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फिंगरप्रिंट्स

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कहा जाता है और शास्वत सत्य है की संसार में सभी व्यक्तियों के फिंगर-प्रिंट्स अलग-अलग होते हैं। फिंगर-प्रिंट्स द्वारा पहचान दो सिद्धांतों पर आश्रित है, एक तो यह कि दो व्यक्तियों की फिंगर-प्रिंट्स कभी एक सी नहीं हो सकतीं, और दूसरा यह कि व्यक्तियों की फिंगर-प्रिंट्स जीवन भर ही नहीं अपितु जीवनोपरांत भी नहीं बदलती। अत: किसी भी विचारणीय फिंगर-प्रिंट्स को किसी व्यक्ति की फिंगर-प्रिंट्स से तुलना करके यह निश्चित किया जा सकता है कि विचारणीय फिंगर-प्रिंट्स उसकी है या नहीं। 

” चेहरा झूठ बोल सकता है परन्तु फिंगर प्रिंट्स नहीं ”

फिंगर-प्रिंट्स विज्ञानं तीन कार्यों के लिए विशेष उपयोगी है, जैसे:-

1. विवादग्रस्त लेखों पर की फिंगर-प्रिंट्स की तुलना व्यक्ति विशेष की अंगुलि छापों से करके यह निश्चित करना कि विवादग्रस्त फिंगर-प्रिंट्स उस व्यक्ति की है या नहीं;

2. ठीक नाम और पता न बताने वाले अभियुक्त की फिंगर-प्रिंट्स की तुलना दंडित व्यक्तियों की फिंगर-प्रिंट्स से करके यह निश्चित करना कि यह पूर्व-दंडित है अथवा नहीं; और

3. घटनास्थल की विभिन्न वस्तुओं पर अपराधी की अंकित फिंगर-प्रिंट्स की तुलना संदिग्ध व्यक्ति की फिंगर-प्रिंट्स से करके वह निश्चित करना कि अपराध किसने किया है।

फिंगर-प्रिंट्स का छोटा सा इतिहास  

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सन १८५८ में हूगली जिले के मुख्य न्यायधीश Sir William James Herschel ने एक व्यवसायी से अनुबंध पर हस्ताक्षर कराने के स्थान पर पुरे हाथ का प्रिंट लिया था। ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी के हाथों के निशान का प्रयोग किसी की पहचान करने के लिए किया गया था। लेकिन उस समय इस बात का किसी को अंदाजा नहीं था की इसका प्रयोग क्राइम-इन्वेस्टीगेशन में भी हो सकता है।

सन १८८० में डॉ. हेनरी फौल्ड्स ने नेचर नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में एक लेख छापा जिसमे उन्होंने इस बात जिक्र किया की फिंगर-प्रिंट्स का प्रयोग व्यक्तिगत पहचान के लिए किया जा सकता है। सर हेनरी को पहला फिंगर-प्रिंट लेने का भी क्रेडिट दिया जाता है। दोस्तों डॉ. हेनरी को फिंगर-प्रिंट्स के विज्ञान का जनक माना जाता है।

सन १८९२ में सर फ्रांसिस गाल्टन, जो की सर चार्ल्स डार्विन के चचेरे भाई थे, ने फिंगर-प्रिंट्स के ऊपर पहली पुस्तक प्रकाशित की जिसमे उन्होंने फिंगर-प्रिंट्स के द्वारा व्यक्तित्व और विशिष्टता की पहचान की।

1892 ई. में प्रसिद्ध अंग्रेज वैज्ञानिक सर फ्रांसिस गाल्टन ने अंगुलि छापों पर अपनी एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने हुगली के सब-रजिस्ट्रार श्री रामगति बंद्योपाध्याय द्वारा दी गई सहायता के लिए कृतज्ञता प्रकट की। उन्होंने अंगुलि रेखाओं का स्थायित्व सिद्ध करते हुए फिंगर-प्रिंट्स के वर्गीकरण तथा उनका अभिलेख रखने की एक प्रणाली बनाई जिससे संदिग्ध व्यक्ति की ठीक से पहचान हो सके। किंतु यह प्रणाली कुछ कठिन थी। दक्षिण प्रांत (बंगाल) के पुलिस इंस्पेक्टर जनरल सर ई.आर. हेनरी ने उक्त प्रणाली में सुधार करके फिंगर-प्रिंट्स के वर्गीकरण की सरल प्रणाली निर्धारित की। इसका वास्तविक श्रेय श्री अजीजुल हक, पुलिस सब-इंस्पेक्टर, को है, जिन्हें सरकार ने 5000 का पुरस्कार भी दिया था। इस प्रणाली की अचूकता देखकर भारत सरकार ने 1897 ई. में फिंगर-प्रिंट्स द्वारा पूर्व दंडित व्यक्तियों की पहचान के लिए विश्व का प्रथम अंगुलि-छाप-कार्यालय कलकत्ता में स्थापित किया।

 

फिंगर-प्रिंट्स का लेखन की दुनिया में पदार्पण

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सन १८८३ में, महान लेखक मार्क ट्वेन की पुस्तक Life on the Mississippi (1883)  जिसमे उन्होंने उन कहानियों और लघु-कथाओं का जिक्र किया है जो उन्हें सुनाई गयी थी जब उन्होंने अपने जीवन के कुछ समय इस नदी पर बिताये थे। इनमे से ही एक कहानी में एक कातिल की खोज अंगूठे के निशान के आधार पर किया जाता है। दोस्तों यह विश्व की पहली ऐसी पुस्तक थी जिसमे पहली बार फिंगर-प्रिंट्स के बारे में बात किया गया था। अपने उपन्यास Pudd’nhead Wilson (१८९३) में मार्क ट्वेन ने पूरा का पूरा एक कोर्ट-रूम ड्रामा दिखाया है जो की फिंगर-प्रिंट्स आइडेंटिफिकेशन पर आधारित था। मतलब की यह उपन्यास क्राइम-फिक्शन जगत का पहला उपन्यास हुआ जिसमे फिंगर-प्रिंट्स सिद्धांत का प्रयोग किया गया।

 

 “The Norwood Builder” नाम के लघु कथा में सर आर्थर कैनन डोयले ने प्रसिद्द काल्पनिक किरदार शर्लाक होल्म्स को एक खुनी फिंगर-प्रिंट्स की सहायता से असली अपराधी को सजा दिलाने में और अपने मुअक्किल को आज़ाद करते हुए दिखा गया था।

 

जानकारी का स्रोत – विकिपीडिया एवं “फिंगरप्रिंट” पर आधारित इन्टरनेट पर अन्य उपलब्ध ब्लॉग एवं लेख

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फिंगर-प्रिंट्स का इतिहास और लेखन में उसका योगदान
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