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काजर की कोठरी खंड-6 के लिए क्लिक करें                                 काजर की कोठरी के सभी खंड  

अब हम अपने पाठकों को एक ऐसी कोठरी में ले चलते हैं जिसे इस समय कैदखाने के नाम से पुकारना बहुत उचित होगा, मगर यह नहीं कह सकते कि यह कोठरी कहाँ पर और किसके आधीन है तथा इसके दरवाजे पर पहरा देनेवाले कौन व्यक्ति हैं।

                       वह कोठरी लंबाई में पंद्रह हाथ और चौड़ाई में दस हाथ से ज्यादे न होगी। बेचारी सरला को हम इस समय इसी कोठरी में हथकड़ी-बेड़ी से मजबूर देखते हैं। एक तरफ कोने में जलते हुए चिराग की रोशनी दिखा रही है कि अभी तक उस बेचारी के बदन पर वे ही साधारण कपड़े मौजूद हैं, जो ब्याह वाले दिन उसके बदन पर थे या जिन कपड़ों के सहित वह अपने प्यारे रिश्तेदारों से जुदा की गई थी। हाँ, उसके बदन में जो कुछ जेवर उस समय मौजूद थे, उनमें से आज एक भी दिखाई नहीं देते। यद्यपि इस वारदात को गुजरे अभी बहुत दिन नहीं हुए मगर देखने वालों की आँखों में इस समय वह वर्षों की बीमार होती है।

          शरीर सूख गया है और अंधेरी कोठरी में बंद रहने के कारण रंग पीला पड़ गया है। उसके तमाम बदन का खून पानी होकर बड़ी-बड़ी आँखों की राह बाहर निकल गया और निकल रहा है। उसके खूबसूरत चेहरे पर इस समय डर के साथ-ही-साथ उदासी और नाउम्मीदी भी छाई हुई है और वह न मालूम किस खयाल या किस दर्द की तकलीफ से अधमुई होकर जमीन पर लेटी है। यद्यपि वह वास्तव में खूबसूरत, नाजुक और भोली-भाली लड़की है, मगर इस समय या इस दुर्दशा की अवस्था में उसकी खूबसूरती का बयान करना बिलकुल अनुचित-सा जान पड़ता है, इसलिए इस विषय को छोड़कर हम असल मतलब की बातें बयान करते हैं।

          सरला के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी पड़ी हुई है और वह केवल एक मामूली चटाई के ऊपर लेटी हुई आँचल से मुँह छिपाए सिसक-सिसककर रो रही है। हम नहीं कह सकते कि उसके दिल में कैसे-कैसे खयालात पैदा होते और मिटते हैं और वह किन विचारों में डूबी हुई है। यकायक वह कुछ सोचकर उठ बैठी और इधर-उधर देखती हुई धीरे-से बोली, ”तो क्या जान दे देने के लिए भी कोई तरकीब नहीं निकल सकती?”

             इसी समय उस कोठरी का दरवाजा खुला और कई नकाबपोश एक नए कैदी को उस कोठरी के अंदर डालकर बाहर हो गए। कोठरी का दरवाजा पुन: उसी तरह से बंद हो गया। जब वह कैदी सरला के पास पहुँचा तो सरला उसे देखकर चौंकी और इस तरह उसकी तरफ झपटी, जिससे मालूम होता था कि यदि सरला हथकड़ी से जकड़ी हुई न होती तो उस कैदी से लिपटकर खूब रोती, मगर मजबूरी थी इसलिए ‘हाय भैया!’ कहकर उसके पैरो पर गिर पड़ने के सिवाय और कुछ न कर सकी।

            यह कैदी सरला का चचेरा भाई पारसनाथ था। उसने सरला के पास बैठकर आँसू बहाना शुरू किया और सरला तो ऐसा रोई कि उसकी हिचकी बँध गई। आखिर पारस ने उसे समझा-बुझाकर शांत किया और तब उन दोनों में यों बातचीत होने लगी-

सरला : भैया ! क्या तुम लोगों को मुझ पर कुछ भी दया ने आई? और मेरे पिता भी मुझे एकदम भूल गए, जो आज तक इस बात की खोज तक न की कि सरला कहाँ और किस अवस्था में पड़ी हुई है?

