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ऊँचे-ऊँचे देवदार एवं बलूत के वृक्षों ने सूरज की रोशनी को पूरी तरह से ढक लिया था जिसके कारण दोपहर के समय भी उस जंगल में शाम का अहसास हो रहा था। जहां उस जंगल में आसमान को देखना आसान नहीं था वहीँ जमीन को देख पाना भी मुश्किल था। बर्फ की मोटी-मोटी परतों से वह धरती दूर-दूर तक बर्फ के रेगिस्तान जैसी नज़र आ रही थी। ठण्ड के कारण हर्ष वर्मा की हालत खराब हो रही थी। अपने मौजूदा प्रोफेशन में यह उसका सबसे मुश्किल असाइनमेंट था और इस बात का एहसास उसे अभी थोड़ी देर पहले ही हुआ था जब जंगल के एक हिस्से से गुजरते वक़्त एक गोली उसके फर की टोपी को छूकर गुजरते हुए उसके पीछे जंगल में कहीं गुम हो गयी। इस घटना के बाद उसकी साँसें थम गयी थीं और वह सकते में आ गया  लेकिन क्षण भर में ही उसकी चेतना वापिस आई और उसने अपने होल्स्टर से लाइसेंसी .३२ कैलिबर की पिस्तौल निकालते हुए एक वृक्ष की ओट ली। आधे घंटे तक वह उस वृक्ष के ओट में ही साँसें रोके खड़ा रहा। यह उसके  समझ से बाहर था कि उस घने जंगल में, जहाँ उसे कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं, जहाँ आबादी के नाम पर बस वृक्ष, झाड़-झंखार, पहाड़ और नदियाँ ही थीं, उस जगह पर किसी ने उस पर हमला करने की कोशिश की थी। जब उसे अच्छी तरह से अहसास हो गया कि शूटर ने अपना इरादा बदल लिया है, तब उसने एक लंबा घेरा काट कर अंदाजन उस स्थान तक का सफ़र किया जहाँ से गोली चलाई गयीं होंगी। उम्मीद से नाउम्मीद न होते हुए उसको सफलता मिली और इस सफलता का सबूत .३० कैलिबर राइफल की गोली का एक ब्लेंक सेल था जो उस स्थान पर गिरा हुआ था।

हर्ष वर्मा, एक रिटायर्ड मिलिट्री ऑफिसर था जो चंडीगढ़ के सेक्टर १७ के मार्किट से अपनी प्राइवेट “ईगल आई डिटेक्टिव एजेंसी” चलाता था। वैसे तो उसे पेंशन के रूप में अच्छा ख़ासा पैसा सरकार से मिलता था लेकिन मिलिट्री की हैबिट के अनुसार, अपनी काम की आदत और खुद को बिजी रखने के लिए उसने यह डिटेक्टिव एजेंसी खोल ली थी। हालाँकि डिटेक्टिव एजेंसी खोल लेने के बाद भी वह अपने ऑफिस में खाली ही बैठा रहता था। अमूमन उसके पास जो केस आते वे बहुत छोटे और हल्के होते, जैसे कि – हस्बैंड का पीछा करके उसके प्रेम घरौंदे की खबर अपनी क्लाइंट यानी उसकी पत्नी को देना, बच्चे के खो जाने पर उसकी तलाश करना और कभी-कभार चंडीगढ़ में आने वाले सेलेब्रटी के लिए सिक्यूरिटी मुहैया कराना।

२ दिन पहले उसे दिल्ली से फ़ोन आया था कि उसे एक सफ़ेद मारुति आल्टो कार को खोज निकालना है, जो चंडीगढ़ से कसोल के लिए १० दिन पहले निकली थी लेकिन अभी तक कसोल नहीं पहुंची। कॉल के अनुसार उस मारुती से दो आदमी सफ़र कर रहे थे, जिनके पास एक सिल्वर एंड ब्लैक कलर का ब्रीफ़केस था। कॉल पर यह भी बताया गया की उसे इस काम के लिए उसकी तय फीस से कहीं ज्यादा पैसे मिलेंगे। हर्ष वर्मा को पैसों में अधिक दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन यह काम रोमांचक लगा इसलिए उसने दो सवाल पूछे और उन सवालों के संतोषजनक जवाब मिलने पर इस काम के लिए राजी हो गया। उसी शाम उसे ई-मेल के द्वारा मारुति आल्टो, दोनों सवारियों एवं ब्रीफ़केस की डिटेल मिल गयी। साथ ही उस मेल में यह भी जानकारी उपलब्ध कराई गई कि आखिरी दफा उस आल्टो से संपर्क भुन्तार में हुआ था।

