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इण्डिया से बाहर, एशिया के भी बाहर, एक नए देश में जब मैंने अपना आशियाना बनाने का फ़ैसला किया, तब सबसे पहला सवाल जो मेरे मन में आया। कहाँ? उस नए देश में कहाँ?

अपने देश में कब हमने इस सवाल का सामना किया था? जहाँ नियति में बदा था वहाँ पैदा हो गए और लो जी हो गए.. लखनवी, इलाहाबादी या इंदौरी। हमने कब तय किया?

तरुणाई में, आगे की पढ़ाई के लिए कई तरह के फ़ॉर्म भरे, परीक्षाएँ दी और जहाँ से बुलावा आ गया वहाँ के हो गए.. भोपाल, गोवा या कोचीन। हमने कब सर खुजलाया था?

कॉलेज परिसर में जितनी कम्पनियाँ आयीं, सब के इम्तिहान दिए और जिसने हमें चुन लिया उसके साथ चल पड़े.. दिल्ली, मुम्बई या हैदराबाद। हमने कब सोच-सोच कर रातें काली कीं कि कहाँ जाएँगे?

कभी नहीं। हर बार किसी ना किसी ने हमारे लिए निर्णय ले लिया। ए बावरे नैन, उधर नहीं इधर आओ और हम चल पड़े। जीवन के तीन दशक बीत रहे बिना इस उधेड़बुन के कि कहाँ जाएँ, कहाँ रहें।

अब यह यक्ष प्रश्न घटोत्कच-सा कद लिए रास्ता रोके खड़ा है। कभी ठिठोली करता है “पासवर्ड बोल, रास्ता खोल नहीं तो, यहीं पर कर रॉक एंड रोल”

कुछ देर तो प्रश्न के यूँ प्रकट होने, उसके मायावी आकार पर, उसकी ठिठोली पर स्तब्ध रहे, फिर कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ हुए और तब धीरे से अपने आप में लौटे कि कुछ तो सोचना होगा। अब निर्णय की ज़िम्मेदारी हम पर आयी है। “हर जगह तन्ने बचाने तेरा पप्पा ना आएगा” हम्मम्म….

तय हुआ कि सोचना तो हमें ही पड़ेगा। बस, फिर क्या था, हमने गम्भीर विचारक की मुद्रा में ठुड्डी हथेली पर टिकाई और लगे शून्य में घूरने। “कहाँ? मतलब कहाँ जाएँ? कहाँ ठीक रहेगा?” मन में यह गूँज और उसकी अनुगूँज गुंजायमान हो गयी और हमें लगा, चलो सोचना शुरू कर दिया हमने। जब कुछ देर हो गयी यह शोर-शराबा सुनते हुए तो ध्यान आया, “अरे! यह क्या सोच रहे हैं हम! तरह-तरह से सवाल ही सोचे डाल रहे हैं। बड़े भाई, जवाब सोचना है, जवाब। अरे यार! सोचना नहीं है, नहीं-नहीं। ढूँढना है। जवाब ढूँढना है।”

यकायक उत्साह दामिनी चमकी और कड़क कर बोली, “ ढूँढना है? लो, बस, एक एप्प भर की दूरी है.. गूगल पर जानकारी पूरी है”। हमने तुरन्त कम्प्यूटर स्क्रीन पर छापा” best places to live in Australia” और भरपूर जोश में यह माउस बटन दबा के छोड़ा और चला दिया दिव्यास्त्र। पलक झपकते स्क्रीन पर धूमकेतु समान कुछ शहरों के नाम आतिश हो उठे। सिडनी, मेल्बर्न, ब्रिस्बेन, एडलेड और पर्थ।

अब या तो हम अक्कड़-बक्कड़ से चुन लेते या फिर और सोचने का बीड़ा उठाते। लेकिन क्यूँकि हम दरअसल इंटेलेकचुअल टाइप के प्राणी हैं, तो हमने आगे और सोचने, ढूँढने की ठानी।

हमने भौगोलिक नक़्शा देखा और रेगिस्तान देखकर पर्थ सबसे पहले हटा दिया.. रेत के टीले सुहाते तो हैं, पर पेड़ की छाँव की बात और ही है। फिर एडलेड भी हट गया और बच रहे तीन शहर। ब्रिस्बेन के बीच लुभावने लगे, मेल्बर्न का खुलापन और सिडनी का मौसम। यह तीनों ही घुमक्कड़ी के लिहाज़ से लाजवाब हैं, लेकिन ज़िन्दगी सिर्फ़ यायावरी तो नहीं कुछ और भी है।

जीवन गाड़ी चलाने के लिए रोजगार निहायत ज़रूरी है इसलिए अब देखना था कि रोजी का जुगाड़ कहाँ जल्दी बनेगा? कुछ औफ़िशीयल साइट्स ढूँढी और तीनों शहरों के डाटा चेक किए। सिडनी ने बाज़ी मार ली। लो भई, शहर भी नक्की हुआ। अब शहर में कहाँ? कौन सा गली मोहल्ला ठीक रहेगा?

शहरों में शहर: सिडनी। बोलने में भी अंग्रेज़ियत का भरपूर एहसास।

आजकल गूगल मैप्स पर एक लचीला सा कंकाल विहीन जिंजरब्रेड मैन क़िस्म का घुमक्कड़ आदमी प्रतिपल उपस्थित रहता है। आपको किसी भी देश के किसी भी गली मोहल्ले में ताँकाझांकी करनी हो, ये आपकी मदद को तत्पर रहता है। ये महाशय आपको पलक झपकते उन गलियों में घुमा देंगे। आगे आपकी जैसी श्रद्धा हो।

सिडनी के गली मोहल्ले के बारे में गूगल मैप्स से जो जानकारी मिली वह कुछ अधकचरा टाइप की थी और निर्णय लेने में किसी तरह मददगार नहीं हो पा रही थी। तब हमने फेसबुक तारनहार को याद किया।

अँधा क्या चाहे?? दो आँखें। और सोशल मीडिया जीवी क्या चाहे? एक अदद फ़ेसबुक पेज जिसका नाम हो “Indians in Sydney”

बस जी, हमने आनन फानन उस पेज से जुड़ने की अर्जी डाल दी। अगले ही दिन हमें उसकी सदस्यता दे दी गयी और हमने छूटते ही अपनी जिज्ञासा वहाँ प्रकट कर दी। लोगों ने भरपूर मार्गदर्शन किया और तीन मोहल्ले उभर कर आये.. पैरामेटा, हैरिस पार्क और वेस्टमीड। गौरतलब यह कि 90% प्रवासी भारतीय इन्ही जगहों में बसे हुए हैं।

हमने बताया नहीं शायद, पर हम ठहरे अच्छा खासा प्रश्नपत्र। हमने अगला सवाल दाग दिया कि ऐसा होने की क्या वजह है? भई, न जाने क्यूँ इस बार जवाब कुछ खास नहीं मिले और बहुत ही कम मिले। ख़ैर…

हम मायूस होने ही वाले थे कि चमत्कार हुआ। हमें हमारी बहुत बहुत, मतलब, बहुत ही दूर की भाभी का नंबर मिला। दूरी इतनी है कि हमारी ननद की दोस्त की भाभी की भाभी। अहो भाग्य! हम ऐसे देश के वासी हैं जहाँ इतनी दूरी होने पर भी ननद भाभी का रिश्ता बन जाता है, तो झटपट वह बन गयी भाभी और हम ननद। ओहो! हम ऐसे आह्लादित हुए कि एक मुद्दे की बात तो बताना रह ही गया। वो यह कि हमारी यह जो नयी नयी भाभी हैं, यह सिडनी में रहती हैं और वो भी पिछले २ साल से। एंड नो वंडर..वो पैरामेटा में ही रहती हैं। लग गया ना हमारा जैकपोट।

हमने उनसे बात की तो उन्होंने बड़े हर्ष से हमें बधाई दी और फिर आश्वस्त भी किया कि पैरामेटा ही हमारे लिए बिलकुल सही है। और तो और उन्होंने हमें सिडनी के प्रवासी भारतीयों के व्हाट्सएप्प ग्रुप में भी जोड़ दिया। यह तो ऐसा हो गया कि अन्धे को आँख के साथ-साथ स्टाइलिश गौगल्स भी मिल गए। अब तो हमारी पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कढ़ाई में था। तल डालो, जितने पकौड़े तलने हैं सवालों के।

उस ग्रुप में मुझे कई सारे संवेदनशील और मददगार “हिन्दुस्तानी” मिले। जो बड़ी नयी और हैरत की बात थी। हैरानी क्यूँ? इस पर बात फिर कभी होगी। हाँ, तो, हैरत अपनी जगह और सवाल अपनी जगह। मेरे एक-एक सवाल पर ढेरों जवाब आते। कई लोग तो इतने प्यारे हैं कि कॉल करके मुझे समझाते। मुझे लगा इन्सानों की किसी नयी प्रजाति से पाला पड़ रहा है। इनमें से बहुत से प्यारे लोग आज मेरे अच्छे दोस्त भी हैं।

कई जवाबों में से एक जवाब, जो बहुत दिनों तक मेरे जेहन में गूँजता रहा, वह था “परदेस में हम लोगों को मिलजुल कर रहना चाहिए। कभी कोई कम्युनल दंगा भड़क गया तो एकजुट होकर लड़ना आसान है। कहीं अकेले फंस गए तो…..”

‘कम्युनल दंगा’! कब हुआ था पिछली बार ऑस्ट्रेलिया में? 2005 में। पिछले १३ सालों की शांति व्यवस्था भी लोगों के डर को मिटाने में कामयाब नहीं हो पाई कि वह वहाँ सुरक्षित हैं। उस पर हैरानी यह भी कि जितने प्रवासी भारतीय आज वहाँ हैं उनमें से शायद २% ने भी वह दौर अपनी आँखों से नहीं देखा है। फिर भी इतने डरे हुए हैं!

अनावश्यक डरों से मुक्ति पाने के लिए तो मैंने अपनी मिट्टी छोड़ इतनी दूर जाने का फ़ैसला लिया। थक चुकी थी मैं अपनी बेटी को डराते-डराते, इंसानों पर भरोसा न करना सिखाते। कहीं अकेले आने-जाने नहीं दे सकती। कोई अनजान निष्पाप हृदय से भी अगर दुलार में उसके गाल छू दे तो उसे सतर्क हो जाने को समझाना। किसी बड़ी उम्र के सज्जन को दादा, मामा और चाचा न बनाने को कहना। हद तो यह कि कोई मुस्कुराहट से देखे तो नमस्ते भी न करना। यह कैसे समाज में रह रही है मेरी बेटी? अगर वह अपनी सुरक्षा के लिए ही हर समय चिंतित रहेगी तो बाकी चिंतन मनन कब करेगी? अपनी दुनिया, अपने जीवन को बचाने की सोच जीवन बेहतर बनाने की कब होगी?

मुझे कुछ करना था, मेरी बेटी के लिए। उसे वहाँ से निकालना था। यह आसान नहीं था क्यूँकि मेरी जड़ें उसी मिट्टी में बंधी हैं जहाँ से मुझे अब उखड़ना था। मेरे बूढ़े होते माता-पिता के प्रति मेरी जिम्मेदारियाँ भी मुझे रोक रहीं थीं। भावनात्मक तौर पर यह बहुत कठिन फ़ैसला था जो लिया जाना नितान्त ज़रूरी था।

मैंने सिडनी की आपराधिक जानकारियों पर भी नज़र रखना शुरू किया और यह देखकर मन दहल गया कि सिडनी में सबसे असुरक्षित जगहों में पैरामेटा, हैरिस पार्क, वेस्टमीड के नाम आते हैं। कम्युनल नहीं, यहाँ रोज़मर्रा वाले अपराध होते हैं। आत्महत्या, हत्या, चोरी, लूट और रेप।

एक समाचार पत्र में पढ़ी वह ख़बर तो मुझे भुलाये नहीं भूलती। आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं याद करके। अपराधी ने एक १२ साल की भारतीय लड़की का रेप किया और बच्ची ने समाचार पत्र को बताया कि बलात्कारी ने उससे कहा, “इण्डिया में तो यह अब तक तुम्हारे साथ कितनी बार हो गया होता”

इतनी रिसर्च के बाद मैंने पक्का कर लिया कि चाहे कम्युनल दंगे में अकेले फंस जाऊँ पर उस जगह हरगिज नहीं जाऊँगी जहाँ फिर मेरा डर मुझपर अपना फंदा कस ले।

इण्डियन मोहल्ले में तो नहीं जाना, तो चलो, अब वैसा ही कुछ करते हैं जो यहाँ हमारे साथ अनायास ही हो गया। जहाँ रोजी रोटी का जुगाड़ बन जाए उस जगह के आस पास रहेंगे। सिडनी में CBD (Central Business District) इलाक़ा है। यहाँ सभी बड़े ऑफ़िस होते हैं और शहर की लगभग 90% नौकरियाँ होती हैं। तो क्यूँ न इस इलाक़े के आस पास रहा जाये? हाँ, यही ठीक रहेगा। यहाँ का क्राइम इंडेक्स भी बहुत कम है। यहाँ कीमतें बढ़ी हुई हैं होटल्स की हों या किराए के घर की। लेकिन मानसिक और आर्थिक बोझ में अगर चयन करना है, तो मैं आर्थिक बोझ चुन लूँगी। हमने AirBnB वेबसाइट से शुरुवात के एक महीने टिकने के लिए CBD के पास ठिकाना ढूँढना शुरू किया।

इन्टरनेट ने मनुष्य को अपार शक्तियों का मालिक बना दिया है। उसे दिव्य दृष्टि दे दी है। दिल्ली में बैठे सिडनी के एक होटल का मुआयना कर पा रहे हैं लोग। उस होटल के आस पास और क्या क्या है, यह जानना भी कितना सहज हो गया है! मैं उस समय की कल्पना भी नहीं कर सकती जब मेरे मम्मी पापा ने पहाड़ छोड़कर लखनऊ आने का निर्णय लिया था। कैसी अज्ञात और निर्वात सी रही होगी वह अनुभूति? कैसी उत्कट रही होगी वह चाहना! कैसा अद्भुत साहस रहा होगा उनमें? जहाँ जा रहे हैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानते। वहाँ के लोग बोली अलग बोलते होंगे ये जानकारी तो होगी, पर वह कैसे रहते हैं? उनके घर कैसे होते हैं? घर में पानी कैसे आता होगा? क्या वहाँ घरों में गाय होती होगी? दूध कैसे घर आता होगा? ऐसे न जाने कितने विस्मय और कौतूहल मन में लिए मेरे मम्मी पापा ने वह साहसिक कदम उठाया होगा। मुझे उनके संघर्ष ने हमेशा प्रेरणा दी है कि अज्ञात से मत डरो, बढे चलो..बढे चलो।

आज जब मैंने उन्हें अपना AirBnB वाला बुक्ड होटल दिखाया तो वह कैसे सुखद आश्चर्य में घिर गए। निश्चिन्त भी हुए कि वहाँ रहने की क्या क्या सुविधाएँ हमें मिलेंगी। फिर मुस्कुराते हुए एक दूसरे को देखकर पहाड़ी में बोले, “अहा रे बखता (समय की बलिहारी)!!”

