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अध्याय ९ : मुंशी जी का मकान

मुंशी हर प्रकाशलाल अपने मकान पर पहुँच गए है। उनका मकान हीरा सिंह की इमारत की तरह आलीशान नहीं है और उनका न उतना ठाठ-बाट है परन्तु बहुत मामूली भी नहीं है। मकान खूब साफ़-सुथरा और देखने योग्य है। मकान के सामने रास्ता है, रास्ते के दूसरी तरफ बाग़ और तालाब है। भीतर दो मंजिले पर नई सफेदी का एक चमकता हुआ बड़ा कमरा है, उसके सामने खुली छत है। उसी घर में मुंशी जी सोते हैं। घर में एक तरफ एक शमादान में बत्ती जलती थी। उसकी रोशनी में घर में सजे हुए बर्तन चमचमा रहे थे और दाहिनी ओर खिड़की के पास एक सुन्दर चारपाई पर पार्वती सो रही थी। पार्वती स्वामी की बाट बहुत देर तक, देखती रही परन्तु पिछली रात जागने और थक जाने के कारण उसकी आँखें लग गयी। कुछ देर बाद दरवाजा खुला, मुंशी जी भीतर आकर चारपाई के पास खड़े हुए और प्रेम भरे नयनों से प्राण प्यारी का मुख-कमल और लुनाई भरी देह निरखने लगे।

 

मुंशी जी इससे पहले जिस चिंता में पड़े थे, कोठरी में पैर रखते ही वह सब भूल गए। ये मन ही मन कहने लगे – हाय ऐसे कोमल अंग पर चोट करते समय पापी का हाथ क्यों नहीं बँध गया। ओफ! बर्दाश्त नहीं होता। देखूंगा कि हीरा सिंह कितना बड़ा डाकू है। उसको कितनी ही धन-दौलत हो, कितना ही प्रताप हो, कितने ही मददगार हों, कितनी ही प्रतिष्ठा हो, एक बार मैं उसे देखूंगा। उस पापी के अत्याचार से जाने कितने ही दूधमुहें बच्चे पितृहीन हो गए, कितनी ही बूढी माताएं पुत्र से हाथ धो चुकीं, कितनी अबलायें विधवा हो गयीं। हीरा! तूने अनगनित लोगों को राह का भिखमंगा बना दिया है, तेरे पाप का प्रायश्चित नहीं है।

 

हरप्रकाश लाल गहरी चिंता में डूबे हुए हैं, इतने में अचानक वहां बेला और चन्दन की खुशबू महक उठी। अचानक दरवाजे पर एक हट्टे-कट्टे ब्रह्मचारी का आगमन हुआ, उसने गंभीर स्वर से कहा – “हरप्रकाश लाल! अपनी स्त्री का यह हार लो।” – कहकर उसने एक हार मुंशी जी के सामने फेंक दिया। मुंशी जी भौंचक से दरवाजे की ओर इकटक ताकने लगे।

 

फिर उस मूर्ति ने कहा – “मुंशी। तुम मुझे देखकर चकरा गए हो? मेरा नाम भोला राय है। मैंने ही कल रात को तुम्हारी ससुराल में डाका डाला था। यह हार मैं नहीं चाहता, मैं तुम्हारा वह गहनों का संदूक चाहता हूँ। तीन दिन की मुहलत देता हूँ, आगामी अष्टमी की रात को वह संदूक यहीं लाकर रखना; नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं।”

 

यह कहकर डाकू गायब हो गया। मुंशी जी कुछ भौंचक से खड़े रहे। कुछ देर के बाद उनके होश-हवाश ठिकाने आये, जमीन से हार उठाकर तुरंत बाहर गए, चारों ओर ढूंढा परन्तु उसको कहीं नहीं पाया।

अध्याय ८ : हीरा सिंह का मकान

अध्याय १० : मैदान में

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