हर्ष वर्मा ने गौर से वह स्थान और उसके चारों ओर देखा तो पाया कि बर्फ पर जिग-जैग वाले जूतों के निशान थे, जो अन्दर जंगल की तरफ बढ़ रहे थे। इस बात ने उसके दिमाग के सारे बादल साफ़ कर दिए। वह दुविधा में था कि इन जूतों के निशान के सहारे गोली चलाने वाले शूटर तक पहुंचे या जिस काम के लिए आया है उसपर ध्यान दे। आख़िरकार उसने निर्णय लिया कि वह अपने काम पर ध्यान देगा और अगर कहीं रास्ते में शूटर के साथ टकराव हुआ तो उसकी भी खबर लेगा।

*******

हर्ष वर्मा अपनी तलाश में अन्दर तक जंगल में घुसता गया। लेकिन काफी अरसे के बाद भी उस एरिया में उसे अपनी तलाश का कोई अंजाम नहीं मिला। वह उत्तर दिशा में लगातार चलता जा रहा था, जहाँ जंगल और घना होता जा रहा था। अचानक वह रुका और अपनी दाहिनी ओर देखा – उससे १००-१५० मीटर दूरी पर, एक छोटी सी लकड़ी की झोपड़ी बनी हुई थी जिससे हल्का-हल्का धुंआ उठ रहा था।

वह धीरे-धीरे, सधे हुए कदमों से उस झोपड़ी की तरफ बढ़ा। इस दौरान उसने अपने होल्स्टर से पिस्तौल निकाल ली। किसी अज्ञात दुर्घटना से बचने के लिए ही वह इस तरह से एक्ट कर रहा था। उसे आशंका थी की कहीं गोली चलाने वाला इसी झोपड़ी में न हो। साँस रोके हुए झोपड़ी के दरवाजे पर पहुंचा तो उसकी नज़र बाहरी दीवार पर टंगे जूतों पर पड़ी। उसने जूतों को तले की तरफ से पलट कर देखा – लेकिन उसके सोल का पैटर्न उस पैटर्न से बिलकुल नहीं मिलता था जिसे उसने जंगल में देखा था। उसने दरवाजे को नॉक करते हुए धक्का दिया तो दरवाजा कराहते हुए खुल गया।

कमरे के अन्दर एक मोटा आदमी चूल्हे पर एक केतली के हैंडल को पकड़े हुए दरवाजे की तरफ देख रहा था। उसके चेहरे पर घनी दाढ़ी थी, भँवें मोटी, गाल भरा हुआ, सिर पर फर की टोपी और बदन पर लंबा-मोटा ओवरकोट पहना हुआ था। उसने हर्ष वर्मा की ओर देखते हुए कहा –“जी, बताइये।” – उसने गौर से देखते हुए, हर्ष वर्मा जो ठण्ड के मारे कांप रहा था, का ऊपर से नीचे तक निरीक्षण करते हुए कहा – “बहुत ठण्ड है।”

“हाँ। बहुत ठण्ड है।” – उसने अपने शरीर से ओवरकोट उतारते हुए कहा – “मैं आराम करने के लिए जगह तलाश रहा था।”

उस दाढ़ी वाले आदमी ने एक छोटा सा स्टूल उसकी तरफ सरकाते हुए कहा – “बिलकुल सही जगह पहुंचे हो। मेरा नाम किशन सिंह है और २-३ महीने से इस कॉटेज में रह रहा हूँ।”

“लेकिन इस निर्जन वन में आप करते क्या हैं? आपको देखकर लगता नहीं है कि आप इसी क्षेत्र से हैं?”

“सही पहचाना, मैं यहाँ रहकर पेंटिंग करता हूँ।”

“पेंटिंग। अच्छा! कुछ बनाया अभी तक?”

“हाँ।” – यह कहकर उसने एक स्टैंड की तरफ इशारा कर दिया।

हर्ष वर्मा उठकर स्टैंड की ओर गया और शीट्स को उलट-पलट कर देखने लगा।

किशन सिंह बोला – “कुछ खास नहीं हैं। लेकिन कुछ न कुछ बेहतरीन बना कर ही निकलूंगा। वैसे आप इधर कैसे? इधर तो किसी का आना-जाना नहीं होता है?”

“पेंटिंग्स शानदार हैं। आपने कुदरत की खूबसूरती को बेहतरीन तरीके से रंगों में कैद किया है।”- यह सुनते ही किशन सिंह ने गर्दन झुका ली, जबकि वह बोलता गया –“मेरा नाम हर्ष वर्मा है और मैं प्राइवेट डिटेक्टिव हूँ। एक सफ़ेद आल्टो कार की तलाश कर रहा हूँ और सम्भावना है कि उसका एक्सीडेंट हो गया है।”

“ओह माय गॉड! कितने लोग थे उस कार में?”

