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दूसरे दिन शाम को खण्डहर के सामने घास की सब्जी पर बैठे हुए बीरसिंह और नाहरसिंह आपस में बातें कर रहे हैं! सूर्य अस्त हो चुका है, सिर्फ उसकी लालिमा आसमान पर फैली हुई है। हवा के झोंके बादल के छोटे-छोटे टुकड़ों को आसमान पर उड़ाये लिए जा रहे हैं। ठंडी-ठंडी हवा जंगली पत्तों को खड़खड़ाती हुई इन दोनों तक आती और हर खण्ड की दीवार से टक्कर खाकर लौट जाती है। ऊँचे-ऊँचे सलई के पेड़ों पर बैठे हुए मोर आवाज लड़ा रहे हैं और कभी-कभी पपीहे की आवाज भी इन दोनों के कानों तक पहुँच कर समय की खूबी और मौसिम के बहार का सन्‍देशा दे रही है। मगर ये चीजें बीरसिंह और नाहरसिंह को खुश नहीं कर सकतीं। वे दोनों अपनी धुन में न-मालूम कहाँ पहुँचे हुए और क्या सोच रहे हैं।

यकायक बीरसिंह ने चौंक कर नाहरसिंह से पूछा–

बीर० : खैर, जो भी हो, आप उस करनसिंह का किस्सा तो अब अवश्य कहें, जिसके लिए रात वादा किया था।

नाहर० : हाँ, सुनो, मैं कहता हूँ, क्योंकि सबके पहले उस किस्से का कहना ही मुनासिब समझता हूँ।

करनसिंह का किस्सा

पटने का रहने वाला एक छोटा-सा जमींदार, जिसका नाम करनसिंह था, थोड़ी-सी जमींदारी में खुशी के साथ अपनी जिंदगी बिताता और बाल-बच्चों में रह कर सुख भोगता था। उसके दो लड़के और एक लड़की थी। हम उस समय का हाल कहते हैं, जब उसके बड़े लड़के की उम्र बारह वर्ष की थी। इत्तिफाक से दो साल की बरसात बहुत खराब बीती और करनसिंह के जमींदारी की पैदावार बिल्कुल ही मारी गई। राजा की मालगुजारी सिर पर चढ़ गई, जिसके अदा होने की सूरत न बन पड़ी। वहाँ का राजा बहुत ही संगदिल और जालिम था। उसने मालगुजारी में से एक कौड़ी भी माफ न की और न अदा करने के लिए कुछ समय ही दिया। करनसिंह की बिल्कुल जायदाद जब्त कर ली, जिससे वह बेचारा हर तरह से तबाह और बर्बाद हो गया।

करनसिंह का एक गुमाश्ता था, जिसको लोग करनसिंह राठू या कभी-कभी सिर्फ राठू कह कर पुकारते थे। लाचार होकर करनसिंह ने स्त्री का जेवर बेच पाँच सौ रुपये का सामान किया। उसमें से तीन सौ अपनी स्त्री को देकर उसे करनसिंह राठू की हिफाजत में छोड़ा और दो सौ आप लेकर रोजगार की तलाश में पटने से बाहर निकला। उस समय नेपाल की गद्दी पर महाराज नारायणसिंह बिराज रहे थे, जिनकी नेकनामी और रिआयापरवरी की धूम देशान्तर में फैली हुई थी। करनसिंह ने भी नेपाल ही का रास्ता लिया। थोड़े ही दिन में वहाँ पहुँच कर वह दरबार में हाजिर हुआ और पूछने पर उसने अपना सच्चा-सच्चा हाल राजा से कह सुनाया। राजा को उसके हाल पर तरस आया और उसने करनसिंह को मजबूत, ताकतवर और बहादुर समझ कर फौज में भरती कर लिया।

उन दिनों नेपाल की तराई में दो-तीन डाकुओं ने बहुत ही जोर पकड़ रखा था, करनसिंह ने स्वयं उनकी गिरफ्तारी के लिए आज्ञा मांगी, जिससे राजा बहुत ही प्रसन्न हुआ और दो सौ आदमियों को साथ देकर करनसिंह को डाकुओं की गिरफ्तारी के लिए रवाने किया। छ: महीने के अरसे में एकाएकी करके करनसिंह ने तीनों डाकुओं को गिरफ्तार किया, जिससे राजा के यहाँ उसकी इज्जत बहुत बड़ गई और उन्होंने प्रसन्न होकर हरिपुर का इलाका उसे दे दिया, जिसकी आमदनी मालगुजारी देकर चालीस हजार से कम न थी, साथ ही उन्होंने एक आदमी को इस काम के लिए तहसीलदार मुकर्रर करके हरिपुर भेज दिया कि वह वहाँ की आमदनी वसूल करे और मालगुजारी देकर जो कुछ बचे, करनसिंह को दे दिया करे।

