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अध्याय ५: ससुराल

रात झन-झन कर रही है। चारों ओर सन्नाटा है। निशाचरी जानवरों के सिवा और सभी जीव सोये हुए हैं। ऐसी गहरी रात में वह कौन स्त्री अकेली इस अटारी की खिड़की में बैठी झाँक रही है? युवती क्या किसी की बाट देख रही है? या किसी असह्य मनोवेदना से अभी तक सुख की नींद नहीं सो सकी है? घर में एक दीया जल रहा है और एक पलंग पर एक विधवा सोयी हुई है। घर के पिछवाड़े से एक गीदड़ हुआँ- हुआँ करके भागा, फिर कई कुत्ते भों-भों करने लगे। विधवा की नींद टूटी। उसने खिड़की की तरफ देखकर कहा – ‘जीजी। सोवोगी नहीं क्या? रात बहुत हो गयी।”

खिड़की पर बैठी हुई स्त्री मुंशी हरप्रकाश लाल की पत्नी पार्वती है। पार्वती ने उदास होकर कहा –“हाँ सोती हूँ।”

विधवा ने करवट बदलकर कहा – “रात भर जागने से बीमार हो जाओगी।”

पार्वती –“आती हूँ।”

विधवा –“अब देर मत करो। पाहुन आने को होते तो अबतक आ गए होते। अब आज नहीं आवेंगे। तुम आओ सो रहो।”

पार्वती-“आती हूँ।”

विधवा-“अरे! तुम रोती हो क्या?”

पार्वती के ह्रदय में बड़ा कष्ट हो रहा था। कितनी ही कुचिंताएं उसके चित्त-पट पर तरह-तरह के अशुभ चित्र खींचती थी। बहतु दिनों के बाद स्वामी आनेवाले थे। वह अभी तक उनकी बाट देख रही थी। विधवा की बात सुनकर वह अपना मान संभाल नहीं सकी, रोने लगी।

विधवा उठी, पार्वती का हाथ पकड़ कर पलंग पर ले आई और उसे बिठाकर आप भी उसकी बगल में बैठ गयी।

विधवा ने अपने आँचल से पार्वती का मुहं पोछकर कहा –“राम!राम! तुम रोती क्यों हो? जीजा नहीं आये इसीसे रोती हो क्या? तुम तो महा नादान हो। रोकर उनका अशुभ क्या करती हो? नाव पानी का रास्ता है, ज्वार-भाटे की बात है, शायद नाव नहीं पहुंची, इसीसे नहीं आये। खैर, आज नहीं आये तो कल सवेरे आ जायेंगे। इसके लिए इतनी फ़िक्र क्यों, रोना-पीटना क्यों?”

पार्वती-“भौजी! मेरे मन में कैसा तो हो रहा है। बड़ी चिंता हो रही है। वे अच्छे तो हैं न?” – फिर आँखों से आंसू जारी हो गए।

विधवा-“वाह, अच्छे नहीं तो क्या हैं? ऐसी अशुभ बात जबान पर नहीं लानी चाहिए। जीजी! बाहरी दरवाजे पर कौन धक्का मार रहा है। धां-धां धक्का ही तो मारता है। दरवाजा तोड़ डालेगा क्या?”

पार्वती-“बाबूजी तो बाहर ही हैं। क्या वे ऐसे बेखबर सो गए हैं?”

विधवा-“रात क्या कम गई है। बूढ़े आदमी हैं। बैठे-बैठे सो गए होंगे। एक काम करो। दीया लेकर मेरे साथ चलो, मैं ही जाकर दरवाजा खोले देती हूँ।”

पार्वती का चेहरा खिल गया। उसने ख़ुशी मन से चिराग ले जाकर कोठरी का दरवाजा खोला। बाहरी दरवाजे पर लगातार धक्का पड़ रहा है। विधवा पार्वती के पीछे-पीछे चली और हँसते-हँसते बोली-“हरे, हरे। मुंशीजी से देर सही नहीं जाती है, दरवाजा ही तोड़ डालेंगे क्या?”

उन्होंने ज्योंही दालान में पैर रखा, त्योंही दरवाजे का एक किवाड़ धड़-धड़ाकर गिर पड़ा और यमदूत सरीखे दो लंबे जवान भीतर घुस आये। उनके सारे अंग में तेल और स्याही पुती हुई थी, दोनों के हाथ में एक-एक जलती मशाल और एक-एक लाठी थी। दोनों स्त्रियाँ अचानक इन भयंकर मूर्तियों को देख डर के मारे चिल्ला उठीं। पार्वती के हाथ से दीया गिर पड़ा। दोनों भाग कर अटारी पर चढ़ गई।

पार्वती जन्म से ही कोमल स्वभाव की है। एक तो रात भर जागते और इंतज़ार करते रहने से उसकी देह और मन थक गया था, ऊपर से इस घटना ने भय और नाउम्मीदी से उसको बदहवास कर दिया। वह खड़ी नहीं रह सकी, एकदम अचेत होकर धरती पर गिर पड़ी। विधवा भी घर का दरवाजा बंद करके भौंचक सी बनकर खिड़की की राह बाहर की तरफ चुपचाप ताकने लगी।

जो दो विकट मूर्तियाँ मकान में घुसीं उनमे से एक वही प्रधान डाकू भोलाराय और दूसरा उसका साथी था। भोला घर में घुसकर बड़े जोर से गरजा और लालू को नीचे छोड़कर खुद उन स्त्रियों के पीछे-पीछे गया। लेकिन ऊपर जाकर देखा कि औरतों ने भीतर से दरवाजा बंद कर दिया है। तब वह उसकी जंजीर चढ़ाकर फिरा, दालान में एक चारपाई पर मुंशीजी के ससुर बूढ़े बलदेवलाल सोये थे, नींद में नहीं थे। भोला पंछी के तड़पने से पहले ही उनकी नींद टूट गयी थी, परन्तु डाकुओं की अवाई जानकार वे पत्थर की तरह पड़े रहे।

भोला ने हाथ में मशाल लिए बूढ़े के सामने आकर कहा – “अरे बुड्ढा। तेरे दामाद का वह पाजी प्यादा कहाँ है?”