“दो सवारियां थी – ड्राईवर राकेश चौहान – जो मंझोले कद, सामान्य चेहरा,  मोटी नाक और जिसके बाल अधपके थे और तिलक राम – जिसकी उंचाई ५.७-.५.८ होगी, शरीर भारी, बाल काले और क्लीन शेव्ड है।”

“च च च! अगर उनका एक्सीडेंट हुआ होगा तो बचने की संभावना बहुत कम है।”

“हाँ, ऐसा है तो सही लेकिन मेरे क्लाइंट का इंटरेस्ट फैक्ट्स में है, ट्रुथ में है। वे कार और कार से सवारियों से अधिक, उन सवारियों के कब्जे में मौजूद एक ब्लैक एंड सिल्वर ब्रीफ़केस में इंटरेस्टेड हैं।”

“क्या ख़ास है उस ब्रीफ़केस में?”

“उस ब्रीफ़केस में ४० लाख रूपये हैं।”

उसकी सीटी निकल गयी। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे। उसने पूछा – “इस तरफ ४० लाख रूपये किस काम के थे?”

“यह मेरे क्लाइंट का मसला है। मैंने उनसे कोई कारण नहीं पूछा।”

“तो उस आल्टो की तलाश करते-करते आप इस निर्जन वन में कैसे पहुँच गए।”

“एक्चुअली वह कार १० दिन पहले ही कसोल के लिए निकली थी लेकिन अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची नहीं। दो दिन पहले जब मुझे यह असाइनमेंट मिला, तो अपने क्लाइंट से मिली जानकारी के अनुसार उस कार से आखिरी संपर्क भुन्तार में हुआ था। मैंने अपने क्लाइंट से उन दोनों व्यक्तियों के पास मौजूद मोबाइल नंबर लिया और अपने एक मित्र को दिया जो एक टेलीकम्यूनिकेशन कंपनी में कार्यरत था ताकि उन दोनों मोबाइल नंबर की गतिविधियाँ जांच सकूँ। जब मुझे दोनों मोबाइल नंबर की एक्टिविटी लिस्ट मिली तो उसमें साफ़ दर्ज था कि भुन्तार के बाद दोनों में से किसी ने भी कहीं संपर्क नहीं किया था। फिर मैंने भुन्तार और कसोल के बीच लगे मोबाइल टावर्स की लिस्ट निकाली – एक मित्र की सहायता से। जिस दिन वह कार गायब हुई – उस दिन, उन टावर्स पर आये कॉल्स डिटेल के साथ जब दोनों नंबर को सर्च आउट किया तो पता चला कि गाँव शरनी के टावर्स पर तो यह नंबर आ रहे थे पर गाँव शत के टावर पर नहीं आ रहे थे। फिर मैंने अपनी जांच की दिशा को फील्ड में उतरकर आगे बढ़ाया। शत और शरनी गाँवों में किसी ने भी उस ऑल्टो को नहीं देखा था और न ही किसी प्रकार के एक्सीडेंट की खबर भी लगी थी। मैंने दोनों गाँवों के बीच की सड़क का मुआयना किया, लेकिन किसी प्रकार के एक्सीडेंट का कोई सुराग हाथ नहीं लगा। अपनी तहकीकात को आगे बढ़ाने के चक्कर में ही मैं दोनों गाँवों के बीच पड़ने वाली इस घाटी में उतर आया।

“ओह! आपने वाकई बहुत मेहनत की और बहुत जल्दी कई चीजों का पता लगा लिया। वैसे, कुछ सुराग मिला?”

“हाँ, एक सुराग तो मिला है।”

“क्या?” – किशन सिंह ने उत्साहित होकर पूछा।

“किसीने मुझे आज शूट करने की कोशिश की। इससे साफ़ पता चलता है कि जैसा भी है, मैं सही रास्ते पर हूँ।”

“कुछ पता चला किसने शूट किया?” – उसने एक स्टील का कप हर्ष को थमाते हुए पूछा।

हर्ष ने दोनों हाथों से स्टील के कप को पकड़ लिया। स्टील के कप से भाप उठ रही थी जो साफ़-साफ़ चाय का अहसास दिला रही थी। उसने किशन सिंह की तरफ कप उठा कर कहा -“शुक्रिया। नहीं अभी तक वह पकड़ में नहीं आया है लेकिन एक .३० कैलिबर के राइफल के बुलेट का ब्लेंक सेल जरूर मिला है।”

“हम्म….” – उसने हँसते हुए कहा – “मेरे पास तो .22 कैलिबर की राइफल है।”

“क्या आपने कोई आवाज नहीं सुनी? मेरा मतलब जब एक्सीडेंट हुआ होगा और गाड़ी नीचे गिरी होगी, पहाड़ों से टकराई होगी तब आवाज हुई होगी।”

“नहीं, ऐसा एज सच मैंने तो नहीं सुना। वैसे भी मैं कई बार पेंटिंग के चक्कर में बहुत दूर भी निकल जाता हूँ और कई बार तो इस कमरे में भी आवाज नहीं सुनाई देती क्यूंकि हवाओं का बहाव बहुत ज्यादा होता है।”

“हम्म…”

“वैसे मैं आपको एक बात बता देना चाहूँगा कि इसी जंगल में एक और महाशय रहते हैं – भारतेंदु कुमार दास – जिनके पास .३० कैलिबर की राइफल है।”

“अच्छा! बड़े पते की बात बताई आपने। लेकिन वो करता क्या है इस जंगल में?”