पारसनाथ:  मेरी प्यारी बहिन सरला ! क्या कभी ऐसा हो सकता था कि हम लोगों को तेरा पता लगे और हम लोग चुपचाप बैठे रहें? मगर क्या किया जाए, लाचारी से हम लोग कुछ कर न सके ! जब से तू गायब हुई है तभी से मैं तेरी खोज में लगा था, मगर जब मुझे तेरा पता लगा तब मैं भी तेरी तरह उन्हीं दुष्टों का कैदी बन गया जिन्होंने रुपए की लालच में पड़कर तुझे इस दशा को पहुँचाया।

सरला: मैं तो अभी तक यही समझे हुई थी कि तुम्हीं ने मुझे इस दशा को पहुँचाया, क्योंकि न तुम मुझे बुलाकर चोर-दरवाजे के पास ले जाते और न मैं इन दुष्टों के पंजे में फंसती।

पारस.: राम राम राम, यह बिलकुल तेरा भ्रम है ! मगर इसमें तेरा कुछ कसूर नहीं। जब आदमी पर मुसीबत आती है तब वह घबड़ा जाता है, यहाँ तक कि उसे अपने-पराए की मुहब्बत का भी कुछ खयाल नहीं रहता, और वह दुनिया-भर को अपना दुश्मन समझने लगता है। अगर तूने मेरे बारे में कुछ शक किया तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है।

सरला : मगर नहीं, अब मुझे तुम पर किसी तरह का शक न रहा, लेकिन तुम यह बताओ कि आखिर हुआ क्या?

पारसनाथ:  वास्तव में मैं चाचा जी की आज्ञानुसार तुझे बाहर की तरफ ले चला था, मगर मुझे इस बात की क्या खबर थी कि दरवाजे ही पर दस-बारह दुष्ट मिल जाएँगे।

सरला : तब क्या मेरे पिता ही ने ऐसा किया और उन्होंने ही इन दुष्टों को दरवाजे पर मुस्तैद करके मुझे उस रास्ते से बुलवाया था?

पारस.: हरे हरे हरे ! वे बेचारे तो तेरे बिना मुर्दे से भी बदतर हो रहे हैं। जब से तू गायब हुई है तब से उनका ऐसा बुरा हाल हो गया है कि मैं कुछ बयान नहीं कर सकता।

सरला : तब यह सब बखेड़ा हुआ ही कैसे?

पारस: : जब वे लोग तुझे जबरदस्ती उठाकर घर से बाहर निकले तो मैंने उनका पीछा किया मगर दरवाजे के बाहर निकलते ही उनमें से एक आदमी ने घूमकर मुझे ऐसा लट्ठ मारा कि चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा और दो घंटे तक मुझे तनबदन की सुध न रही। आखिर जब मैं होश में आया, तो धीरे-धीरे चलकर चाचा जी के पास पहुँचा और उनसे सब हाल कहा। बस उसी समय चारों तरफ रोना-पीटना मच गया, पचासों आदमी इधर-उधर तुम्हें खोजने के लिए दौड़ गए, तरह-तरह की कार्रवाइयाँ होने लगीं।

मगर सब व्यर्थ हुआ, न तो तुम्हारा ही पता लगा और न उन दुष्टों ही की कुछ टोह लगी।  यह खबर तुम्हारे ससुरालवालों को भी पहुँची और वहाँ भी खूब रोना-पीटना मच गया।  मगर हरनंदन पर इस घटना का कुछ भी असर न पड़ा और वह महफिल में से उठकर बाँदी रंडी के डेरे पर चला गया जो उसके यहाँ नाचने के लिए गई थी। सब लोगों ने उसे इस नादानी पर शर्मिंदा करना चाहा, तो उसने लोगों को ऐसा उत्तर दिया कि सब कोई अपने कान पर हाथ रखने लगे और उसका बाप भी उससे बहुत रंज हो गया।

सरला : (हरनंदन की खबर सुन दुख और लज्जा से सिर नीचे करके) खैर. यह बताओ कि आखिर मेरा पता तुम्हें कैसे लगा?

पारसनाथ: मैं सबकुछ कहता हूँ तुम सनो तो सही। हाँ तो जब हरनंदन की बात तुम्हारे पिता को मालूम हुईं तो उन्हें बड़ा ही क्रोध चढ़ आया। उन्होंने मुझे बुलाकर सब हाल कहा और यह भी कहा कि ‘मुझे यह सब कार्रवाई उसी हरनंदन की मालूम पड़ती है, अस्तु, तुम पता लगाओ कि इसका असल भेद क्या है? इस मामले में जो कुछ खर्च होगा मैं तुम्हें दूँगा।’ बस उसी समय से मैंने अपनी जान हथेली पर रख ली और तुम्हें खोजने के लिए घर से बाहर निकल पड़ा।

इस कार्रवाई में क्या-क्या तकलीफें उठानी पड़ी और मैंने कैसे-कैसे काम किए, इसका कहना व्यर्थ है। असल यह कि मुझे शीघ्र इस बात का पता लग गया कि यह सब जाल हरिहरसिंह के फैलाए हुए हैं, जिसके साथ तुम्हारी वह मौसेरी बहिन ‘कल्याणी’ ब्याही गईं थी, जो आज इस दुनिया में तुम्हारा दुख देखने के लिए न रहकर वैकुंठ धाम चली गई।

सरला. : मैंने हरिहरसिंह का क्या बिगाड़ा था, जो उसने मेरे साथ ऐसा सलूक किया? मेरे पिता ने भी तो उसके साथ किसी तरह की बुराई नहीं की थी?

