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दूसरे दिन यह बात अच्छी तरह से मशहूर हो गई कि वह बाबाजी जिन्हें देख करनसिंह राठू डर गया था, बीरसिंह के बाप करनसिंह थे। उन्हीं की जुबानी मालूम हुआ कि जिस समय राठू ने सुजनसिंह की मार्फत करनसिंह को जहर दिलवाया उस समय करनसिंह के साथियों को राठू ने मिला लिया था। मगर- चार-पाँच आदमी ऐसे भी थे, जो जाहिर में तो मौका देख कर मिल गए थे, पर दिल से उसकी तरफ न थे। जिस समय जहर के असर से करनसिंह बेहोश हो गए, उस समय जान निकलने के पहिले ही उनके मरने का गुल मचा कर राठू ने उन्हें जमीन में गड़वा दिया और तुरत वहाँ से कूच कर गया था। राठू के कूच करते ही धनीसिंह नामी एक राजपूत अपने नौकरों को साथ लेकर जान-बूझ के पीछे रह गया। उसने जमीन खोद कर करनसिंह को निकाला और उनकी जान बचाई।

जहर के असर ने पाँच बरस तक करनसिंह को चारपाई पर डाल रक्खा। वे पाँच बरस तक दूसरे शहर में रहे और फिर फकीर हो गये मगर राठू की फिक्र में लगे रहे। जब नाहरसिंह का नाम मशहूर हुआ तब हरिपुर के पास ही जंगल में आ बसे और नाहरसिंह से मुलाकात पैदा की मगर अपना नाम न बताया।

करनसिंह को बचाने वाला धनीसिंह तो मर गया था मगर उसका छोटा भाई अनिरुद्ध सिंह (रईसों और सरदारों की कमेटी में इसका नाम आ चुका है) इसी शहर में रहता है, जिसकी गिनती रईसों में है। उसको भी इनमें की बहुत-सी बातें मालूम हैं, और वह हमेशा बीरसिंह का पक्षपाती रहा, मगर समय पर ध्यान देकर करनसिंह का हाल उसने किसी से न कहा।

आज बड़ी खुशी का दिन है कि करनसिंह ने अपने दोनों लड़के, लड़की और दामाद को नाती सहित पाया और छोटे लड़के को राजसिंहासन पर देखा। इस जगह लोग पूछ सकते हैं कि करनसिंह सिंहासन पर क्यों नहीं बैठे या बड़े भाई के रहते छोटे भाई को गद्दी क्यों दी गई? इसके लिए थोड़ा-सा यह लिख देना जरूरी है कि जब करनसिंह, खड़गसिंह और बिजयसिंह एकान्त में मिले थे तो इस विषय की बातचीत हो, चुकी थी। करनसिंह ने राज्य करने से इन्कार किया था, बिजयसिंह ने भी कबूल नहीं किया और कहा कि अभी तक मेरी शादी नहीं हुई और न शादी करूँगा ही अस्तु यह बात पहिले ही से पक्की हो चुकी थी कि बीरसिंह को गद्दी दी जाये।

राजमहल से राठू के वे रिश्तेदार जिन्होंने बीरसिंह की शरण चाही, निकाल कर दूसरे मकान में रख दिए गए और उनके खाने-पीने का बन्दोबस्त कर दिया गया। अब राजमहल में वही सुन्दरी जो तहखाने के अन्दर कैद रह कर मुसीबत के दिन काटती थी और तारा जो असली करनसिंह (बाबाजी) के कब्जे में थी रहने लगीं, मगर राठू के लड़के सूरजसिंह का कहीं पता न लगा, न-मालूम वह किसके यहाँ भेज दिया गया था या किस जगह छिपा कर रक्खा गया था। रामदास ने आत्महत्या की। आँखों की तकलीफ से पांच ही सात दिन में राठू यमलोक की तरफ चल बसा और बीरसिंह ने बड़ी नेकनामी से राज्य चलाया।

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कटोरा भर खून खंड-16 (आखिरी)

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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