“वही जो मैं करता हूँ – पेंटिंग।”

“अच्छा। लेकिन उसको मुझ पर गोली चलाने की क्या आवश्यकता थी?

“ये तो उससे मिलकर ही पता चलेगा।”

“अच्छा! शुक्रिया! आपने मेरी बहुत सहायता की।” – इतना कहकर हर्ष वर्मा उठने लगा। किशन सिंह ने हर्ष वर्मा के साथ खड़े होते हुए कहा – “शुक्रिया किस बात का? जो मुझे मालूम था वह मैंने आपको बता दिया। लेकिन अगर आप चाहें तो मैं इस तलाश में आपकी सहायता करना चाहूँगा।”

“ओह! ये तो मेरे लिए ख़ुशी की बात है। एक से भले दो – क्यूँ क्या कहते हैं?” – हर्ष वर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा।

प्रत्युतर में किशन सिंह ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया –“हाँ! एक से भले दो।”

किशन सिंह ने अपनी राइफल कब्जे में की और बाहर आकर, जूते पहन कर हर्ष वर्मा के साथ आगे बढ़ गया। हर्ष वर्मा ने देखा की किशनसिंह लंगड़ा रहा है, उसने पूछा – “किशन सिंह जी, आपके पैरों को क्या हुआ?”

“पैरों को?”- किशन सिंह इस अनपेक्षित सवाल से सकपका गया फिर खुद को सयंत करते हुए कहा – “ओह, इस पैर की बात कर रहे हैं आप” – उसने दाएँ पैर की ओर इशारा करते हुए कहा – “एक्चुअली कुछ दिनों पहले मैं गाँव की तरफ निकल गया था जहाँ एक खेत को घेरने एवं जन-जीवन को जानवरों से बचाने के लिए जमीन में लोहे के फंदे लगाए गए थे और इसकी जानकारी मुझे बिल्कुल नहीं थी, इसलिए एक फंदे में मेरा पैर फंस गया और मुझे घाव हो गया। यही कारण है कि मैं लंगड़ा के चल रहा हूँ।”

“ओह! ये तो बहुत बुरा एवं दर्दनाक हुआ आपके साथ।” – हर्ष वर्मा ने आगे बढ़ते हुए कहा। उसके पीछे-पीछे किशन सिंह भी धीमी-धीमी गति से चल पड़ा।

कुछ दूर जाने पर हर्ष वर्मा ने कहा – “क्यूँ न हम दोनों अलग हो जाएँ। आप इस दिशा में चले जाइए और मैं इस दिशा में चला जाता हूँ। जैसे ही हममें से किसी को कुछ ख़ास नज़र आये तो इशारे के रूप में दो गोलियाँ दागेंगे। अगर कुछ नहीं मिलेगा तो हम भारतेंदु कुमार दास की झोपड़ी में मिलेंगे। आप एक बार उसके रिहाइश तक पहुँचने का रास्ता बता दीजिये।

******

किशन सिंह से भारतेंदु कुमार दास की झोपड़ी का रास्ता जान लेने के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में बढ़ गए। हर्ष वर्मा ने आगे बढ़ते हुए पार्वती नदी के किनारे चलने का फैसला किया। नदी के किनारे चलते-चलते वह अचानक एक जगह रुक गया। यह ऐसा स्थान था जहाँ नदी की धारा संकरी और धीमी हो गयी थी। नदी के उस पार एक काला ढेर था। उस स्थान पर नदी की गहराई और पानी का बहाव नाम मात्र का था, इसलिए उसने पत्थरों पर पैर रख-रखकर उस नदी को पार कर लिया। उस पार पहुँचते ही जब उसने काले ढेर का निरीक्षण किया तो पाया कि वह किसी गाड़ी का हिस्सा है। उसने तुरंत अपनी पिस्तौल से दो फायर किए। कुछ देर बाद ही किशन सिंह लंगड़ाकर दौड़ता हुआ नदी के पार प्रगट हुआ। उसने हाँफते-हाँफते नदी पार की और हर्ष वर्मा के पास पहुँच कर बोला – “क्या हुआ डिटेक्टिव साहब? सॉरी, मैं कभी इधर आया नहीं और पैर में घाव है, इसलिए इस तरफ आने में देर हो गई।”

