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अध्याय 21 : चोर के भाग जाने पर बुद्धि चलती है

आधीरात हो गयी है, चारो ओर सन्नाटा है। मकान के बाहर तीनबार “सियाराम” की आवाज़ हुई। भोला उठ बैठा और मन ही मन बोला – यही मौका है। देखा, पुजारी की नाक बज रही है। भोला ने अपनी झोली सहित बाहर निकलकर दरवाज़े की जंजीर चढ़ा दी। फिर ड्योढ़ी पर आया। वहाँ एक लालटेन जलती थी और ढाल-तलवार बर्छी आदि हथियार  जगह जगह लटकते थे। मिरजापुरी ड्योढ़ीदार जगन्नाथ चित सोया था।

भोला राय ने अपनी झोली से मोटी रस्सी निकालकर जगन्नाथ को खटिये से बाँध दिया। वह चिल्लाया तो भोला ने दीवार से एक तलवार निकालकर उसको डराया। मिरजापुरी जवान चुप हो गया।

भोलाराय ने झोली कमर में बाँधकर हाथ की तलवार जगन्नाथ के मुँह के पास ले जाकर कहा-“साँस न लेना समझा?” यह कहकर वह सीढ़ी से झट छत पर चढ़ गया। वह मुंशीजी की सोने की कोठरी के पास आया और शबरी से एक खिड़की की कई ईंटें निकालकर उसका किवाड़ निकाल दिया। देखा कि घर में चिराग जल रहा है, मुंशीजी अपनी स्त्री के साथ बेखबर सो रहे हैं। सोचा-“बड़े मौके पर आया हूँ परन्तु वह सन्दूक कहाँ है? मुंशीजी ने कहा कि वह सन्दूक बड़े सन्दूक में नहीं रखा है तो जरूर इसी घर में कहीं है।” यों सोचते-सोचते भोलाराय इधर-उधर ढूँढने लगा परन्तु कहीं नज़र नहीं आया।

-तो क्या मुंशीजी ने झूठ कहा था? न, ऐसा नहीं हो सकता। वह जैसा तेजस्वी और साहसी है वह झूठी डींग नहीं मारेगा। यों सोचते-सोचते भोला ने मुंशीजी के पलंग के पीछे आकर देखा कि कई खूटियों पर वह सन्दूक रखा हुआ है।

भोलाराय काम फ़तेह कर ताबड़तोड़ ज्योंही चला त्योंही पलंग के पावों में पैर ठेक जाने से वह सन्दूक के साथ जमीन पर गिर पड़ा, दम्पति की नींद टूट गई।

मुंशीजी “कौन है, कौन है” कहकर उछल पड़े। पार्वती खिड़की के पास डाकू की भयंकर मूर्ती देखकर डर के मारे चिल्ला उठी।

भोलाराय झटपट उठकर खिड़की के पास आकर बोला-“मेरा नाम भोलाराय है प्रण पूरा करके अब जाता हूँ। भगवान् तुम्हें बनाये रखें।”

मुंशीजी घायल शेर की तरह गरजकर उसके पीछे दौड़े। भोला हँकड़ता हुआ कूदकर तिमंजिले पर पहुँचा । वहाँ से बोला-“मुंशीजी! तुम इन गहनों के लिये अफ़सोस मत करना, तुम धर्म से चलकर अपार धन कमाओगे।”

मुंशीजी ने दलीपसिंह को पुकारा, जगन्नाथ को पुकारा परन्तु किसी की आहट नहीं मिली। वे तिमंजिले पर चढ़े वहाँ भोला को नहीं पाया। झटपट नीचे उतारकर देखा कि मिरजापुरी ड्योढ़ीदार खटिया से बँधा है और बाहरी दरवाजा बन्द है। उन्होंने झटपट दरवाजा खोलकर सड़क में पहुँचकर दलीपसिंह को पुकारते-पुकारते सुना कि कोई धीमी आवाज़ से कुछ कह रहा है। जिधर से आवाज़ आती थी उधर कुछ दूर जाते ही दलीपसिंह को देखकर पूछा-“अजी, तुम यहाँ इस तरह क्यों बैठे हो? तुम कहाँ थे? कड़ा दम लगाकर कहीं पड़े थे न?”

दलीप-“सरकार! आज भी कड़ा दम लगाने का दिन है? आपपर विपद पड़ने के दिन मैं ख़ुशी मनाऊँगा ? आपका नमक बहुत खाया है परन्तु आपके काम नहीं आया! इसी का मुझे बड़ा दुःख है! डाकू मेरी जान ही क्यों न ले गये!”

मुंशीजी-“तुम्हे मारा भी है क्या?”

दलीप-“सरकार! मेरा दायाँ पैर तोड़ गये।”

मुंशी – “वे सब घर में घुसे थे कि निकले? तुमसे जैसा कहा था उसी तरह मकान के चारों ओर पहरा देते थे न?”

दलीप – “सरकार! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि रात के एक बजे तक एक चूहा भी घर में घुसने नहीं पाया था। इसके बाद सरकार मुझसे एक कसूर हो गया। मैंने सोचा एक बज गया और अभी तक कोई नहीं आया तो आज डाका नहीं पड़ेगा। यही समझकर आधे घण्टे के लिये सिर्फ एक बार नाच देखने चला गया था। वहाँ से लौटकर ज्योंही साहजी के गोले के पास पहुँचा हूँ कि एक आदमी आपकी छत से रास्ते में कूदा। मैंने दौड़कर उसे पकड़ा वह, छुड़ाने लगा। मैं भी उसे काबू में लाने की कोशिश करने लगा। इतने में और एक आदमी ने आकर मेरे पैर में लाठी मारी। मैं गिर पड़ा वे दोनों भाग गये।”

मुंशी – “दलीप! तुम्हारा कुछ कुसूर नहीं है। मुझे ही जरा खबरदार रहना चाहिये था। अब समझ गया कि कल जो ब्राहम्ण बनकर आया था वही भोला पंछी था। खैर, जो होना था सो हो गया। तुम्हे क्या गहरी चोट लगी है?”

दलीप- “सरकार! गहरी चोट नहीं लगती तो क्या मैं इस तरह बैठा रहता?”

मुंशीजी – “अच्छा मैं ड्योढ़ीदार को भेजता हूँ, वह तुम्हें सहारा देकर लिवा ले जायगा। जगन्नाथ-को खटिया में बाँध दिया है। वह शायद सो गया था।” मुंशीजी ने घर लौटकर जगन्नाथ का बंधन खोलकर उसे दलीपसिंह के पास भेजने के बाद देखा कि सब घरो में जंजीर बंद है। जंजीर खोलने पर घर भर के लोग जमा होकर हाय-हाय करने लगे। बलदेवलाल ने कहा-“भैया! हम जिस लिये आयें है आओ वह काम अभी करें, अब घड़ी भर देर करना उचित नहीं है। चलो पौ फटते हम और तुम फौजदार के पास चलें। वे जरूर इसका कुछ इलाज करेंगे।”

मुंशीजी-“बहुत अच्छा! आप तैयार हो जाइये। मैं भी कपड़ा बदल कर आता हूँ।”

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