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अपनी बहिन लाडिली, ऐयारों और दोनों कुमारों को साथ लेकर कमलिनी राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार मायारानी के तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जाकर देवमन्दिर में कुछ दिन रहेगी। वहां रहकर ये लोग जो कुछ करेंगे, उसका हाल पीछे लिखेंगे, इस समय तो भूतनाथ का कुछ हाल लिखकर हम अपने पाठकों के दिल में एक प्रकार का खुटका पैदा करते हैं।

भूतनाथ कमलिनी से विदा होकर सीधे काशीजी की तरफ नहीं गया, बल्कि मायारानी से मिलने के लिए उसके खास बाग (तिलिस्मी बाग) की तरफ रवाना हुआ और दो पहर दिन चढ़ने के पहले ही बाग के फाटक पर जा पहुंचा। पहरे वाले सिपाहियों में से एक की तरफ देखकर बोला, “जल्द इत्तिला कराओ कि भूतनाथ आया है।” इसके जवाब में उस सिपाही ने कहा, “आपके लिए रुकावट नहीं है आप चले जाइए, जब दूसरे दर्जे के फाटक पर जाइएगा तो लौंडियों से इत्तिला कराइयेगा।”

भूतनाथ बाग के अन्दर चला गया। जब दूसरे दर्जे के फाटक पर पहुंचा, तो लौंडियों ने उसके आने की इत्तिला की और वह बहुत जल्द मायारानी के सामने हाजिर किया गया।

मायारानी – कहो भूतनाथ, कुशल से तो हो तुम्हारे चेहरे पर खुशी की निशानी पाई जाती है, इससे मालूम होता है कि कोई खुशखबरी लाये हो और तुम्हारे शीघ्र लौट आने का भी यही सबब है। तुम जो चाहो कर सकते हो! हां, क्या खबर लाये।

भूतनाथ – अब तो मैं बहुत कुछ इनाम लूंगा, क्योंकि वह काम कर आया हूं जो सिवा मेरे दूसरा कोई कर ही नहीं सकता था।

मायारानी – बेशक तुम ऐसे ही हो, भला कहो तो सही क्या कर आये?

भूतनाथ – वह बात ऐसी नहीं है कि किसी के सामने कही जाये।

मायारानी – (लौंडियों को चले जाने का इशारा करके) बेशक मुझसे भूल हुई कि इन सभी के सामने तुमसे खुशी का सबब पूछती थी। हां, अब तो सन्नाटा हो गया।

भूतनाथ – आपने अपने पति गोपालसिंह के लिए जो उद्योग किया था, वह तो बिल्कुल ही निष्फल हुआ। मैं अभी कमलिनी के पास से चला आ रहा हूं। उसे मुझ पर पूरा भरोसा और विश्वास है और वह मुझसे अपना कोई भेद नहीं छिपाती। उसकी जबानी जो कुछ मुझे मालूम हुआ है उससे जाना जाता है कि गोपालसिंह अभी किसी के सामने अपने को जाहिर नहीं करेगा बल्कि गुप्त रहकर ही आपको तरह-तरह की तकलीफें पहुंचावेगा और अपना बदला लेगा।

मायारानी – (कांपकर) बेशक वह मुझे तकलीफ देगा। हाय, मैंने दुनिया का सुख कुछ भी नहीं भोगा। खैर, तुम कौन-सी खुशखबरी सुनाने आये हो सो तो कहो।

भूतनाथ – कह तो रहा हूं – पर आप स्वयं बीच में टोक देती हैं तो क्या करूं। हां तो इस समय आपको सताने के लिए बड़ी-बड़ी कार्रवाइयां हो रही हैं और रोहतासगढ़ से फोज चली आ रही है क्योंकि गोपालसिंह और तेजसिंह ने कुमारों की दिलजमई करा दी है कि राजा वीरेन्द्रसिंह और रानी चन्द्रकांता को मायारानी ने कैद नहीं किया बल्कि धोखा देने की नीयत से दो आदमियों को नकली चन्द्रकांता और वीरेन्द्रसिंह बनाकर कैद किया है। अब कुंअर इन्द्रजीतसिंह के दो ऐयारों को साथ लेकर गोपालसिंह किशोरी और कामिनी को छुड़ाने के लिए मनोरमा के मकान में गये हैं।

मायारानी – बिना बोले रहा नहीं जाता! मैं न तो कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्द या उनके ऐयारों से डरती हूं और न रोहतासगढ़ की फौज से डरती हूं, मैं अगर डरती हूं तो केवल गोपालसिंह से बल्कि उसके नाम से, क्योंकि मैं उसके साथ बुराई कर चुकी हूं और वह मेरे पंजे से निकल गया है। खैर, यह खबर तो तुमने अच्छी सुनाई कि वह किशोरी और कामिनी को छुड़ाने के लिए मनोरमा के मकान में गया है। मैं आज ही यहां से काशीजी की तरफ रवाना हो जाऊंगी और जिस तरह होगा, उसे गिरफ्तार करूंगी!

