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काजर की कोठरी खंड-8 के लिए क्लिक करें                       काजर की कोठरी सभी खंड

बाँदी की अम्मा पारसनाथ से मनमाना पुर्जा लिखवाकर नीचे उतर गई और अपने कमरे में न जाकर एक दूसरी कोठरी में चली गई जिसमें सुलतानी नाम की एक लौंडी का डेरा था। यह सुलतानी लौंडी पुरानी नहीं है, बल्कि बाँदी के लिए बिलकुल ही नई है। आज चार ही पाँच दिन से इसने बाँदी के यहाँ अपना डेरा जमाया है।

                  इसकी उम्र चालीस वर्ष से कम न होगी। बातचीत में तेज, चालाक और बड़ी ही धूर्त है। दूसरे को अपने ऊपर मेहरबान बना लेना तो इसके बाएँ हाथ का करतब है। यद्यपि उम्र के लिहाज से लोग इसे बुढ़िया कह सकते हैं, मगर यह अपने को बुढ़िया नहीं समझती। इसका चेहरा सुडौल और रंग अच्छा होने के सबब से बुढ़ापे का दखल जैसा होना चाहिए था, न हुआ था और अब भी यह खूबसूरतों के बीच में बैठकर अपनी लच्छेदार बातों से सभों का दिल खुश कर लेने का दावा रखती है। इसने बाँदी के घर पहुँचकर उसकी अम्मा को खुश कर लिया और उसकी लौंडी या मुसाहब बनकर रहने लगी। इसके बदन पर कुछ जेवर और एक हजार नगद रुपया भी था, जो उसने बाँदी के पास यह कहकर अमानत में रख दिया था कि ‘एक नजूमी (ज्योतिषी) के कहे मुताबिक मैं समझती हूँ कि मेरी उम्र बहुत कम है, अब मैं और चार-पाँच साल से ज्यादे इस दुनिया में नहीं रह सकती, साथ ही इसके मेरा न तो कोई मालिक है न वारिस। एक लड़की थी वह जाती रही, अस्त, इस एक हजार रुपए को जो मेरे पास है, अपनी आकबत सुधारने का जरिया समझकर तुम्हारे पास अमानत रख देती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि इससे मेरे मरने के बाद मेरी आकबत ठीक करके कब्र वगैरह बनवा दोगी।’

                   रुपए वाले की कदर सब जगह होती है, अस्तु, बाँदी की माँ ने भी खुशी-खुशी उसे रुपए सहित अपने घर में रख लिया और लौंडी के बदले में उसे अपना मुसाहब समझा। बस इस समय बाँदी की माँ ने जो कुछ पारसनाथ से लिखवाया, वह इसी की सलाह का नतीजा था।

बाँदी की अम्मा को देखकर सुलतानी उठ खड़ी हुई और बोली, ”कहिए, क्या रंग है!’

बाँदी की अम्मा : सब ठीक है, जो कुछ मैंने कहा उसने बेउज्र लिख दिया, देखो, यह उसके हाथ का पुर्जा है।

सुलतानी : (पुर्जा पढ़कर) बस इतने ही से मतलब था, आइए बैठ जाइए। गहने के बारे में उसने क्या कहा?

बाँदी की अम्मा : (बैठकर) गहना आधा तो उसने बेच खाया, बाकी आधा कल ले आवेगा। जो कुछ करना है तुम्हीं को करना हैं, क्योंकि तुम्हारे ही कहे मुताबिक और तुम्हारे ही भरोसे पर कार्रवाई की गई है।

सुलतानी : आप किसी तरह का तरद्दुद न करें, सरला को राजी कर लेना मेरे लिए कोई बात नहीं है, इस काम के लिए केवल हरनंदन बाबू के हाथ की एक चिट्ठी उसी मजमून की चाहिए जैसा कि मैं कह चुकी हूँ, बस और कुछ नहीं।

बाँदी की अम्मा : यकीन तो है कि हरनंदन बाबू भी सरला के बारे में चिट्ठी लिख देंगे। जब उन्हें सरला से कुछ मतलब ही नहीं रहा तो चिट्ठी लिख देने में उनको हर्ज क्या है?