इस तरह इंटरनेट की असीम कृपा से हमने निर्णय ले ही लिया कि हम कहाँ रहेंगे। जगह निर्धारित हुई। होटल निर्धारित हुआ। टिकिट आरक्षित हो गयीं और अब आया सबसे विकट समय अपनी रंगारंग झाँकी की एक झलक लुटाते हुए। 12 साल की गृहस्थी में क्या नहीं जोड़ रखा था: AC, फ्रिज, वाशिंग मशीन,.. लगभग एक अंतहीन लिस्ट। अब इस लिस्ट में सबका नाम बदलने का समय आ गया। सबका नाम अब ‘माया’ है।

क्या लेके आया बन्दे? क्या लेके जायेगा? न.. न यह केवल मेटाफोरिक बात नहीं है। सच है। मैं २ सूटकेस लेके इस शहर आई थी, बस वही साथ जायेगा।

घर का सारा सामान ऑने-पोने दाम में बेचने की दुखदायी, कष्टप्रद और थकाऊ प्रक्रिया शुरू हुई। धीरे-धीरे कमरे खाली होने लगे और हम बिना संसाधनों के कैसे गुज़र-बसर करेंगे, एक तरह से, इसका अभ्यास शुरू हो गया।

यूँ तो लगभग सभी चीज़ों से मोह के धागे तोड़े, लेकिन उन धागों के पैनेपन का एहसास तब सबसे अधिक हुआ जब बेटी के खिलौने, स्टडी टेबल और उसके पुस्तकालय की किताबें एक एक कर घर से बाहर हुई। मेरी बेटी के लिए भी यह बहुत विचित्र, विस्मयकारी, दुखदायी और खिन्न करने वाला प्रकरण था। उसके लिए विस्थापित होने का यह पहला अवसर और पहला अनुभव था। उसकी नाज़ुक उँगलियाँ इन मज़बूत धागों के खिंचाव से कहीं- कहीं चुटहिल भी हुई। आँसुओं से घाव धोकर और मन पर, सोच पर कई बैंडएड लगाकर वो सफ़र तय हुआ। आज भी कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अत्याचार किया हमने, अपनी बेटी पर। फिर यह सोचकर खुद को हिम्मत देते हैं कि भविष्य में चलकर बेटी को समझ आएगा कि ऐसा क्यूँ किया हमने उसके साथ? हालांकि यह भी सच ही है कि समझ आ जाने पर भी दुःख तो दुःख ही रहता है और उसकी टीस भी वैसी ही चुभती है।

यूँ तो घरवालों से दूर रहते हमें लगभग 17 साल हो चुके थे। यह पापा ही थे जिन्होंने अपने आँसू छिपाकर 17 साल पहले मुझे हॉस्टल के कमरे में छोड़ा था। तब मेरी माँ और मेरी आँखों में आँसू थे। बिछड़ने का दुःख था और पापा एकदम सहज थे या निष्ठुर हो गए थे। उन्होंने ज़रा भी नहीं जताया कि उन्हें कोई दुःख है। बल्कि वह झिड़कते हुए बोले थे- “क्या रोना धोना कर रहे हो। अरे! जब मन हो तो घर आ जाना। घर निकला थोड़ी दिया है तुमको। मन लगाकर पढ़ो, अब यह कर्मभूमि है तुम्हारी।” आज जब मैंने बाहर जाने की बात की, तो वो रो पड़े। उनकी आँखों के आँसू मेरे गले में आज भी गाँठ बनकर रुके हुए हैं। न जाने बढ़ती उम्र का तकाज़ा है या मानस में परदेस जाकर कभी वापस न आने वाले किस्सों का पैठा आतंक? आज वह निष्ठुरता का स्वांग नहीं कर सके। आज हमारे रोल बदल गए थे। आज मैं निष्ठुर थी और मैंने हँसते हुए कहा- “क्या पापा, एक फ्लाइट भर की दूरी है। यहाँ भी तो ऐसा ही था। यहाँ भी रोज़ फ़ोन पर बात होती थी वहाँ भी होगी। विडियो कॉल होती है। आप जब बुलाओगे हम आ जायेंगे।” अपने मम्मी-पापा के सामने एक बार भी नही रोई मैं। कभी नहीं जताया कि डर लग रहा है। चिंता हो रही है और बुरा लग रहा है। बस एक निर्दयी, निर्मोही और दुस्साहसी की तरह पेश आई।

3+1 BHK के फैलाव से हम 6 सूटकेस में सिमट चुके थे और अपने सभी परिजनों के साथ मेल-मिलाप कर, उनके साथ समय बितााकर हमने देश से विदा लेने की पूरी तैयारी कर ली। नियत दिन पर फ्लाइट में बैठ गए, एक नयी उड़ान भरने को। जाते हुए अपनी मिट्टी को यही कहा।

मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम

मैं एक दिन लौटके आऊँगा, यह मत भूल जाना तुम

अच्छा, फ्लाइट वाले चाहे जितना भी प्रचार प्रसार लें कि बड़ी सुविधाजनक है हमारी सेवा। जो खावे सोई जाने कि इनकी सेवा का मेवा। खट्टा ही होता है। कम से कम, इकॉनोमी क्लास में सफ़र करने वालों के लिए तो यह वाक़ई ‘suffer’ करना ही होता है। छोटी सी जगह में कैसे-तैसे ठसकर बैठो। उनका बकवास सा एक्ज़ोटिक खाना नोश फरमाओ। सुरक्षा पेटी से पेट कसे रहो। जबरन का अंटार्टिका वाला तापमान बनाकर उन्होंने जो कृपा बरसाई है, उसके प्रकोप से बचने के लिए उनके पतले से कम्बल में पनाह लो। और सोने पर सुहागा यह कि अगली सीट का यात्री सोने लगे, तो अपनी सीट आपके मुँह तक ले आये। उसे भी क्या कहें? बेचारा, वह भी किसी तरह suffer ही काट रहा है। हाँ, थोड़ा ख़ुशकिस्मत है कि सो पाता है। मेरी तो अजीब समस्या है ट्रेन हो, बस हो या फ्लाइट, हमने यात्रा जागते हुए ही करनी है। शायद, हम हर बार नींद को भी किसी सूटकेस में पैक कर लेते हैं।

फ्लाइट में, मेरे पति ज्यादातर लोगों की तरह फ़िल्में निपटा रहे थे। मेरी बेटी भी कुछ देर कुछ देखने की कोशिश करती रही। कोशिश इसलिए कि किसी भी चैनल पर 5 मिनट से ज्यादा नहीं टिकी वह। उसके लिए फ्लाइट में सबकी अपनी स्क्रीन और अपनी मर्ज़ी का चैनल सेट करने की सुविधा बहुत ही आकर्षक और उत्साहित करने वाली होती है। घर में तो सब एक ही चैनल देखते हैं।

यहाँ यूँ माँ-पापा के साथ बैठकर अपनी मर्जी! ओह! निजता का अनुभव है, स्वतंत्रता का अनुभव है और वयस्कों से बराबरी का भी। बच्चों को बड़ी उत्कंठा होती है, बड़ों जैसा व्यवहार करने की तिस पर अगर दूसरे भी उन्हें बड़ों के समकक्ष समझें और वैसे ही व्यवहार करें, तो उनकी ख़ुशी का ठौर ठिकाना नहीं रहता। इसलिए फ़्लाइट वालों से बड़ा ही आत्मीय नाता है मेरी बेटी का और उनपर ऐसी अगाध श्रद्धा है कि हम जलभुन जाते हैं।

कुछ देर मैं उसे यह सुख ले लेने देती हूँ, उसकी बाल सुलभ हरकतों और चेहरे से फूटती खुशियों का रस पी लेती हूँ। थोड़ी देर हो जाने पर मैं बलात उससे यह सुख छीन लेती हूँ। इसके बाद मैंने और मेरी बेटी ने एक बोर्ड गेम खेला और फिर मैंने उसे सुला लिया। हम तीनों की सीटें साथ थी, तो बेटी का सर अपनी गोद में रखा, उसके पैर पति की गोद में और बेटी के सोने की व्यवस्था हो गयी। मैं तनिक देर अपनी सोती हुई परी को निहारती रही फिर आँखें मूँद कर बैठ रही। मुझे फ्लाइट का मुँहफट टीवी स्क्रीन, जो मुँह पर ही फटा जा रहा हो, ज़रा नहीं सुहाता। थोड़ा तो पर्सनल स्पेस का लिहाज़ होना चाहिए। इसलिए, मेरी तो नाराज़गी ही चलती है उसके साथ।

मैं आँखें बंद किये कुछ सोच विचार में निकल लेती हूँ। या फिर किंडल पर कोई किताब पढ़ लेती हूँ। बीच-बीच में आजू-बाजू की सीट पर बैठे लोगों को त्रस्त होते हुए देख लेती हूँ। बहुत अच्छी गुणवत्ता का भले न हो, पर मनोरंजन हो ही जाता है। थोड़ा ढांढ़स भी बंध जाता है कि डूबे हम ही नहीं यूँ अकेले।

अमूमन, बेटी को सुलाने के बाद मैं और मेरे पतिदेव अपनी बातों में मशगूल हो जाते हैं। लेकिन इस बार मैंने उन्हें फ़िल्म देखने से नहीं रोका। मुझे बहुत अच्छी तरह उनकी मनोदशा पता थी। इस समय दिलासा देने की बातों का कोई औचित्य नहीं था। दुःख को कम करने की कोशिश अपने माता-पिता और अपनी ज़मीं से जुड़ाव को झुठलाने की बेहूदी कोशिश। वो अपना दुःख अपने ढंग से जी रहे थे।

कितना बेमानी लगता है “हमसफ़र” शब्द और इसका फ़लसफ़ा। हर इंसान का सफ़र सिर्फ़ उसका ही होता है। हर इंसान का दर्द उसे ही सहना होता है। चाहे दूसरे “हमदर्द” होने की कितनी ही मुग़ालते पालते रहें।

ख़ैर, इस तरह फ्लाइट की तमाम दुश्वारियाँ उठाते हुए, एक लम्बी हवाई यात्रा करके हम सुबह 11 बजे पहुँचे, सिडनी हवाईअड्डे पर। सामान लिया और धुक-धुक सी होने लगी। अभी यह लोग सारे बैग खुलवायेंगे। वैसे तो हमने कोई ऐसी निषेध वस्तु नहीं रखी है, पर यह बिन देखे क्यूँ भरोसा करने लगे हमारा?

बैग खोलने में परेशानी यह कि ऐसा लगता है किसी ने हमारी निजता पर आक्रमण कर दिया है। थोड़ी शर्म भी होती है क्यूँकि बैग पैक भी ऐसे किये थे जैसे रसगुल्ले से भरे बंगाली बाबू का मुँह। अगर जो कहीं खोलते ही रसगुल्ले का जरा भी रस चू गया तो सफाई भी हमे ही करनी होगी। और खोलते ही सबसे पहले क्या निकलकर बाहर आएगा, इसका अनुमान लगाना भी नामुमकिन। पर हमारे हाथ में था ही क्या? जैसी प्रभु और इमीग्रेशन वालों की इच्छा। हमने मन में दोनों को याद किया, सारे बैग इकट्ठा किये और चले आगे। वहीं पर मनी एक्सचेंज का काउंटर मिल गया.. तो रुपयों को डॉलर में डाई और लैमिनेट करवा लिया। डॉलर यहाँ क़ागज नहीं प्लास्टिक पर छपे होते हैं। थोड़ी देर में, एक काउंटर पर पहुँचे…

पहला सवाल हुआ, पहली बार आये हो?

शायद हमारे चेहरे की उड़ी हुई हवाईयाँ देखकर पूछा था या ऐसे ही शुरू करते हों, रोज़ ही, सबसे। खैर..

हमने एक सहज चिन्ता मुक्त मुस्कुराहट बिखेरने की भरसक कोशिश की और कहा, ‘हाँ’

उन्होंने पूछा, किसी तरह की दवाई लाये हो?

हमने कहा, ‘हाँ’

उन्होंने पूछा, रेगुलर हैं?

हमने एक बार फिर हामी भर दी।

अगला सवाल सोचकर हमने पर्स से 1000 रुपयों में बनवाया फ़र्जी प्रिस्क्रिप्शन हाथ में निकाल लिया, लेकिन उसकी अनुभवी आँखें बोल उठी, ‘रहने दो..यह फर्जीवाड़ा रहने दो’। दनादन उसने स्टाम्प मारे और मुस्कुराकर कहा, “वेलकम’ और हम पहली पगबाधा पार कर वहाँ से आगे बढ़ चले।

सामान चेक करवाने की जगह पहुँचे और यह लो! कोई बैग नहीं खोलना! कोई कुत्ता नहीं छोड़ा उन्होंने हमारे बैग पर। बस, उठाकर एक्स-रे वाले यंत्र में रख दिया और मुस्कुराकर कहा, “यू आर वेलकम”। कैसे-कैसे किस्से सुने थे हमने?

नाहक ही बदनाम कर रखा है इन्हें, यह तो कितने प्यारे लोग हैं। बस हमारी आँखों से आँसू ही झरना रह गए थे, हम इतना विह्वल हो उठे। कैसा-कैसा डर मन में बिठाये हुए थे और यहाँ तो कुछ हुआ ही नहीं। बिलकुल मक्खन की तरह फिसल कर बाहर निकल आये। वाह! अब ज़रा सीने में हवा भरी और गला ख़राशा.. ख़ुशी से लहराते हुए वहीं एक सीट पर बैठ गए और मुआयना शुरू किया, कौन सा सिम लें?

