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अध्याय ३: मैदान में

मुंशी हरप्रकाश लाल लंबे-लंबे डेग मारते चले जा रहे थे। वे डर को कोई चीज नहीं समझते थे। उनके पीछे-पीछे भीम-देह दलीपसिंह एक संदूक पीठ पर बाँधे लम्बी लाठी कंधे पर लिए मतवाले हाथी की तरह झूमता जाता था। दोनों चुरामनपुर गाँव को जा रहे थे, जहाँ मुंशी जी की ससुराल थी। ठोरे पर से चुरामनपुर सड़क से जाने के बाद मैदान की पगडण्डी से जाना पड़ता था। मुंशी जी और दलीपसिंह धीरे-धीरे कई गाँव पार करके मैदान में जा पहुंचे। वहां जाने पर मुंशी जी को बड़ी ख़ुशी हुई। अगणित तारों से जुड़ा हुआ अनंत आकाश, चांदनी में सराबोर खेतों की हरियाली और शीतल-मंद बयार उनकी ख़ुशी चौगुनी करने लगी। मुंशी जी चलते-चलते गाने लगे –

अगर हम बागवाँ होते, तो गुलशन को लुटा देते।

पकड़कर दस्त बुलबुल को, चमन से जा मिला देते।।

दलीप सिंह इस गीत में मग्न हो रहा था। अचानक उसके पैर के पास से कोई चीज बिजली की तरह निकल गईं। वह झट कूदकर मुंशी जी के सामने जा खड़ा हुआ। मुंशी जी ने पूछा –“क्यों दलीप, क्या है?”

दलीप ने कहा –“सरकार। आपने सुना नहीं फरफराकर कोई चीज मेरे पैर के नीचे से चली गई। जो हो, सरकार रंग कुरंग मालूम होता है। जरूर डाकू हमलोगों के पीछे लगे हैं।”

मुंशी जी –“डर गए क्या दलीप?”

यह बात सुनकर दलीप कुछ शरमाया। उसने चिल्लाकर कहा –“अरे बदमाशों। अगर मर्द हो तो सामने आओ सामने।”

डाकू आगे-पीछे से गरज उठे। हरप्रकाश लाल लड़ने के लिए तैयार हो कर बोले –“देखो जी दलीप। अगर मैं घायल हो जाऊं तो तुम उसी वक़्त भाग जाना और यह संदूक मेरी स्त्री को जाकर देना। खबरदार नमकहरामी मत करना और संदूक में से दस मोहरें तुम ले लेना।”

उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि दो लंबे-लंबे जवान उनके सामने आकर खड़े हो गए। उनमे से एक के हाथ में एक लाठी और दुसरे के हाथ में तलवार थी।

मुंशी जी –“तुम लोग कौन हो? क्या चाहते हो?”

भोला-“यह संदूक चाहता हूँ।”

मुंशी –“बौना चाँद चाहता है।”

भोला –“मरने का शौक इतना क्यों है।” – कहकर उसने मुंशी जी पर लाठी उठाई।

मुंशी जी झट उछलकर एक बगल जा रहे और दुसरे डाकू के दाहिने हाथ पर ऐसी लाठी जमाई कि उसकी तलवार टूट गिरी। भोला ने फिर मुंशी जी पर हमला किया। दोनों में घमासान लड़ाई होने लगी। इस बीच दलीपसिंह जमीन से वह तलवार उठाकर भोला की तरफ दौड़ा। मुंशीजी की लाठी से हींगन का दायाँ हाथ टूट गया था, उसने बायें हाथ से लाठी उठाई। इस बीच में और दो डाकू आ पहुंचे। अब वे चार हो गए। मुंशीजी और दलीपसिंह इससे भी न डरकर पहले से अधिक जोश के साथ लाठी चलाने लगे। बड़ी देर तक लड़ाई होने के बाद हींगन मुंशी जी से सख्त घायल होकर धरती पर लोट गया। इसके बाद ही भोला पंछी के प्रहार से आंधी से टूटे हुए वृक्ष की भांति मुंशी जी भी लोटन कबूतर हुए। दलीपसिंह मालिक के आज्ञानुसार हवा की तरह भागा।