भूतनाथ – नहीं-नहीं, अब आप उसे कदापि गिरफ्तार नहीं कर सकतीं, आप क्या बल्कि आप-सी अगर दस हजार एक साथ हो जायें तो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।

मायारानी – (चिढ़कर) सो क्यों?

भूतनाथ – कमलिनी ने उसे एक ऐसी अनूठी चीज दी है कि वह जो चाहे कर सकता है और आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।

मायारानी – वह कौन ऐसी अनमोल चीज है?

इसके जवाब में भूतनाथ ने उस तिलिस्मी खंजर का हाल और गुण बयान किया जो कमलिनी ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह को दिया था और कुंअर साहब ने गोपालसिंह को दे दिया था। अभी तक उस खंजर का पूरा हाल मायारानी को मालूम न था इसलिए उसे बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वह कुछ देर तक सोचने के बाद बोली –

मायारानी – अगर ऐसा खंजर उसके हाथ लग गया है तो उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। बस मैं अपनी जिन्दगी से निराश हो गई। परन्तु मुझे विश्वास नहीं होता कि ऐसा तिलिस्मी खंजर कहीं से कमलिनी के हाथ लगा। यह असम्भव है, बल्कि ऐसा खंजर हो ही नहीं सकता। कमलिनी ने तुमसे झूठ कहा होगा।

भूतनाथ – (हंसकर) नहीं-नहीं, बल्कि उसी तरह का एक खंजर कमलिनी ने मुझे भी दिया है। (कमर से खंजर निकालकर और हर तरह पर दिखाकर) देखिये, यही है।

मायारानी – (ताज्जुब से) हां-हां, अब मुझे याद आया। नागर ने अपना और तुम्हारा हाल बयान किया था तो ऐसे खंजर का जिक्र किया था और मैं इस बात को बिल्कुल भूल गई थी। खैर तो अब मैं उस पर किसी तरह फतह नहीं पा सकती।

भूतनाथ – नहीं, घबड़ाइये मत, उसके लिए भी मैं बन्दोबस्त करके आया हूं।

मायारानी – वह क्या?

भूतनाथ ने वह कमलिनी वाली चिठ्ठी बटुए में से निकालकर मायारानी के सामने रखी जिसे पढ़ते हुए वह खुश हो गई और बोली, “शाबाश भूतनाथ, तुमने बड़ा ही काम किया! अब तो तुम उस नालायक को मेरे पंजे में इस तरह फंसा सकते हो कि कमलिनी को तुम पर कुछ भी शक न होगा।

भूतनाथ – बेशक ऐसा ही होगा। मगर अब हम लोगों को अपनी राह बदल देनी पड़ेगी अर्थात् पहले जो यह बात सोची गई थी कि किशोरी को छुड़ाने के लिए जो कोई वहां जायेगा, उसे फंसाते जायेंगे, सो न करना पड़ेगा।

मायारानी – तुम जैसा कहोगे वैसा ही किया जायेगा, बेशक तुम्हारी अक्ल हम लोगों से तेज है। तुम्हारा खयाल बहुत ठीक है अगर उसे पकड़ने की कोशिश की जायेगी तो वह कई आदमियों को मारकर निकल जायेगा और फिर कब्जे में न आवेगा, और ताज्जुब नहीं कि इसकी खबर भी लोगों को हो जाये, जो हमारे लिए बहुत बुरा होगा।

भूतनाथ – हां, अतः आप एक चिठ्ठी नागर के नाम की लिखकर मुझे दीजिए और उसमें केवल इतना ही लिखिए कि किशोरी और कामिनी को निकाल ले जाने वाले से रोक-टोक न करे बल्कि तरह दे जाये और उस मकान के तहखाने का भेद मुझे बता दे, फिर जब ये दोनों किशोरी और कामिनी को ले जायेंगे तो उसके बाद मैं उन्हें धोखा देकर दारोगा वाले बंगले में जो नहर के ऊपर है ले जाकर झट फंसा लूंगा। वहां के तहखानों की ताली आप मुझे दे दीजिये। कमलिनी की जबानी मैंने सुना है कि वहां का तहखाना बड़ा ही अनूठा है, इसलिए मैं समझता हूं कि मेरा काम उस मकान से बखूबी चलेगा। जब मैं गोपालसिंह को वहां फंसा लूंगा तो आपको खबर दूंगा, फिर आप जो चाहे कीजियेगा!

मायारानी – बस-बस, तुम्हारी यह राय बहुत ठीक है, अब मुझे निश्चय हो गया कि मुराद पूरी हो जायेगी!

मायारानी ने दारोगा वाले बंगले तथा तहखाने की ताली भूतनाथ के हवाले करके उसे वहां का भेद बता दिया और भूतनाथ के कहे बमूजिब एक चिठ्ठी भी नागर के नाम की लिख दी। दोनों चीजें लेकर भूतनाथ वहां से रवाना हुआ और काशीजी की तरफ तेजी के साथ चल निकला।

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चंद्रकांता संतति भाग 8 बयान 8

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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