आजकल की दुनिया में सबसे ज़रूरी है फ़ोन, उससे प्राप्त होने वाली जानकारी और पहुँच। सोच विचार कर एक सिम ले लिया और फिर उसी की सुविधा का लाभ उठाते हुए ऊबर बुक कराई। वहीँ पर जाना पहचाना नाम दिखा ’मैक डोनोल्ड’ और जीवन में पहली बार उसकी टैग लाइन से मैंने इत्तेफ़ाक किया, “आय एम लविंग इट”। झटपट फ्रेंच फ्राइज और चाय ली।

हर जगह की चाय के साथ एक नायाब सा किस्सा जुड़ा होता है और एक अलग सा स्वाद भी। पहली बार इन्दौर गयी और वहाँ छोटू ने पूछा ‘कटिंग चाय कि चाय’? कटिंग चाय पी कर देखी जाय, यह सोचकर कटिंग बोल दी। जब सामने आई तो बड़ी निराशा हुई, चाय के आधे कप को कटिंग चाय बोलते हैं वहाँ। चाय का स्वाद बढ़िया था इसलिए एक और कटिंग चाय मंगवाई।

त्रिवेंद्रम में चाय बोली, तो एक छोटे से कप में नन्ही सी चाय मिली। स्वाद भी कुछ खास नहीं था। यहाँ, सिडनी में तीन तरह के विकल्प थे, स्मॉल, मीडियम और लार्ज कप। चाय भी कितनी तरह की! हमने दूध वाली चाय चुनी और सोचा स्मॉल कप में नन्ही सी चाय मिलेगी जिससे चाय पीने की संतुष्टि कतई नहीं मिलती, इसलिए मीडियम चाय बोल दी।

उफ़्फ़! उसने चाय का पूरा हौदा मेरे हाथ में थमा दिया। इतनी चाय! भाई, इतनी चाय दुनिया के कौन से हिस्से में पी जाती है? और कौन हैं वह महामानव जो इतनी चाय पी लेते हैं! चाय पिए बिना ही संतुष्टि मिल गयी। आधी चाय पी, आधी छोड़नी पड़ी और स्वाद ऐसा कि दोबारा चाय लेने से तौबा की। जाने किस प्रकार का दण्ड था यह! क्यूँ था!

यह अल्पाहार करके हम हवाई अड्डे के बाहर निकले तो देखा बारिश हो रही है। धीमी-धीमी बूँदें बड़े एहतियात से साफ़ सुथरी जमीं को छू रही हैं। मन खुश हो गया। इतने लम्बे सफ़र के बाद ईश्वर ने कैसे झटपट शावर की व्यवस्था कर दी। बूँदों ने एकदम रिफ्रेश कर दिया। शुक्रिया ऊपरवाले। शुक्रिया।

ऑस्ट्रेलिया में टेलस्ट्रा, वोडफ़ोन और ओपटस तीन बड़े खिलाड़ी हैं सिम की दुनिया के। टेलस्ट्रा सबसे महँगा और भरोसेमंद है । ओपटस अच्छे ऑफ़र से लुभाता है और सेवा भी बढ़िया है । वोडफ़ोन अपने में मस्त है । “ऐसा ही हूँ मैं” टाइप का अजय देवगन वाला स्वैग लिए।

ऊबर ली हमने कैंटरबरी के लिए। जो कि सिडनी हवाई अड्डे से 15 मिनट की दूरी पर था या कहिये 9 किलोमीटर की दूरी पर था। पूरे रास्ते हम गाड़ी के शीशे से बाहर ही देखते रहे। ऐसा लगा अपना ग्रेटर नॉएडा वाक़ई ग्रेटर हुआ चला जा रहा है। दिल से और यादों से बढ़ता हुआ इस शहर को अपने रंग में रंगा जा रहा हो। सिडनी की सडकों के दोनों तरफ़ वैसे ही पेड़ और फूलों वाले पौधे लगे हुए थे।

घर तसल्ली से, इत्मिनान से बने हुए और एक दूसरे से कोई गुत्थम्गुत्थी नहीं। कोई ऊँची सीमेंट की अट्टालिकाएं नहीं। सड़कें भी दूर से, सलीके से एक दूसरे से दुआ सलाम करती हुईं।

पहाड़ों की तरह लकड़ी के कलात्मक ढ़ंग से बने हुए सुघड़ मकान, जिनमें आगे से ढलान वाला आकर दिया गया है बारिश के पानी के बहाव के लिए। रास्ते किनारे तरह-तरह के पक्षी ऐसे विचर रहे थे मानो फुटपाथ उन्हीं के लिए बनाया गया है, बिलकुल निःसंकोच। जैसे उन्हें पता है कि गाड़ियों और इन्सानों से उन्हें कोई ख़तरा नहीं। मेरे पहाड़ में भी ऐसा ही होता है। भांति-भांति के पक्षी मनुष्यों के साथ प्रेम और सौहार्दपूर्ण ढ़ंग से धरा की गोद में खेलते हैं।

सिडनी तो एकदम चतुर नार सी निकली। घर आये परदेसी को उसके देश की सबसे अज़ीज़ झलक दिखाकर अपने सम्मोहन में बाँध लिया। मुझे लगा कि यह मेरा पहाड़ ही है। बिलकुल वैसी ही शांति और सुकून है इसकी हवाओं में।

बस बिजली और पानी की समस्या किसी तरह यहाँ मिल जाए, तो पहाड़ में होने का एहसास पूरा हो जाए। ख़ैर…

कभी-कभी माता-पिता जब खुशमिजाज़ मूड में होते हैं, तो अपने बच्चों को बिन बात ही दुलार देते हैं। कुछ छुट्टे दे देते हैं कि लो, आइसक्रीम खा लेना बिलकुल उसी तरह ईश्वर ने पहले फुहारों से तरोताजा किया और फिर इशारों में कह दिया, सही जगह आये हो। या कौन जाने मेरा मन ही सुबूत तलाश रहा हो, अपने विस्थापन के निर्णय के ठीक होने का।

वजह जो भी हो, मेरा मन झूम कर बोला- ‘मुड़ के तकना ठीक नहीं है, अब चाहे संसार पुकारे’।

रास्ते भर आनंदित होते हुए हम यथा स्थान पर पहुँचे और ऊबर वाले ड्राईवर भैय्या ने 90 डॉलर माँग लिए। जबड़ा जमीन छूने ही वाला था कि ड्राईवर से नज़रें दो चार हो गईं। कहीं यह अमीर देश का अमीर वाहनचालक हमें ग़रीब न समझ ले, इस ख्याल से हमने संभला हुआ ‘ओके’ कहा और 90*50 ऐसा मन में गणित लगाकर गाढ़ी पसीने की कमाई उसके हाथों में रख दी। अब कोई संशय नहीं रहा कि हम विकासशील देश से एक विकसित देश में आ गए हैं।

अब सामने नई मंजिल थी, तीसरी मंजिल। होटल की सबसे ऊँची मंजिल। आपको बता दूँ कि मेरे ऑफिस में सीढ़ियों की शुरुवात में सेब का चित्र बना था जो कि स्वास्थ्य वर्धन का प्रतीक था और कहता था लिफ्ट न लें, सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। अब ऑफिस में तो ठीक है, एक पर्स और एक लैपटॉप लिए चढ़ जाते थे हम। यह बात कैसे याद आई मुझे कि यहाँ के लोग भी स्वास्थ्य के प्रति बड़े जागरूक हैं। तीन मंजिला इमारत में लिफ्ट नहीं होती। आप सीढ़ियों का ही इस्तेमाल करें।

हमारे पास 6 बड़े सूटकेस और ३ छोटे बैग थे। इतने सामान के साथ तीन मंजिल चढ़ना!!! पर अब हो ही क्या सकता था? हाँफते-कांपते पहुँचे भई कमरे तक और सोफे पर निढ़ाल हो गए। इतने सब कार्यक्रम में शाम के ५ बज गए थे। हमने कुछ देर में किचन का रुख किया और बिना ज्यादा तफ्शीश किये चाय बनाई और बिस्कुट डुबो डुबो कर पी।

आहा!! परमानन्द!!! बालकनी में गए और बाहर का नज़ारा देखकर मन बाग़ बाग़ हो उठा। आराम करते और रात के खान पान का इंतज़ाम करते, फिर उस इंतज़ाम को अन्जाम तक पहुँचाते पहुँचाते रात के 8 बज गए।

एक बार फिर हम बालकनी में गए। ओह! बचपन वाला आसमान!! कितने तारे भरे हुए हैं! मेरे बचपन में ऐसा आसमान हुआ करता था। जो, अक्सर, मैं लाइट जाने पर छत में लेटकर देखती थी। फिर वो तारे खोने लगे और जब मैं पहाड़ जाती तो वहाँ दिखते। ३ साल पहले, जब ग्रेटर नॉएडा आई तो वहाँ सालों बाद फिर तारों भरा आसमान देखा। और अब यहाँ। मन मयूर हो उठा। मेरा मन रेडियो का विविध भारती चैनल हो गया और गुनगुनाते हुए मैं सोने लेट गयी

झिलमिल सितारों का आँगन होगा,

रिमझिम बरसता सावन होगा

ऐसा सुन्दर सपना अपना जीवन होगा।

हम सभी यात्रा से इतने थके हुए थे कि लेटते ही आँख लग गयी और कई रातों के बाद ऐसा हुआ था जो हमने रात को सपना नहीं देखा। पूरी रात एक ही नींद ली और सुबह 10 बजे ही आँख खुली।

यह सुबह बड़ी ख़ास थी। बाहर से चिड़िया मीठा सा उलाहना दे रही थी, ‘उठ भी जाओ’। मुस्कुराते हुए उठकर बिस्तर पर बैठे, तब पहली बार ध्यान दिया कि किस ऊँचाई पर चढ़ कर सो रहे थे।

इतना ऊँचा स्प्रिंग का गद्दा। यह कितना मुलायम है और इसकी स्प्रिंग कितनी रवां! जहाँ बैठे थे वहाँ गड्ढा हो गया था हमारे वजन से और हमारे चारों तरफ़ गद्दा ऊँचा हो गया था।

ऐसे बिस्तर से उठना थोड़ी मेहनत का काम था और उसके बाद वहाँ से फ़र्श पर छलांग लगानी थी। मैं तो सोच रही थी छोटी-छोटी सीढ़ियाँ ही बना देते, यह लोग। खैर, ऐसा ही तब भी मेरे मन में आया था जब मैं पहली बार हॉलैंड गयी थी। एक बात तय थी कि मेरी बेटी को बेडरूम में ट्रेमपोलिन का मज़ा मिलने वाला था।

उठकर बाहर गयी तो सीधे बालकनी में पहुँची और सामने टेनिस लॉन में खेल चल रहा था। भाव विभोर सी मैं उधर ही देखने लगी। तभी एक खिलाड़ी की नज़र मुझ तक आई और उसने मुस्कुराकर कहा, “गुड मोर्निंग”। किसी अजनबी का यूँ दोस्ताना ढ़ंग से बात करना मेरे लिए नया तो न था। विदेशों में मैंने अक्सर ही देखा है कि लोग आते जाते एक दूसरे को यूँ ही दुआ सलाम करते जाते हैं। मैंने मुस्कुराकर हाथ हिला दिया।

कुछ देर उन्हें देखने के बाद मैंने ध्यान दिया कि टेनिस लॉन के दाहिनी तरफ़ जो स्विमिंग पूल है उसमें कुछ हलचल है। कल तो वो पानी बिलकुल शांत था। हाँ, हवा से कुछ तरंगें ज़रूर बनती थी। आज यह क्या? लगभग हर 30 इंच पर एक नन्हा सा चक्रवात बना हुआ है पूल में। कुछ समय अचरज से उसे निहारती रही, फिर गहरी साँस लेते हुए हॉल में आई।

हम AirBnB के जिस घर में थे, उसमें २ बेडरूम, 1 हाल, डाइनिंग एरिया, किचेन, वाशिंग एरिया और वाशरूम था। इसमें से 1 बेडरूम हमारा था और दूसरा बेडरूम जिसका था वो ३ दिन बाद आने वाला था। बाकी सभी कमरे और सुविधाएँ हम लोगों के बीच साझा थी।

हाल में दो बड़े आरामदायक काउच थे, टीवी था, डाइनिंग टेबल पर बहुत ख़ूबसूरत फूलों का वास था। सबको प्रेम और संतोष से निहारते हुए मैं किचेन में आई और पानी गरम करने को रख दिया। सुबह के बाकी व्यक्तिगत कामों से निवृत होकर मैं गुनगुना पानी लिए अपनी बेटी और अपने पति को उठाने गयी।

वो दोनों भी उत्साहित से उठे कि देखें क्या-क्या है यहाँ! और मेरी तरह मेरे पति और मेरी बेटी बालकनी में गए। तुरन्त ही दोनों में टेनिस मैच की बातें शुरू हो गयी और प्लान भी बन गया कि हम सब चलेंगे खेलने। नाश्ते की भी दरकार नहीं थी उन दोनों को। ऐसे उत्साहित पलों में मेरा किरदार ,अक्सर ही, वैम्प वाला हो जाता है। मैंने दोनों को टोका और पहले सुबह के काम निपटाकर, नाश्ते के बाद ही बाहर जाने की शर्त रखी। मेरे दोनों बच्चे मुँह बनाते हुए मेरी तरफ़ देखने लगे, पर मेरा फ़ैसला अटल था। इसलिए टेनिस का प्लान शाम को शिफ्ट हो गया।

इण्डिया और यहाँ के समय में 4:30 घंटे का अंतर होता है सर्दियों में और 5:30 घंटे का अंतर गर्मियों में। नाश्ता करके हमने दिन के 12:30 बजने का इंतज़ार किया और घर वालों को विडियो कॉल की। उत्साह से उनको सब चीज़ें दिखाई और जो दर्द और दुःख सा पसरा हुआ था हम लोगों के बीच उसे नए रंगों से सजाने की कोशिश की।

सूटकेस से ज़रूरी सामान निकालते, उसे यथास्थान लगाते हुए पहला दिन कैसे शाम तक आ पहुँचा, कोई अंदाज़ा नहीं। यात्रा की थकान ने पहली रात तो सोचने का मौका न दिया, पर आज यह भी सोचना था कि सोने का इंतज़ाम कैसे करें। इन गद्दों पर सोने से तो पूरा बदन दर्द हो जाता है। बस यूँही तरह-तरह की व्यवस्थाओं में दिन बीत गया और हम रात को कारपेट वाली फ़र्श पर कम्बल बिछा कर सो गए।

3 दिन यूँही नई जगह देखते हुए मजे-मजे में बीत गए और चौथी सुबह जब मैं उठकर बाहर आई तो 7 फुट का एक आदमी फंकी सी हाफ टीशर्ट और शॉर्ट्स में हाल के काउच पर विराजमान था। मुझे देखते ही उसने आवाज़-ए-बुलन्द में कहा- “गुड मोर्निंग, इट्स अ लवली सनी डे”।

मैं इतनी देर में समझ गयी कि यह दूसरे बेडरूम वाला प्राणी है और मैंने मुस्कुराहट के साथ कहा, “येस, इट इज़, गुड मोर्निंग”

उसने आगे संवाद छेड़ा, “क्या आपको जगह और घर पसंद आया?”

