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काजर की कोठरी खंड-7 के लिए क्लिक करें            काजर की कोठरी -सभी खंड

इस समय हम बाँदी को उसके मकान में छत के ऊपरवाली उसी कोठरी में अकेली बैठी हुई देखते हैं जिसमें दो दफे पहिले भी उसे पारसनाथ और हरनंदन के साथ देख चुके हैं। हम यह नहीं कह सकते कि उसके बाद पारसनाथ और हरनंदन बाबू का आना इस मकान में दो दफे हुआ या चार दफे, हाँ, इसमें कोई शक नहीं कि उसके बाद भी उन लोगों का आना यहाँ जरूर हुआ, मगर हम उसी जिक्र को लिखेंगे जिसमें कोई खास बात होगी।

             बाँदी अपने सामने पानदान रक्खे हुए धीरे-धीरे पान लगा रही है और कुछ सोचती भी जाती है। दो ही चार बीड़े पान के उसने खाए होंगे कि लौंडी ने खबर दी कि ‘पारसनाथ आए हैं, बड़ी बीबी उन्हें बरामदे में रोककर बातें कर रही हैं।’ इतना सुनते ही बाँदी ने लौंडी को तो चले जाने का इशारा किया और खुद पानदान को किनारे कर एक बारीक चादर से मुँह लपेट सो रही। जब पारसनाथ उस कोठरी में आया, तो उसने बाँदी को ऊपर लिखी हालत में पाया। वह चुपचाप उसके पास बैठ गया और धीरे-धीरे उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा।

बाँदी : (लेटे-ही-लेटे) कौन है?

पारसनाथ: तुम्हारा एक ताबेदार!

बाँदी : (उठकर) वाह! वाह, मैं तो तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी।

पारसनाथ:  पहिले यह तो बताओ कि आज तुम्हारा चेहरा इतना सुस्त और उदास क्यों है?

 बाँदी: कुछ नहीं, यों ही बेवक्त सो रहने से ऐसा हुआ होगा।

पारसनाथ: नहीं -नहीं, तुम मुझे धोखा देती हो, सच बताओ क्या बात है?

बाँदी : कह तो चुकी और क्या बताऊँ? तुम तो खाहमखाह की हुज्जत निकालते हो और यों ही शक करते हो।

पारसनाथ: बस-बस, रहने भी दो, मुझसे बहाना न करो, जहाँ कुछ है वह मैं तुम्हारी अम्मा से सुन चुका हूँ। ह

बाँदी : (कुछ भौवें सिकोडकर) जब सुन ही चुके हो तो फिर मुझसे क्या पूछते हो?

पारसनाथ:  उन्होंने इतना खुलासा नहीं कहा जितना मैं तुम्हारी जुबान से सुना चाहता हूँ।

बाँदी : (ठट्ठा उडाने के तौर पर: हँसकर) जी हाँ ! क्या बात है आपकी चालाकी की, अब दुनिया में एक आप ही तो समझदार और सच्चे रह गए हैं!!

पारसनाथ:  (चौंककर) यह ‘सच्चे’ के क्या मानी? आज ‘ सच्चे के उल्टे’ खिताब पर तुमने ताना क्यों मारा? क्या मैं झूठा हूँ या क्या मैं तुमसे झूठ बोलकर तुम्हें धोखे में डाला करता हूँ?

बाँदी : तो तुम इतना चमके क्यों? तुम्हें सच्चा कहा तो क्या बुरा किया? अगर मुझे ऐसा ही मालूम होता तो दावे के साथ तुम्हें ‘झूठा’ कहती।

पारसनाथ:  फिर वही बात ! वही ढंग !! .

बाँदी : खैर इन सब बातों को जाने दो, इन पर पीछे बहस करना, पहिले यह बताओ कि कल तुम आए क्यों नहीं? तुम तो हरनंदन बाबू को दिखा देने के लिए अपने चाचा को साथ लेकर आने का वादा न कर गए थे! तुम्हारी जबान पर भरोसा करके न मालूम किन-किन तरकीबों से मैंने आधी रात तक हरनंदन बाबू को रोक रक्खा था। आखिर वही ‘टाँय टाँय फिस!’ मैं पहिले ही कह चुकी थी कि अब हरनंदन बाबू को तुम्हारे चाचा का कुछ भी डर नहीं रहा और इस बारे में तुम्हारे चाचा को मुँह-तोड़ जवाब मिल चुका है। अब वह बड़े भारी बेवकूफ होंगे जो हरनंदन बाबू को देखने के लिए यहाँ आवेंगे।

