इस समय जरूर महाराज के पास जाऊँगा, क्या आप भी मेरे साथ वहाँ चल सकते हैं?

नाहरसिंह : चलने में हर्ज ही क्या है? मैं ऐसा डरपोक नहीं हूँ, और जब आप ऐसा मददगार मेरे साथ है तो मैं किसी को कुछ नहीं समझता! फिर मुझे वहाँ पहिचानता ही कौन है?

खड़गसिंह : शाबाश! आपकी बहादुरी में कोई शक नहीं, मगर मैं इस समय वहाँ जाने की राय आपको नहीं दे सकता, क्या जाने कैसा मामला हो। आप इसी जगह कहीं ठहरें, मैं जाता हूँ, अगर बीरसिंह वहाँ होंगे तो जरूर अपने साथ ले आऊँगा, (कुछ सोच कर) मगर आपका यहाँ अकेले रहना भी मुनासिब नहीं।

नाहरसिंह : इसकी चिन्ता आप न करें। मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे साथी लोग इधर-उधर छिपे-लुके जरूर होंगे।

खड़गसिंह : अच्छा तो मैं अपने इन तीनों आदमियों को साथ लिए जाता हूँ।

अपने तीनों आदमियों को साथ ले खड़गसिंह राजमहल की तरफ रवाना हुए। वहाँ ड्योढ़ी पर के सिपाहियों ने राजा के हुक्म मुताबिक इन्हें रोका मगर खड़गसिंह ने किसी की कुछ न सुनी। ज्यादा हुज्जत करने का हौसला भी सिपाहियों को न हुआ, क्योंकि वे लोग जानते थे कि खड़गसिंह नेपाल के सेनापति हैं।

खड़गसिंह धड़धड़ाते हुए दीवानखाने में चले गए और ठीक उस समय वहाँ पहुँचे, जब राजा करनसिंह अपने दोनों मुसाहबों शम्भूदत्त और सरूपसिंह के साथ बातें कर रहा था और चार आदमी एक लाश उठाये हुए वहाँ पहुँचे थे। वह लाश बीरसिंह की ही थी और इस समय राजा के सामने रक्खी हुई थी। बीरसिंह मरा नहीं था, मगर बहुत ज्यादे जख्मी हो जाने के कारण बेहोश था।

यकायक खड़गसिंह को वहाँ पहुँचते देख राजा को ताज्जुब हुआ और वह कुछ हिचका, चेहरे पर खौफ की निशानी फैल गई। उसने बहुत जल्द अपने को सम्हाल लिया, उठ कर बड़ी खातिरदारी के साथ खड़गसिंह का इस्तकबाल किया और अपने पास बैठा कर बोला, “देखिए, बड़ी मेहनत और परेशानी से अपने प्यारे लड़के के खूनी बीरसिंह को, जिसे शैतान नाहरसिंह छुड़ा ले गया था, मैंने फिर पाया है।”

खड़गसिंह : खूनी के गिरफ्तार होने की मैं आपको बधाई देता हूँ। मैंने अच्छी तरह तहकीकात किया और निश्चय कर लिया कि बीरसिंह बड़ा ही शैतान और नमकहराम है। मैं अपने हाथ से इसका सिर काटूँगा। हाँ, मैं एक बात की और मुबारकबाद देता हूँ।

राजा : वह क्या?

खड़गसिंह : आपके भारी दुश्मन नाहरसिंह को भी इस समय मैंने गिरफ्तार कर लिया!

राजा : (खुश होकर) वाह-वाह, यह बड़ा काम हुआ! इसके लिए मैं जन्म-भर आपका अहसान मानूँगा, वह कहाँ है?

