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मैं तुमसे प्रेम करता हूँ

इसका सबूत इससे बढ़कर क्या होगा कि

अब फूलों को बस निहारता हूँ

तोड़ता नहीं

मुझे बगिया अब तुम्हारे ही बालों का जूड़ा लगती है

मैं प्राची में उगते सूर्य को देख

भर जाता हूँ असीम ऊर्जा से

और पश्चिम में तुम्हारे घर की ओर

अस्त होने की कामना से

चल पड़ता हूँ दिन की सड़क पर

मुझे दिशाएं इतनी खुली कभी नहीं लगीं कि

अब से पहले मतवाला बन

इतनी दूर-दूर तक नाच आता

आज ये मेरे मन की चौहद्दी बन गईं हैं

मैं देख रहा हूँ फूट रहे हर एक अंकुर को

और रीझ रहा हूँ

इनमें मुझे प्रेम दिख रहा है

उगते, बढ़ते और महकते हुए

लगता है मेरे प्रेम की हरियाली ढाँप लेगी

धरती का सारा खुरदुरापन

सुनो, तुम जो नहीं हो अभी मेरे पास

तो भी मैं अपनी उदासी जाहिर नहीं कर रहा

मुझे पता है  प्रेम में जुदाई बरसों की हो सकती है

पर प्रेम बचा रहता है

प्रेम की तरह ही ।

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मैं तुमसे प्रेम करता हूँ 

आलोक मिश्रा

जन्म: 10 अगस्त 1984 शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र) पेशा: अध्यापन रुचि- समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता लेखन, कुछ पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, मगहर आदि में।
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