हर्ष वर्मा ने सामने की ओर इशारा करते हुए कहा –“लगता है, गाड़ी के एक्सीडेंट के बाद उसमें आग लग गई।”

“हाँ, उधर देखिए।”- किशन सिंह ने हर्ष वर्मा को ढलान की तरफ देखने के लिए कहा।

हर्ष वर्मा और किशन सिंह दोनों ढलान की तरफ बढ़े। वहां एक मानव शरीर था जो बुरी तरह नोचा-खंसोटा गया था। लगता था जंगली जानवरों ने भी उस शरीर में अपनी सेंध लगा दी थी। हर्ष वर्मा ने अपने मोबाइल के गैलरी में जाकर एक तस्वीर निकाली फिर स्लाइड कर दूसरी पर गया फिर मोबाइल बंद कर दिया।

हर्ष वर्मा ने कहा – “ये वही गाड़ी है।”

“आप इतना निश्चिंत होकर कैसे कह सकते हैं?”

“क्यूंकि यह मानव शरीर राकेश चौहान का है जो उस कार का ड्राइवर था। लगता है, एक्सीडेंट के दौरान जब गाड़ी रोड से नीचे घाटी की तरफ बढ़ी होगी तब इन ऊँचे-ऊँचे देवदार के पेड़ों से टकराई होगी, फिर ढलान के कारण इस जगह तक पहुँच गयी होगी। ये भी साफ़-साफ़ लगता है कि राकेश चौहान, जो इस गाड़ी का ड्राईवर था वह इस गाड़ी से निकलकर नीचे गिर पड़ा, और किसी पत्थर से टकराने से उसकी मौत हो गई और बाद में इसकी यह हालत जंगली जानवरों द्वारा की गयी है। लेकिन समस्या यह है कि यह गाड़ी ऊपर के क्षेत्र में किसी पेड़ के तने से फंस कर रुक क्यूँ नहीं गई?”

“हाँ, लगता है दूसरी सवारी ब्रीफ़केस समेत इस गाड़ी में जल कर मर गया। अब तो कुछ करने लायक नहीं बचा, चलिए चलते हैं।”

हर्ष वर्मा ने एक लम्बी टहनी ली और उसके सहारे गाड़ी के उस राख को खोदना शुरू किया।

“नहीं-नहीं, कुछ गड़बड़ है क्यूंकि दूसरी सवारी तो जल सकती थी लेकिन वह ब्रीफ़केस नहीं जल सकता था।”

“मतलब?”

“जैसा की मेरे क्लाइंट ने मुझे बताया था – वह ब्रीफ़केस फायर प्रूफ था – वह अल्लुमिनियम मेटल से बनी अपने आप में कीमती शै थी। इसलिए ऐसा लगता है कोई तो फ़ाउल प्ले हुआ है।”

किशन सिंह ने कुछ कहा नहीं लेकिन होठों की बुदबुदाहट ने एक नाम जरूर लिया। हर्ष वर्मा ने कहा –“चलो, अब एक बार भारतेंदु कुमार दास से भी मिल लेते हैं।”

सूरज अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचने जा रहा था जिसके कारण अँधेरा अपना प्रभाव जमा रहा था। दोनों धीरे-धीरे सावधानी से भारतेंदु कुमार दास की झोपड़ी की ओर बढ़ रहे थे। उस घने जंगल में, उस झोपड़ी तक पहुँचने का सिर्फ एक आसान जरिया था – कि उसकी चिमनी से उठ रहे धुएं को फॉलो किया जाए।

उस झोपड़ी के करीब पहुँचते ही हर्ष वर्मा ने अपनी बन्दूक अपने हाथ में ले ली। दरवाजे पर पहुँचते ही उसने झटके से दरवाज़ा खोल दिया। वहीँ उसके पीछे-पीछे किशन सिंह अपने हाथों में राइफल लिए, एड़ियों के सहारे अन्दर घुसा। एक नज़र देखने से पता चल रहा था कि अन्दर कोई नहीं, लेकिन जल रहे चूल्हे पर चढ़ी केतली में उबलते पानी से साफ़-साफ़ पता चल रहा था कि उस झोपड़ी का मालिक आस-पास ही है।

हर्ष वर्मा ने किशन सिंह को निर्देश देते हुए कहा – “लगता है वह वापिस आने वाला है। तुम बाहर देखते रहना, मैं तब तक देखता हूँ ब्रीफ़केस कहाँ है।”

