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पारसनाथ बाजार को तय करता हुआ ऐसी जगह पहुँचा, जहाँ से बहुत तंग और गंदी गलियों का सिलसिला जारी होता था और इन गलियों में घूमता हुआ एक उजाड़ मुहल्ले में पहुँचा, जहाँ दिन-दोपहर के समय भी आदमियों को जाते डर मालूम पड़ता था। यहाँ पर एक मजबूत मगर पुराना मकान था जिसके दरवाजे पर पहुँचकर पारसनाथ ने कंडी खटखटाई। थोड़ी देर बाद किसी ने भीतर से पूछा, ‘कौन है?” इसके जवाब में पारसनाथ ने कहा, ‘गूलर का फूल!”

      दरवाजा खुला और पारसनाथ उसके अंदर चला गया। इसके बाद मकान का दरवाजा भी बंद हो गया। इस मकान की भीतरी कैफियत बयान करने की इस समय कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हम मुख्तसर ही में उन बातों को बयान करना चाहते हैं जिन्हें असल फैक्ट कह सकते हैं।

      एक लंबे-चौड़े दालान में पारसनाथ के कई दोस्त और मददगार बैठे आपस में बातें और दम-दम-भर पर गाँजे का दम लगाकर मकान को सुवासित कर रहे थे। इसी मंडली में हमारा पुराना परिचित हरिहरसिंह भी बैठा हुआ था।’

       पारसनाथ क्या देखकर सब उठ खड़े हुए और हरिहरसिंह ने बड़ी खातिर से पास बैठाकर करना शुरू किया।

 हरिहरसिंह : कहो दोस्त, क्या रंग-ढंग है?

 पारसनाथ: बहुत अच्छा  है।  आनंद-ही-आनंद दिखता है। हमारे मामले का पुराना कोढ़ भी निकल गया और अब हम लोग इस तरह से बेफिक्र होकर अपना काम करने लायक हो गए।

 हरिहरसिंह : (चौंककर) कहो-कहो, जल्दी कहो क्या हुआ ! वह कोढ़ कौन-सा था और कैसे निकल गया?

 दूसरा. : हाँ यार, सुनाओ तो सही, यह तो तुम बड़ी खुशखबरी लाए!

पारसनाथ:  बेशक खुशखबरी की बात है, बल्कि यों कहना चाहिए कि हम लोगों के लिए इससे बढ़कर खुशखबरी हो ही नहीं सकती।

हरिहरसिंह: भला कुछ कहो भी कि यों ही जी ललचाया करोगे !

पारसनाथ:  सच यों है कि दम लगा लेंगे तभी कुछ कहेंगे।

दूसरा : (तैयार चिलम पारसनाथ की तरफ बढ़ाकर) लीजिए दम भी तैयार है, मलते -मलते मोम कर डाला है।

पारसनाथ:  (दम लगाकर) हम लोगों को अपने कमबख़्त चचा लालसिंह का बड़ा ही डर लगा हुआ था। यह सोचते थे कि कहीं ऐसा न हो कि कमबख़्त दूसरा ही वसीयतनामा लिखकर हमारी सब मेहनत की मिट्टी कर दे, ऐसी हालत में सरला की शादी दूसरे के साथ हो जाने पर भी इच्छानुसार लाभ न होता और इसी सबब से हम लोग उसे मार डालने का विचार भी कर रहे थे।

तीसरा: हाँ-हाँ, तो क्या हुआ, वह मर गया?।

पारसनाथ:  मरा तो नहीं पर मरे के बराबर हो गया।

हरिहरसिंह : सो कैसे? तुमने तो कहा था कि वह कहीं चला गया।

पारसनाथ:  हाँ ठीक है, ऐसा ही हुआ था, मगर आज उसके हाथ की लिखी हुई एक चिट्ठी मुझे मिली जिसे एक आदमी लेकर मेरे पास आया था।

हरिहरसिंह : उसमें क्या लिखा था?।

पारसनाथ:  (जेब से चिट्ठी निकालकर और हरिहरसिंह का दिखाकर) लो जो कुछ है पढ़ लो और हमारे इन दोस्तों को भी सुना दो।

हरिहरसिंह : (चिट्ठी पढ़कर) बस-बस-बस, अब हमारा काम हो गया। जब उसने संन्यास ही ले लिया, तब उसे अपनी जायदाद पर किसी तरह का अधिकार न रहा और न वह किसी तरह का वसीयतनामा ही लिख सकता है, ऐसी अवस्था में केवल सरला की शादी ही किसी दूसरे के साथ हो जाने से काम चल जाएगा और किसी को किसी तरह का उज्र  न रहेगा। मगर एक बात की कसर जरूर रह जाएगी।

पारसनाथ:  वह क्या?