भोलाराय ने दलीपसिंह को भागते देखकर कहा –“साधो। तुम हींगन को देखो, माल उस बच्चू के हाथ में है। हम उसे पकड़ने जाते हैं।

यह कहकर उसने लालू सहित दलीप का पीछा किया।

चन्द्रमा अस्त हो गया है। आकाश में घोर घटा छा गयी है। एक भी तारा नहीं दिखाई देता। चारों ओर काली अंधियारी है, बीच-बीच में बिजली चमक जाती है, बूंदा-बंदी होने लगी है। पास की चीज भी नहीं दिखाई देती। ऐसी भयानक रात में डाकू सरदार भोलाराय का साथी हींगन मैदान में अधमरा पड़ा है। खून चारों ओर बह रहा है। चुपके-चुपके एक गीदड़ आकर उसका मुख सूंघने लगा। हींगन डर के मारे चीख उठा।

साधो घायल डाकू को वहां से हटाने का भार लेकर एक टूटे पुल पर बैठकर गांजा मलने लगा। हींगन की चीख सुन उसके पास आकर बोला – “हींगन। तुम अभी जीते हो। तमाकू पीओगे?”

हींगन ने धीरे-धीरे कहा – “आह! आह! अरे पहले इस गीदड़ को भगाओ।”

साधो-“गीदड़ भाग गया; गांजा पीओगे?”

हींगन-“मुझमें उठने की शक्ति थोड़े हैं। आह! आह! भाई जरा मेरा सिर बाँध दो।”

साधो-“अच्छा! मुंशी का कपड़ा खोल लाऊं।”

साधो उठकर मुंशी जी के लाश ढूँढने लगा परन्तु उसका कहीं नाम निशाँ भी न पाकर हींगन के पास लौट आया और उसी की धोती फाड़ एक गढ़े पानी में भिंगोकर उसके सिर में बाँध दिया और ऊपर से अपना गमछा लपेट दिया। हींगन ने जरा आराम पाकर पूछा – “मुंशी मर गया?”

“लेकिन मरकर गया कहाँ? गीदड़ घसीट ले गया क्या?” – यह कहकर साधो चारों ओर मुंशी जी को ढूँढने लगा। सड़क के किनारे, झाडी, जंगल, धान के खेत, सब जगह ढूँढा, लेकिन कही उनका चिन्ह नहीं पाया। लाचार लौटकर हींगन की बगल में सोना चाहता था कि इतने में एक आदमी आया और उसे जमीन पर ढकेलकर उसकी छाती पर चढ़ बैठा और बोला – “पाजी! अब कह?”

साधो हिल-डुल नहीं सकता था। उसने बड़े कष्ट से कहा – “सरकार मैं आपका गुलाम हूँ, आप मेरी जान मत मारिये। आप जो हुक्म देंगे वही करूँगा।”

हमला करने वाले ने कहा – “तू डाकू है। तेरी बात का विश्वास क्या?”

साधो-“हुजूर! विश्वास कीजिये, मैं कभी नमकहरामी नहीं करूँगा।”

उस आदमी ने तुरंत साधो को छोड़कर कहा – “मैं तुझे छोड़ देता हूँ लेकिन तू अपनी बात रख जो कहता हूँ सो कर।”

साधो ने हाथ जोड़कर कहा –“क्या हुक्म है हुजूर।”

उस आदमी ने कहा –“इस घायल आदमी को कंधे पर चढ़ाकर मेरे साथ चल, यह जो मैदान में रौशनी दिखाई देती है वहीँ जाना होगा।”

साधो ने हींगन को कंधे पर लिया और उस आदमी के साथ-साथ उसी रोशनी की तरफ चला।

भोजपुर की ठगी : अध्याय २ : पंछी का बाग़

भोजपुर की ठगी : अध्याय ४ : साधु का आश्रम

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