हर्ष वर्मा ने उस झोपड़ी की अच्छी तरह से तलाशी ली, लेकिन कोना-खुदरा और एक-एक चीज़ को अच्छी तरह से देख लेने के बाद भी वहां ब्रीफ़केस और पैसे का नामोनिशान नहीं मिला। सबसे आश्चर्य की बात यह थी, कि जैसा किशन सिंह ने बताया था, उस हिसाब से भारतेंदु एक पेंटर है लेकिन उसके कमरे में पेंटिंग से सम्बंधित रंगों का कोई बॉक्स मौजूद नहीं था। हाँ, पर कुछ कोरे पोस्टर जरूर मौजूद थे। उसने अपनी कमर पर दोनों हाथ रखकर हताश अवस्था में पूरे कमरे में एक बार फिर नज़र दौड़ाई, फिर उसकी नज़र झोपड़ी से बाहर लकड़ी के टीले पर गयी जो बर्फ से पूरी तरह ढका हुआ था। वह बाहर निकलकर टीले के करीब पहुंचा और एक-एक लकड़ी उतारने लगा। आखिरकार उसकी मेहनत सफल हुई और उसकी नज़रों के सामने उस लकड़ी के टीले के बीच से वह ब्रीफ़केस बरामद हुआ। यह हूबहू वही ब्रीफ़केस था जिसके बारे में उसके क्लाइंट ने बताया था। हर्ष वर्मा ने गौर से उस ब्रीफ़केस को देखा तो पाया कि उसकी सिल्वर पट्टी पर काला रंग लगा हुआ है। हर्ष वर्मा ने उस रंग वाले हिस्से को छुआ लेकिन वह उसकी उँगलियों में लगा नहीं।

हर्ष वर्मा पुनः उस झोपडी में घुसा और उसे देखते ही किशन सिंह की निगाहें उससे सवाल पूछती नज़र आईं – “मिल गया। कमबख्त ने लकड़ी के टीले के नीचे छुपा रखा था।”

“बहुत अच्छे। बाहर देखो, भारतेंदु आ रहा है।” –  किशन सिंह ने ऊँगली के इशारे से हर्ष वर्मा को बाहर देखने के लिए कहा।

हर्ष वर्मा नीचे झुक गया ताकि वह भारतेंदु की नज़र में न आ सके। फिर धीरे से उठकर खिड़की से सावधानीपूर्वक भारतेंदु को आते हुए देखने लगा। एक ४०-५० वर्षीय व्यक्ति अपनी हाथों में राइफल उठाए, उसे हिलाते हुए झोपड़ी की तरफ बढ़ रहा था। उसके दूसरे हाथ में एक पेंटिंग स्टैंड, कुछ पेपर और कलर बॉक्स था। जैसे-जैसे वह करीब आ रहा था, हर्ष वर्मा उसके चेहरे को गौर से देख रहा था।

******

भारतेंदु कुमार दास जैसे ही अपनी झोपड़ी के करीब आया तो उसकी नज़र बर्फ में बने पैरों के निशान पर गयी। उसने अपने एक हाथ का सारा सामान नीचे गिरा दिया और राइफल दोनों हाथों से संभाल कर झोपड़ी की तरफ तान दी।

हर्ष वर्मा ने आवाज लगाई – “मिस्टर दास अपनी राइफल नीचे रख दीजिए।”

लेकिन भारतेंदु कुमार दास ने राइफल नीचे रखने के बजाय आवाज की दिशा में एक फायर कर दिया। पूरा वातावरण उस फायर की आवाज से गूंज गया। हर्ष वर्मा ने भी अपनी पिस्तौल से भारतेंदु कुमार दास की तरफ फायर झोंक दिया। हर्ष वर्मा की गोली भारतेंदु कुमार दास के हाथ को छूते हुए निकल गई जिसके कारण उसके हाथ बन्दूक नीचे गिर गई। यह देखते ही हर्ष वर्मा झोपड़ी से बाहर निकल आया लेकिन ये क्या! अब भारतेंदु के हाथ में एक लंबे फल वाला चाक़ू आ चुका था।

तभी झोपड़ी के अन्दर से भारतेंदु की तरफ फायर हुआ जो भारतेंदु के कान को छूते हुए गुजर गया। हर्ष वर्मा ने झोपड़ी की तरफ देखकर चिल्लाते हुए कहा – “क्या कर रहे हो यार। मुझे ये जिन्दा चाहिए और मैं इसे आसानी से हैंडल कर सकता हूँ।”

“मिस्टर दास, अपना चाक़ू नीचे फेंक दीजिये।”

“तुम साला चोर, मेरे घोर में कैसे घूस आया। हम पोलिस को फ़ोन करेगा।”

“मिस्टर दास, आपके झोपड़े का दरवाजा खुला था इसलिए हम अन्दर घुस गए।”

“तुम हम पर गोली भी चलाया।”

“तुमने पहले गोली चालाया।”

यह सुनकर भारतेंदु चुप हो गया। हर्ष वर्मा बोला – “तुम कबूल करते हो कि‍ तुमने ही मुझ पर दिन में फायर किया था और साथ ही गाड़ी से ब्रीफ़केस भी चुराकर ले गए थे।”

“उडी बाबा, तुम वही आदमी है। हाँ, हम शूट किया था लेकिन..लेकिन। एक मिनट, तुम किस ब्रीफ़केस और किस चोरी की बात कर रहा है।”

हर्ष वर्मा ने ब्रीफ़केस उसके सामने ले जाकर दिखाया – “क्या तुमने इसे कभी नहीं देखा?”