सुलतानी: अगर वे लिखने में कुछ हील करें तो मुझे उनके सामने ले चलिएगा, फिर देखिएगा कि मैं किस तरह समझा लेती हूँ।

     इसी तरह की बातें इन दोनों में देर तक होती रहीं, जिसे विस्तार के साथ लिखने की कोई जरूरत नहीं, हाँ बाँदी और हरनंदन बाबू का तमाशा देखना जरूरी है।

हरनंदन बाबू की खातिरदारी का कहना ही क्या? बाँदी ने इन्हें सोने की चिड़िया समझ रखा था और समय तथा आवश्यकता ने इन्हें भी दाता और ओला-भाला ऐयाश बनने पर मजबूर किया था। दिल में जो कुछ धुन समाई थी उसे पूरा करने के लिए हर तरह की कार्रवाई करने का हौसला बाँध लिया था, मगर बाँदी इन्हें आधा बेवकूफ समझती थी। बाँदी को विश्वास था कि हरनंदन का दिल हाथ में लेना उतना आसान नहीं है, जितना पारसनाथ का–और इन्हीं सबबों से इनकी खातिरदारी ज्यादा होती थी।

             हरनंदन बाबू बड़ी खातिर और इज्जत के साथ उसी ऊपरवाले बँगले में बैठाए गए। बरसनेवाले बादल के घिर आने से पैदा हुई उमस ने जो गमीं बढ़ा रक्खी थी, उसे दूर करने के लिए नाजुक पंखी ने बाँदी के कोमल हाथों का सहारा लिया और इस बहाने से समय के खुशनसीब हरनंदन बाबू का पसीना दूर किया जाने लगा। ” आह, मेरा दिल इतना बर्दाश्त नहीं कर सकता!” यह कहकर हरनंदन बाबू ने बाँदी के हाथ से पंखी लेनी चाही, मगर उसने नहीं दी और मुहब्बत के साथ झलती रही। दो ही चार दफे की ‘हाँ-नहीं’ के बाद इस नखरे का अंत हुआ और इसके बाद मीठी-मीठी बातें होने लगीं।

हरनंदन: मालूम होता है कि पारसनाथ आया था?

बाँदी: (मुस्कराती हुई) जी हाँ।

हरनंदन : है या गया?

बाँदी : (मुस्कराती हुई) गया ही होगा।

हरनंदन : इसके क्या मानी ! क्या तुम नहीं जानतीं कि वह है या गया?

बाँदी : जी हाँ, मैं नहीं जानती, क्योंकि जब आपके आने की खबर हुई, तब मैंने उसे पायखाने में छिपे रहने की सलाह दी, क्योंकि उसे आपका सामना करना मंजूर न था और मुझे भी उसके छिपने के लिए इससे अच्छी जगह दूसरी कोई न सूझी।

हरनंदन : ठीक है, रंडियों के घर आकर पायखान में छिपना, उगालदान का उठाना, तलवे में गुदगुदाना अथवा नाक पर हँसी का बुलाना बहुत जरूरी समझा जाता है, बल्कि सच तो यों है कि ऐयाशी के सुनसान मैदान में ये ही दो-चार खुशनुमा दरख्त हरारत को दूर करनेवाले हैं।

बाँदी : (दिल में शरमाती मगर जाहिर में हँसती हुई) आप भी अजब आदमी हैं। मालूम होता है आपने खानगियों के बहुत-से किस्से सुने हैं, मगर किसी खानदान रंडी की शराफत का अभी अंदाजा नहीं किया है!

हरनंदन : (हँसकर) ठीक है, या अगर अंदाजा किया है तो पारसनाथ ने!

बाँदी: (कुछ झेपकर) यह दूसरी बात है! ‘जैसा मुँह वैसी थपेड़।’ न मैं उसके लिए रंडी हूँ और न वह मेरे लिए लायक सरदार। वह दिवालिया और कंगला सरदार और मैं अम्मा के दबाव से जैरबार! हाँ अगर कोई आप ऐसा सरदार मुझे मिला होता, तो मैं दिखाती कि खानदानी रंडी की वफादारी किसे कहते हैं! (अपना कान छूकर) शारदा की कसम, हम लोग उन खानगियों में नहीं हैं जिन्होंने हमारी कौम की बदनामी कर रखी है।

हरनंदन : (प्यार से बाँदी को अपनी तरफ खींचकर) बेशक, बेशक ! मुझे भी तुमसे ऐसी ही उम्मीद है और इसी खयाल से मैंने अपने को तुम्हारे हाथ बेच भी डाला है।

बाँदी : (हरनंदन के गले में हाथ डालकर) मैं तो तुम्हारे कहने से और तुम्हारे काम का खयाल करके उस मूँडी-काटे से दो-दो बातें भी कर लेती हूँ, नहीं तो मैं उसके नाम पर थूकना भी नहीं चाहती।

हरनंदन : (इस बहस को बढ़ाना उचित न जानकर और बाँदी को बगल में दबाकर) मारो कमबख़्त को, जाने भी दो, कहाँ का पचड़ा ले बैठी हो! अच्छा यह बताओ, वह कब से बैठा हुआ था?