खड़गसिंह : सिपाहियों के पहरे में अपने लश्कर भेज दिया है। मैं मुनासिब समझता हूँ कि बीरसिंह को भी आप मेरे हवाले कीजिए और अपने आदमियों को हुक्म दीजिए कि इसे उठा कर मेरे डेरे में पहुँचा आवें। कल मैं एक दरबार करूँगा, जिसमें यहाँ की कुल रिआया को हाजिर होने का हुक्म होगा। उसी में महाराज नेपाल की तरफ से आपको एक पदवी दीं जाएगी और बिना कुछ ज्यादे पूछताछ किए इन दोनों को मैं अपने हाथ से मारूँगा। इसके सिवाय आपके दो-चार दुश्मन और भी हैं, उन्हें भी मैं उसी समय फाँसी का हुक्म दूँगा।

राजा: यह आपको कैसे मालूम हुआ कि मेरे और भी दुश्मन हैं?

खड़ग ० : महाराज नेपाल ने जब मुझको इधर रवाना किया तो ताकीद कर दी थी कि करनसिंह की मदद करना और खोज-खोज कर उनके दुश्मनों को मारना। हरिपुर की रिआया बड़ी बेईमान और चालबाज है, उन लोगों को चिढ़ाने के लिए मेरी तरफ से करनसिंह को यह पत्र और अधिराज की पदवी देना। उसी हुक्म के मुताबिक मैंने यहाँ पहुँच कर यहाँ के जमींदारों और सरदारों से मेल पैदा किया और उनकी गुप्त कमेटी में पहुँचा, जो आपके विपक्ष में हुआ करती है, बस फिर आपके दुश्मनों का पता लगाना क्या कठिन रह गया!

राजा : (हँस कर) आपने मेरे ऊपर बड़ी मेहरबानी की, मैं किसी तरह आपके हुक्म के खिलाफ नहीं कर सकता। आप मुझे अपना ताबेदार ही समझिए। क्या आप बता सकते हैं कि मेरे वे दुश्मन कौन हैं?

खड़गसिंह : इस समय मैं नाम न बताऊँगा, कल दरबार में आपके सामने ही सभों को कायल करके फाँसी का हुक्म दूँगा, वे लोग भी ताज्जुब करेंगे कि किस तरह उनके दिल का भेद ले लिया गया।

खड़गसिंह जब यकायक दीवानखाने में राजा के सामने जा पहुँचे, तो राजा बहुत ही घबड़ाया और डरा, मगर उसने तुरत अपने को सँभाला और जी में सोचा कि खड़गसिंह के साथ जाहिरदारी करनी चाहिए, अगर मौका देखूँगा तो इसी समय इन्हें भी खपा कर बखेड़ा तै करूँगा, किसी को कानोंकान खबर भी न होगी।

उधर खड़गसिंह के दिल में भी यकायक यही बात पैदा हुई। उसने सोचा कि मैं केवल तीन आदमी साथ लेकर यहाँ आ पहुँचा सो ठीक न हुआ। कहीं ऐसा न हो कि राजा मेरे साथ दगा करे, क्योंकि अभी थोड़ी ही देर हुई है, इस बात का पता लग चुका है कि कमेटी में एक आदमी राजा का पक्षपाती भी धोखा देकर घुसा हुआ है, उसकी जुबानी मेरी कुल कार्रवाई राजा को मालूम हो गई होगी। ताज्जुब नहीं कि वह इस समय दंगा करे। इन बातों को सोचकर बुद्धिमान खड़गसिंह ने फौरन अपना ढंग बदल दिया और मतलब-भरी बातों के फेर में राजा को ऐसा फँसा लिया कि वह चूँ तक न कर सका। उसे विश्वास हो गया कि खड़गसिंह मेरा मददगार है, इससे किसी तरह का उज्र करना मुनासिब नहीं।

उसने तुरन्त अपने आदमियों को हुक्म दिया कि बीरसिंह को उठाकर सेनापति खड़गसिंह के डेरे पर पहुँचा आओ। खड़गसिंह भी दीवानखाने के नीचे उतरे और सड़क पर पहुँच कर उन्होंने अपने साथी तीन बहादुरों में से दो को मरहम-पट्टी की ताकीद करके बीरसिंह के साथ जाने का हुक्म दिया तथा एक को अपने साथ लेकर उस तरफ बढ़े, जहाँ नाहरसिंह को छोड़ आए थे।

उस मकान से, जिसमें कमेटी हुई थी, थोड़ी दूर इधर ही खड़गसिंह ने नाहरसिंह को पाया। इस समय नाहरसिंह अकेला न था, बल्कि पांच आदमी और भी उसके साथ थे, जिन्हें देख खड़गसिंह ने पूछा, “कौन है, नाहरसिंह?”