भारतेंदु ने उस ब्रीफ़केस को देखते ही अपने हाथों से चाक़ू गिरा दिया। भारतेंदु के चेहरे पर डर की छाया साफ़ नज़र आने लगी जिसके कारण उसकी जुबान पर ताला लग गया और उसने बात करने से मना कर दिया।

हर्ष वर्मा ने भारतेंदु के हाथों को पीछे बाँधने के दौरान कहा – “बेटा, तू मेरे सामने भले ही न बोले लेकिन जब तेरा बाप दिल्ली से आकर तुझे ले जाएगा तो तेरे मुह से विरह के गीत और वीर रस की कवितायें दोनों ही बाहर निकलेंगी” – हाथ बंधने के बाद हर्ष वर्मा ने उसे आगे के तरफ ढकेल दिया जो इशारा था कि आगे की ओर चलो।

हर्ष वर्मा ने झोपड़ी में बैठे किशन सिंह को आवाज देकर कहा – “यहाँ रुकने से कोई फायदा नहीं है। आप उसकी राइफल उठा लीजिये, हम आज की रात आपकी झोपड़ी में ही बिताएंगे फिर कल सुबह मैं इसे भुन्तार लेकर जाऊँगा।”

*******

किशन सिंह की झोपड़ी में पहुँचते ही हर्ष वर्मा ने पहले तो भारतेंदु के दोनों हाथ-पैर बाँध दिए और एक कोने में टिकने की जगह दे दी। वहीँ किशन सिंह ने रात के भोजन के लिए तैयारी शुरू कर दी। इस दौरान हर्ष वर्मा बार-बार ब्रीफ़केस को जांचता-परखता रहा। उसने ब्रीफ़केस पर लगे काले रंग को सूंघा जो अजीब ही प्रकार का गंध दे रहा था। जब तक भोजन तैयार नहीं हुआ वह उस कमरे में टहलता रहा – कभी किशन सिंह के पास जाकर करछी घुमाने लगता तो कभी किशन सिंह के पेंटिंग के सामान को देखने लगता।

रात के भोजन के पश्चात, हर्ष वर्मा दीवार के सहारे टेक लगा कर सिगरेट पी रहा था। तभी किशन सिंह ने पूछा –“मुझे आशा है कि आपको भारतेंदु को यहाँ से ले जाने में कोई तकलीफ नहीं होगी। आप मुझे बता दीजियेगा, मैं गवाही देने के लिए मौजूद हो जाऊँगा।”

“नहीं।” – हर्ष वर्मा बोला – “मुझे नहीं लगता कि कोई परेशानी होगी। हाँ, दो अपराधियों को एक साथ संभालना कष्टदायक हो सकता है पर नामुमकिन नहीं।”

“दो अपराधी!”- किशन सिंह यह सुनते ही आश्चर्य के मारे उछल पड़ा – “क्यूँ, कहाँ है दूसरा अपराधी?”

हर्ष वर्मा धीरे से खड़ा हुआ और उसका हाथ होल्स्टर में फंसी हुई पिस्तौल तक गया। उसने किशन सिंह की तरफ देखते हुए कहा –“धीरे से किशन सिंह या कहूँ – तिलक राम। तुमने ही किशन सिंह और राकेश चौहान की हत्‍या की है।”

उस कमरे में कुछ क्षण के लिए मौत सा सन्नाटा पसर गया था। किशन सिंह धीरे से उठा और बोला – “हर्ष वर्मा तुम पागल हो गए हो? ये क्या वाही-तबाही बके जा रहे हो? तुम कहते हो मैं तिलक राम हूँ – क्या मैं तुम्हें तिलक राम जैसा नज़र भी आता हूँ।”

“हां तुम तिलक राम जैसे नज़र नहीं आते। भले ही तुम बहुत चालाक हो लेकिन तुमसे दो-तीन ऐसी गलतियाँ हुईं जिसने तुम्हारा भांडा फोड़ दिया, तुम्हें बेनकाब कर दिया। एक तो जब तुम उस जली गाड़ी के पास पहुंचे तो कहा कि तुम कभी उधर आए नहीं जबकि यहाँ बनी हुई पेंटिंग में एक पेंटिंग वहां की भी है, जो साफ़ इशारा करती थी कि तुम पेंटर किशन सिंह तो नहीं हो। तुमने अपने बालों को डाई करके बदल लिया वहां अपनी कद-काठी में इजाफा करने के लिए तुमने एक्स्ट्रा कपड़े पहन लिए।”

