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अध्याय ८: हीरा सिंह का मकान

हीरा सिंह एक बड़ा भारी जमींदार था। उसका धन-ऐश्वर्य अपार और दबदबा बेहद था। उन दिनों शाहाबाद जिले में उसकी जोड़ का कोई जमींदार नहीं था। हीरा सिंह दानी-मानी और आचारी था। सब तीर्थों में उसके बनाए मंदिर और बड़े-बड़े शहरों में उसकी कोठियां थी। वह मुरार में रहता था। जो कोई उससे एक बार मिलता या बात कर लेता था वह मानों उसीका हो जाता था। उसकी हंसती बोली में कुछ ऐसी ही जादू भरी थी।

हीरासिंह का मकान बड़ा भारी था। वैसा मकान उस समय और कहीं देखने में नहीं आता था; मकान के सामने फुलवारी थी, फाटक और नौवतखाना थे। एक दिन पहर रात चली गयी थी, पंचमी का चन्द्रमा अस्त हो गया था, नौवतखाने में शहनाई बज रही थी। नामी तायफा लतीफन कोयल को लजाने वाले स्वर से श्रोताओं को मोह रही थी। हीरासिंह कभी हँसता, कभी हाथ जोड़ता, किसी का हाथ धरकर बिठाता, किसी को अपने हाथ से पंखा करता, किसी को ताम्बूल और फूल देता, किसी के बदन पर गुलाबजल छिड़कता था। पर उसका ध्यान किसी और ही तरफ था।

हीरासिंह के यहाँ विजयादशमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। कुँवार सुदी १ से १० तक रोज तरह-तरह के नाच-तमाशे होते थे। खासकर हर साल पंचमी को उसकी वर्षगाँठ होने से बड़ा भारी उत्सव होता था। आज उसी की धूम है। सब लोग खुश हैं लेकिन हीरासिंह का चित्त उतना चंचल क्यों है?

वेश्या अपने गीत से सबको मोह रही थी। आधी रात जा चुकी थी। सभी कठपुतली की तरह बैठे थे कि इतने में ड्योढ़ीदार आकर दरवाजे पर खड़ा हुआ। उसपर हीरासिंह की नज़र पड़ी तो उसने सलाम करके कहा – “हुजूर नीचे राय साहब खड़े हैं।”

यह सुनते ही हीरासिंह अपने पुत्र मोतीसिंह को अतिथियों के स्वागत का भार सौंपकर दरबान के साथ नीचे आया। वही भोलाराय को देखा। हीरासिंह ड्योढ़ीदार को यथा स्थान भेजकर भोलाराय सहित ठाकुरबाड़ी में आया। वहां सिर्फ एक चिराग जलता था और सामने राम, लक्ष्मण, जानकी की मूर्तियाँ दिखाई देती थी। दोनों ने ठाकुरबाड़ी की एक कोठरी में घुसकर भीतर से दरवाजा बंद कर दिया। कोठरी में बहुत अँधेरा था, रोशनी का नाम नहीं। टटोल-मतोलकर दोनों और एक दरवाजे पर पहुंचे। हीरासिंह ने उसका ताला खोला और एक छोटी सी सीढ़ी से उतरकर एक लंबे-चौड़े घर में दोनों दाखिल हुए। उस पाताल-गृह में सदा एक गंभीर शक आप से आप होता था और उसकी बेमरम्मत दीवारों पर ढाल, तलवार, भुजाली, हथोड़ी, मोचनी, संड़सी, आदि सोनार के औजार और दूसरी तरफ कई मोटी-मोटी मशालें और तेल के भांड पड़े थे। चिराग की झलमलाती रोशनी में मालूम होता था कि एक जगह लाश की सी कोई चीज पड़ी है और उसके बगल में एक विकटाकर मूर्ति चुपचाप बैठी है।

वहीँ जाकर हीरासिंह ने भोला पंछी से पूछा –“क्यों राय साहब क्या खबर है? आज दिन भर आसन कहाँ था?”

भोला कुछ नहीं बोला, उदास मन से चुपचाप बैठा रहा।

राय साहब कहने से ही भोला को क्रोध हो गया क्या, यह सोचकर हीरासिंह ने कुछ शरमाकर फिर कहा –“क्यों भोला! आज तुम इतने उदास क्यों हो?”

भोला –“अब मैं यह काम नहीं करूँगा। इससे क्या फायदा है? क्या सुख है?”

हीरा – “फायदा रूपये का है, रुपया होने से सुख की क्या कमी है।”

भोला –“रूपये से तुम्हें सुख हो सकता है, मुझे रूपये से सुख नहीं होगा। मैंने बहुत रूपये पैदा किये हैं लेकिन एक दिन भी सुखी नहीं हुआ। इस काम में कभी कुछ सुख नहीं है।”

हीरासिंह ने जोर से हंसकर कहा – “तुम तो बड़े बेवकूफ मालूम होते हो, इस काम में सुख नहीं रहा तो क्यों करता? और तू मेरे कहने को क्यों बजाता? जान पड़ता है तुमने आज दिन भर कुछ खाया नहीं है। आओ पहले भोजन कर लो, तुम्हारे लिए भोजन बनवा रक्खा है। पहले खा-पीकर ठंढा हो लो तब बातचीत होगी।”

हीरासिंह भोला का हाथ पकड़कर चिराग के पास ले आया और उसको आसानी से बिठाकर हलवा, पूड़ी-कचौड़ी आदि पकवान सामने ला रक्खा। सामने पकवान की थाली देखकर भोला का चेहरा पहले से कुछ प्रसन्न हो आया, उसने छककर खाया और ऊपर से एक हांडी दूध भी चढ़ा गया। उसके हाथ-मुहँ धोने पर फिर काम की बात छिड़ी। पहले रायसाहब ने ही मुहं खोला, कहा- “ठाकुर साहब, आप कहते थे कि तुम्हें जो हुआ है वह मैं समझ गया हूँ, अच्छा बताइये तो मुझे क्या हुआ है?”