इसके जवाब में नाहरसिंह ने कहा, “जी हाँ।”

खड़गसिंह : ये सब कौन हैं?

नाहरसिंह : मेरे साथियों में से जो इधर-उधर घूम रहे थे और इस इन्तजार में थे कि समय पड़ने पर मदद दें।

खड़गसिंह : इतने ही हैं या और भी?

नाहरसिंह : और भी हैं, यदि चाहूँ तो आधी घड़ी के अन्दर सौ बहादुर इकट्ठे हो सकते हैं।

खड़गसिंह : बहुत अच्छी बात है, क्योंकि आज यकायक लड़ाई हो जाना कोई ताज्जुब नहीं।

नाहरसिंह : बीरसिंह का पता लगा?

खड़गसिंह : हाँ, उन्हें जख्मी करके करनसिंह के आदमी ले गए थे, उसी समय मैं भी जा पहुँचा, फिर वह मुझसे क्योंकर छिपा सकता था? आखिर उन्हें अपने कब्जे में किया और अपने आदमियों के साथ अपने डेरे पर भिजवा दिया।

नाहरसिंह : बीरसिंह की कैसी हालत है?

खड़गसिंह : अच्छी हालत है, कोई हर्ज नहीं, जख्म लगे हैं, मालूम होता है, बहादुर ने लड़ने में कसर नहीं की। मेरे आदमियों ने पट्टी बाँध दी होगी। अब देर न करो चलो, सरदार लोग अभी तक बैठे मेरा इन्तजार कर रहे होंगे।

नाहरसिंह : जी हाँ, जब तक हम लोग न जायेंगे, वे लोग बेचैन रहेंगे। खड़ग सिंह के पीछे-पीछे अपने साथियों के साथ नाहरसिंह फिर उसी मकान में गया, जिसमें कमेटी बैठी थी। कुल सरदार और जमींदार अभी तक वहाँ मौजूद थे। खड़गसिंह को देख सब उठ खड़े हुए। खड़गसिंह ने बैठने के बाद अपनी बगल में नाहरसिंह को बैठाया और सब को बैठने का हुक्म दिया। नाहरसिंह ने अपने साथियों में से एक आदमी को अपने पास बैठाया, जो अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था।

अनिरुद्धसिंह : बीरसिंह का पता लगा ?

खड़गसिंह : हाँ, वह राजा के दगाबाज नौकरों के हाथ में फँस गया था, मैं वहाँ जाकर उसे छुड़ा लाया और अपने डेरे पर भेजवा दिया, अब बच्चनसिंह और हरिहरसिंह को भी पहरे के साथ हमारे लश्कर में भिजवा देना चाहिए।

तुरत हुक्म की तामील हुई, कई सिपाहियों को पहरे पर से बुलवा कर दोनों बेईमान उनके सुपुर्द किए गए और एक बहादुर सरदार उनके साथ पहुँचाने के लिए गया।

खड़गसिंह : (नाहरसिंह की तरफ देखकर) हाँ तो करनसिंह का लड़का जीता है? उसे तुम दिखा सकते हो?

नाहरसिंह : जी हाँ, उसके जीते रहने का एक सबूत तो मेरे पास इसी समय मौजूद है।

खड़गसिंह : वह क्या?