अब करनसिंह की इज्जत बहुत बढ़ गई और वह नेपाल की फौज का सेनापति मुकर्रर किया गया। अपने को ऐसे दर्जे पर पहुँचा देख करनसिंह ने पटने से अपनी जोरू और लड़के-लड़कियों को करनसिंह राठू के सहित बुलवा लिया और खुशी से दिन बिताने लगा।

दो वर्ष का जमाना गुजर जाने के बाद तिरहुत के राजा ने बड़ी धूमधाम से नेपाल पर चढ़ाई की जिसका नतीजा यह निकला कि करनसिंह ने बड़ी बहादुरी से लड़कर तिरहुत के राजा को अपनी सरहद के बाहर भगा दिया और उसको ऐसी शिकस्त दी कि उसने नेपाल को कुछ कौड़ी देना मंजूर कर लिया। नेपाल के राजा नारायणसिंह ने प्रसन्न होकर करनसिंह की नौकरी माफ कर दी और पुश्तहापुश्त के लिए हरिपुर का भारी परगना लाखिराज करनसिंह के नाम लिख दिया और एक परवाना तहसीलदार के नाम इस मजमून का लिख दिया कि वह परगने हरिपुर पर करनसिंह को दखल दे दे और खुद नेपाल लौट आवे।

नेपाल से रवाने होने के पहले ही करनसिंह की स्त्री ने बुखार की बीमारी से देह-त्याग कर दिया, लाचार करनसिंह ने अपने दोनों लड़कों और लड़की तथा करनसिंह राठू को साथ ले हरिपुर का रास्ता लिया।

करनसिंह राठू की नीयत बिगड़ गई। उसने चाहा कि अपने मालिक करनसिंह को मार कर राजा नेपाल के दिए परवाने से अपना काम निकाले और खुद हरिपुर का मालिक बन बैठे। उसको इस बात पर भरोसा था कि उसका नाम भी करनसिंह है मगर उम्र में वह करनसिंह से सात वर्ष छोटा था।

करनसिंह राठू को अपनी नीयत पूरी करने में तीन मुश्किलें दिखाई पड़ीं। एक तो यह कि हरिपुर का तहसीलदार अवश्य पहिचान लेगा कि यह करनसिंह सेनापति नहीं है। दूसरे यह करनसिंह सेनापति का लड़का जिसकी उम्र पन्द्रह वर्ष की हो चुकी थी, इस काम में बाधक होगा और नेपाल में खबर कर देगा, जिससे जान बचनी मुश्किल हो जाएगी। तीसरे, खुद करनसिंह की मुस्तैदी से वह और भी काँपता था।

जब करनसिंह रास्ते ही में थे तब ही खबर पहुँची कि हरिपुर का तहसीलदार आ गया । एक दूत यह खबर लेकर नेपाल जा रहा था जो रास्ते में करनसिंह सेनापति से मिला। करनसिंह ने राठू के बहकाने से उसे वहीं रोक लिया और कहा कि अब नेपाल जाने की जरूरत नहीं है।

अब करनसिंह राठू की बदनीयती ने और भी जोर मारा और उसने खुद हरिपुर का मालिक बनने के लिए यह तरकीब सोची कि करनसिंह सेनापति के साथियों को बड़े-बड़े ओहदे और रुपये के लालच से मिला ले और करनसिंह को मय उसके लड़कों और लड़की के किसी जंगल में मारकर अपने ही को करनसिंह सेनापति मशहूर करे और उसी परवाने के जरिये से हरिपुर का मालिक बन बैठे, मगर साथ ही इसके यह भी खयाल हुआ कि करनसिंह के दोनों लड़कों और लड़की के एक साथ मरने की खबर जब नेपाल पहुँचेगी तो शायद वहाँ के राजा को कुछ शक हो जाये। इससे बेहतर यही है कि करनसिंह सेनापति और उसके बड़े लड़के को मार कर अपना काम चलावे और छोटे लड़के और लड़की को अपना लड़का और लड़की बनावे, क्योंकि ये दोनों नादान हैं, इस पेचीले मामले को किसी तरह समझ नहीं सकेंगे और हरिपुर की रिआया भी इनको नहीं पहिचानती, उन्हें तो केवल परवाने और करनसिंह नाम से मतलब है।

आखिर उसने ऐसा ही किया और करनसिंह सेनापति के साथी सहज ही में राठू के साथ मिल गए। करनसिंह राठू ने करनसिंह सेनापति को तो जहर देकर मार डाला और उसके बड़े लड़के को एक भयानक जंगल में पहुँचकर जख्मी करके एक कुएँ में डाल देने के बाद खुद हरिपुर की तरफ रवाना हुआ। रास्ते में उसने बहुत दिन लगाए, जिसमें करनसिंह सेनापति का छोटा लड़का उससे हिल-मिल जाए।