मैंने कहा, “बहुत”।

उसने मुस्कुराकर बताया कि उसको भी यह बहुत पसंद है। मैंने अंदाज़ा लगाया कि यह यहाँ पहले भी आ चुका है फिर मैंने मुस्कुराकर उससे विदा लेते हुए कहा, “एक्सक्युज़ मी” और अपने सुबह के कार्यक्रम निपटाने लगी। तब तक मेरे पति भी बुलंद ऐलान सुनकर हडबडाते हुए बाहर आये और नए अतिथि से मिले।

उसने बताया, उसका नाम जेफ्फ़ है और वह इस घर का मालिक है। थाईलैंड से छुट्टियाँ मना कर लौटा है। यह जानना हमारे लिए सुखद भी था और दुखद भी। सुखद यूँ कि सिडनी के लोकल बाशिन्दे के इतने सानिध्य में रहेंगे तो यहाँ का माहौल और संस्कृति बेहतर समझेंगे। दुखद इसलिए कि मकानमालिक के साथ रहना पड़ेगा। अगर वह एक साधारण अतिथि होता हमारी तरह, तो मामला बराबरी का होता, लेकिन अब तो हर बात में उसका पलड़ा भारी होगा।

इस ख़बर और नए व्यक्ति के साथ सहज होने के बाद मैं किचेन की तरफ़ जाने लगी तो मैंने उससे पूछा, ” वुड यू लाइक टू हेव टी विद अस?”

उसने सहर्ष कहा, “श्योर” और फिर अगला सवाल किया, ” यू नो चाय?”

मैंने सोचा उसे ही तो अंग्रेज़ी में टी कहते हैं, फिर यह ऐसे क्यूँ पूछ रहा है!

ख़ैर, मैंने हामी भर दी। तो वो चहककर बोला, “टी की जगह चाय बना दो। मिल्की, स्वीट और एरोमेटिक ड्रिंक। जब मैं इण्डिया गया था तो रोज़ पीता था.. आई लव इट.. एंड इट गोज़ विद एव्रीथिंग”।

मुझे बड़ा अच्छा सा लगा कि फिरंगी कबूतर चाय का दीवाना है। मैं अपना सवाल मन में ही लिए चाय बना लायी और हम सबने मिलकर चाय रस्क का नाश्ता किया। उसने एक-एक घूँट चाय जिस रसास्वादन के साथ पी, वो ,आज तक, मेरी बनाई गयी चाय की सबसे ख़ूबसूरत तारीफ़ है, बिना लफ़्ज़ों के। यह तो मुझे बाद में उसकी दीवानगी की हद पता चली।

जब वो बोला, “जब भी चाय बच जाए तो मेरे लिए फ्रिज में रख देना, मैं बाद में गरम करके पी लूँगा”। ऐसा कद्रदान मिला कि मैं रोज़ उसके लिए चाय बनाकर फ्रिज में रख देती थी। दो बार तो वो अपने दोस्तों के लिए भी चाय पैक करके ले गया। बाद में मुझे पता चला कि “इंग्लिश टी” में स्वाद की कमी होती है और वो ख़ालिस होती है।

जेफ्फ़ अक्सर मेरे साथ किचन में आ जाता और देख-देखकर मुदित होता कि मैं सारा खाना उसी समय फ्रेश बनाती हूँ। रोटी को जब उसने पहली बार फूलते देखा तो उसके मुँह से निकला, “हाउ वंडरफुल!!!”

वहाँ के लोगों में रेडीमेड खाना खाने की प्रथा है। दुकानों से रेफ्रीजरेटेड खाना लाते हैं और जब मन हुआ गरम करके खा लिया। उसके लिए हमारा खान पान का तरीका मनमोहक और आश्चर्यजनक था। वह हर रोज़ हमारे साथ खाना खाता और खाने के दौरान बार-बार कहता, “इट इज हेल्दी फ़ूड” और परितोष से कहता, “यू आर अ लकी मैन”। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है या नहीं, यह तो मुझे नहीं पता। लेकिन इतने दिनों में जेफ्फ़ ज़रूर हफ़्ते ,में २ बार खाना घर पर बनाने लगा। उससे मैंने दो जापानी और एक थाईलैंडी व्यंजन बनाना सीखा।

वो मुझसे खूब बातें करता और एक बार बातों ही बातों में उसने बताया कि उसके दादा-दादी स्कॉटलैंड से यहाँ आ गए थे। तब से उसका परिवार यहीं है। उसने बताया कि अपने माता-पिता के साथ वह लगभग 12 साल की उम्र तक रहा। तब ब्रेड उसके घर पर ही बनती थी और वह भी ब्राउन। शक्कर भी ब्राउन इस्तेमाल होती थी। उसने बताया कि उसके माता-पिता बहुत ही हेल्थ कॉन्शियस लोग थे।

मैंने उससे पूछा कि फिर उसने वह सब क्यूँ छोड़ दिया? उसका जवाब सुनकर मैं दंग रह गयी। उसने बताया कि उसके ऐसे खान-पान की वजह से स्कूल में सब बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे। लंच टाइम उसके लिए बहुत चुनौती भरा होता था। जो बलिष्ठ किस्म के लड़के थे वह उसे धक्का मार देते थे और फिर सब मिलकर उसपर हँसते थे।

उस पर, हर रोज़, स्कूल में होने वाली घटना का ऐसा मनोवैज्ञानिक असर पड़ा कि उसे अक्सर रातों को सपने आने लगे कि उसे स्कूल के प्लेग्राउंड में सबने मिलकर नंगा कर दिया है और उसे घेरकर सब उसका मज़ाक बना रहे हैं। उसके माता-पिता खानेपीने को लेकर समझौता करने को तैयार नहीं थे।

धीरे-धीरे जेफ्फ़ को हेल्दी खान-पान से नफ़रत हो गयी और अपने माता-पिता से भी। जब से उसने घर छोड़ा कभी हेल्दी फ़ूड की तरफ़ नहीं देखा। आज जेफ्फ़ 70 साल का हो चुका है, लेकिन वो यादें आज भी उसके जेहन में एकदम तरोताज़ा हैं। सालों बाद, हमारे साथ रहते हुए वह दोबारा हेल्दी खाने की तरफ़ मुड़ा था और हर बार उसे अपने बीते दिन याद आते।

वह मुझपर बहुत स्नेह करने लगा था। बहुत प्यार से बात करता और वहाँ के समाज में बच्चे कैसे बड़े किये जाते हैं यह बताता। उसके अपने बच्चों के साथ कैसे सम्बन्ध हैं और उसने उनकी परवरिश कैसे की, यह सब भी मुझे बताता।

उसने मुझे एक कार्ड गेम सिखाया और मेरी बेटी को डोमिनोज का खेल सिखाया। वह कहता, “मैं ऐसी लम्बी भावनात्मक बातें और किसी से नहीं करता। मेरे बच्चे मुझे सुनना नहीं चाहते, उन्हें लगता है वह बहुत बड़े हो चुके हैं और सब जानते समझते हैं। दोस्तों के बीच मौसम के हाल-चाल और राजनीति ही चर्चा का विषय होती है। तुम मेरे परिवार जैसी हो।”

यह सिडनी में बना मेरा पहला रिश्ता।

हम सिडनी घूमने नहीं आये थे बल्कि यहाँ की पीआर (परमानेंट रेजीडेंसी) लेकर अपने पैर जमाने आये थे। मेरे पति ने यहाँ आने से 15 दिन पहले इण्डिया में नौकरी छोड़ दी थी और यहाँ आकर नौकरी ढूँढने का निर्णय हुआ था।

जब से हम यहाँ आये थे मेरे पति रोज सुबह 2 घंटे तरह-तरह के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर नौकरी ढूँढते और अप्लाई करते। उसके बाद सारा दिन फ़ोन पर SMS, मेल और कॉल का इंतज़ार करते कि कहीं से कोई जवाब आएगा। शुरू-शुरू में तो कुछ ख़ास तनाव नहीं होता था उन्हें। उम्मींद और आत्मविश्वास से मानो लहराते से रहते थे। लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बीतने लगा, वैसे-वैसे उनकी आवाज़ की खनक दबने लगी। मुस्कुराहट संकोच करने लगी। रातों को नींद की जगह बेचैन करवटों ने ले ली। उनकी आँखों में उम्मींद की चमक धुँधली पड़ने लगी और वह खुद को 18 इंच की लैपटॉप स्क्रीन के पीछे छिपाने लगे। कभी कोई टुटोरिअल पढ़ते तो कभी कोई टेक्नोलॉजिकल जानकारी बटोरते तो कभी फ़िल्में देखते।

वह कर चाहे जो भी रहे हों, उनके चेहरे पर एक मायूसी रहती और मांसपेशियां खिंची रहती। कॉमेडी देखकर भी वह हँस नहीं पा रहे थे। किस तरह अपना मानसिक संतुलन क़ायम रख रहे थे, यह तो बस वही जानते हैं।

मुझे उन्हें देखकर दुःख होता था और यह सोचकर बुरा लगने लगता था कि फ़ैसला हमने मिलकर लिया था फिर सारे कष्ट उनके ही हिस्से क्यूँ आये? कितना आसान है मेरे लिए। वहाँ भी घर संभालती थी और यहाँ भी वही कर रही थी। वहाँ भी घर के तरह-तरह के कामों में व्यस्त रहती थी और यहाँ भी व्यस्तता बनी हुई थी। मेरे लिए तो कुछ भी ख़ास न बदला।

औरतों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें कभी छुट्टी नहीं मिलती, कभी रिटायरमेंट नहीं मिलता। यह, मेरी नज़र में, एक तरह का वरदान ही है। यह मैं मेरे पापा को रिटायरमेंट के बाद और अपने पति को बिना काम के देखने के बाद कह रही हूँ। मेरे पति के पास कोई काम ही नहीं खुद को व्यस्त करने को या, कम से कम, अपनी मौजूदा हालत से कुछ देर मुँह फेर लेने को। हर पल वह कैसी विकट मनोदशा में रहते थे। कुछ दोस्त हैं जिनसे बात होती थी, पर समय ऐसा था ही नहीं कि बातों से दिल बहल जाए।

मुझे कुछ न सूझता था कि कैसे उनकी मदद करूँ। यहाँ रहते हुए 15 दिन हो गए थे और हर हफ़्ते 450 डॉलर का किराया और 150 डॉलर का राशन, सब्जी-भाजी। अब तक 1200 डॉलर खर्च हो चुके थे और कहीं से कोई आसरा नहीं दिखता था। अगर अगले 15 दिनों में कोई बात न बनी तो फिर जून में तो कुछ भी नहीं होना। जून में यहाँ का फाइनेंशियल इयर ख़तम होता है और चुनाव भी हैं तो नौकरी बाज़ार ठप्प। इसका मतलब अगले 6 हफ़्ते यूँ ही रहना था।

बेटी को कब तक स्कूल नहीं भेजेंगे। तो सोचा, चलो, पहले स्कूल का पता करते हैं। स्कूलों में यहाँ एक नियम है कि घर स्कूल के 2 किलोमीटर के अन्दर होना चाहिए। हम पास के एक स्कूल में गए जो 1 किमी की दूरी पर था । उसने हमसे कुछ कागज़ात माँगे जैसे के लीज़ डॉक्यूमेंट, बिजली, पानी या इन्टरनेट का बिल। हमारे पास इसमें से कुछ भी नहीं था। इनका इंतज़ाम किये बिना स्कूल नहीं शुरू हो सकता था और इस इंतज़ाम को करने के लिए हमें चाहिए था एक घर, लीज़ पर।

मतलब 550 डॉलर किराया प्रति हफ्ता और लीज़ के लिए 4 हफ़्ते का किराया बोंड की तरह, 2 हफ़्ते का किराया एडवांस और 2 हफ़्ते का अग्रिम किराया । रहना, खाना-पीना कुल मिलाकर लगभग 7,500 डॉलर की व्यवस्था हो तो जून के आखिर तक यहाँ रहा जा सकता है और बेटी का स्कूल शुरू करा सकते हैं। सरकारी स्कूल में फीस 150 डॉलर, 100 डॉलर की स्कूली पोशाक और लगभग 100 डॉलर की कॉपी किताबें इत्यादि। 11,000 डॉलर की व्यवस्था।

आर्थिक तौर पर यह वजन आशाओं को चरमराने के लिए बहुत था। जो मित्र यहाँ आकर नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करने की सोच रहे हैं, उन्हें मेरा सुझाव यही है कि खाते में 10 से 15 हज़ार डॉलर की व्यवस्था करके ही रखें।

हम यह सोचकर तो आये थे कि नौकरी मिलने में 3 से 4 महीने लग जायेंगे, लेकिन सोचने और उस हक़ीकत को जीने का फ़ासला अब समझ आ रहा था। हमने बहुत सी जानकारी हासिल की थी, लेकिन फिर भी यहाँ आकर महसूस हुआ कि हम यूँ ही बोरिया बिस्तर समेट चले आये। इतना खर्च तो हरगिज़ नहीं आँका था।

इस बीच एक और बात गौर तलब थी, वह थी मम्मी-पापा से होने वाली रोज-रोज की बात। वह रोज़ एक ही तरह के सवाल पूछते। जॉब का क्या चल रहा है? बेटा, पैसों की कमी तो नहीं? बताना, मैं एकाउंट में डाल दूँगा। पिछले 15 सालों से हम आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर जी रहे थे । गाहे-बगाहे मैं उनसे पूछ लूँ या या वह मुझसे पूछ लें कि कोई समस्या तो नहीं पैसों की। वह भी अमूमन जब कोई बड़ा काम पड़ा हो जैसे शादी वगैरह। अब यह सवाल रोज़ और एकतरफ़ा होने लगा था। एक तरह से देखूँ तो मेरे मम्मी पापा मुझे सहारा ही दे रहे थे। लेकिन क्या करूँ कि मुझे हर बार लगता। क्या मैं अब बिना सहारे के चलने लायक नहीं रही??