नाहरसिंह ने एक पत्र कमर से निकाल कर खड़गसिंह के हाथ में दिया और पढ़ने के लिए कहा। यह वही चिट्ठी थी जो नदी में तैरते हुए रामदास को गिरफ्तार करने बाद उसकी कमर से नाहरसिंह ने पाई थी। इसे पढ़ते ही गुस्से से खड़गसिंह की आंखें लाल हो गयीं।

खड़गसिंह : बेशक, यह कागज राजा के हाथ का लिखा हुआ है, फिर उसकी मोहर भी मौजूद है। इससे बढ़कर और किसी सबूत की हमें जरूरत नहीं। अब सूरजसिंह का पता न भी लगे तो कोई हर्ज नहीं। (अनिरुद्ध सिंह के हाथ में चीठी देकर) लो पढ़ो और बाकी सभी को भी पढ़ने को दो। एकाएकी वह चीठी सभों के हाथ में गई और सभी ने पढ़ कर इस बात पर अपनी प्रसन्नता प्रकट की कि बीरसिंह निर्दोष निकला।

अनिरुद्ध : (खड़गसिंह से) अब आपको मालूम हो गया कि हम लोगों की जो दरखास्त नेपाल गई थी, वह व्यर्थ न थी।

खड़गसिंह : बेशक, (नाहरसिंह की तरफ देख कर) हाँ, आपने कहा था कि बीरसिंह का असल हाल आप लोग नहीं जानते। वह कौन-सा हाल है, क्या आप कह सकते हैं?

नाहरसिंह : हाँ मैं कह सकता हूँ यदि आप लोग दिल लगा कर सुनें।

खड़गसिंह : जरूर सुनेंगे।

नाहरसिंह ने करनसिंह और करनसिंह राठू का हाल और अपने बचने का सबब जो बीरसिंह से कहा था, इस जगह खड़गसिंह और सब सरदारों के सामने कह सुनाया और इसके बाद बीरसिंह को कैद से छुड़ाने का हाल और अपनी बहिन सुन्दरी का भी वह पूरा हाल कहा जो तारा ने बाबाजी से बयान किया था। सुन्दरी का हाल बहुत-कुछ नाहरसिंह को पहिले से ही मालूम था, बाकी हाल जो तारा ने बीरसिंह से कहा था, वह बीरसिंह ने अपने बड़े भाई नाहरसिंह को सुनाया था। बीरसिंह यह नहीं जानता था कि उसकी स्त्री तारा ने जिस अहिल्या का हाल उससे कहा था, वह उसकी बहिन सुन्दरी ही थी। जब  बीरसिंह और नाहरसिंह में मुलाकात हुई और अपनी बहिन सुन्दरी का नाम नाहरसिंह से सुना तब मालूम हुआ कि अहिल्या या सुन्दरी ही वह बहिन है।

नाहरसिंह की जुबानी करनसिंह का किस्सा सुनकर सभी का जी बेचैन हो गया। आँखों में आँसू भर कर सभों ने लम्बी सांसें लीं और बेईमान करनसिंह राठू को गालियाँ देने लगे। थोड़ी देर तक सभों के चेहरे पर उदासी छाई रही, मगर फिर क्रोध ने सभों का चेहरा लाल कर दिया और सभों ने दांत पीस कर कहा कि हम लोग ऐसे नालायक राजा की ताबेदारी नहीं कर सकते, हम लोग अपने हाथों से राजा को सजा देंगे और असली राजा करनसिंह के लड़के विजयसिंह (नाहरसिंह) को यहाँ की गद्दी पर बैठावेंगे, हम लोग चन्दा करके रुपये बटोरेंगे और फौज तैयार करके विजयसिंह और बीरसिंह को सरदार बनावेंगे इत्यादि-इत्यादि।

जोश में आकर बहुत-सी बातें सरदारों ने कही और इसी समय खड़गसिंह ने भी, अपनी फौज के सहित, जो नेपाल से साथ लाए थे, बीरसिंह और नाहरसिंह की मदद करना कबूल किया।

नाहरसिंह : मेरी बहिन सुन्दरी का हाल थोड़ा-सा और बाकी है, जिसे आप चाहें तो सुन सकते हैं, यह हाल मुझे इनकी (अपने बगल में बैठे हुए साथी की तरफ इशारा करके) जुबानी मालूम हुआ है।

सरदार: हाँ हाँ, जरूर सुनेंगे, ये कौन हैं?