पारसनाथ:  (तरद्दुद की सूरत बनाकर) बात तो कुछ ऐसी ही मालूम पड़ती है, मगर इतना मैं फिर भी कहूँगा कि कल के पहिले इस किस्म की कोई बात न थी, पर कल मुझे भी रंग बुरे ही नजर आए जिसका सबब अभी तक मालूम नहीं हुआ, पर मैं बिना पता लगाए छोड़ने वाला भी नहीं।

बाँदी : (मुस्कराकर) अजी जाओ भी, तुम्हें बगात की कुछ खबर तो हुई नहीं, कहते हैं कि ‘कल से कुछ बुरे रंग नजर आते हैं। ‘ हाँ यह कहते तो कुछ अच्छा भी मालूम पड्ता कि ‘मेरे होशियार कर देने पर कल कुछ पता लगा है।’

पारसनाथ:  नहीं-नहीं, ऐसा नहीं। मैं तुम्हारे सर की कसम खाकर कहता हूँ कि कल जो कुछ मैंने देखा वह निःसंदेह एक अनूठी और ताज्जुब की बात थी। सुनोगी तो तुम भी ताज्जुब करोगी। मगर मैं यह नहीं कहता कि जो कुछ तुमने कहा था उसकी कुछ भी असलियत नहीं है, शायद वैसा भी हुआ है।

बाँदी : बस, लाजवाब हुए तो मेरे सर की कसम खाने लगे! इनके हिसाब मेरा सर मुफ्त का आया है! खैर पहिले मैं सुन तो लूँ कि कल तुमने क्या देखा?

पारसनाथ: चेहरा उदास बना के) तुम्हें मेरी बातों का विश्वास ही नहीं होता। क्या तुम समझती हो कि मैं यों ही तुम्हारे सर की कसम खाया करता हूँ और तुम्हारे सर को कद्दू समझता हूँ?

बाँदी.: (मुस्कराकर) खैर तुम पहले कलवाली बात तो कहो।

पारसनाथ: क्या कहूँ, तुम तो दिल दुखा देती हो।

बाँदी : अच्छा -अच्छा, मैं समझ गई कि तुम्हारे दिल में गहरी चोट लगीं और बेशक लगी होगी, चाहे मेरी बातों से या और किसी की बातों से!

पारसनाथ: फिर उसी ढंग पर तुम चलीं! और जब ऐसा ही है तो फिर मेरी बातों का तुम्हें विश्वास ही क्यों होने लगा? (लंबी साँस लेकर) हाय, क्या जमाना आ गया है! जिसके लिए हम मरें, वही इस तरफ चुटकियाँ ले !!.

बाँदी : जी हाँ, मरते तो सैकड़ों को देखती हूँ मगर मुर्दा निकलते किसी का भी दिखाई नहीं देता! इतना कहकर बाँदी बात उड़ाने के लिए खिलखिला कर हँस पड़ी और पारसनाथ के गाल पर हल्की चपत लगा के मुस्कराती हुई पुन: बोलीं, “जरा-सी दिल्लगी में रो देने का ढंग अच्छा सीख लिया है, इतना भी नहीं समझते कि मैं कौन-सी बात ठीक कहती हूँ और कौन-सी दिल्लगी के तौर पर ! अच्छा बताओ कल क्या हुआ और तुम आएं क्यों नहीं? मुझे तुम्हारे न आने का बड़ा रंज रहा।”

पारसनाथ: (खुश होकर और बाँदी के गले में हाथ डालकर) बेशक रंज हुआ होगा और मुझे भी इस बात का बहुत खयाल था, मगर लाचारी हैं कि वहाँ एक आदमी ने पहुँचकर चाचा साहब के मिजाज का रंग ही बदल दिया और अब वह दूसरे ढंग से बातें करने लगे।

बाँदी : (गले में से हाथ हटाकर) तो कुछ कहो भी तो सही !

पारसनाथ: परसों रात को एक आदमी चाचा साहब के पास आया और उन्हें अपने साथ कहीं ले भी गया, तथा जब से वे लौटकर घर आए हैं, तभी से उनके मिजाज का रंग कुछ बदला हुआ दिखाई देता हैं।

बाँदी : वह आदमी कौन था?  “

पारसनाथ:  अफसोस ! अगर उस आदमी का पता ही लग जाता तो इतनी कबाहत क्यों होती ! मैं उसका ठीक इलाज कर लेता।

बाँदी : तो क्या किसी ने उसे देखा न था?