हरिहरसिंह : यही कि शादी हो जाने के बाद सरला अपने मुँह से किसी बड़े बुजुर्ग या प्रतिष्ठित आदमी के सामने कह दे कि ‘यह शादी मेरी प्रसन्नता से हुई है।’

पारसनाथ:  हाँ, यह बात बहुत जरूरी है मगर मैं इसका भी पूरा-पूरा बंदोबस्त कर चुका हूँ।

हरिहरसिंह : वह क्या?

पारसनाथ:  बाँदी ने इस काम के लिए एक बुड्ढी खन्नास को ठीक कर दिया है। वह सरला को दूसरे के साथ शादी करने पर राजी कर लेगी।

हरिहरसिंह: मगर मुझे विश्वास नहीं होता कि सरला इस बात को मंजूर कर लेगी या किसी के कहने-सुनने में आ जाएगी। उस रोज खुद तुम्हीं ने सरला से बातें करके देख लिया है।

पारसनाथ:  ठीक है, मगर उसके लिए बाँदी की माँ ने जो चालाकी खेली हैं, वह भी साधारण नहीं है।

हरिहरसिंह : सो क्या?

पारसनाथ:  उसने हरनंदन से एक चिट्ठी लिखवा ली है कि ‘मुझे सरला के साथ शादी करना स्वीकार नहीं है। जो नौजवान और कुँवारी लड़की घर से निकलकर कई दिन तक गायब रहे, उसके साथ शादी करना धर्मशास्त्र के विरूद्ध है, इत्यादि।’ इसके अतिरिक्त हरनंदन ने उस चिट्ठी में और भी ऐसी कई गंदी बातें लिखी हैं जिन्हें पढ़ते ही सरला आग हो जाएगी और हरनंदन का मुँह देखना भी पसंद न करेगी।’

हरिहरसिंह : अगर हरनंदन ने ऐसा लिख दिया है तो कहना चाहिए कि अब हमारे काम में किसी तरह की अंडस बाकी न रही।

पारसनाथ:  ठीक है, मगर दो बातें बाँदी ने हमारी इच्छा के विरूद्ध की हैं।

हरिहरसिंह : वह क्या?

पारसनाथ:  एक तो उसने सरला के गहने मुझसे ले लिए और काम हो जाने पर दस हजार रुपए नकद देने का भी एकरारनामा लिखा लिया है।

हरिहरसिंह : खैर इसके लिए कोई चिंता की बात नहीं है, जब इतनी दौलत मिलेगी तो दस हजार रुपया,कोई बड़ी बात नहीं है।

पारसनाथ:  यही तो मैंने भी सोचा।

हरिहरसिंह : और दूसरी बात कौन-सी है?

पारसनाथ:  दूसरी बात उसने हरनंदन की इच्छानुसार की है, क्योंकि अगर वह उस बात को कबूल न करती तो हरनंदन उसको इच्छानुसार चिट्ठी न लिख देता। इसके अतिरिक्त वह हरनंदन से भी कुछ रुपया ऐंठना चाहती थी। अस्तु, लाचार होकर मुझे वह भी कबूल करना ही पड़ा।

हरिहरसिंह : खैर वह बात क्या है सो तो कहो?

पारसनाथ: हरनंदन ने बाँदी से कहा था कि मैं सरला से शादी न करूँगा, मगर ऐसा जरूर होना चाहिए कि उसकी शादी मेरे दोस्त के साथ हो जिसमें मैं कभी-कभी सरला को देख सकूँ। अगर ऐसा तुम्हारे किए हो सके तो मैं चिट्ठी लिख देने के लिए तैयार हूँ और चिट्ठी के अतिरिक्त काम हो जाने पर बहुत-सा रुपया भी दूँगा। इसी से बाँदी को हरनंदन की बात कबूल करनी पड़ी। बाँदी को क्या उस बुढ़िया खन्नास को रुपए के लालच ने घेर लिया और वह इस बात पर तैयार हो गई कि जिस आदमी के साथ शादी करने के लिए हरनंदन कहेंगे उसी आदमी के साथ शादी करने पर सरला को राजी करूँगी।

हरिहरसिंह : (रंज से कुछ मुँह बनाकर) खैर जो चाहो सो करो मगर मैं तो समझता हूँ कि अगर तुम कुछ और रुपया देने का एकरार बाँदी से करते तो शायद यह पचड़ा ही बीच में न आन पड़ता।

पारसनाथ:  नहीं-नहीं, मेरे दोस्त ! यह काम मेरे अख्तियार के बाहर था, रुपए की लालच से नहीं निकल सकता था। मैंने बहुत कुछ बाँदी से कहा और चाहा, मगर उसने कबूल नहीं किया। सबसे भारी जवाब तो उसका यह था कि ‘अगर मैं हरनंदन की बात कबूल नहीं करती और उसकी इच्छानुसार काम कर देने की कसम नहीं खाती तो वह सरला के नाम की चिट्ठी कदापि नहीं लिखेगा और जब वह हरनंदन की लिखी हुई चिट्ठी सरला को दिखाई न जाएगी तब तक सरला भी बातों के फेर में न आवेगी और उसका कहना भी वाजिब ही था, इसी से लाचार होकर मुझे भी स्वीकार करना ही पड़ा।

हरिहरसिंह : (लंबी साँस लेकर) खैर किसी तरह तुम्हारा काम हो जाए वही बड़ी बात है। मेरे साथ सरला की शादी हुई तो क्या और न भी हुई तो क्या!