बाँदी: कमबख़्त दो घंटे से मगज चाट रहा था।

हरनंदन: मेरा जिक्र तो आया ही होगा?

बाँदी: भला इसका भी कुछ पूछना है !

हरनंदन : क्या-क्या कहता था?

बाँदी : बस वही सरलावाली बातें, मैंने तो उस कमबख़्त से कई दफे कहा कि अब हरनंदन बाबू सरला से शादी न करेंगे, मगर उसको विश्वास ही नहीं होता और विश्वास न होने का एक सबब भी है।

हरनंदन : वह क्या?

बाँदी : तुमने चाहे अपने दिल से सरला को भुला दिया है, मगर सरला ने तुम्हें अभी तक नहीं भुलाया।

हरनंदन : इसका क्या सबूत?

बाँदी : इसका सबूत यही है कि वह (पारसनाथ) कैदी बनकर उस कैदखाने में गया था, जिसमें सरला कैद है और सरला को कई तरह से समझा-बझाकर दूसरे के साथ ब्याह करने के लिए राजी करना चाहा था, मगर उसने एक न मानी।

हरनंदन : (ताज्जुब के ढंग से) हाँ ! उसने तुमसे खुलासा कहा कि किस तरह से सरला के पास गया और क्या-क्या बातें हुईं?

बाँदी : जी हाँ, उसने जो कुछ कहा है मैं आपको बताती हूँ।

इतना कहकर बाँदी ने वह हाल जिस तरह पारसनाथ से सुना था, उसी तरह बयान किया जिसे सुनकर हरनंदन ने कहा, ”अगर ऐसा है तो मुझे भी कोई तरकीब करनी चाहिए, जिससे सरला के दिल से मेरा खयाल जाता रहे!”

बाँदी : इससे बढ़कर और कोई तरकीब नहीं हो सकती कि तुम उसे कैद से छुड़ाकर उसके साथ ब्याह कर लो। मैं इस काम में हर तरह से तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हूँ, बल्कि उसका पत्ता भी करीब-करीब लगा चुकी हूँ। दो ही एक दिन में बता दूँगी कि वह कहाँ और किस हालत में है, साथ ही इसके मैं यह भी की कसम खाकर कहती हूँ कि मुझे इस बात का जरा भी रंज न होगा, बल्कि मुझे एक तरह पर खुशी होगी, क्योंकि मेरा दिल घड़ी-घड़ी यह कहता है कि सरला जब इस बात को जानेगी कि मेरा कैद से छूटना और अपने चहेते के साथ ब्याह होना बाँदी की बदौलत है, तो वह मुझे भी प्यार की निगाह से देखेगी और ऐसी हालत में हम दोनों की जिंदगी बड़ी हँसी-खुशी के साथ बीतेगी।

हरनंदन : (बाँदी की पीठ पर हाथ ठोंक के) शाबाश! क्यों न हो! तुम्हारा यह सोचना तुम्हारी शराफत का नमूना है।  मगर बाँदी ! मैं क्या करूँ, लाचार हूँ कि मेरे दिल से उसका खयाल बिलकुल जाता रहा और अब मैं उसके साथ शादी करना बिलकुल पसंद नहीं करता। मैं नहीं चाहता कि मेरी उस मुहब्बत में कोई भी दूसरा शरीक हो जो मैंने खास तुम्हारे लिए उठा रखी हैं।

बाँदी : मेरे खयाल से तो कोई हर्ज नहीं है।

हरनंदन : नहीं-नहीं, ऐसी बातें मत करो और अब कोई ऐसी तरकीब करो जिससे उसके दिल से मेरा खयाल जाता रहे!

बाँदी : (दिल में खुश होकर) खैर तुम्हारी खुशी, मगर यह बात तो तभी हो सकती है जब वह तुम्हारी तरफ से बिलकुल नाउम्मीद हो जाए और उसकी शादी किसी दूसरे के साथ हो जाए।

हरनंदन : हाँ तो मैं भी तो यही चाहता हूँ, मगर साथ ही इसके इतना जरूर चाहता हूँ कि वह किसी नेक के पाले पड़े!