पारसनाथ: देखा तो सही, मगर बह ऐसे ढंग पर स्याह कपड़ा ओढ़कर आया था कि कोई उसे पहिचान न सका। सुबह को जब मैं चाचा साहब के पास गया, तो उनसे कहा कि आज हरनंदन को बाँदी के यहाँ दिखा देने का बंदोबस्त हो गया है मगर उन्होंने इस बात पर विशेष ध्यान न दिया और बोले कि ‘हरनंदन को रंडी के यहाँ देखने से फायदा ही क्या होगा जब तक कि इस बात का पूरा-पूरा सबूत न मिल जाए कि सरला को तकलीफ पहुँचाने का सबब वही हरनंदन है।’ इसके बाद मुझसे और उनसे देर तक बातें होती रहीं, मैंने बहुत तरह से समझाया मगर उनके दिल में एक न बैठी!

बाँदी : ठीक है मगर फिर भी मैं वही बात कहूँगी कि तुम्हारे चाचा का खयाल कल से नहीं बदला बल्कि कई दिन पहिले ही से बदल गया है। जबकि हरनंदन के बाप.ने टका-सा सूखा जवाब दे दिया और हरनंदन खुल्लमखुल्ला रंडियों के यहाँ आने-जाने लगा, तब वे हरनंदन का कर ही क्या सकते हैं और ताज्जुब नहीं कि उन्हें हरनंदन की इस नई चाल चलन का पता लग भी गया हो! ऐसी हालत में तुम्हारा सूम चाचा रुपया क्यों खर्च करने लगा? अब तो जहाँ तक जल्द हो सके सरला की शादी किसी के साथ हो जानी चाहिए। हाँ, मैंने तो आज यह भी सुना है कि तुम्हारा चाचा दूसरा वसीयतनामा तैयार कर रहा है।

पारसनाथ: (चौंककर) यह तुमसे किसने कहा?

बाँदी : आज राजा साहब का एक मुसाहब अपने लड़के की शादी में नाचने के लिए ‘बीड़ा’ देने के वास्ते मेरे यहाँ आया था। वही इस बात का जिक्र करता था। उसका नाम तो मैं इस वक्त भूल गई, अम्मा को याद होगा।

पारसनाथ:  अगर ऐसा हुआ तो बड़ी मुश्किल होगी !

बाँदी : बेशक !

पारसनाथ:  भला यह भी कुछ मालूम हुआ कि दूसरे वसीयतनामे में उसने क्या लिखा है?

बाँदी : तुम भी अजब ‘ऊद’ हो ! भला इस बात का जवाब मैं क्या दे सकती हूँ और मैं उस कहनेवाले से पूछ भी क्यों कर सकती थी?

पारसनाथ: ठीक है, (कुछ सोचकर) अगर यह बात ठीक है तो मैं समझता हूँ कि अपने चाचा को जहन्नुम में पहुँचा देने के सिवाय मेरे लिए और कोई उचित कार्य नहीं है।

बाँदी : अब इन सब बातों को तुम ही समझो, मगर मैं यह पूछती हूँ कि अब तक तुमने सरला की शादी का इंतजाम क्यों नहीं किया? अगर वह हो जाती तो सब बखेरा ही तै था!

पारसनाथ:  ठीक है मगर जब तक सरला शादी करने पर दिल से राजी न हो जाए तब तक हमारा मतलब नहीं निकलता। मान लिया जाए कि अगर हमने उसकी शादी जबरदस्ती किसी के साथ कर दी और प्रगट होने पर उसने इस बात का हल्ला मचा दिया कि मेरे साथ जबरदस्ती की गई, तब मेरे लिए बहुत बुराई पैदा हो जाएगी और शादी हो जाने के बाद भी उसे छिपाए रहना उचित नहीं होगा। ताज्जुब नहीं कि बहुत दिनों तक सरला का पता न लगने के कारण मेरा चचा उसकी तरफ से नाउम्मीद होकर अपनी कुल जायदाद खैरात कर दे या कोई दूसरा वसीयतनामा ही लिख दे। हमारा काम तो तब बने कि सरला शादी के होने के बाद एक दफे किसी बड़े के सामने कह दे कि ‘हाँ यह शादी मेरी इच्छानुसार हुई है। ‘ इसके अतिरिक्त हमारी गुप्त कमेटी ने भी यही निश्चय किया है कि ‘चचा साहब को किसी तरह खतम कर देना चाहिए, जिसमें उन्हें दूसरा वसीयतनामा लिखने का मौका न मिले।’ उन लोगों ने जो कुछ चाल सोची थी वह तो अब पूरी होती नजर नहीं आती।

बाँदी : वह कौन-सी चाल?

