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‘द न्यूगेट कैलेंडर’ के ब्योरे से लेखन तक

जहां विश्व पटल पर शरलॉक होल्म्स किरदार ने विश्व-विख्यात ख्याति पायी, वहीं ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ को दुनिया ने भुला दिया। सबसे ज्यादा रुचिकर यह है कि इसका नाम ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ ही क्यूं पड़ा – एक्चुअली लंदन में उस जेल का नाम ‘न्यूगेट प्रिजन’ था, जहां अपराधियों को अपराध के बाद एवं मौत की सजा से पहले रखा जाता था। उन्हीं अपराधियों से संबंधित सभी जानकारियों को इकट्ठा किया जाता था और बाद में उन्हें ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ के रूप में छापा जाता था। ‘न्यूगेट प्रिजन’ में अपराधियों के बयान, उनकी जिंदगी, उनके इकबालिया बयान, उनके द्वारा किये गए अपराध एवं मौत की सजा तक के सभी ब्यौरों को, वहां मौजूद पादरियों एवं उनके सहायकों द्वारा सुना एवं लिखा जाता था।

बताना चाहूंगा की अपराध कथाएं या क्राइम फिक्शन आज के समय में भी सबसे अधिक बिकती हैं एवं पढ़ी जाती है। 18 वीं शताब्दी के अंत एवं 19 वीं शताब्दी के आरंभ में भी, अपराध कथाओं को खूब पढ़ा जाता था। ऐसे में अपराधियों के ये ब्यौरे पठन-पाठन के लिए ‘तैयार माल’ थे। उस दौर के प्रकाशकों में इस तैयार माल को लपककर लिया और उन्हें छापना शुरू कर दिया जो ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ के नाम से जाना जाने लगे। स्टीफेन नाइट के अनुसार 1728 में छोटा सा, 1748 में उससे बड़ा और 1773 में पांच वॉल्यूम के सेट में यह प्रकाशित हुआ। बाद के वर्षों में, अलग-अलग एडिशन में ये छपते रहे। ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ में छपे, ये ब्यौरे अधिक नैतिकतापूर्ण होते थे।

इन कहानियों का फॉरमेट, एक जैसा ही होता था जिसमे, धार्मिक कांसेप्ट ज्यादा दिखाया गया था क्योंकि ये पादरियों एवं उनके सहायकों द्वारा लिखे गए थे। बाद में जब वकीलों ने ब्यौरों को एडिट किया तो उसमें कानूनी-भाषा का भी इस्तेमाल किया। इन कहानियों को एक आयताकार बॉक्स में लिखा जाता था जिसमे अपराधी द्वारा किये गए अपराध की कहानी होती थी और उसके द्वारा किया गया जुर्म का इकबाल होता था। आगे के हिस्सों में यह दर्शाया गया होता था कि अपराधी ने उन अपराधों को स्वीकार कर लिया जिसके लिए उसकी मृत्यु हुई। इससे उस समय की कानून व्यवस्था आम जनता को यह दर्शाती थी कि किस प्रकार से कानून अभी भी आम जनता के लिए जीवित है। वे इससे समझाते थे कि अपराधी कितना भी बड़ा हो, उसके अपराध कितने भी बड़े हों, उसे सजा मिलनी ही मिलनी है।

लेकिन आम लोगों के लिए इन ब्यौरों को पढ़ना मनोरंजन का साधन था क्योंकि इसमें अपराधियों के जीवन, जीवन में किये गए अपराध, फिर उनको मिलने वाली सजाओं का जिक्र होता था। इसलिए ये ब्यौरे प्रकाशकों द्वारा जब छापे गए तो उसे संभ्रात वर्ग एवं सामान्य वर्ग ने हाथों-हाथ लिया। हालांकि ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ महंगा था और उस तक पहुंच सिर्फ समाज के ऊंचे लोगों की थी। लेकिन इसकी लोकप्रियता ने जल्दी ही सामान्य वर्ग को भी छू लिया। जल्दी ही दोनों वर्गों के लिए इसका प्रकाशन होने लगा। सामान्य वर्ग के लिए यह बलाड शीट्स या ब्रॉडसाइड्स पर छापा जाने लगा। बलाड शीट्स पर छपने वाले इन ब्यौरों में, एक ही पृष्ठ पर, आर्टवर्क के द्वारा सभी ब्यौरों को प्रस्तुत किया जाता था।

उपन्यास फॉरमेट का उदय होने पर कई लेखकों ने इन ब्यौरों में, कल्पनाओं का मसाला मिलाकर, उपन्यास का रूप देना शुरू कर दिया। डेनियल डेफोए जो कि एक पत्रकार, लेखक एवं जासूस थे, उन्होंने अपने जीवन का एक वक्फा राजनैतिक बंदी के रूप में न्यूगेट प्रिजन में बिताया था, ने उस जेल में मौजूद, कई अपराधियों की आत्मकथा लिखी। हालांकि ये आत्मकथाएं उतनी लंबी नहीं होती थी लेकिन फिर भी इनका बाज़ार बड़ा था। विद्वानों के अनुसार, सन 1794 में, विलियम गॉडविन के उपन्यास ‘सेलेब विलियम्स’ में पहली बार किसी डिटेक्टिव की झलक नज़र आती है। गॉडविन, एक स्थान पर फुटनोट के जरिये, सेलेब को ‘द न्यूगेट कैलेंडर’ से रेफेर किया हुआ बताते हैं।

लेकिन ऐसा नही है कि सिर्फ ब्रिटिश साहित्य में ही अपराध और गल्प को मिलाकर कुछ प्रस्तुत किया गया, बल्कि अमेरिका में भी इसका आरंभ हो चुका था, लैरी लेन्द्रम के अनुसार ‘Edger Huntley (1799-1800)’ अमेरिका का पहला जासूसी उपन्यास था लेकिन कई विद्वान इससे सहमति नही जताते क्योंकि वे जेम्स फेनिमोर कूपर की रचना ‘The Last of The Mohicans’ को पहले जासूसी उपन्यास का दर्जा देते हैं।

अपराध गल्प लेखन : एक नज़र #२

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