मन करता कि उन्हें रोक दूँ यह कहने से, पर फिर सोचती एक माता-पिता के नज़रिए से देखो तो उनके बस में इससे ज्यादा और था भी क्या? जाने हमारी फ़िक्र में वह रातों को ठीक से सो भी पाते होंगे या नहीं? एक बार जब मैंने उनसे कहा, “पापा, इतना परेशान मत होइए, हम ज़रुरत होने पर ज़रूर बताएँगे” तो पापा ने आहत होकर कहा, “जैसे मुम्बई में बताया था”।

MCA के फाइनल सेमेस्टर में, जब मैं TCS मुम्बई गयी अपनी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के लिए, तो वह 5 महीने का असाइनमेंट था। मुम्बई के तौर तरीकों से अनजान, मेरे पापा ने मेरे एकाउंट में 13000 रुपये डाले। यह सोचकर कि बेक-अप हमेशा रहना चाहिए और शुरू में एक महीना तो अपने ही खर्च पर चलना होगा। कॉलेज से हम 7 लडकियाँ वहाँ पहुँची और किराये का मकान ढूँढा। वहाँ की नयी रीत पता चली। 10 महीने का किराया एडवांस देना होता है, 1 महीने का ब्रोकरेज और 1 महीन एक किराया। सब मिलाकर हर किसी के हिस्से में 11000 आये। हक्के-बक्के से हम सबने उस रीत को निभाया और सबकी माली हालत ढीली हो गयी । बस एक महीने की बात है, यह सोचकर हाथ खींचकर खर्च चलाते रहे। TCS को लगा, उसने रईसों को हायर किया है। दूसरे महीने की शुरुवात में तलब करने पर उन्होंने कहा कि फ़ोर्मलिटीज़ में टाइम लगेगा, पैसे इस महीने नहीं मिल पायेंगे। अब हम सब बहुत बड़ी मुश्किल में थे। सब यह ज़ज्बा लेकर आये थे कि अब मम्मी-पापा से पैसे नहीं लेंगे। अब तो हम खुद कमाते हैं।

लड़कपन का जोश था या अधेड़ होते बचपने की बचीकुची नादानी जो हममें से किसी ने भी घर पर यह नहीं बताया कि अब हम लंच नहीं करते। सुबह के नाश्ते के बाद रात को एक जगह से मिलाजुलाकर 10 रुपये की करिश्माई सब्जी लेते हैं और 2 रुपये की घिसे हुए सूती कपडे सरीखी पतली 2 रोटी लेकर डिनर करते हैं। करिश्माई सब्जी यूँ कि 7 लड़कियाँ उस एक छोटे से पैकेट में बंद सब्जी से खाना खा लेती थी और किसी को भी सब्जी कम न पड़ती थी। इस तरह हर किसी को डिनर लगभग 3:50 रूपये पड़ जाता था। यह सन 2004 की बात है। इस खाने की गुणवता इतनी थी कि हम जिंदा रह सकते थे। रह रहकर हम लोग दोहराते, “तीन बेर खाती थी वह, तीन बेर अब खाती है”।

इतिहास के ऐसे संघर्षो में खुद को जोड़कर देखने से भी एक शक्ति मिलती थी और अपने संघर्ष पर थोड़ा नाज़ भी हो जाता था। हमारी प्यारी कंपनी ने हमें वेतन 4 महीने बाद दिया और वह चार महीने हम सब किस तरह रहे, इसकी गवाही हम सबका स्लिम ट्रिम फ़िगर दे रहा था। पापा को जब बहुत समय बाद यह बात पता चली तो वह बहुत दुखी हुए और उन्होंने मुझसे वादा लिया कि जब तक मैं ज़िन्दा हूँ, मेरी बच्ची को तुम ऐसे तंग नहीं करोगी। तुम हमेशा मेरी छोटी सी बच्ची रहोगी। कभी खुद को बोझ नहीं समझना। तुम मेरी रेस्पोंसिबिलिटी कम और एसेट ज्यादा हो।

वादा खिलाफ़ी का तो कभी नहीं सोचा मैंने और अब जब खुद एक माँ हूँ तब और भी गहराई से उनका दर्द महसूस कर पाती हूँ और खुद को उसके लिए गुनेहगार भी मानती हूँ। लेकिन फिर भी हर रोज़ उनके सहारा देने को बढे हाथ दुःख को थोड़ा और गहरा कर जाते थे।

कठिन समय धीरे-धीरे अपना शिकंजा कस रहा था। हम कसमसा रहे थे। समय बदलेगा इस उम्मीद का दामन थामे रहने की भरपूर कोशिश कर रहे थे।

हम मई 2019 में सिडनी आए थे और ऐसे बहुत से लोगों के सम्पर्क में थे जो हमारे साथ या हमसे तीन चार महीने पहले यहाँ आए थे PR लेकर। उनसे बात करना निराशा को कई गुना बढ़ा देता था और डर अनियंत्रित हो जाता था। कई लोग परिवार सहित शेयर्ड अक्कोमोडेशन में रह रहे थे क्यूँकि 450 डॉलर प्रति हफ़्ता किराया देने की हैसियत नहीं रही। यह सब वो लोग हैं जो इंडिया में बहुत ऐश-आराम से जी रहे थे। यहाँ आकर दो परिवार और किसी बैचलर के साथ घर शेयर करके रह रहे थे। इतने समय से काम ना मिलने के कारण एक तरह से सिनिकल और मायूस हो चुके थे।

बार-बार हर कोई बस यही कहता कि “सब्र करो। इसके सिवा और कुछ भी हमारे हाथ में नहीं है।” कुछ लोगों को 3 महीने का कॉंट्रैक्ट मिला था कुछ हो 6 महीने का और वो यहाँ लगभग साल भर से थे। कुछ निराश होकर इंडिया लौट गए। इंसान जब अकेला हो तो कैसे भी रह लेता है, लेकिन जब पूरा परिवार साथ हो तो उसकी हिम्मत जल्दी टूट जाती है। अपने फ़ैसलों का नतीजा अपने परिवार को भोगते देखकर कोई भी स्थितिप्रज्ञ डोल जाए। कुछ लोगों ने अपने परिवार को वापस भेज दिया और ख़ुद यहीं डटे रहे।

कुछ औरतों को डेली के हिसाब से किसी दुकान या ऑफ़िस में काम मिल रहा था जिसके बूते पर उनका परिवार पल रहा था। उन कामकाजी महिलाओं का संघर्ष बहुत भीषण था। उनके पति काम ढूँढ रहे हैं और वो डेली कुछ कमा कर घर चला रहीं हैं। कम पैसों का होना दुखदायी उतना नहीं था जितना कि इंडिया से आने की वजह से काम को तुच्छ आँकने की सोच और उनके पति का हीन भावना में घिर जाना कि पत्नी उन्हें पाल रही है। कैसे दिन-रात कट रहे होंगे उन जोड़ों के, यह सोचने की हिम्मत मैं नहीं कर पाती।

जेफ्फ़ के होने से हमारी एकरसता में एक अच्छा बदलाव आता। वह हमारी परिस्थितियों को जनता था लेकिन भोग नहीं रहा था, इसलिए वो उन तात्कालिक चिन्ताओं के परे देख पाता था। वह हमें बाहर जाने और घूमने को प्रेरित करता रहता। वह परितोष का CV देखता। अपने अनुभव के आधार पर उसमें सुधार बताता तो कभी इंटरव्यू लेता।

7 दशक का अनुभवी था तो कभी अनुभव के पिटारे से मज़ेदार किस्सा सुनाता। वह, एक बार, अपने इंटरव्यू में चटक लाल रंग की जैकेट पहनकर गया और बाकी लोग फॉर्मल ड्रेस में थे। उसे वह नौकरी मिल गयी। बाद में, उसने अपने बॉस से पूछा, कि मुझे क्यूँ चुना था उस दिन? इस पर उसके बॉस ने बताया, तुम्हारी लाल जैकेट की वजह से। नौकरी चार अलग विभागों को एक विभाग के तहत करने की थी। मुझे एक आक्रामक व्यक्तित्व की तलाश थी और तुम्हारी जैकेट का रंग तुम्हारे मिजाज़ की गरमी ज़ाहिर कर रहा था। जीवन में 5 बार करीअर की दिशा बदली थी जेफ्फ़ ने।

किस्सों कहानियों की एक बोलती किताब था वो। कभी दोस्तों को घर पर बुला कर खानपान कराता। हमें नए-नए लोगों से मिलवाता। तो कभी हमें ही जिद करता कि आज रेस्तरां चलते हैं, खाने। वह कहता, मेरी अनुभवी आँखें कहती हैं, परितोष, तुम उनमें से हो जो बहुत काबिल है। तुम्हें नौकरी ज़रूर मिल जाएगी और जल्दी मिलेगी”।

उसके साथ न होते तो पता नहीं वह गाढ़े 40 दिन सिडनी में कैसे कटते! ऐसा अब लगता है, जब वो मुश्किल दौर गुज़र गया। उस समय तो कभी-कभी मन उखड़ जाता था। यह सुनने भर से कोफ़्त हो जाती थी कि सब ठीक हो जायेगा जब आस पास सभी परेशान लोग हों। उस समय हम पर भावनाओं और परिस्थितियों के ऐसे घनघोर बादल छाये थे कि मन करता था कोई हमसे बात न करे। आशाओं के इन्द्रधनुष तो न ही दिखाये।

इसी बीच मैं ‘प्रवासी whatsapp ग्रुप’ के लोगों से भी बात करती रहती थी जिसका जिक्र मैंने पहले किया है। बातों-बातों में, एक दिन, उनमें से एक दोस्त ने अपने घर बुलाया, पैरामेटा में । मैं उस समय ऐसे कगार पर थी कि कहीं से कोई दोस्ती और प्यार के दो बोल मिल जायें तो लगता उस मुँह को तकती रहूँ। उस हाथ को थाम लूँ जो कहे, कभी हमने भी ऐसा वक़्त जिया है। जीवन में करने को चिंता और सोच विचार के अलावा कुछ था ही कहाँ? यह काम तो बस और ट्रेन में बैठकर भी हो जाता है। शायद, मैं अपनी आँखों को अपने संभावित भविष्य से मिलवाना चाहती थी इसलिए मैं सपरिवार उनसे मिलने गयी।

कोई ख़ास अपेक्षाएँ नहीं थी हमारी। सोचा था कुछ देर बैठकर बातें होंगी और फिर चाय पीकर वापस आ जायेंगे। लेकिन उस दोस्त से मिलकर मेरी हैरत का कोई अन्त न था। कोई कैसे whatsapp के जरिये बने दोस्त को इतना मान-सम्मान और अपनापन दे सकता है! कोई कैसे कितना संवेदनशील हो सकता है! कोई कैसे पहली मुलाक़ात में ऐसा परिवार सा महसूस करवा सकता है! सच ही है कि एक घायल ही दूसरे घायल की गति को समझे।

मेरी यह दोस्त किसी पार्क में थी, तो मैंने कहा, हम वहीँ आ जाते हैं, वहीँ मिल लेंगे। उसने एक न सुनी और अपने घर का पता गूगल मैप पर भेजकर कहा, घर पहुँचो। मैं आ रही हूँ। तुम 2 घंटे के सफ़र के बाद पहुँचे हो, ऐसे नहीं जाने दूँगी।

वह आई और आते ही मेरी बेटी के लिए आलू फ्राई बनाये और हमारे लिए अदरक वाली चाय। फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ और घड़ी की सुईयां नज़र बचाकर भागती हुई शाम के 6 बजे वाले निशान पर पहुँच गयी।

अब हमने जाने की बात की, तो उसने कहा कि उसके पति के ऑफिस से आने तक रुकें। उसने अपने पति से बात की तो उसके पति बोले, जाने नहीं देना उनको। तुम डिनर की तैयारी करो। मैं 7 बजे तक पहुँचता हूँ। उसने प्यार से, हठ करके हमें रोक लिया और हमारे लिए आलू-टमाटर की रसीली सब्जी, पूड़ियाँ और दही का इंतज़ाम किया। मेरे पति और मेरी बेटी का सबसे पसंदीदा पकवान। उस पर, इतने प्यार से उसने खाना बनाया कि उस खाने का स्वाद लाख गुना बढ़ गया था। नियत समय पर उसके पति आये और उन्होंने हमें सिडनी में घर किराये पर लेने की प्रक्रिया विस्तार से समझाई। नौकरी के बारे में भी कुछ ज़रूरी ज्ञान दिया। फिर मिलने के वादे के साथ हमने उनसे विदा ली।

अहा! क्या अनुभव था वह!! मेरी दोस्त तुम्हारा कितना शुक्रिया करूँ। जब मन में केवल नकारात्मक भाव बड़ी देर तक अपना तम्बू गाड़े रहते थे तब तुमने सहृदयता और दोस्ती के भाव से मन का आँगन धो दिया। मेरा मन छोटा हुआ जाता था। तुमसे मिलकर नयी ऊर्जा और स्फूर्ति का एहसास हुआ। वह शाम और वह भोज मेरी ज़िन्दगी के उन चुनिन्दा अवसरों में से एक है, जब मैंने अपने आप से किया वादा दोहराया। वादा कि यह प्रेम और सद्भाव की ज्योति जो अभी मेरे दिल में जगी है, इसे मैं आगे बढ़ाऊँगी।

हे ईश्वर! एक दिन इस ऋण से मुक्त हो सकूँ, कृपा कर मुझे वह अवसर और सामर्थ्य एक दिन ज़रूर दें।

सुख के बदले दुःख देने की, अगर भावना तेरी

दुःख को सहने की शक्ति देना, यही प्रार्थना मेरी

ज़िन्दगी हैरतअंगेज वाक़यों की पोटली हो गयी थी। हम हर पल चौकन्ने और हक्के-अक्के से रहते। बस, हमारा सोचा हुआ नहीं होगा और चाहे जो हो ले। जाने समय किस अनजानी धुन पर थिरक रहा था! हम पूरी बल-बुद्धि से उसकी ताल से तालमेल बिठाने में लगे हुए थे।

मेरे पति के एक मित्र मेल्बर्न में रहते हैं। एक दिन उन्होंने फ़ोन करके कहा कि एक नियुक्ति के सिलसिले में अपना CV भेजो। मेरे पति का CV वहाँ शॉर्ट लिस्ट हो गया।

सिडनी में पिछले चौदह दिनों में एक भी इंटरव्यू कॉल नहीं आयी थी। ना कहीं से हाँ आती थी और ना कहीं ना ही होती थी। ऐसा लगता था एक ज़िद्दी सन्नाटा हमारे चारों तरफ़ घेराबंदी किए हुए है। मेरे पति के सभी आवेदन कोई निर्वात बिना डकार लिए खाए जा रहा था।

ऐसे में मेल्बर्न से आयी शॉर्ट लिस्ट होने की खबर बहुत दिनों में मिला एक सुखद समाचार था। एक अच्छी बात और यह थी हमारा वीज़ा स्टेट स्पोंसर्ड नहीं था। स्टेट स्पोंसर्ड वीज़ा में पाँच पोईंट मिलते हैं जो कि विदेश से बुलावा आने में मददगार होते हैं, लेकिन इस शर्त के साथ कि आप कम से कम दो साल वो स्टेट नहीं छोड़ेंगे। हम आज़ाद थे कि पूरे ऑस्ट्रेल्या में जहाँ जॉब मिल जाए वहाँ रहो। सिडनी और मेल्बर्न दोनों ही हमारी मौसी हैं, चाहे जिसके घर चले जाओ। तो बुलावा आते ही मेरे पति दोस्ती और उम्मीद का हाथ थामे इंटरव्यू के लिए दो दिन के लिए मेल्बर्न चले गए।