पारसनाथ:  (हरिहर का पंजा पकड़कर) नहीं-नहीं, मेरे दोस्त, तुम्हें इस बात से रंज न होना चाहिए, मैं तुम्हारे फायदे का भी बंदोबस्त कर चुका हूँ। सरला के साथ शादी होने पर जो कुछ तुम्हें फायदा होता सो अब भी हुए बिना न रहेगा।

हरिहरसिंह : (कुछ चिढ़कर) सो कैसे हो सकता है?

पारसनाथ:  ऐसे हो सकता है–जिस आदमी के साथ सरला की शादी होगी, वह रुपए के बारे में तुम्हारे नाम एक वसीयतनामा लिख देगा। 1

हरिहरसिंह : यह बात तो जरा मुश्किल है।  मगर मुझे उन रुपयों की कुछ ऐसी परवाह भी नहीं है। मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि किसी तरह तुम्हारा यह काम हो जाए।

पारसनाथ:  मुझे विश्वास है कि ऐसा हो जाएगा और अगर न भी हुआ तो इकरार करता हूँ कि मुझे जो कुछ मिलेगा उसमें आधा तुम्हारा होगा।

हरिहर. : (कुछ खुश होकर) खैर जो होगा देखा जाएगा। अब यह बताओ कि बुढ़िया यहाँ कब आवेगी और सरला के पास कब जाएगी?

पारसनाथ:  वह आती ही होगी।

         ये बातें हो ही रही थीं कि बाहर से किसी ने दरवाजा खटखटाया। मामूली परिचय देने के बाद दरवाजा खोला गया तो हरनंदन के एक दोस्त के साथ सुलतानी दरवाजे के अंदर पैर रखती हुई दिखाई पड़ी। यह सुलतानी वही औरत है, जिसे हम बाँदी के मकान में दिखला आए हैं और लिख आए हैं कि इसने हाल ही में बाँदी के यहाँ नौकरी की है। बाँदी की तरफ से इसी ने सरला को समझाने का ठीका लिया है और यही इस काम का बीड़ा उठाकर लाई है कि सरला को दूसरे के साथ शादी करने पर राजी कर लूँगी।

         जिस समय वह उन लोगों के सामने पहुँची, पारसनाथ बोल उठा, ” लीजिए, वह आ गई। अब इसे सरला के पास पहुँचाना चाहिए।”

          सरला कहीं दूर न थी, इसी मकान की एक अंधेरी मगर हवादार कोठरी में अपनी बदकिस्मती के दिनों को नाजुक उँगलियों के पोरों पर गिनती और बड़ी-बड़ी उम्मीदों को ठंडी साँसों के झोंकों से उड़ाती हुई जमाना बिता रही थी। साधारण परिचय देने और लेने के बाद सुलतानी उस कोठरी में पहुँचाई गई, जिसमें केवल एक चिराग सरला की अवस्था को दिखलाने के लिए जल रहा था। जब से सरला को यह कोठरी नसीब हुई तब से आज तक उसने किसी औरत की सूरत नहीं देखी थी। इस समय यकायक सुलतानी पर निगाह पड़ते ही वह चौंकी और ताज्जुब से उसका मुँह देखने लगी। सुलतानी ने सरला के पास पहुँचकर धीरे-से कहा, ”मुझे देखकर यह न समझना कि तुम्हारे लिए कोई दुखदाई खबर या सामान अपने साथ लाई हूँ, बल्कि मेरा आना तुम्हें दुख के अथाह समुद्र से निकालने के लिए हुआ है। अपने चित्त को शांत करो और जो कुछ मैं कहती हूँ उसे ध्यान देकर सुनो।“

पाठक! इस जगह हम यह न लिखेंगे कि सुलतानी ने सरला से क्या-क्या कहा और सरला ने उसकी चलती-फिरती बातों का क्या और किस तौर पर जवाब दिया अथवा उन दोनों में कितनी देर तक हुज्जत होती रही। हाँ, इतना जरूर कहेंगे कि सुलतानी के आने का नतीजा इस समय पारसनाथ वगैरह को खुश करने के लिए अच्छा ही हुआ अर्थात घंटे-भर के बाद जब सुलतानी मुस्कराती हुई उस कोठरी के बाहर निकली और कोठरी का दरवाजा पुन: बंद कर दिया गया तब उसने (सुलतानी ने) पारसनाथ से कहा,

