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हॉस्पिटल के बाहर बेंच पर बैठी मैं अतीत के पन्नो को पलट रही थी…आज मैं ख़ुद को ऐसे मोड़ पर ले आई थी, जहाँ से मुझे रास्तें नही गहरी खाई दिख रही थी…सुरेखा भाभी की कही बात आज मेरे कानों में गूँज रही थी “वियोना, तुम्हें मैंने दिल से अपनी छोटी बहन माना है, इसका एहसास तुम्हें एक ना एक दिन जरूर होगा और जब होगा तो मिलने आना, मैं तुम्हें तुम्हारी बड़ी बहन की तरह ही मिलूंगी”
परंपरागत, रूढ़िवादी ब्राह्मण खानदान में एक पारसी लड़की को बहु के रूप में स्वीकृति मिलना किसी चमत्कार से कम नही था, ये चमत्कार हुआ शुभम की सुरेखा भाभी के कारण..उफ़्फ़..ये क्या कर दिया मैंने, सुरेखा भाभी मेरे और शुभम के प्यार के लिए पूरे परिवार से लड़ गयी थी और मैंने उनको उनके ही घर संसार से निकाल दिया।
मैं अपनी माँ के कहे अनुसार चलती रही जो परिवार प्यार और भरोसे की नींव पर भाभी ने बनाई कुछ महीनों में ही मैंने तोड़ दिए, आज शुभम हॉस्पिटल की बेड पर है इसकी जिम्मेदार भी कही ना कही मैं ही हूं, मैंने शुभम को उसके भाई,भाभी से दूर किया तो माँ ने भी हम दोनो से रिश्ता तोड़ लिया,शुभम कुछ कहते तो नही थे,पर मानसिक रूप से तनाव में रहते थे फिर मुझे खुश करने, ज़िन्दगी के सारे सुख देने के लिए शुभम ने खुद को रात दिन काम में डुबो दिया था, ना खाने की सुध,ना आराम की, इसका नतीजा शुभम की लीवर पर पड़ा, स्थिति इतनी गंभीर थी की आज डॉक्टर ने कह दिया अगर दो दिनों के अंदर लीवर ट्रांसप्लांट नही हुआ तो शरीर के बाक़ी अंगों पर असर पड़ना शुरू हो जाएगा, डोनर इतनी जल्दी नही मिलने वाला, जिन रिश्तों को अब तक अपना माना था, वो हाथ झटक कर दूर खड़े थे..आज रिश्तों का सच सामने था, समय का जोरदार तमाचा पड़ा था मुझ पर, आज मैं सालों बाद होश में आई थी.
तीव्र उत्कंठा हो रही है एक बार मिलने जाऊ भाभी से, उनके गले लग कर रोना चाहती हूं, जानती हूं..भाभी के पास गयी तो वो मेरे सारे दुःखो को जज्ब कर लेंगी, मेरी मुस्कान लाने के लिए कुछ भी करेंगी, चेहरे पढ़ना बखुबी आता है उनको, मुझे कुछ कहने की जरूरत ही नही उनकी आँखे मुझे पढ़ने के लिए काफ़ी है..पर कैसे जाऊ.
जो गलतियां मैंने की उसके लिए माफ़ी नही है..भारी कदमो से शुभम के वार्ड की तरफ़ बढ़ी ही थी सामने माँ,भाभी और भैया खड़े थे.
“इतना कुछ हो गया, तुमने बताना ज़रूरी नही समझा,किस तरह तुमने संभाला ख़ुद को और शुभम को..मुश्किल घड़ियों में अपनों से कैसे किनारा कर लिया, तुम और शुभम हमारे लिए बहुत मायने रखते हो” भाभी मुझे गले लगाते हुए बोली.
मैं फुट फुट कर रोने लगी, शब्द नही थे मेरे पास उनका प्यार देख हतप्रभ थी.
“वियोना, मेरी डॉक्टर से बात हो गयी है, अभी मैं एडमिट हो रहा हूं, आज और कल में सभी जरूरी टेस्ट हो जाएंगे और परसो ट्रांसप्लांट होगा” भैया ने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा.
“बेटी, ख़ुद को संभालो, मेरे बच्चें स्वास्थ्य होकर शीघ्र घर आएंगे” माँ ने रुँधे गले से कहा.
“वियोना, मैं बच्चों को लेकर जा रही हूं, कल सुबह आऊंगी” मेरी माँ ने रूखे शब्दों में कहा…लाज़मी था..उनको कभी भी मुझे मेरे परिवार से मिलना पसंद नही था.
“माँ, आप परेशान ना हो, मेरा परिवार आ गया है बच्चें अपनी दादी के साथ घर जाएंगे”
आज मैंने परिवार का महत्व समझा था, उनके प्यार को महसूस किया, अब ये प्यार, अधिकार, अपनापन मुझे ताउम्र अपने साथ चाहिए,अपनी आंखों पर बंधी स्वार्थ की पट्टी को उतार कर दूर फेंक दिया और भाभी का हाथ थामे शुभम को खुशखबरी देने चल पड़ी.

लेखिका.
अनामिका अनूप तिवारी

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