नाहरसिंह : यह अपना हाल खुद आप-लोगों से बयान करेंगे।

खड़गसिंह : मगर इनको चाहिए कि अपने चेहरे से नकाब हटा दें।

नाहरसिंह के ये साथी महाशय जो उनके- बगल में बैठे हुए थे वे ही बाबू साहब थे जो गोद में एक लड़के-को लेकर, सुन्दरी से मिलने के लिए. किले के अन्दर तहखाने में गए थे। इन्हें पाठक अभी भूले न होंगे। खड़गसिंह के कहते ही बाबू साहब ने “कोई हर्ज नहीं” कहकर अपने चेहरे से. नकाब हटा दी और बेचारी सुन्दरी का बाकी-किस्सा कहने लगे. इन्हें इस शहर में कोई भी पहिचानता नहीं था।

बाबू साहब: सुन्दरी अहिल्या के नाम से बहुत दिनों तक इस नालायक राजा के यहाँ रही। राजा की पाप-भरी आँखों का अन्दाज रानी को मालूम हो गया और उसने चुपके-से सुन्दरी को अपने नैहर भेज कर बाप को कहला भेजा कि उसकी शादी करा दी जाये। सुन्दरी की शादी मेरे साथ को गई और वह बहुत दिनों तक मेरे घर में रही, एक लड़की और उसके बाद एक लड़का भी पैदा हुआ। तब तक राजा को सुन्दरी का पता न लगा मगर वह खोज लगाता ही रहा, आखिर मालूम होने पर उसने सुन्दरी को चुरा मंगाया और उसके साथ जिस तरह का बर्ताव किया आप बहादुर विजयसिंह की जुबानी सुन ही चुके हैं। बेचारी लड़की जिस तरह से मारी गई उसे याद करने से कलेजा फटता है। सुन्दरी को राजी करने के लिए राजा ने बहुत-कुछ उद्योग किया मगर उस बेचारी ने अपना धर्म न छोड़ा। आखिर राजा ने उसे गुप्त रीति से किले के अन्दर के एक तहखाने में बन्द किया और उसकी लड़की का खून एक कटोरे में भरकर और मसाले से जमा कर एक चौकी पर उसके सामने रख दिया जिसमें वह दिन-रात उसे देखा करे और कुढ़ा करे। आप लोग खूब समझ सकते हैं कि उस बेचारी की क्या हालत होगी और उस कटोरे-भर खून की तरफ देख-देख कर उसके दिल पर क्या गुजरती होगी, मगर वाह रे सुन्दरी! फिर भी उसने अपना धर्म न छोड़ा!!

बाबू साहब ने इतना ही कहा था कि सभों के मुँह से “वाह रे सुन्दरी, शाबाश, शाबाश! धर्म पर दृढ़ रहने वाली औरत तेरे ऐसी कोई काहे को होगी!” की आवाज आने लगी। बाबू साहब ने फिर कहना शुरू किया–

बाबू साहब० : जब सुन्दरी कैदखाने में बेबस की गई तो कई लौंडियाँ उसकी हिफाजत के लिए छोड़ी गयीं। उनमें से एक लौंडी सुन्दरी पर दया करके और अपनी जान पर खेल के वहाँ से निकल भागी। उसने मेरे पास पहुँच कर सब हाल कहा और अन्त में उसने सुन्दरी का यह संदेशा मुझे दिया कि लड़के को लेकर तुम्हें एक नजर देखने के लिए बुलाया है, जिस तरह बने आकर मिलो! सुन्दरी का हाल सुन मेरा कलेजा फट गया। मैं इस शहर में आया और उससे मिलने का उद्योग करने लगा इस फेर में बरस-भर से ज्यादा बीत गया, बहुत-सा रुपया खर्च किया और कई आदमियों को अपना पक्षपाती बनाया, आखिर दो ही चार दिन हुए हैं कि किसी तरह छोटे बच्चे को, जो नालायक राजा के हाथ से बच गया और मेरे पास था, लेकर किले के अन्दर तहखाने में गया और उससे मिला। कैदखाने में उसकी जैसी अवस्था मैंने देखी, कह नहीं सकता। इत्तिफाक से उसी दिन नाहरसिंह ने बीरसिंह को कैदखाने से छुड़ाया था और यह हाल मुझे मालूम था, बल्कि बीरसिंह के छुड़ाने की खबर कई पहरे वालों को भी लग गई थी, मगर वे लोग राजा के दुश्मन और बीरसिंह के पक्षपाती हो रहे थे, इसलिए नाहरसिंह के काम में विघ्न न पड़ा।

