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ओम प्रकाश सहित वहाँ उपस्थित सभी इंस्पेक्टर की बात सुनकर चौक गए। 
मतलब आप जानते है की चोरी किसने की है?”, ओम प्रकाश ने इंस्पेक्टर से पूछा। 
जी, बिलकुल, और उसने ही बाहर पेड़ पर वह पुतला भी लटकाया था। 
फिर देर किस बात की है, जल्दी बताइए कि यह किसकी करतूत है। 
आप अपना अपराध स्वयं स्वीकार करेंगे या हमें आपके कमरे कि तलाशी लेनी पड़ेगी?” इंस्पेक्टर ने करण रस्तोगी की तरफ देखते हुए कहा। 
सबकी आश्चर्यपूर्ण निगाहें करण की तरफ मूड़ गई। करण इस अचानक हमले से बौखला गया। 
यह कैसा मज़ाक है इंस्पेक्टर?” 
मतलब आप इस सबूत को झुठला सकते है?” कहते हुए इंस्पेक्टर ने एक पालिथीन की थैली दिखाई जिसमे पुतले से उतारे हुए कपड़े रखे हुए थे। इंस्पेक्टर शर्ट के पॉकेट को इंगित कर रहा था। 
मुझे देखने दीजिए, कहता हुआ करण इंस्पेक्टर के पास आ गया। क्या है इसमें? मुझे तो कुछ भी नहीं दिख रहा ! 
इंस्पेक्टर ने मुस्कराते हुए कहा, “आपका चश्मा कहाँ है? उसके बिना आपको ठीक से नहीं दिखेगा। 
मैं अपना चश्मा आज लाना भूल गया हु, और वैसे भी मेरी दूर की नजर कमज़ोर है, पास से मुझे सबकुछ ठीक दिखता है। 
मुझे पता है, तभी आप मेरे आइडेंटिटी कार्ड को करीब से देख रहे थे। पर प्रश्न यह है कि जब आपको यहाँ रोशनी में मेरा आई कार्ड ठीक से नहीं दिख रहा था, तो अंधेरे में पुतला कैसे दिख गया? और आप उस रस्सी से उलझने से कैसे बच गए जिसकी वजह से मानिकचंद गिर पड़े थे?” अपनी बातों का प्रभाव देख इंस्पेक्टर ने अपनी आवाज़ को और दमदार बनाते हुए कहा, “मैं बताता हूँ कि आपको वह पुतला और रस्सी कैसे दिखे, क्योंकि आपने स्वयं ही उस रस्सी को इस्तेमाल करते हुए वह पुतला लटकाया था। आप जानते थे कि सुजाता रात को 2 बजे उठेगी। आपको सिर्फ़ इतना करना था कि सबके सो जाने के बाद पेंटिंग गायब कर पुतला सुजाता कि खिड़की से सामने लटका दे। फिर सभी यही समझते कि पेंटिंग कि चोरी तभी हुई है जब घर के सभी लोग बाहर पुतले के पास थे। आपके ऊपर कोई शक नहीं करता। लेकिन आपकी दूर कि नज़र ने आपको धोखा दे दिया। 
करण ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसे भी ओम प्रकाश की तरह पिछले दिनों बिजनेस में घाटे का सामना करना पड़ा था, और पैसे की सख्त जरूरत थी। रात को डिनर के वक़्त जब उसे इस पेंटिंग के बारे में पता चला तो उसके इसे चुराने का प्लान बना लिया। पेंटिंग उसके कमरे से बरामद हुई। पर ओम प्रकाश ने इंस्पेक्टर से बात करके अपनी शिकायत वापस ले ली। उनकी नज़र में करण की गलती यह थी कि उसने अपने दोस्त को अपनी मुसीबत के बारे में नहीं बताया। यदि उसने पैसे कि जरूरत के बारे में बताया होता, तो उसे चोरी करने की नौबत ही नहीं आती। घाटा होने के बाद भी उनकी माली हालत इतनी अच्छी थी की वह अपने मित्र की मदद कर सके। इंस्पेक्टर ने उनकी मित्रता की इज्ज़त करते हुए केस वही ख़त्म कर दिया। मानिकचंद को अपने नए उपन्यास के लिए एक प्लॉट मिल गया था। सुबह से नाश्ते के वक़्त माहौल सुधार चुका था और सभी ख़ुश नज़र आ रहे थे।

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Final Chapter Written by Mr. Binay Pandey-Winner of Mystery of the Month – April
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