पारसनाथ:  वही कि मेरा चचा खुद हरनंदन से रंज होकर यह हुक्म दे देता कि सरला को खोजकर उसकी दूसरी शादी कर दी जाए। बस उस समय मुझे खैरखाह बनने का मौका मिल जाता। मैं झट सरला को प्रगट करके कह देता कि इसे हरनंदन के दोस्त डाकुओं के कब्जे में से निकाल लाया हूँ और जब उसकी शादी किसी दूसरे के साथ हो जाती तब इसके पहिले कि मेरा चचा दूसरा वसीयतनामा लिखे मैं उसे मारकर बखेड़ा मिटा देता। ऐसी अवस्था में मुझे उनके लिखे वसीयतनामे के अनुसार आधी दौलत अवश्य मिल जाती। इसके अतिरिक्त और भी बहुत-सी बातें हैं जिन्हें तुम नहीं समझ सकतीं। (कुछ गौर करके) मगर अब जो हमलोग गौर करते हैं तो हम लोगों की पिछली कार्रवाई बिलकूल जहन्नुम में मिल गई-सी जान पड़ती है, क्योंकि मेरे चचा हरनंदन के खिलाफ कोई कार्यवाही करते दिखाई नहीं देते।  आज हरिहरसिंह ने भी यही बात कही थी, ‘खाली तुम्हारे चचा के मारे जाने से कोई फायदा नहीं हो सकता। फायदा तभी होगा जब चाचा भी मारा जाए और सरला भी अपनी खुशी से शादी कर ले।’ मगर बड़े अफसोस की बात है कि मैं सरला को भी किसी तरह समझा न सका।  मैं स्वयं कैदी बनकर उसके पास गया और बहुत तरह से समझाया-बुझाया मगर उसने एक न मानी, उल्टे मुझी को बेवकूफ बना के छोड़ दिया।

बाँदी : (ताज्जुब से) हाँ ! तुम सरला के पास गए थे ! अच्छा तो वहाँ क्या हुआ, मुझसे खुलासा कहो?

              पारस ने अपना सरला के पास जाने और वहाँ से छुच्छु बनकर बैरंग लौट आने का हाल बाँदी से बयान किया और तब बाँदी ने मुस्कराकर कहा, ”अगर मैं सरला को दूसरे के साथ शादी करने पर राजी कर दूँ और वह इस बात को खुशी से मंजूर कर ले तो मुझे क्या इनाम मिलेगा?” इतना सुनकर पारस ने उसके गले में हाथ डाल दिया और प्यार की निगाहों से देखता हुआ खुशामद के ढंग पर बोला, ‘तुम मुझसे पूछती हो कि मुझे क्या इनाम मिलेगा? तुम्हें शर्म नहीं आती! हालाँकि तुम इस बात को बखूबी जानती हो कि यह सब कार्यवाही तुम्हारे ही लिए की जा रही है और इस काम में जो कुछ मिलेगा उसका मालिक सिवा तुम्हारे दूसरा कोई नहीं हो सकता, तुम जो कुछ हाथ उठाकर मुझे दे दोगी वही मेरा होगा।”

बाँदी : यह सब ठीक है, मुझे तुमसे रुपए-पैसे की लालच कुछ भी नहीं है, मैं तो सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत चाहती हूँ, मगर क्या करूँ, अम्मा के मिजाज से लाचार हूँ। आज बात-ही-बात में तुम्हारा जिक्र आ गया था, तब अम्मा बोलीं, ” मैं तो दो ही तीन दिन की मेहनत में सरला को राजी कर लूँ! मैं ही नहीं बल्कि मेरी तरकीब से तू भी वह काम कर सकती है, मगर मुझे फायदा ही क्या जो इतना सिर-खप्पन करूँ!” मैंने बहुत कुछ कहा कि अम्मा वह तरकीब मुझे बता दो, मैं उनका काम कर दूँ तो मुझे भी फायदा होगा, मगर उन्होंने एक न मानी, बोलीं कि ‘फलाने–फलाने ढंग से मेरी कर दी जाए तो मैं सब कुछ कर सकती हूँ। जो किसी के किए न हो सके वह हम लोग कर सकती हैं।’ उन्हीं की बात मुझे इस समय याद आ राई, तब मैं तुमसे कह बैठी कि अगर मैं ऐसा करूँ तो मुझे क्या इनाम मिलेगा, नहीं तो मैं भला तुमसे क्या माँगूँगी! खैर इन बातों को जाने दो, अम्मा तो पागल हो गई हैं, तुम जो कुछ कर रहे हो करो उनकी बातों पर ध्यान न दो।