पारसनाथ:  ठीक है, मगर मैं इसका सबब भी तुमसे बयान करता हूँ, तुम सुनती चलो। तुम्हारे पिता ने जो वसीयतनामा लिखा है उसका हाल तो तुम्हें मालूम ही होगा?

सरला. : हाँ मैं अपनी माँ की जबानी उसका हाल सुन चुकी हूँ।

पारसनाथ:  बस वही वसीयतनामा तुम्हारी जान का काल हो गया, और उसी रुपए की लालच में पड़कर हरिहर ने ऐसा किया।

सरला बहुत ही नेक, बुद्धिमान तथा पढ़ी-लिखी लड़की थी। यद्यपि उसकी अवस्था कम थी मगर उसकी पतिव्रता और बुद्धिमान माता ने उसके दिल में नेकी और बुद्धिमानी की जड़ कायम कर दी थी और वह इसीलिए ऊँची-नीची बातों को बहुत नहीं तो थोडा-बहुत अवश्य समझ सकती थी, मगर इतना होने पर भी वह न मालूम क्या सोचकर पूछ बैठी, ”क्या ऐसा करने से हरिहर को मेरे बाप की दौलत मिल जाएगी?”

इसके जवाब में पारसनाथ ने कहा–

“पारसनाथ: हाँ, मिल जाएगी, अगर उसकी शादी तुम्हारे साथ हो जाएगी तो !

सरला : मगर उस हालत में तो उसमें से आधी दौलत तुम लोगों को भी मिलने की आशा हो सकती है।

पारसनाथ:  (कुछ झेंपकर) हाँ, तुम्हारे पिता की लिखावट का मतलब तो यही है मगर हम लोग ऐसी दौलत पर लानत भेजते हैं, जिसमें तुम्हारा और चाचा जी का दिल दुखे, हाँ, इतना जरूर कहेंगे कि जान से ज्यादे दौलत की कदर न करनी चाहिए और इस समय तुम्हारे हाथ में कम-से-कम चार आदमियों की जान तो जरूर है, अगर अपनी जान नहीं तो अपने प्यारे रिश्तेदारों की जान का जरूर ही खयाल करना चाहिए।

सरला : (कुछ चौंककर) मेरी समझ में न आया कि तुम्हारे इस कहने का मतलब क्या है?

पारसनाथ: बस यही कि अगर तुम हरिहरसिंह के साथ ब्याह करना स्वीकार कर लोगी तो इस समय तुम्हारी, तुम्हारे पिता की, तुम्हारी माता की, और साथ ही इसके मेरी भी जान बच जाएगी और रुपया-पैसा तो हाथ-पैर का मैल है तथा यह बात भी मशहूर है कि लक्ष्मी किसी के पास स्थिर भार से नहीं रहती, इधर-उधर डोला ही करती है।

सरला : क्या हम लोगों में किसी और का दूसरा ब्याह भी होता है! मैं तो दिल से समझे हुए हूँ कि मेरी शादी हो चुकी! हाँ, इसमें कोई संदेह नहीं कि मैं अपनी जान समर्पण करके तुम लोगों की जान बचा सकती हूँ, मगर उस ढंग से नहीं जिस ढंग से तुम कहते हो, क्योंकि मेरे पिता के जीते-जी न तो वह वसीयतनामा ही कोई चीज है और न किसी को उनकी दौलत ही मिल सकती है। नतीजा यही होगा कि जिस लालची को मैं धर्म त्याग करके स्वीकार कर लगी, वह मेरे बाप की दौलत शीघ्र पाने की आशा से मेरे पिता को अवश्य मार डालेगा और ताज्जुब नहीं कि अब भी उनके मारने का उद्योग कर रहा हो। हाँ, एक दूसरी तरकीब से उन लोगों की जान अवश्य बच जाएगी जो मैं अच्छी तरह सोच चुकी हूँ”।

पारसनाथ: (बात काटकर) न मालूम तुम कैसी-कैसी अनहोनी बातें सोच रही हो जिनका न सिर है न पैर!

सरला : जो कुछ मैंने सोचा है वह बहुत ठीक है। मेरे साथ चाहे कितनी ही बुराई की जाए या मेरी बोटी-बोटी भी काट डाली जाए मगर मैं अपनी दूसरी शादी तो कदापि न करूँगी! तुम मुझे यह नहीं समझा सकते कि यह दूसरी शादी नहीं है और न तुम्हारा समझाना मैं मान सकती हूँ मगर हाँ, किसी के साथ शादी न करके भी अपने पिता की जान दो तरह से बचा सकती हूँ और इसमें किसी तरह की कठिनाई भी नहीं है।

पारसनाथ:  खैर और बातों पर तो पीछे बहस करूँगा पहिले यह पूछता हूँ कि वे दोनों ढंग कौन-से हैं जिनसे तुम हम लोगों की जान बचा सकती हो?