बूढा-“ऐं! दामाद!!!”

भोला-“तेरे दामाद को तो यमलोक में भेज दिया; अब यह बता कि उसका प्यादा और संदूक कहाँ है?”

बूढा-“ ऐं! संदूक! मुझे…तो कुछ माँ….लू….म…नहीं भैया….”

भोला-“हरामजादा! तू नहीं जानता?(मारते-मारते) बता कहाँ है?”

बूढा-“दुहाई दादा की। मैं कुछ नहीं जानता। भगवान् जाने, मैं कुछ नहीं जानता। यह चाभी देता हूँ। मेरे पास जो कुछ है ले लो, मेरी जान मत मारो।”

भोला-“अरे बदमाश तेरे पास लेने को क्या रक्खा है, बता दे संदूक कहाँ है, बता दे।”

बूढा-“भैया। तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ, मुझे मत मारो। मैं संदूक-फंदूक कुछ नहीं जानता।”

“नहीं बतावेगा?”-कहकर भोला ने लात मार बूढ़े को दूर फेंक दिया। बूढा कराहने लगा। परन्तु भोला इसका कुछ ख्याल न करके फिर एक बड़ी लकड़ी से उसके हाथ-पैर खोदने लगा। जब इतने से भी अपना काम बनते न देखा तब उस असमर्थ बूढ़े को उठाकर गाय के घर में पटक दिया। बूढा बेहोश हो गया। गाय वह विकट मूर्ति, जलती मशाल और भयंकर घटना देखकर उछल पड़ी और पगई तुड़ा कर बां-बां करती हुई भाग चली। भोला राय ने बाहर से किवाड़ बंद करके मशाल से घर में आग लगा दी और भीतर घुसकर लूट-मार मचाने लगा।

विधवा खिड़की से बूढ़े ससुर की पीड़ा और यंत्रणा देखकर रो उठी, उसके रोने से पार्वती को होश हुआ। वह उठ बैठी परन्तु पागल सी सिर्फ एक ओर टुकुर-टुकुर ताकती रही।

भोला ने नीचे के घर में जो कुछ दामी माल पाया उसे समेट कर कमर में बाँध लिया। फिर अटारी पर चढ़कर बंद दरवाजे पर धक्का देने लगा। बार-बार धक्का देने से किवाड़ टूट गया। भोला ने भीतर घुसते ही पार्वती की चम्पाकली नोंच ली और कहा-“अगर खैर चाहती है तो संदूक सामने रख दे।”

इसका कुछ उत्तर न पाकर वह दोनों स्त्रियों को पीटते-पीटते दालान में ले आया और बोला –“देख रे लालू। अगर प्यादे और संदूक का पता न बतावें तो इन हरामजादियों को भी जला दे।”

यह कहकर भोला गरजता हुआ बिजली की तरह लाठी घुमाता हुआ इधर-उधर नाचने लगा। आग गाय के फूसवाले मकान में भभक उठी और उसी में अभागा बूढा चिल्ला रहा था। क्या ही भयंकर दृश्य था।

पार्वती फिर मूर्छित हो गई। किन्तु धन्य विधवा का साहस। धन्य उसका धैर्य। वह इस दशा में भी पार्वती का सिर अपनी गोद में उठाकर उसकी मूर्छा छुड़ाने की चेष्टा करने लगी। पार्वती के बदन पर जो कुछ जेवर बाकी थे, उन सबको लालू ने उतार लिए। उसके गालों से लहू की धारा बहने लगी। विधवा रोते-रोते अपने आँचल से वह धारा पोंछने लगी।

इतने में “हाय रे राक्षस। तू ने क्या कर डाला?” कहकर कौन चिल्लाया? किसका कलेजा छेदकर यह आवाज निकली। विधवा ने उस आवाज की तरफ कान दिया कि उसी घड़ी डाकू का सिर धड़ से अलग हो गया। विधवा चिल्ला उठी। यह कार्यवाई किसने की? इस विपद में किसने आकर मदद की? विधवा ने फिर देखा कि खून से रंगी तलवार हाथ में लिए पागल की तरह एक आदमी आकर पार्वती को गोद में उठाये महल में चला गया। वह आने वाला मुंशी हरप्रकाश लाल था।

थोड़ी ही देर बाद दलीप आ पहुंचा। भोला पंछी अपने को अकेला देखकर भाग गया। तब दलीप सिंह चिल्लाहट सुनकर जलते हुए गौसार की तरफ दौड़ा गया और क्षणभर में बूढ़े लाला बलदेव लाल को निकाल लाया।

अध्याय ४ : साधु का आश्रम

अध्याय ६ : सलाह

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