पारसनाथ:  नहीं-नहीं, तुम्हें ऐसा न कहना चाहिए, आखिर जो कुछ तुम्हारी अम्मा के पास है या रहेगा वह सब तुम्हारा ही तो है, और अगर मैं इस समय उनकी इच्छानुसार कुछ करूँगा, तो उसमें तुम्हारा ही तो फायदा है। मेरे दिल का हाल तो तुम जानतीं ही हो कि मैं तुम्हारे मुकाबले में किसी चीज की भी हकीकत नहीं समझता ! खैर पहिले यह बताओ कि वे चाहती क्या थीं?

बाँदी : अजी जाने भी दो, उनकी बातों में कहाँ तक पड़ोगे? वह तो कहेंगी कि अपना घर उठाकर दे दो, तो कोई क्या अपना घर उठाकर दे दे?

पारसनाथ:  और कोई चाहे न दे मगर मैं तो अपना घर तुम्हारे ऊपर न्योछावर किए बैठा हूँ, अस्तु, मैं सबकुछ कर सकता हूँ। तुम कहो भी तो सही, मतलब तो अपना काम होने से है।

बाँदी : (सिर झुकाती हुई नखरे के साथ) मैं क्या कहूँ, मुझसे तो कहा नहीं जाता!

पारसनाथ:  फिर वही नादानी की बात ! तुम तो अजब बेवकूफ औरत हो! कहो-कहो, तुम्हें मेरे सर की कसम, कहो तो सही वे क्या माँगती थीं?

बाँदी : कहती थीं कि ‘इस समय तो सरला के कुल गहने मुझे दे दो, जो ब्याह वाले दिन उस वक्त उसके बदन पर थे, जब तुम लोगों ने उसे घर से बाहर निकाला था और जब तुम्हारा काम हो जाए अर्थात सरला प्रसन्नता से दूसरे के साथ शादी कर ले बल्कि सभों से खुल्लमखुल्ला कह दे कि हाँ यह शादी मैंने अपनी खुशी से की है, तब दस हजार रुपया नकद मुझे मिले।’ मगर वे चाहती हैं कि रुपए की बाबत आप एक पुर्जा पहिले ही लिखकर उन्हें दे दें। बस यही तो बात है जो अम्मा कहती थीं।

पारसनाथ: तो इसमें हर्ज ही क्या है? आखिर वह रुपया जो मुझे मिलेगा तुम्हारा ही तो है। फिर आज अगर दस हजार देने का पूर्जा मैं लिख ही दूँगा तो क्या हर्ज है? मगर हाँ एक बात जरा मुश्किल है!

बाँदी : वह क्या?

पारसनाथ:  गहने जो सरला के बदन पर थे उनमें से आधे के लगभग तो हम लोगों ने बेच डाले हैं। .

बाँदी : तो हर्ज ही क्या है, जो कूछ हो उन्हें दे दो, मैं उन्हें कह-सुनकर ठीक कर लूँगी, आखिर कुछ भी मेरी बात मानेंगी या नहीं? ऐसी ही जिद करने पर उतारू होंगी तो मैं उनका साथ ही छोड़ दूँगी। वाह रे, जिसे मैं प्यार करती हूँ उसी को वह मनमाना सतावेंगी! यह मुझसे बर्दाश्त न हो सकेगा! अच्छा तो बुलाऊँ निगोड़ी अम्मा को?

पारस. . हाँ-हाँ बुलाओ, पुर्जा तो मैं इसी समय लिख देता हूँ और बचे हुए गहने कल इसी समय लेकर हाजिर हो जाऊँगा। मगर तुम उन्हें निगोड़ी क्यों कहती हो? वह बड़ी हैं, उन्हें ऐसा न कहना चाहिए!