सुन्दरी जानती थी कि बीरसिंह उसका भाई है मगर राजा के जुल्म ने उसे हर तरह से मजबूर कर रखा था। बीरसिंह के कैद होने का हाल सुन कर सुन्दरी और भी बेचैन हुई, मगर जब मैंने उसके छूटने का हाल कहा तो कुछ खुश हुई। मैं तहखाने में सुन्दरी से बातचीत कर ही रहा था कि राजा का मुसाहब बेईमान हरीसिंह वहाँ जा पहुँचा। उस समय सुन्दरी मेरी और अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो गई। आखिर हरीसिंह उसी समय मुझसे लड़ कर मारा गया और मैं उसकी लाश एक कम्बल में बाँध और लड़के को एक लौंडी की गोद में दे और उसे साथ ले तहखाने के बाहर निकला और मैदान में पहुँचा। वहाँ नाहरसिंह के दो आदमियों से मुलाकात हुई। मुझे नाहरसिंह तथा बीरसिंह से मिलने का बहुत शौक था और उन लोगों ने भी मुझे अपने साथ ले चलना मंजूर किया। आखिर हरीसिंह की लाश गाड़ दी गई, लौंडी वापस कर दी गई, और मैं लड़के को लेकर उन दो आदमियों के साथ नाहरसिंह की तरफ रवाना हुआ। उसी समय राजा के कई सवार भी वहाँ आ पहुँचे जो नाहरसिंह की खोज में घोड़ा फेंकते उसी तरफ जा रहे थे। हम लोगों को तो डर हुआ कि अब गिरफ्तार हो जायेंगे, मगर ईश्वर ने बचाया। एक पुल के नीचे छिप कर हम लोग बच गए और नाहरसिंह और बीरसिंह से मिलने की नौबत आई।

खड़गसिंह : लड़का अब कहाँ है?

बाबू साहब: (नाहरसिंह की तरफ इशारा कर के) इनके आदमियों के सुपुर्द है।

खड़गसिंह : तुम लोगों का हाल बड़ा ही दर्दनाक है, सुनने से कलेजा काँपता है। लेकिन अभी तक यह नहीं मालूम हुआ कि बेचारी तारा कहाँ है और उस पर क्या बीती?

नाहरसिंह: तारा का हाल मुझे मालूम है मगर मैंने अभी तक बीरसिंह से नहीं कहा।

एक सरदार : तो इस समय भी उसका कहना शायद आप मुनासिब न समझते हों।

नाहरसिंह : कहने में कोई हर्ज भी नहीं।

खड़गसिंह : तो कहिये।

नाहरसिंह : ऊपर के हाल से आपको इतना तो जरूर मालूम हो ही गया होगा कि बेईमान राजा ने तारा के बाप सुजनसिंह को इस बात पर मजबूर किया था कि वह तारा का सिर काट लावे।

खड़गसिंह : हाँ, इसलिए कि सुजनसिंह ने दीवानखाने की छत पर से लौंडियों को तो गिरफ्तार किया मगर तारा को छोड़ दिया था।

नाहरसिंह : ठीक है,राजा यह भी चाहता था कि तारा यदि राजा के साथ रहना स्वीकार करे तो उसकी जान छोड़ दी जाये। इस काम के लिए: समझाने-बुझाने पर हरीसिंह मुकर्रर किया गया था, मगर तारा ने कबूल न किया। जिस समय बीरसिंह के बाग में सुजनसिंह अपनी लड़की तारा की छाती पर सवार हो उसे मारा चाहता था, मैं भी वहाँ मौजूद था, उसी समय एक साधु महाशय भी वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने मेरी मदद से तारा को छुड़ाया। इस समय तारा उन्हीं के यहाँ है।

खड़गसिंह : आपने एक साधु फकीर की हिफाजत में तारा को क्यों छोड़ दिया? उस साधु का क्या भरोसा?