हरिपुर में पहुँच कर उसने सहज ही में वहाँ अपना दखल जमा लिया। करनसिंह सेनापति के लड़के और लड़की को थोड़े दिन तक अपना लड़का और लड़की मशहूर करने के बाद फिर उसने एक दोस्त का लड़का और लड़की मशहूर किया । उसके ऐसा करने से रिआया के दिल में कुछ शक पैदा हुआ मगर वह कुछ कर न सकी क्योंकि करनसिंह साल में पाँच-छ: मर्तबे अच्छे-अच्छे तोहफे नेपाल भेजकर वहाँ के राजा को अपना मेहरबान बनाये रहा। यहाँ तक कि कुछ दिन बाद नेपाल का राजा, जिसने करनसिंह को हरिपुर की सनद दी थी, परलोक सिधारा और उसका भतीजा गद्दी पर बैठा। तब से करनसिंह राठू और भी निश्चिंत हो गया और रिआया पर भी जुल्म करने लगा। वही करनसिंह राठू आज हरिपुर का राजा है, जिसके पंजे में तुम फँसे हुए थे। कहो, ऐसे नालायक राजा के साथ अगर मैं दुश्मनी करता हूँ तो क्या बुरा करता हूँ?

बीर० : (कुछ देर चुप रहने के बाद) बेशक, वह बड़ा मक्कार और हरामजादा है। ऐसों के साथ नेकी करना तो मानो नेकों के साथ बदी करना है ! !

नाहर० : बेशक, ऐसा ही है।

बीर० : मगर आपने यह नहीं कहा कि अब करनसिंह सेनापति के लड़के कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं?

नाहर० : क्या इस भेद को भी मैं अभी खोल दूं?

बीर०: हाँ, सुनने को जी चाहता है।

नाहर० : करनसिंह सेनापति के छोटे लड़के तो तुम ही हो मगर तुम्हारी बहिन का हाल नहीं मालूम। पारसाल तक तो उसकी खबर मालूम थी, मगर इधर साल-भर से न-मालूम वह मार डाली गई या कहीं छिपा दी गई।

इतना हाल सुनकर बीरसिंह रोने लगा, यहाँ तक कि उसकी हिचकी बँध गई। नाहरसिंह ने बहुत-कुछ समझाया और दिलासा दिया। थोड़ी देर बाद बीरसिंह ने अपने को संभाला और फिर बातचीत करने लगा।

बीर० : मगर कल आपने कहा था कि तुम्हारी उस बहिन से मिला देंगे, जिसके बदन में सिवाय हड्डी के और कुछ नहीं रह गया है। क्या वह मेरी वही बहिन है, जिसका हाल आप ऊपर के हिस्से में कह गए हैं?

नाहर० : बेशक वही है।

बीर० : फिर आप कैसे कहते हैं कि साल-भर से उसका पता नहीं है?

नाहर० : यह इस सबब से कहता हूँ कि उसका ठीक पता मुझे मालूम नहीं है, उड़ती-सी खबर मिली थी कि वह किले ही के किसी तहखाने में छिपाई गई है और सख्त तकलीफ में पड़ी है। मैं कल किले में जाकर उसी भेद का पता लगाने वाला था, मगर तुम्हारे ऊपर जुल्म होने की खबर पाकर वह काम न कर सका और तुम्हारे छुड़ाने के बन्दोबस्त में लग गया।

बीर० : उसका नाम क्या है?

नाहर० : सुंदरी।

तीर०: तो आपको उम्मीद है कि उसका पत्ता जल्द लग जाएगा?

नाहर० : अवश्य।

बीर० : अच्छा, अब मुझे एक बात और पूछना है।

नाहर० : वह क्या?

बीर० : आप हम लोगों पर इतनी मेहरबानी क्यों कर रहे हैं और हम लोगों के सबब राजा के दुश्मन क्यों बन बैठे हैं?

नाहर० : (कुछ सोचकर ) खैर, इस भेद को भी छिपाए रहना अब मुनासिब नहीं है। उठो, मैं तुम्हें अपने गले लगाऊँगा तो कहूँ।(बीरसिंह को गले गला कर) तुम्हारा बड़ा भाई मैं ही हूँ, जिसे राठू ने जख्मी करके कुएं में डाल दिया था! ईश्वर ने मेरी जान बचाई और एक सौदागर के काफिले को वहाँ पहुँचाया, जिसने मुझे कुएँ से निकाला। असल में मेरा नाम विजयसिंह है। राजा से बदला लेने के लिए इस ढंग से रहता हूँ। मैं डाकू नहीं हूँ और सिवाय राजा के किसी को दुःख भी नहीं देता, केवल उसी की दौलत लूट कर अपना गुजारा करना हूँ।

बीरसिंह को भाई के मिलने की खुशी हद से ज्यादा हुई और घड़ी-घड़ी उठ कर कई दफे उन्हें गले लगाया। थोड़ी देर और बातचीत करने के बाद वे दोनों उठ कर खंडहर में चले गए और अब क्या करता चाहिए यह सोचने लगे।

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कटोरा भर खून खंड-7

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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