लेकिन अभी वह परीक्षा पूरी नहीं हुई थी जो ईश्वर हमारी ले रहा था। वहाँ से न हो गयी। पर एक बात यह हुई कि मेरे पति एक लम्बे अरसे के बाद अपने दोस्त से मिले। उसने बताया कि केवल जॉब अप्लाई करने से कुछ नहीं होता। हर जॉब के साथ सबसे नीचे एक फ़ोन नंबर दिया गया होता है। उस पर बात करने से कुछ बात बनती है। उन्होंने यह भी बताया कि रिक्क्रूटर अक्सर पर्सनल बातचीत को ज्यादा तवज्जो देते हैं। तुम जॉब अप्लाई करने के बाद उन्हें फ़ोन करो और कॉफ़ी ऑफर करो। ‘अ लॉट केन हैपन ओवर अ कॉफ़ी।’ मुलाक़ात होगी। वह और भी कुछ ज़रूरी बातें बताएगा। हर जॉब के हिसाब से अपना CV बदलो। एक एक्सेल शीट में ब्यौरा रखो कि किसको कौन सा CV भेजा है। यह सब करने के बाद लोगों को पाँच से छः महीने लग जाते हैं नौकरी पाने में। अभी से मायूस क्यूँ होते हो? अभी तो तुम्हारी शुरुवात ही हुई है।

वैसे तो दुःख-दर्द का तोल मोल मुश्किल है और ठीक भी नहीं। क्यूँकि जब हम किसी दुःख से गुज़र रहे होते हैं तो वही सबसे भीषण मालूम देता है। और उम्मीद जितनी बड़ी होती है उसके टूटने का दुःख और पीड़ा भी उसी अनुपात में होती है। यह भी सच है। महीने भर बाद कहीं से एक आवाज़ आई थी। किसी ने देखा था कि “तुम” भी यहाँ हो। तुम्हारा भी कोई अस्तित्व है। अब तक लग रहा था कि कोई बस एक बार बुला ले इंटरव्यू के लिए। हम ऐसे परचम लहरायेंगे कि हर मुश्किल घुटने टेक देगी। फिर नौकरी मिलने से कोई कैसे रोक लेगा? जिस तरह पटक देने पर बिस्किट पैकेट के अन्दर ही चूरा बन जाते हैं उसी तरह इस पटखनी ने हमारा विश्वास चूर-चूर कर दिया।

मेरे पति बहुत ही हताश होकर लौट आये। महीने भर की तलाश और नाकामयाबी के चलते वह आत्मविश्वास खोने से लगे थे।

कहते हैं औरत होना आसान नहीं। मैं सोचती हूँ तो क्या पुरुष होना आसान है? अपनी व्यक्तिगत अपेक्षाओं, इच्छाओं और ध्येय से चूक जाने का दुःख जैसे कम हो! अपने प्रति उत्तरदायित्व जैसे कम पड़ते हों कि यह बोझ और यह एहसास भी कभी पीछा नहीं छोड़ता कि मुझपर मेरे पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। मुझे पूरे परिवार की अपेक्षाएं और सपने पूरे करने हैं। मैं अपनी गलती पर अपनी जग-हँसाई सह लूँ, पर मेरी वजह से दुनिया मेरे घर वालों को मज़ाक का विषय बना ले। यह कैसे सह जाऊँ? कितनी भी टूटन हो, मैं भरभराकर बिखर नहीं सकता। मैं अपनी कमजोरी मेरी तरफ़ आस से देखते अपने लोगों को दिखा नहीं सकता। उनका ईश्वर हूँ मैं। जिनसे मैं प्यार करता हूँ इस कठिन समय में उनकी शरण भी ले नहीं सकता।

बड़ा ही साहस चाहिए ईश्वर पद को त्यागने के लिए। बहुत भरोसा चाहिये अपने पारिवारिक रिश्तों पर कि उनके सामने बिन परदे के खड़े हो सकें। ईश्वर और नश्वर का सन्तुलन साध सकें। मेरे पति ने यह साहस किया और ईश्वर की असीम कृपा है मुझ पर कि मेरे पति मुझपर ऐसा भरोसा कर पाते हैं।

उस शाम वह मेरे पास आये और बोले- ‘अगर तुम्हें पता चले कि मैं जॉब ढूँढने में पूरी ईमानदारी नहीं बरत रहा हूँ तो?’

उनकी आँखें लाल हो रही थी। शायद टूटती उम्मीदों के शीशे आँखों में चुभे हुए थे। आवाज़ में बहुत गहराई आ गयी थी। चंचलता और चपलता तो कब से गुमशुदा थी। दुखी, व्याकुल, व्यथित, खुद से खिन्न और अव्यवस्थित से वो मेरा मन टटोल रहे थे। मानो जानने की कोशिश कर रहे हों कि क्या मैं भी उनकी नाकामयाबी में उनकी कमियाँ देख रही हूँ?

मैंने पूछा- ‘ऐसा क्यूँ कह रहे हो?’

वह गहरी साँस छोड़कर बोले- ‘महीने भर से जॉब अप्लाई कर रहा हूँ। कभी देखा ही नहीं कि एक फ़ोन नंबर भी लिखा होता है। पता नहीं कैसे असंतुलित दिमाग से काम कर रहा हूँ। ऐसे कैसे नौकरी मिलेगी? मैं इण्डिया के तौर तरीके से बाहर ही नहीं आ पाया हूँ। मेरी इन बेवकूफियों की वजह से तुम दोनों भी ऐसे हालातों से गुज़र रहे हो।’ इसके आगे वह बोल नहीं पाए। बस सर झुकाकर चुप हो गए।

मेरे पति खुद को कोस रहे थे। यह कैसा इम्तेहान है प्रभु? अविश्वास पसरने की कोशिश कर रहा है। प्यार में भी! उन्हें शक होने लगा है कि उनके साथ-साथ मैं भी उन्हें मन ही मन अपराधी मानने लगी हूँ। यह ह्रदय विदारक था। मेरे पति मेरा अभिमान हैं, मेरा प्यार हैं। उन्हें इस क़दर झकझोरने की इज़ाज़त मैं किसी भी हालात या इंसान को नहीं दे सकती। ख़ुद उनको भी नहीं।

मैंने दिल में उठते गुबार को दबाया और उनके दोनों हाथ अपनी हथेलियों में थामकर कहा- ‘नयी जगह है, नया ढ़ंग है। तुम धीरे-धीरे ही सीखोगे। हमने मिलकर यह फ़ैसला लिया था और मैं तुम्हारे साथ हूँ। लेकिन विडम्बना यह है कि लड़ना अकेले तुम्हें ही पड़ता है। तुम वह रेसलर हो जो रिंग में लड़ रहा है। मैं रिंग के बाहर से तुम्हें देख रही हूँ। तुम्हारे ज़ख्मों को देखकर कैसे कह दूँ कि तुम लड़ ठीक से नहीं रहे हो। तुम हार रहे हो तो कैसे कहूँ कि ईमानदारी में कमी रह गयी। सच कहूँ, मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम इतना साहस रखते हो। हर रोज़ ज़ख़्मी होते हो। हर रोज जीतने की उम्मीद कम होती जाती है। दर्द बढ़ जाता है। और इसके बावजूद, अगले दिन तुम फिर लड़ने चल देते हो। तुम्हारे घाव तुम्हारी कमजोरी और नाकामी नहीं हैं। यह तुम्हारी हिम्मत और जुझारूपन का सुबूत हैं। काश! मैं तुम्हारी कोई मदद कर पाती।’

एक चोट खाए और सताए हुए बच्चे की तरह आँखों से मोती टपकाते हुए मेरे पति ने मेरी गोद में अपना सिर रख दिया। कुछ देर बाद मेरी तरफ़ देखा उन्होंने। इस बार आँखों में थोड़ी चमक लौट आई थी।

वह पूछ उठे- ‘मैं एक दिन सब ठीक कर दूँगा। है ना?’

मैंने मुस्कुराकर कहा- ‘ज़रूर। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।’

‘क्यूँ करती हो मुझ पर इतना भरोसा’- उन्होंने जानना चाहा।

तो मैंने कहा- ‘तुम्हें जानती हूँ न इसलिए। रिमेम्बर, जामवंत और हनुमान।’ बड़ी देर बाद मुस्कान उनके होंठों पर आई और उन्होंने मुस्कुराकर अपना सिर फिर मेरी गोद में रख दिया।

मैं उनके बालों में उँगलियाँ फिराते हुए सोच रही थी। काश! मैं किसी तरह इनकी मदद कर पाती। हे ईश्वर! चाहे दुनिया में सब कुछ उलट-पुलट हो जाए। मुझे शिक़ायत न होगी। लेकिन मेरे अभिमान को, मेरे पति को इस तरह न तोड़ना। मेरे भोले, मैंने हमेशा अपने पति में तुम्हें देखा है। हलाहल इनके जीवन में उतना ही उतारना ईश्वर जितना कंठ में संभाला जा सके। अपनी लाज रख लेना महादेव।

‘माँ, यह देखो, मेरा हाथ छिल गया।’ मेरी बेटी दर्द से हाथों को झटकती हुई मेरे पास आती है। मैं उसकी नाजुक कलाई पकड़कर हथेली की चोट पर फूँक दूँ और उसे गले लगा लूँ तो इतने भर से उसकी बड़ी से बड़ी चोट की प्राथमिक चिकित्सा हो जाती है।

उसको कुछ चाहिए तो वह दुआ में हाथ नहीं उठाती। सीधे अपने पापा के पास आती है और कहती है- ‘पापा, मुझे यह चाहिए।’ और नन्ही परी को वह मिल जाया करता है। सच ही कहते हैं कि माँ-बाप बच्चे के लिए भगवान होते हैं। नन्ही सी बच्ची है और अपने सारी अनुभूतियों को बड़े ही छोटे और सादे से ढ़ंग में कह देती है। जैसे कि “मुझे अच्छा नहीं लग रहा।” इस एक छोटे से वाक्य के पीछे दुनिया भर की भावनाएँ होती हैं: कभी कोई बड़ी ही बालसुलभ सी समस्या तो कभी गम्भीर भावनात्मक द्वन्द।

फ़रवरी 2019 में उसकी तीसरी कक्षा के फाइनल एग्जाम हो गए थे। उसके बाद पूरे मार्च छुट्टियाँ रहीं। अप्रैल से नया सत्र शुरू हुआ और हमने प्राइवेट स्कूल की अड्मिशन फ़ीस और नए सत्र की कॉपी किताबें जो कि लगभग एक लाख रुपये थी बचाने की कोशिश में उसको चौथी कक्षा में नहीं भेजा। सिर्फ़ पंद्रह दिनों के लिए एक लाख देना बहुत ज्यादा लगा हमें।

नतीजा यह कि वो अकेली हो गयी ढ़ेर सारे वक़्त के साथ। हम घर समेटने और सामान ठिकाने लगाने में लगे थे और उसके दोस्त जो अब तक घर पर आया जाया करते थे वह स्कूल में व्यस्त हो गए। हमारी बेटी घनघोर तरीके से बोर होने लगी। हम दोनों पति पत्नी गृहस्थी समेटने में लगे हुए थे और अपनी बेटी को अपना समय कम ही दे पा रहे थे। उस पर कभी उसकी सायकिल कोई लेने आता तो कभी उसके स्केट्स। कभी उसका स्कूटर कोई ले जाता तो कभी कोई उसका कीबोर्ड।

वह पंद्रह दिन बहुत कठिन वक़्त था मेरी बेटी के लिए। मैंने सोचा था एक बार ऑस्ट्रेलिया पहुँच गए तो मैं अपनी बच्ची को फिर से अपना पूरा ध्यान और समय दूँगी। हम बड़े लोग तो पंद्रह दिन, दो महीने या साल भर यह कितना लम्बा वक़्त होता है इसका अंदाज़ा रखते हैं। पर बच्चे?

उनको अगर पूछो- ‘कितनी देर और खेलना है?’ जवाब देते हैं- ‘पाँच मिनट’ और उनके पाँच मिनट घंटे भर में भी पूरे नहीं होते। ऐसी होती है बच्चों की समय को लेकर समझ और समयावधि का अनुमान। ऐसे में न जाने मेरी बेटी ने मेरे पंद्रह दिन के आश्वासन को किस तरह समझा होगा। वह पंद्रह दिन का समय उसने किस तरह बिताया होगा? हम सब साथ होकर भी कितने अकेले हो गए थे! सब अपने अपने ढंग से ख़ुद को सम्हाल रहे थे।

मेरी पति जब ऑफिस से आते तो मेरी बेटी पूरी तरह पापा की बेटी हो जाती थी। पापा यह देखो। पापा पता है आज क्या हुआ। पापा सुनो। पापा लो। पापा दो। बस पापा ही पापा। कभी-कभी तो मुझे लगता कि बेचारी दिन भर मेरे साथ बिलकुल त्रसित हो जाती है शायद। फिर सोचती नहीं पापा से ज्यादा ही प्यार है इसको और पापा की भी जान बसती है इसमें। मैं इन दोनों की बातें सुनकर, इन दोनों को एक दूसरे के साथ ऐसे व्यस्त देखकर बहुत संतोष का अनुभव करती हूँ।

जब हम ऑस्ट्रेलिया आये तो शुरू के कुछ दिन मेरी बेटी बहुत खुश रही। अब उसे माँ के साथ-साथ पापा भी पूरे दिन मिलने लगे थे। पापा शुरुआत में जोश और उम्मीद से लबालब थे तो दिलखुश रहा करते थे। हम तीनों खूब खेलते आपस में: कभी इंडोर तो कभी लॉन टेनिस। घूमने जाते हर रोज़। ऐसा लगा कि बीते दिनों की तकलीफों के लिए हमारी बेटी से हमें माफ़ी मिल गयी।

यही ज़ज्बात रहे दिन रात, तो फिर क्या बात? लेकिन देखते-देखते मेरे पति को चिंता ने घेरना शुरू कर दिया। अब खेलने में उनका मन नहीं लगता था। बच्ची है तो कभी-कभी बालहठ भी कर ही बैठती थी और बदले में उसे पापा की बेरुखी और कभी-कभी झिड़की भी मिलने लगी। एक दिन उसकी सहनशक्ति का मजबूत बाँध टूट गया।

उसने रोते हुए अपने पापा से कहा- ‘तुम ऑफिस ही जाया करो। तुम्हारे लिए वही ठीक है। मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ पूरे दिन। तुम ग़ुस्सा करते हो।’

मेरे परेशान और दुखी पति के घायल दिल पर कैसी बिजली सी गिरी होगी? यह तो एक पेरेंट होने के नाते मैं समझ पा रही थी। लेकिन मेरी फूल सी बच्ची के दिल पर कैसी बीत रही होगी? इसका शायद ठीक-ठीक अंदाज़ा मैं नहीं लगा पा रही थी। कुछ देर असमंजस में रही कि किसको सम्भालूँ? पर फिर बेटी के पास गयी और उसे गले लगाकर चुप कराया।

मैंने उसे समझाने की कोशिश की- ‘बेटा, पापा परेशान हैं। जब उनकी जॉब लग जाएगी तो ठीक हो जायेंगे। तब तक हम दोनों को पापा की गलतियाँ माफ़ करनी होंगीं।’

