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साहित्य विमर्श एंड्रॉयड एप


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मैं एक पेड़ होना चाहता हूँ

जिसके नीचे

मेरी बेटियाँ खेलें घर-घर

जिसकी डाल पर वे

और सावन दोनों झूलें झूम झूमकर

मैं चिड़िया होना चाहता हूँ

कि ला सकूँ दूर देश से दाने

और डाल सकूँ उनके मुँह में

बड़े प्रेम से बड़े जतन से

मैं अपनी बेटियों के लिये

बनना चाहता हूँ जादूगर

कि उन्हें दिखा सकूँ दुनियादारी के

ऐसे ऐसे करतब

जिससे वे आनंदित ही न हों

बल्कि सीख भी सकें

मैं अपनी बेटियों का

बनना चाहता हूँ खिलौना

जिससे उनके सीने से लग

सो सकूँ रात भर और

महसूस कर सकूँ उनका मासूम स्पर्श

मैं एक किताब होना चाहता हूँ

जिसमें पढ़ सकें मेरी लाडलियां

जिन्दगी के फलसफे

कुल मिलाकर मैं होना चाहता हूँ

अपनी बेटियों का अच्छा पापा

कि जिन्दगी जीते हुए

वे महसूस कर पाएँ हमेशा

अपने साथ मुझे ।

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आलोक मिश्रा

जन्म: 10 अगस्त 1984 शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र) पेशा: अध्यापन रुचि- समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता लेखन, कुछ पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, मगहर आदि में।
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