“लीजिए बाबू साहब, मैं आपका काम कर आई। हरनंदन की लिखी हुई चिट्ठी का नतीजा तो अच्छा होना ही था, मगर मेरी अनूठी बातों ने सरला का दिल मोम कर दिया और जब उसने मेरी जुबानी यह सुना, बाप लालसिंह उसी के गम में संन्यासी हो गया तब तो और भी उसका दिल पिघलकर बह गया और जो कुछ मैंने उसे समझाया और कहा उसे उसने खुशी से कबूल कर लिया। उसने इस बात का भी मुझसे वादा किया है कि ब्याह हो जाने पर मैं अपने हाथ अपने बाप को इस मजमून की चिट्ठी लिख दूँगी कि मैंने अपनी खुशी और रजामंदी से शिवनंदन के साथ शादी कर ली।  मगर मुझसे उसने इस बात की शर्त करा ली है कि शादी होने के समय मैं उसके साथ रहूँगी।”

         सुलतानी की बातें सुनकर ये लोग बहुत प्रसन्न हुए और पारसनाथ ने खुशी के मारे उछलते हुए अपने कलेजे को रोककर सुलतानी से कहा, ‘क्या हर्ज है अगर एक रोज दो घंटे के लिए तुम और भी तकलीफ करोगी।  तुम्हारे रहने से सरला को ढाढ़स बनी रहेगी और वह अपने कौल से फिरने न पावेगी। तुम यह न समझो मैं तुम्हें यों ही परेशान करना चाहता हूँ, बल्कि विश्वास रखो कि शादी हो जाने पर मैं तुम्हें अच्छी तरह खुश करके विदा करूँगा।”

        सुलतानी ने खुश होकर सलाम किया और जिसके साथ आई थी उसी के साथ मकान के बाहर होकर अपने घर का रास्ता लिया।

        हमारे पाठक यह जानना चाहते होंगे कि यह शिवनंदन कौन है जिस के साथ शादी करने के लिए सरला तैयार हो गई। इसके जवाब में हम इस समय इतना ही कहना काफी समझते हैं कि बाँदी ने शिवनंदन के बारे में पारसनाथ से इतना ही कहा था कि शिवनंदन एक साधारण और बिना बाप-माँ का गरीब लड़का है। उसकी और हरनंदन की उम्र एक ही है, बातचीत और चाल-ढाल में भी विशेष फर्क नहीं है। हरनंदन और शिवनंदन एक साथ ही पाठशाला में पढ़ते थे, उसी समय से हरनंदन के दिल में उसका कुछ खयाल है और उसी के साथ सरला की शादी हरनंदन पसंद करता है।

         शिवनंदन को पारसनाथ भी बहुत दिनों से जानता था और उसे विश्वास था कि यह बिलकुल साधारण और सीधे मिजाज का लड़का है।

         सुलतानी को विदा करने के बाद पारसनाथ और हरिहरसिंह शिवनंदन के मकान पर गए और उसकी शादी के बारे में बहुत देर तक चलती -फिरती बातें करते रहे।  हरिहरसिंह वहाँ अपनी चालाकी से बाज न आया, शिवनंदन को शादी के बंदोबस्त से खुश देखकर उसने उससे इस बात का इकरार लिखा लिया कि शादी होने के बाद सरला की जो जायदाद उसे मिलेगी उसमें से आधा हरिहरसिंह को वह बिला उज्र दे देगा। शादी की बातचीत खतम हुई। दिन और समय ठीक हो गया। शादी करानेवाले पंडित जी भी स्थिर कर लिए गए और यह भी तै पा गया कि बिना धरम धाम के मामूली रस्म और रिवाज के साथ रात्रि के समय शादी की जाएगी। इन बातों में शिवनंदन ने अपने खानदान की रस्मों में से दो बातों का होना बहुत जरूरी बयान किया और उसकी वे दोनों बातें भी खुशी से मंजूर कर ली गईं।  एक तो चेहरे पर रोली का जमाना और दूसरे बादले का बंददार सेहरा बाँधकर घर से बाहर निकलना। साथ ही इसके यह बात भी तै पा गई कि शादी के समय पर केवल एक आदमी को साथ लिए हुए शिवनंदन उस मकान में पहुँचाए जाएँगे, जिसमें सरला है अथवा जिसमें शादी का बंदोबस्त होगा।

          बातचीत खतम होने पर पारसनाथ और हरिहरसिंह घर चले गए और उसके दो घंटे बाद शिवनंदन ने भी रामसिंह के घर की तरफ प्रस्थान किया।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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