मेरी मासूम बेटी बोली- ‘मैं अब नहीं कर सकती। बहुत हो गया है इनका। हर समय….। मैं अब इनसे बात भी नहीं करूँगी।’

मैंने कहा- ‘ठीक है, जब तुम्हारा मन हो तब बात कर लेना। चलो, अभी हम दोनों कुछ खेलें।’

कितना सुखद है यह कि बच्चे विषयांतर को अपने प्रति अपराध नहीं मानते। तुरन्त ही खेल में रम जाते हैं। थोड़ी देर में मेरे पति ने आकर बेटी को मनाया और वह मान गयी। लेकिन इससे एक बात जो खुलकर सामने आई वह यह थी कि मेरी बेटी अब यहाँ खुश नहीं थी। हम दोनों उसके लिए बहुत अच्छा नहीं कर पा रहे थे।

मेरी बेटी के भगवान उसे लगातार मायूस कर रहे थे। सच कहूँ तो अब उनमें भगवान वाली कोई बात नहीं रही थी। वह सिमटकर केवल दो इंसान रह गए थे। बेबस, लाचार और कमजोर इंसान। किसी तरह एक-एक दिन गुज़ारने वाले इंसान। किसी के लिए सब कुछ होने का एहसास जब ख़ुद की असमर्थता बोध के आगे छोटा होने लगता है तब दिल के कितने टुकड़े होते हैं? गिनना मुश्किल है।

हमने सोचा और तय किया कि चाहे जितना भी खर्च आये अब बेटी को स्कूल भेजना ही होगा। कब तक उसे अपने निर्णयों के कुप्रभाव झेलने को कहते रहेंगे हम? हमने घर ढूँढने की कोशिश की। लेकिन हतभाग्य!! समय ने ऐसा दाँव खेला कि जीवन नैय्या हिचकोलों से उबरने ही न पाती थी।

किराये पर मकान लेने के लिए नौकरी होना ज़रूरी है जो कि मेरे पति के पास नहीं थी। जॉब नहीं तो घर नहीं। घर नहीं तो स्कूल नहीं। मेरी बेटी पिछले तीन महीने से स्कूल नहीं गयी। स्कूल बच्चों के विकास में ऐसा ज़रूरी संस्थान है जहाँ बच्चा हर रोज कुछ नया सीखता है। अपनी टीचर से ही नहीं अपने दोस्तों से और अपने माहौल से भी। सिर्फ़ पढ़ाई नहीं सीखता बच्चा और भी बहुत कुछ सीखता है पाठशाला में । पढ़ाई तो पूरी विकास प्रक्रिया का शायद दस प्रतिशत ही हो। मेरी बेटी का यह सारा विकास ठप्प पड़ा था। हम दोनों इस बात से आकुल थे और मेरी बेटी अकेलेपन और परिवार में फैलती निराशा से परेशान थी।

हम हर दो तीन दिन में उसकी बात उसके इण्डिया के दोस्तों से करवाते थे। लेकिन यह किसी भी तरह उस नुकसान की भरपाई नहीं था, जो मेरी बेटी उठा रही थी। जीवन में पहली बार ऐसा लगने लगा कि हम अपनी बेटी के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। एक माँ-बाप के लिए यह जीते जी मर जाने वाली असफलता थी। जिसके लिए हमने यह सब किया उसे ही झुलसा रहे हैं। मैं एक पत्नी और एक माँ दोनों ही मोर्चों पर हार रही थी। हम तीनों धीरे-धीरे अजीब से दलदल में धंसते जा रहे थे।

कोई चोरी क्यूँ करता है? बड़े ढ़ेर सारे कारण दिए जा सकते हैं और कुछ कारण सही भी साबित किये जा सकते हैं। शायद? जैसे रॉबिन हुड टाइप की चोरियाँ। लेकिन नितान्त व्यक्तिगत कारणों से की गयी चोरी? सम्भव है कि उन कारणों को कभी सर्व सहानुभूति भी प्राप्त हो जाती है और वे क्षम्य भी हो जाती हैं। लेकिन क्या इससे वह चोर के लिए कम कलुषित होने वाला कर्म हो जाता है? क्या इससे वह चोर के अंत:करण को कम दुःख देती हैं?

मैंने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि एक दिन मैं उस चोर के स्थान पर खुद को पाऊँगी। मेरे सो कॉल्ड आदर्श जीवन का ऐसा पतन होगा! ऐसा नहीं है कि बचपन से मुझे वह मिलता रहा जिसकी कामना मेरे मन में प्रकट हुई। लेकिन न मिलने पर उसे चुरा लेने की सोच कभी नहीं आई। और पिछले बारह सालों की बात करूँ तो हम दोनों पति-पत्नी सॉफ़्टवेयर इंजीनीयर हैं। अच्छा कमाते थे। देश-विदेश घूमे थे। हम सामान इकट्ठा करने की प्रवृति से दूर ही रहे। ब्रेंडेड कपड़े ही पहने, ऐसी सनक कभी नहीं रही। हाँ, अच्छे स्वास्थ्य के लिए ख़र्च करने में कभी कमी नहीं की। और जो बहुत पसन्द हो उसे कभी नहीं छूटने दिया।

मुझे हमेशा से अदरक की चाय बहुत पसंद है या यह कहूँ कि मौसम कोई भी हो मेरी चाय से अदरक कभी ग़ायब नहीं होता। मेरे पति और बेटी मिर्च नहीं खा पाते तो खाने के साथ मैंने हमेशा अलग से हरी मिर्च खायी। मिर्च बिना खाना सुस्वादिष्ट और सरस कैसे लगे, यह मैंने जाना ही नहीं था। कभी दाम देखकर ख़रीदारी की ही नहीं थी।

पहले ही हफ़्ते की बात है जब मैंने अपनी बेटी से कहा- ‘वो देखो, वो सब्ज़ी कितनी फ़्रेश और मनभावन लग रही है!! ले लें?’ मैं हरी सब्ज़ी लेने से पहले ही बेटी को पटिया लेती हूँ ताकि परोसते समय उसे याद दिल दूँ कि उसने भी पसंद की थी ये मेरे साथ और अब खानी पड़ेगी। यह मैं इण्डिया में करती थी तो आदतन यहाँ भी कर बैठी।

इस पर मेरी बेटी ने तपाक से कहा – ‘माँ, 30 डॉलर की है!’

मैंने हैरान होते हुए कहा-‘ ओह ! मैंने दाम तो देखा ही नहीं।’

मेरी बेटी हँसने लगी क्यूँकि यह शुरूवाती दिनों की बात है जब उसे यह सब नया-नया खेल लग रहा था।

उसके हँसने पर मेरे पति बोले- ‘कोई बात नहीं। तुम अभी नयी नयी ग़रीब हुई हो ना? तो तुम्हें ठीक से ग़रीब बनना नहीं आ रहा।’

यह सुनकर हम तीनों हँसने लगे। हँसते हुए नयी मुश्किलों का सामना कर रहे थे हम तीनों। लेकिन जब मुश्किलें पुरानी पड़ने लगें तो हँसी आना बन्द हो जाती है और ग़ुस्सा आना शुरू हो जाता है अपनी बेबसी पर।

जब से यहाँ आई थी, हर हफ़्ते राशन, सब्जी और फल खरीदने में ही 150 डॉलर खर्च हो जाते थे। अदरक छब्बीस से तीस डॉलर की और हरी मिर्च तीस डॉलर के ऊपर ही होती। मैंने इसे रईसी और व्यसन का दर्जा देकर यह दोनों सामान लेना बंद कर दिया।

सोचा- ‘ऐसा भी क्या? कुछ समय ऐसे ही चला लेते हैं। नौकरी लग जाने पर खरीदेंगे।’ खरीदारी के समय तो यह सोच लेती थी पर खाते समय हमेशा लगता कि कुछ कमी है। और चाय? मुझे चाय पीते हुए कभी गुस्सा आता तो कभी रोना। यह बातें मैंने अपने पति को नहीं बताई। बस किसी तरह बर्दाश्त करती रही।

एक दिन, मैं सुबह चार बजे जगी तो मेरी साँसे बहुत तेज़ भाग रही थीं। मेरे हाथों में कुछ कम्पन सा हो रहा था। मैं खुद से शर्मिंदा थी, हैरान थी, व्यथित थी, व्याकुल थी और शायद शब्द नहीं हैं उस भावना को सटीक तौर पर व्यक्त करने के लिए। मैं एक सपने से चौंक कर जागी थी।

सपने में मैं एक मॉल में घूमने गयी थी। वहाँ मेरे पति और मेरी बेटी कार रेस कर रहे थे। मैं एक जगह पर टिककर उन्हें देख रही थी कि पड़ोस में नज़र पड़ी। किसी की सब्जी का पूरा बैग वहाँ रखा था। उसमें से अदरक, खीरा, हरी मिर्च और दूसरी सब्जियाँ झाँक रहीं थीं। मैं अपनी नज़रें नहीं हटा पा रही थी उस बैग से। फिर मैंने चोर नज़रों से इधर उधर देखा। कुछ देर बेचैनी से इंतज़ार करती रही कि कोई आये और यह बैग ले जाए।

बड़ी देर हो गयी, कोई नहीं आया। मशीनवत ढ़ंग से मेरे हाथ बढ़े और उस बैग से सब्जियाँ निकालकर अपने बैग में रखने लगे। दिल में डर बहुत तेज़ चीख रहा था। सारी सब्जियाँ अपने बैग में रख लेने के बाद मैं उस जगह से थोड़ा दूर होकर खड़ी हो गयी। मेरी डरी हुई आँखें अपने पति और बेटी को ढूँढने लगी।

तभी अचानक मेरे मन में बहुत जोर से धक् हुई और मैंने खुद को पूछा- ‘यह क्या किया तुमने?’

मुझे अपने आप पर इतनी शर्मिंदगी पहले कभी नहीं हुई थी। मेरा मन हुआ वहीं धरती फट जाए और मेरा अस्तित्व निगल जाए। पर फिर मुझे प्यार से किसी ने मेरे भीतर से कहा- ‘जाओ, इसे ठीक करो।’

मैं एक बार फिर मशीन की तरह चल पड़ी सब्जियाँ वापस रखने। सब्जी रखते हुए फिर मैं कांप रही थी कि कोई देख ले तो? कहीं वह आ गया जिसकी सब्जी है तो? मेरा क्या होगा? इस परदेस में कौन बचाने आएगा मुझे? बस इन्हीं सवालों की घबराहट को मैं सपने में नहीं संभाल सकी और उठ गयी।

उठने के बाद मैं कितनी देर शर्मसार रही? समय का रिकॉर्ड रखना भूल गयी। जब होश संभाल पाई और सामान्य ढ़ंग से दिमाग चलने लगा तो सोच में पड़ गयी- मैंने अपनी चेतनता में कभी जो सोचा भी नहीं वह मेरे अवचेतन में क्यूँ आया? कैसे आया?

सोचते-सोचते यहाँ तक पहुँची कि चोरी कोई तब करता है जब उसे लगता है कि जो चीज़ उसे चाहिए वह उसका हक़दार है। उस चीज़ की ज़रुरत होती है। लालच होता है। और मन विद्रोही कहता है कि तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है। तुम्हें वह चीज़ मिलनी ही चाहिए। चीज़ हासिल करने के दूसरे उपाय जब नहीं दिखते तो चोरी का ख्याल मन में आता है। हिम्मत हो जिगर में तो व्यक्ति चोरी कर भी डालता है। मैंने सपने में ही सही पर चोरी की। शायद मेरे माता-पिता के दिए हुए संस्कार हैं जो समय रहते मैं उस दर से लौट आई। या शायद प्रभु ही आ गए थे। उन्होंने कहा है न- “जब-जब धर्म की हानि होती है और पाप बढ़ता है तो परित्राण के लिए मैं आता हूँ।”

इस सपने को मैं कभी भूल नहीं सकूँगी। उस सुबह मैं यह सोचकर कांप उठी थी कि मेरी नन्ही बेटी से जब-जब मैं यह कहती थी कि बेटा यह वाली चॉकलेट नौकरी के बाद लेंगे। वह कूकीज़ नौकरी के बाद लेंगे, तो उसे कैसे सपने आते होंगे???

नयी जगह है, बच्चों को लुभाने के नए नए इंतज़ाम हैं यहाँ। इतने तरह के केक, पाई, चोक्लेट, बिस्कुट, योगर्ट, जेली और ना जाने क्या-क्या!! मेरे बेटी देखती है दूसरे बच्चों को उनका लुत्फ़ उठाते हुए। उसके बालमन में भी कसक होती होगी। उसके मन में भी तो चोरी का या छीन लेने का विचार कौंध ही जाता होगा। जिस बेबसी को शब्द नहीं दे पाती महसूस तो करती ही होगी।

कांपते हाथों को जोड़े ईश्वर से बस यही प्रार्थना करती हूँ कि उसे वह सपने याद न रहें। उसके बाद मैंने हर बार शौपिंग में मेरी बेटी को उसकी चुनी हुई कोई एक चॉकलेट दिलाना शुरू कर दिया। बस, एक शर्त थी कि एक बार की शौपिंग में एक ही चीज़ लेंगे।

अदरक और हरी मिर्च अब भी इंतज़ार में थी कि नौकरी लग जाए।

सिडनी में आने के हफ़्ते भर के अन्दर सेंटरलिंक में ख़ुद को रेजिस्टर कर लेना था। what’sapp ग्रूप में हमें यह बताया गया था कि ऑस्ट्रेलीयन सरकार बेरोज़गार लोगों को कुछ समय के लिए भत्ता देती है। आते ही नौकरी तो हमारे लिए पलक पाँवड़े बिछा के बैठी नहीं होगी और जो पैसे इण्डिया से लेकर आए वो कितने दिन चलेंगे। इसलिए अगर भत्ते की व्यवस्था हो सके तो मदद हो जाएगी।

हमें यह बात समझदारी की लगी और हम पहुँच गये सेंटरलिंक ऑफ़िस। खूब लम्बी लाइन लगी थी भत्ता लेने वाले लोगों की और हमारी तरह ख़ुद को रेजिस्टर करने वालों की। उसके पास एक घने पेड़ पर इतनी चिड़िया बैठी थी और इतना चहचहा रही थीं कि कुछ और सुनना लगभग नामुमकिन। ख़ैर, जब तक बाहर थे उन्हीं की चहक सुनते रहे और फिर एक आवाज़ पर अंदर आए।

भूरे बाल, कँची आँखें, चटक लाल लिपस्टिक, चिपके हुए लम्बे नक़ली हरे नाख़ून, हरे रंग की छोटी स्कर्ट और चाल में तेज़ी। सिडनी के दफ़्तर में 55-60 साल की उस गोरी सी औरत का होना बार-बार मन को बचपन का ‘इन या आऊट’ वाला खेल खिला रहा था। यह इंडीयन है कि नहीं? लग तो रही है लेकिन… नहीं।

ऐसे मिज़ाज इंडीयन के नहीं लगते। यह फ़ैशन, यह टशन, यह तेज़ी एक उम्रदराज़ इंडीयन की छवि से बिलकुल मेल नहीं खा रहे हैं। मगर इसने जिस सफ़ाई से मेरा नाम बिना हिचकिचाये सही पुकारा, यह इंडीयन के सिवा कोई कर सकेगा भला!