“सब बकवास है।”

“हाँ, तुम्हें तो यही लगेगा। वहीँ तुमने खुद को पेंटर कहा लेकिन तुम्हारे हाथ बिलकुल साफ़ हैं।”

किशन सिंह अपने हाथ देखने लगा।

“तुमने पहले से ही यह सब प्लान किया हुआ था। गाड़ी का एक्सीडेंट जान बूझ कर किया। मेरे हिसाब से गाड़ी के खाई में गिरने से पहले ही तुमने अपने ड्राईवर की हत्‍या कर दी फिर गाड़ी को खाई में ढकेल दिया। ब्रीफ़केस भी तुम पहले ही निकाल चुके थे। फिर कच्चे रास्ते से तुम नीचे गए और तुमने उस गाड़ी को पूरी तरह से जला दिया। शायद तुमको ऐसा करते हुए किशन सिंह ने देख लिया इसलिए तुमने उसको भी जान से मार दिया। उसको मारने की कोशिश के दौरान ही तुम्हारे पैरों में यह चोट लगी है और यह तब हुआ होगा जब किशन सिंह ने अपने बचाव की कोशिश में तुम पर भी वार किया होगा और यही कारण है कि तुमने २ दिन बीत जाने के बाद भी इस जंगल से भाग जाने की कोशिश नहीं की।
लेकिन किशन सिंह को जान से मारने से पहले तुमने उससे उसके और इस जंगल के बारे में बहुत कुछ जानकारी ले ली और कुछ दिन इधर ही रहने का निश्चय किया।”

हर्ष वर्मा ने अपनी बात को विराम देते हुए एक पल भारतेंदु और फिर किशन सिंह उर्फ़ तिलक राम की तरफ देखा और बोला – “तुमने खुद को बचाने के लिए ब्रीफ़केस भारतेंदु के घर के करीब लकड़ी के टीले में छुपा दिया। जहाँ तक मेरा सोचना है – इस ब्रीफ़केस में या तो पैसे होंगे नहीं, या होंगे तो बहुत कम। मेरा मानना है कि भारतेंदु कोई पेंटर नहीं है क्यूंकि उसके घर में कोई पेंटिंग का सामान नहीं था। मेरे हिसाब से वह एक अपराधी है जो खुद को पुलिस से छुपा कर रखने के लिए इस जंगल में रह रहा है। तुमने इससे दोस्ती की और किशन सिंह की पेंटिंग से सम्बंधित कई चीजें उधार दी या हो सकता है किशन सिंह ने ही दी हो। भारतेंदु के घर पर – उसे लगा की पुलिस वाले आ गए हैं इसलिए उसने गोली चलाई लेकिन जब उसे पता चला की वह एक चोरी और मर्डर के केस में नपने वाला है वह चुप हो गया।” – इतना कहकर हर्ष वर्मा ने भारतेंदु की तरफ देखा जो हामी भर रहा था।

“लेकिन तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह थी कि तुमने जिस केमिकल से अपने बालों को डाई किया वह इस ब्रीफ़केस पर लग गया। मुझे पहले यह पता नहीं चल पा रहा था कि यह रंग कैसा है लेकिन जब मैंने इसे सूंघा तो इसकी गंध ने इसकी पहचान स्वयं ही दे दी। इसके बाद मैंने भारतेंदु के बालों पर गौर किया तो पाया की वह सफ़ेद एवं काले दोनों रंग के हैं जबकि तुम्हारे बालों का रंग काला है और वह चमक भी रहा है अर्थात तुमने कुछ दिनों पहले ही बालों को डाई किया था।”

जैसे ही ये शब्द हर्ष वर्मा के मुंह से बाहर निकले, किशन सिंह उर्फ़ तिलक राम ने चूल्हे पर चढ़ी केतली उठा कर हर्ष वर्मा की तरफ फेंका और अपनी राइफल की तरफ लपका, लेकिन हर्ष वर्मा जैसे इसके लिए तैयार था। जब तक तिलक राम राइफल तक पहुँचता हर्ष वर्मा की गोली उसके कंधे को चीर कर निकल चुकी थी।

तिलक राम ने अपने कंधे को पकड़ कर चीखते एवं चिल्लाते हुए एक कोने में शरण ली। अब हर्ष वर्मा के लिए दोनों अपराधियों को घाटी से पुलिस स्टेशन तक ले जाना सच में कष्टदायक था।

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बहुरूपिये की गवाही

राजीव रोशन

जासूसी कथा साहित्य में विशेष रुचि। जासूसी उपन्यास के लेखन में व्यस्त। swccf.in के नाम से अपराध कथा केंद्रित ब्लॉग का संचालन
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