सरला : उनमें से एक ढंग तो मैं बता नहीं सकती मगर दूसरा ढंग साफ-साफ है कि मेरी जान निकल जाने ही से वे सब बखेड़ा तै हो जाएगा।

पारसनाथ: यह सब सोचना तुम्हारी नादानी है! अगर तुम अपने हिंदू धर्म को जानती होतीं या कोई शास्त्र पढ़ी होतीं तो मेरी बातों पर विश्वास करतीं, यह न सोचतीं कि मेरी शादी हो चुकी, अब जो शादी होगी वह दूसरी शादी कहलावेगी, और जान देने में किसी तरह का’।

सरला : (बात काटकर) अगर मैं कोई शास्त्र नहीं भी पढ़ी तो भी शास्त्र के असल मर्म को अपनी माता की कृपा से अच्छी तरह समझती हूँ। उसने मुझे एक ऐसा लटका बता दिया है जिससे पूरे धर्मशास्त्र का भेद मुझे मालूम हो गया है। उसने मुझसे कहा था कि ‘बेटी, जो बात चित्त को बुरी मालूम हों या जिस बाते के ध्यान से दिल में जरा भी खुटका पैदा हो, अथवा जिस बात से लज्जा का कुछ भी संबंध हो अर्थात जिसके कहने से लज्जित होना पड़े, उसके विषय में समझ रक्खो कि शास्त्र में कहीं-न-कहीं उसकी मनाही जरूर लिखी होगी।’ अस्तु, मेरे स्वार्थी भाई, इस विषय में तुम मुझे कुछ भी नहीं समझा सकते, क्योंकि मैं माता की इस बात को आज्ञा बल्कि उसकी सब बातों को ‘वेद-वाक्य’ के बराबर समझती हूँ।

पारसनाथ: (कुछ लज्जित होकर) अब तुम्हारी इन लड़कपन की-सी बातों का मैं कहाँ तक जवाब दूँ? और जब तुम मुझी को स्वार्थी कहकर पुकारती हो तो अब तुम्हें किसी-तरह का उपदेश करना भी व्यर्थ ही है।

सरला : निःसंदेह ऐसा ही है, अब इस विषय में तुम मुझे कुछ भी समझाने-बुझाने का उद्योग न करो। जो कुछ समझना था मैं समझ चुकी और जो कुछ निश्चय करना था उसे मैं निश्चय कर चुकी।

 पारस.: (लज्जा और निराशा के साथ) खैर अब मुझे तुम्हारे हृदय की कठोरता का हाल मालूम हो गया और निश्चय हो गया कि तुम्हें किसी के साथ मुहब्बत नहीं है और न किसी की जान जाने की ही परवाह है।

सरला : ठीक है, अगर तुम उस ढंग और कहने पर नहीं समझे तो इस दूसरे ढंग से जरूर समझ जाओगे कि जब मुझे अपनी ही जान प्यारी नहीं है तो दूसरे की जान का खयाल कब हो सकता है?

पारस: : अच्छा तब मैं अपनी जान से भी हाथ धो लेता हूँ और कह देता हूँ कि इस विषय में अब एक शब्द भी मुँह से न निकालूँगा।

सरला : केवल इसी विषय में नहीं बल्कि मेरे किसी विषय में भी अब तुम्हें बोलना न चाहिए क्योंकि मैं तुम्हारी बातें सुनना नहीं चाहती। इतना कहकर सरला पारसनाथ से कुछ दूर जा बैठी और चुप हो गई।

        पारसनाथ की आँखों में क्रोध की लाली दिखाई देने लगी मगर सरला को कुछ कहने या समझाने की उसकी हिम्मत न पड़ी।  थोड़ी देर के बाद पुन: उस कोठरी का दरवाजा खुला और एक नकाबपोश ने कोठरी के अंदर आकर इन दोनों कैदियों से पूछा, ‘क्या तुम लोगों को किसी चीज की जरूरत है?”

इसके जवाब में सरला ने तो कहा, ‘हाँ, मुझे मौत की जरूरत है।’ और पारसनाथ ने कहा, ‘मैं पायखाने जाया चाहता हूँ।’

       वह आदमी पारसनाथ को लेकर कोठरी के बाहर निकल गया और कोठरी का दरवाजा पुन: पहिले की तरह बंद हो गया।  …

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काजर की कोठरी खंड-7

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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