भोला ने ज्योंही यह बात पूछी त्योंही गूजरी की झाड़-फटकार उसे याद आ गयी। उसने सोचा कि, हो सकता है इन्होंने गूजरी की बात जान ली हो।

हीरासिंह ने उत्तर दिया –“अरे नादान! इतना नहीं समझता तो तुम लोगों की सरदारी क्या करता?”

भोला-“अच्छा बताइये न, क्या समझा है?”

हीरा-“भैया, नाकामयाबी और गर्व खर्ब होने पर किसका चित्त ठिकाने रहता है? तुम्हारी भी आज यही दशा हुई है?”

भोला मन ही मन काँप गया। सोचा – इनको ये सब बातें कैसे मालूम हुईं? इन्होने कैसे जान लिया कि मेरा मतलब सिद्ध नहीं हुआ, गूजरी ने मेरा गर्व खर्ब कर दिया है?

किन्तु जब हीरासिंह ने कहा –“भैया, बूढ़े की बात न मानने से ऐसा ही होता है, उसी समय कहा था कि हरप्रकाशलाल को ऐसा-वैसा आदमी नहीं है।” – तब भोला को होश हुए।

उसने नराजी के साथ कहा – “आप हरप्रकाश लाल को क्या समझते हैं?”

हीरा-“मैं चाहे जो समझूँ परन्तु तुमने उसका क्या कर लिया है? तुम उसके दस हज़ार लूटने गए थे, वे रूपये कहाँ हैं? ऐं। हींगन कहाँ है? लालू कहाँ है?”

भोला ने कुछ उत्तर नहीं दिया सिर्फ दांत किचकिचाकर हीरा सिंह की ओर ताकने लगा। हीरा ने चुप देखकर फिर कहा –“क्यों, बोलते क्यों नहीं? चुप क्यों रह गए?”

भोला-“चुप रहो।”

हीरा-“चुप क्या रहूँ? तुम लालू की लाश वहीँ क्यों छोड़ आये? तुम्हारा जो साहस और बल है वह मालूम हो गया। अब बात मत बनाओ।”

भोला-“अब भी कहता हूँ, चुप रहो।”

हीरा –“ऐं। तेरा इतना बड़ा दिमाग है कि मेरे सामने लाल-लाल आँखे करके बोलता है?”

भोला-“क्यों तू है कौन? हीरासिंह। मैं तुझे तिनकी बराबर समझता हूँ, तू बूढा हो गया – क्या कहूँ तेरा नमक बहुत खाया है।”

हीरा-“(बात काटकर) नहीं तो मुझे मारता क्या?”

एक तरफ जो विकटाकर मूर्ति चुपचाप बैठी थी वह अब आगे बढ़ी। वह वही साधो डाकू था। उसने आकर बायें हाथ से भोला के दोनों पैर पकड़ लिए।

भोला-“छोड़, छोड़।”

साधो-“रायसाहब। गम खाइये, आप गुस्सा करेंगे तो किसी की खैर नहीं है। मालिक ने दो बात कह दी तो क्या इतना गुस्सा करना चाहिए? कसूर होने पर मालिक नहीं डांटेंगे तो कौन डाँटेगा?”

भोला-“मेरा क्या कसूर है?”

हीरा-“तेरा हज़ार दोष है, तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी?”

भोला-“तुम्हें दिखा दूँगा कि होता है या नहीं, भोलाराय के शरीर में जबतक एक भी हड्डी रहेगी तब तक हरप्रकाश की जान नहीं छोडूंगा।”

हीरा-“बहुत हुआ, अब बात बनाने का काम नहीं है तेरी ही बात पर भरोसा कर बैठ रहने से यह आफत हुई।”

साधो-“यह बात सच है, मालिक की चतुराई से इस बार हम लोगों की जान बची है। वे हमलोगों के पीछे-पीछे नहीं जाते तो जरूर जान जाती। उन्होंने साधु बनकर बड़ी-बड़ी दिक्कतों से हम लोगों को बचाया है। राय जी, झूठ-मूठ गुस्सा करके क्या आपस में ही बिगाड़ कीजियेगा? चुपचाप बैठिये।”

भोला-“अब मैं नहीं बैठूँगा।”

हीरा-“न बैठ, इस वक़्त कहाँ जाएगा?”

भोला-“मेरा मन खराब हो रहा है, मैं अभी जाता हूँ।”

हीरा-“नहीं-नहीं, चलो गीत सुनो। साधो जानता है न, यहाँ एक गड्ढा खुदा हुआ है?”

साधो ने कहा – “जी सरकार। आ जाइये।”- फिर मन ही मन कहने लगा – “जैसी करनी वैसी भरनी। हिन्दू होकर भी हींगन कब्र में गाड़ा जाता है। न जाने मेरे भाग्य में क्या लिखा है।”

अध्याय ७ : नौरतन का खंडहर

अध्याय ९ : मुंशी जी का मकान

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