नाहरसिंह : उस साधु का मुझे बहुत भरोसा है। वे बड़े ही महात्मा हैं। यह तो मैं नहीं जानता कि वे कहाँ के रहने वाले हैं. मगर वे किसी से बहुत मिलते-जुलते नहीं, निराले जंगल में रहा करते हैं, मुझ पर बड़ा ही प्रेम रखते हैं, मैंने सब हाल उनसे कह दिया है और अक्सर उन्हीं की राय से सब काम किया करता हूँ, उनके खाने-पीने का इन्तजाम भी मैं ही करता हूँ।

खड़गसिंह : क्या मैं उनसे मुलाकात कर सकता हूँ?

नाहरसिंह : इस बात को तो शायद वह नामंजूर करें। (आसमान की तरफ देख कर) अब तो सवेरा हुआ ही चाहता है, मेरा शहर में रहना मुनासिब नहीं।

खड़गसिंह : अगर आप मेरे यहाँ रहें तो कोई हर्ज भी नहीं है।

नाहरसिंह : ठीक है, मगर ऐसा करने से कुछ विशेष लाभ भी नहीं है, बीरसिंह को मैं आपके सुपुर्द करता हूँ और बाबू साहब को अपने साथ लेकर जाता हूँ फिर जब और जहाँ कहिये हाजिर होऊँ?

खड़गसिंह : खैर, ऐसा ही सही मगर एक बात और सुन लो।

नाहरसिंह : वह क्या?

खड़गसिंह : उस समय जब मैं बीरसिंह को छुड़ाने के लिए राजा के पास गया था तो समयानुसार मुनासिब समझ कर उसी के मतलब की बातें की थीं। मैं कह आया था कि कल एक आम दरबार करूँगा और तुम्हारे दुश्मनों तथा बीरसिंह को फाँसी का हुक्म दूँगा, उसी दरबार में महाराज नेपाल की तरफ से तुमको “अधिराज” की पदवी भी दी जायेगी। यह बात मैंने कई मतलबों से कही थी। इस बारे में तुम्हारी क्या राय है ?

नाहरसिंह : बात तो बहुत अच्छी है। इस दरबार में बड़ा मजा रहेगा, कई तरह के गुल खिलेंगे मगर साथ ही इसके फसाद भी खूब मचेगा, ताज्जुब नहीं कि राजा बिगड़ जाये और लड़ाई हो पड़े, इससे मेरी राय है कि कल का दिन आप टाल दें और लड़ाई का पूरा बन्दोबस्त कर लें, इस बीच मैं भी अपने को हर तरह से दुरुस्त कर लूँगा।

खड़गसिंह : (और सरदारों की तरफ देख कर) आप लोगों की क्या राय है?

सरदार : नाहरसिंह का कहना बहुत ठीक है, हम लोगों को लड़ाई के लिये तैयार हो कर ही दरबार में जाना चाहिए। हम लोग भी अपने सिपाहियों की दुरुस्ती करना चाहते हैं, कल का दिन टल जाये तभी अच्छा है।

खड़गसिंह : खैर, ऐसा ही सही।

गुप्त रीति से राय के तौर परे दो-चार बातें और करने के बाद दरबार बर्खास्त किया गया। बाबू साहब को साथ लेकर नाहरसिंह चला गया। सरदार लोग भी अपने-अपने घर की तरफ रवाने हुए, खड़गसिंह अपने डेरे पर आये और बीरसिंह को होश में पाया, उनसे सब हाल कहा-सुना और उनका इलाज कराने लगे।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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