बाँदी : अगर मेहनत की जाए तो ऐसा भी हो सकता है, मगर यह काम किसी बड़े चालाक के किए ही हो सकता है जैसी कि इमामीजान।

हरनंदन: कौन इमामीजान?

बाँदी : इमामीजान एक खबीस बुढ़िया है जो बड़ी चालाक और धूर्त है। कभी-कभी अम्मा के पास आया करती है। मैं तो उसे देख के ही जल जाती हूँ।

हरनंदन : खैर मेरे लिए तुम इतनी तकलीफ और करके इमामीजान को इस काम के लिए मुस्तैद करो, मगर यह बताओ कि इमामीजान को सरला के पास पहुँचने का मौका कैसे मिलेगा?

बाँदी : इसका इंतजाम मैं कर लूँगी, किसी-न-किसी तरह आपका काम करना जरूरी है। मैं पारसनाथ को कई तरह से समझाकर कहूँगी कि अगर सरला तुम्हारी बात नहीं मानती तो मैं एक औरत का पता बताती हूँ, तुम उसे सरला के पास ले जाओ, बेशक वह सरला को समझाकर दूसरे के साथ ब्याह करने पर राजी कर देगी। उम्मीद है कि पारसनाथ इस बात को मंजूर करके इमामी को सरला के पास ले जाएगा, बस।

हरनंदन : बस-बस -बस, मैं समझ गया।  यह तरकीब बहुत ही अच्छी है और पारसनाथ इस बात को जरूर मान लेगा।

बाँदी : मगर फिर यह भी तो उसे बताना चाहिए कि वह किसके साथ ब्याह करने पर सरला को राजी करे।

हरनंदन : मैं सोचकर इसका जवाब दूँगा, क्योंकि इसका फैसला करना होगा कि वह आदमी भी सरला के साथ ब्याह करने से इनकार न करे, जिसके साथ उसका संबंध होना मैं पसंद करूँ।

बाँदी : हाँ यह तो जरूर होना चाहिए, साथ ही इसके इसका बंदोबस्त भी बहुत जरूरी है कि सरला के दिल से तुम्हारा ध्यान जाता रहे और उसे तुम्हारी तरफ से किसी तरह की उम्मीद बाकी न रहे।

हरनंदन : यह तो कोई मुश्किल नहीं है, मैं एक चिट्ठी ऐसी लिख दूँगा जिसे देखते ही सरला का दिल मेरी तरफ से खट्टा हो जाएगा ! और उसमें..

बाँदी : बस-बस, मैं आपका मतलब समझ गईं, बेशक ऐसा करने से मामला ठीक हो जाएगा ! (कुछ सोचकर) मगर कमबख़्त इमामी को लालच हद से ज्यादा है।

हरनंदन : कोई चिंता नहीं, जो कुछ कहोगी उसे दे दूँगा। और फिर उसे चाहे जो कुछ दिया जाए मगर इसमें कोई शक नहीं कि अगर यह काम मेरी इच्छानुसार हो जाएगा तो मैं तुम्हें दस हजार रुपए नकद दूँगा और अपने को तुम्हारे हाथ बिका हुआ।

बाँदी : (मुहब्बत से हरनंदन का हाथ पकड़ के) जहाँ तक होगा मैं तुम्हारे काम में कोशिश करूँगी। मुझे इस बात की लालच नहीं है कि तुम मुझे दस हजार रुपए दोगे। तुम मुझे चाहते हो, मेरे लिए यही बहुत है। जबकि मैं अपने को तुम्हारी मुहब्बत पर न्योछावर कर चुकी हूँ, तब भला मुझे इस बात की ख्वाहिश कब हो सकती है कि तुमसे रुपए वसूल करूँ? (लंबी साँसें लेकर) अफसोस कि तुम मुझे आज भी वैसा ही समझते हो जैसा पहिले दिन समझे थे!

इतना कहकर बाँदी नखरे में दो-चार बूँद आँसू को बहाकर आँचल से आँख पोंछने लगी।  हरनंदन ने भी उसके गले में हाथ डालकर कसूर की माफी माँगी और एक अनूठे ढंग से उसे प्रसन्न करने का विचार किया।  इसके बाद क्या हुआ सो कहने की कोई जरूरत नहीं।  बस इतना ही कहना काफी है कि हरनंदन दो घंटे तक और बैठे तथा इसके बाद उन्होंने अपने घर का रास्ता लिया।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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