बाँदी : (तुनककर) उफ! जबकि वह मेरी तबीयत के खिलाफ करके मेरा दिल जलाती हैं तो मैं उन्हें कहने से कब बाज आती हूँ। इतना कहकर बाँदी चली गई और थोड़ी ही देर में अपनी अम्मा को साथ लेकर चली आई। उस समय उसकी निगोड़ी अम्मा के हाथ में कलम-दवात और कागज भी मौजूद था। मरातबे हों, अल्लाह सलामत रक्खे !’ इत्यादि कहती हुई वह पारसनाथ के पास बैठकर धीरे-धीरे बातें करने लगी और थोड़ी ही देर में उल्लू बनाकर उसने पारसनाथ से अपनी इच्छानुसार पुर्जा लिखवा लिया। मामूली सिरनामे के बाद उस पुर्जे का मजमून यह था-

“बाँदी की अम्माजान ‘रसूल बाँदी’ से मैं एकरार करता हूँ कि उसकी कोशिश से अगर ‘सरला’ (जो इस समय हमारे कब्जे में है) मेरी इच्छानुसार हरनंदन के अतिरिक्त किसी दूसरे के साथ प्रसन्नतापूर्वक विवाह कर लेगी तो मैं ‘रसूल बाँदी’ को दस हजार रुपए नगद दूँगा।”

             पुर्जा लिखवाकर बुढ़िया विदा हुई और बाँदी पारसनाथ को अपने नखरे का आनंद दिखाने लगी। मगर पारसनाथ के लिए यह खुशकिस्मती का समय घंटे-भर से ज्यादे देर तक के लिए न था, क्योंकि इसी बीच में लौंडी ने हरनंदन बाबू के आने की इत्तला दी, जिसे सुनकर पारसनाथ ने बाँदी से कहा, ”ल्लो, तुम्हारे हरनंदन बाबू आ गए, अब मुझे विदा करो ”

बाँदी : मेरे काहे को होंगे, जिसके होंगे उसके होंगे। मैं तो तुम्हारे काम का खयाल करके उन्हें. अपने यहाँ आने देती हूँ, नहीं तो मुझे गरज ही क्या पड़ी है?

पारसनाथ:  उनकी गरज तो कुछ नहीं मगर रुपए की गरज तो है?

बाँदी : जी नहीं, मुझे रुपए की भी लालच नहीं, मैं तो मुहब्बत की भूखी हूँ, सो तुम्हारे सिवाय और किसी में देखती नहीं।

पारसनाथ: तो अब हरनंदन से मेरा क्या काम निकलेगा?

बाँदी : वाह-वाह! क्या खूब? इसी अक्ल पर सरला की शादी दूसरे के साथ करा रहे हो?

पारस.: सो क्या?

बाँदी : आखिर दूसरी शादी करने के लिए सरला को क्योंकर राजी किया जाएगा? और तरकीबों के साथ एक तरकीब यह भी होगी कि हरनंदन के हाथ की लिखी हुईं चिट्ठी सरला को दिखाई जाएगी, जिसमें सरला से घृणा और उसकी निंदा होगी।

पारसनाथ: (बात काटकर) ठीक है, ठीक है, अब मैं समझ गया! शाबाश! बहुत अच्छा सोचा! सरला हरनंदन के अक्षर पहिचानती भी है। (उठता हुआ) अच्छा तो मेरे जाने का रास्ता ठीक कराओ, वह कमबख़्त मुझे देखने न पावे।

बाँदी : बस तुम सीढ़ी के बगलवाले पायखाने में घुसकर खड़े हो जाओ, जब वे ऊपर आ जाएँ, तब तुम नीचे उतर जाना और गली के रास्ते बाहर हो जाना, क्योंकि सदर दरवाजे पर उनके आदमी होंगे।

पारसनाथ:  (मुस्कराते हुए) बहुत खूब ! रंडियों के यहाँ आने का एक नतीजा यह भी है कि कभी-कभी पायखाने का आनंद भी लेना पड़ता है !

         इसके बाद जवाब में बाँदी ने मुस्कराकर एक चपत (थप्पड़) से पारसनाथ की खातिर की और मटकती हुई नीचे चली गई। जब तक हरनंदन बाबू को लेकर वह ऊपर न आई तब तक पायखाने का विमल अथवा समल आनंद पारसनाथ को भोगना पड़ा।

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काजर की कोठरी खंड-8

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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