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नवमी के दिन हीरासिंह के घरवाले एक साथ स्नान करने चले गये हैं। अकेला हीरासिंह शिकार से चुके हुए शेर की तरह भयंकर मूर्ती धारण किये बैठक में टहल रहा है। सोचता है- लतीफन कैसे भाग गई? उसे कौन निकाल ले गया? बाग़ का सुरंग तीन-चार आदमियों को छोड़कर और कोई नहीं जानता; जो लोग जानते हैं उनमें से भी कोई कल रात को यहाँ नहीं था। दुखिया सिर्फ एक बार आया था लेकिन वह भी तो तुरन्त ही गोदाम की चाबी लेकर चला गया था। मैंने अपने हाथ से सुरंग का मुँह बन्द किया था तब वह कैसे बाहर गई? मैंने क्यों नहीं उसको मार डाला! उह वह तुर्किन जहाँ रहे मेरा क्या कर सकेगी?
हीरासिंह इसी सोच-विचार में पड़ा था इतने में भोलाराय एक सन्दूक लेकर वहाँ आया, बोला-“लीजिये सिंहजी! मुंशीजी का जेवर का सन्दूक लीजिये। मैंने तुम्हारे बचने का रास्ता भी बना दिया है। मेरा प्रण पूरा हुआ, काम समाप्त हुआ। अब मैं जाता हूँ। अब तुमसे मेरी मुलाक़ात न होगी।” यह कहकर वह नौ-दो ग्यारह हुआ। हीरासिंह ने उसको कई बार पुकारा परन्तु उसने न तो कुछ उत्तर दिया न लौटा।
इसके बाद ही दरोगा फतेहउल्ला आया। हीरासिंह ने उसको बैठने के लिये कहकर खबर पूछी। दारोगा ने कहा-“सब ठीक कर दिया है साहब! आप बेफ़िक्र रहिये, आरे के कोतवाल कल सबेरे आये थे उनके सामने सब माल बरामद हुआ है। दलीपसिंह और जगन्नाथ सिंह गिरफ्तार हुए।”
हीरा – “और मुंशी?”
दारोगा – “वह बदमाश ससुर के साथ आरे गया है।”
हीरा – “अरे उसके पकड़ नहीं सके?”
दारोगा – “इसके लिये कुछ फ़िक्र नहीं है, मैं अभी जाकर उसको गिरफ्तार कर लाता हूँ।”
हीरा- “उसको पाओगे कहाँ?”
दा – “मुझे खबर लगी है कि वह फौजदारी में नालिश करने गया है। वहीं जाकर उसको गिरफ्तार कर लूँगा। मेरे पास यह वारंट है। मैं अभी जाता हूँ।”
हीरा-“दिन बहुत चढ़ गया है, खा पीकर जाते तो कैसा?”
दा – “नहीं साहब! देर करना ठीक नहीं, मैं अभी जाता हूँ। आदाब अर्ज।”
दारोगा के चले जाने पर हीरासिंह के जी में जी आया। वह अन्दर गया।
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भोजपुर की ठगी : अध्याय 24 : शिकार से चुका हुआ शेर 

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