इन्ही ख़यालों में उलझे-उलझे मैं उसके पीछे-पीछे उसकी सीट तक आ गयी थी। उसने मुझे बैठने का इशारा किया और मुझसे डोक्यूमेंट्स लेकर अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन में घुस गयी। अभी तक उसने बस मेरा नाम भर लिया था और मैं उसके बारे में जानने को उतावली थी। मेरी जिज्ञासु नज़रें कुछ देर उसके चेहरे पर टिकी रहीं जहाँ कुछ झुर्रियाँ थीं जो मेकअप के बाद भी पता चल रहीं थीं। और उस चेहरे में कुछ जाना-पहचाना था, जो उसके इंडीयन होने की आशंका जगा रहा था पर पक्के तौर पर…..

ख़ैर मैंने उसके चेहरे से ज़बरन अपनी नज़रें हटाकर उसकी टेबल को टटोलना शुरू किया। मायूसी से नज़रें मिली और मैंने एक गहरी साँस भरकर फिर उस चेहरे को ताक़ना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद उसने साइड में रखी अलमारी का एक पल्ला खोला। जाने उसने क्या लेने को खोला था और फिर बंद कर दिया। पर मैंने इतनी देर में एक हल्दीराम का तला मख़ाना अलमारी में देख लिया था। मन ही मन मुस्कुराई कि अगर यह इंडीयन नहीं भी है तो भी किसी ना किसी तरह किसी इंडीयन से जुड़ी ज़रूर है। क्या यह इंडीयन हो सकती है???

वो अपना काम किये जा रही थी और मैं तरह-तरह से ‘इन या आऊट’ में ख़ुद को जूझा रही थी कि उसने कहा- ‘आपकी बेटी तो अभी छोटी ही है।’

मेरा मन विदेशी ज़मीं पर और वो भी सरकारी दफ़्तर में अपनी बुज़ुर्ग, अपनी भाषा से मिलकर ऐसा ख़ुश हुआ जैसे भूखे को भण्डारे मिल गया हो। मैंने भरपूर उत्साह और ख़ुशी से हामी भरी।

मैं कुछ कहती इसके पहले ही वो आगे बोलीं- ‘हम 22 साल पहले आए थे और तब मेरा बेटा 11 साल का था और बेटी 3 साल की। अभी मेरी बेटी की शादी है अगले महीने।’

मैं उसकी बातों पर मुस्कुरा रही थी क्यूँकि वो मुझे बोलने की जगह ही नहि दे रही थी। उसे जल्दी थी अपनी उस बात तक पहुँचने की जिसने उसे व्यथित कर रखा था। ऐसा मैं इसलिए कह सकती हूँ क्यूँकि उसकी आँखों में जो नमी बढ़ रही थी और उसकी उँगलियाँ जिस तरह एक दूसरे को रगड़ रही थीं वो ख़ुशी तो ज़ाहिर नहीं कर रहीं थी। एक व्यग्रता थी जो फूट रही थी हर पोर से। मैं अब भी उसे ग़ौर से देख रही थी और वो बता रही थी।

‘बैक इन इण्डिया, मेरे रिश्तेदार कह रहे थे कि तुम्हें तो साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होगी आजकल। शादी के इन्तज़ाम में तो समय कितना भी हो कम ही पड़ता है और तुम लोग वहाँ अकेले हो।’

अभी तक उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी जो अब बहुत कोशिश के बाद भी फीकी पड़ने लगी थी। और शायद मेरी अपनी मुस्कान भी संघर्ष ही कर रही थी होंठों से चिपके रहने मे।

धीरे-धीरे उसके होंठ काँपने लगे थे और वो ऊँगलियाँ चटकाती हुई बोली- ‘मैंने उनको बताया कि ऐसा बिलकुल भी नहीं है। मुझे बस मेरी ड्रेस की चिन्ता करनी है बाक़ी सब बेटी और दामाद ने तय कर लिया है। मेरा दामाद इटेलियन है एण्ड ही इज आ नाइस बोय। जब मेरी बेटी ने मुझे बताया कि वो शादी करने जा रही है तो वी वर ओके, फिर वो लोग वेड्डिंग डेस्टीनेशन ढूँढ रहे थे तो हम दोनो पति पत्नी भी तैयार हो गए।

तब मेरी बेटी बोली-“आप आकर क्या करोगे? हम देख लेंगे और आपको बस शादी में आना है तैयार होकर। चिल करो।”’

अब उसकी आँखों में आँसू थे और होंठ पतझड़ में सूखे पत्ते से काँप रहे थे। उसके दोनों हाथ एक दूसरे को कसकर जकड़े हुए थे। वो जूझ रही थी ख़ुद को सम्भालने की कोशिश में। मेरी भी आँखें नम हो गयी थी। मैंने पानी का एक घूँट पिया और बोतल उसकी तरफ़ बढ़ायी। उसने पानी को कांपते हाथों से मुँह तक पहुँचाया।

कुछ घूँट पीकर मेरी तरफ़ मुस्कुराकर देखा और कहा- ‘मेरा बेटा सिंगापुर में है। उसकी भी शादी हो चुकी है। मेरा बेटा वहाँ बहुत अच्छी कम्पनी में अच्छी पोज़ीशन में है। वैसे मेरी बेटी भी पढ़ायी में अच्छी रही और यहीं एक अस्पताल में डॉक्टर है। बोथ हैव बीन गुड किड्स। दे बोथ आर। बस यही कि जब पर्सनल ज़िन्दगी की बात आती है तो वो दोनो बहुत इंडिपेंडेंट है।’

इतना कहकर वो चुप हो गयी और मेरी तरफ़ दस्तावेज़ सरकाकर मुस्कुराती हुई मुझे देखने लगी। उसके होंठ अब भी काँप रहे थे। जाने उसने मुझे यह सब क्यूँ बताया? मुझे तैयार कर रही थी भविष्य के लिए या फिर कोई ऐसा इंसान ढूँढ रही थी जो अजनबी भी हो और उसके हालात को उसकी तरह समझ सके।

इतने लंबे समय से यहाँ होकर भी वो ख़ुद को इसके लिए तैयार ना कर सकी। जानकारों के बीच यह क़ुबूल करने की शर्मिंदगी उठाने की हिम्मत ना रही शायद उसमें।

रेजिस्ट्रेशन के दौरान उसने हमें यह भी बताया कि बेरोज़गारी भत्ता उन्ही को मिलता है जो कम से कम चार साल से ऑस्ट्रेल्या में हों। मतलब, हमें तो नहीं ही मिलना था।

नौकरी के लिए कोशिशें बहुत कर रहे थे मेरे पति, लेकिन कहीं से सफलता नहीं मिल रही थी। “तू छुपी है कहाँ मैं तड़पता यहाँ” जैसा आलम था।

दिन तरह-तरह के कारनामे करके तमाम करने के बाद हर शाम को हम तीनों लॉन टेनिस खेलते और आस-पास घूमते। इतने तरह के नए-नए फूल दिखते जिनके नाम भी नहीं पता थे मुझे। वो मेरे लिए अजनबी थे और मैं उनके लिए। लेकिन फिर भी मुझे उन्हें देखकर बड़ा ही सुकून मिलता था। मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना वाला हाल हो जाता था। यहाँ की सड़कें इतनी साफ़ हैं कि अगर एक टॉफ़ी का रैपर भी आपके हाथ से छूट कर गिर जाए तो आपकी आँखों को चुभने लगता है। आप झटपट उसे उठाकर अपनी जेब में भर लेते हैं।

हमारे पास कहीं आने-जाने का एक ही साधन था- हमारे पैर। ख़रीदारी करने जब जाते तो इतना सामान लाद कर झोलों में लाना असुविधाजनक तो था ही साथ ही अजीब भी लगता था। यहाँ जो लोग कार नहीं चला सकते उनके पास शॉपिंग के लिए एक ख़ास तरह की ट्रॉली होती है। इसमें पहिये होने के कारण इसे बड़ी आसानी से सड़क पर या फुटपाथ पर चलाया जा सकता है। बिना थके इसे तीन किलोमीटर तक हमराही बनाया जा सकता है। अगर बहुत टिकाऊ और अच्छी गुणवत्ता वाली ट्रॉली लेनी हो तो कुछ साठ डॉलर के आस-पास आती है। काम चलाऊ ट्रॉली लगभग पैंतीस डॉलर में आ जाती है।

हम इण्डिया में आर्थिक रूप से बहुत अच्छे ढंग में जीने वाले प्राणी ठहरे। काम चलाऊ चीजों से किनारा करने की एक आदत थी। इसलिए हमें सस्ती ट्रॉली तो नहीं ही लेनी थी। यह शुरूवात की बात है जब हम नयी सच्चाई को पूरी तरह अपना नहीं पा रहे थे। डॉलर ख़र्च होने और ख़तम होने की चिन्ता तो होने लगी थी और ख़र्चों में कटौती भी शुरू कर ही दी थी। लेकिन काम चलाऊ सामान लेने तक मानसिक स्तर अभी उतरा नहीं था। लेंगे तो बढ़िया वाली, लेकिन साठ डॉलर इस ट्रॉली पर ख़र्च कर दें यह ठीक नहीं लग रहा था। यह और बात है कि दो महीने बाद झक मार कर हमने यही काम चलाऊ ट्रॉली ख़रीदी और भगवान से कहा- ‘देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गयी भगवान, कैसे बदल गया सामान।’

हम धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे। पहले आर्थिक स्तर उतरा और फिर दिमाग़ी तौर पर भी हम “गरीब मानसिकता” में घुसने लगे। गरीब मानसिकता वो होती है जिसमें इंसान अपने संसाधन बहुत बचा कर ख़र्च करता है। हमेशा बहुत बुरे वक़्त का, भूखों मरने का और भीख माँगने की कगार पर पहुँच जाने का डर दिमाग़ में धुँध की तरह घूमता रहता है। इंसान अपना पैसा इन्वेस्ट करके पैसा बढ़ाने की दिशा में बढ़ने की जगह अपना पैसा दाब के बैठने वाला बन जाता है। हम कुछ भी करने से पहले दाम देखने लगे थे। महँगी चीज़ें तो आप ये समझिए कि हमसे पूछती थीं- ‘आप यहाँ आये किसलिए?’

हम जुगाड़ लगाने वाली प्रवृति में घुसने लगे थे। हालाँकि जुगाड़ वाली सोच में कुछ ग़लत नहीं है, लेकिन हमारे लिए यह नयी बात थी तो एक अजीब सी भावना जुड़ गयी इसके साथ। यह हमारे लिए हमारे ख़राब वक़्त की बहुत ख़ास याद बन गया। जैसे एक ख़ास तरह की चिड़िया की सुबह की चहचहाहट मेरे पति के लिए उनकी बेरोज़गारी के दिनों की याद बन गयी है। कितना भी कोशिश करें उस चहक में उन्हें एक उदासी महसूस हो ही जाती है। ऐसी ही होती है कभी-कभी यह चिरकुट ज़िन्दगी। यू नो… ख़ैर…।

तो हमने जुगाड़ के तहत हमारे छोटे ट्रॉली सूट्केस जो कि फ़्लाइट में कैबिन लगेज़ की तरह इस्तेमाल होता था उसे सब्ज़ी भाजी और राशन ख़रीदने की ट्रॉली बना लिया। मेरी बेटी को यह बहुत ही अच्छा लगता था। वो ज़िद करती कि ख़ाली बैग उसे लेकर चलना है। नन्ही बिटिया एयरपोर्ट वाला फ़ील फ़ैक्टर एंजॉय करती थी। फुटपाथ अच्छे साफ़सुथरे थे। ना कहीं कोई टूट फूट, ना जल भराव और ना ही फुटपाथ पर किसी गाड़ी के आने का डर। आस-पास अंग्रेज़ी लोग और विदेश का ख़ूबसूरत नज़ारा। यह सब मेरी बेटी के लिए फ़ील गुड फ़ैक्टर था। मुफ़लिसी में रईसी महसूस करने का ज़रिया। आप भी मानोगे कि बचपना और भोलापन इसे ही कहते हैं।

विकसित देशों में सेवाएँ बड़ी महँगी होती हैं। सरकारी परिवहन की बात करें तो वो भी बहुत महँगा है। एक बाध्यता सी भी है कि आप एक पास बनवाएँ। उसमें टॉप अप करवाइये और वाहन पर चढ़ते समय “टैप ऑन” करें और उतरते समय “टैप ऑफ़” करें। मशीन ख़ुद ही पैसे काट लेगी आपकी यात्रा के। ऐसा करना सुविधाजनक है और समय कम लेता है। अगर आप यह पास ना बनवाएँ तो वाहन में चढ़कर आपको ड्राइवर के पास जाना होगा जिसके पास खुले पैसे कभी नहीं होते। यानी कि अगर आपके सफ़र की क़ीमत तीन डॉलर चालीस सेंट है तो आपको इग्ज़ैक्ट्ली इतने पैसे देने होंगे जो कि पहले से जानना लगभग सम्भव नहीं है।

हमने जब पहली बार बस में चढ़ना तय किया तो बस में चढ़कर पाँच डॉलर का नोट दिया और ड्राइवर ने कुछ वापस नहीं किया। हम तीन लोग थे तो तीन टिकट बनाने का समय लगा। तो इससे हमारा और बाक़ी सहयात्रियों का समय तो ख़राब हुआ ही साथ ही हमारे एक डॉलर साठ सेंट प्रति सवारी ज़्यादा लग गए। मतलब कुल मिलाकर चार डॉलर के ऊपर का नुक़सान और हम “कीप द चेंज” वाली अंग्रेज़ी भी ना झाड़ पाए। कंगाली में आटा गीला का पर्फ़ेक्ट उदाहरण।

ड्राइवर के पास खुले इसीलिए नहीं रखे जाते क्यूँकि सरकार लोगों को ठेलना चाहती है कि पास बनवाओ और समय की किफ़ायत सीखो। ये नहीं कि हर स्टॉप पर ड्राइवर टिकट काट रहा है, सवारियाँ अपने गंतव्य पर लेट पहुँच रहीं हैं और बाक़ी का ट्रैफ़िक त्रस्त हो रहा है अलग से। जब किसी का लाभ नहीं हो रहा तो हे बिना पास वाले प्राणी! तुम्हारा लाभ क्यूँ हो? तुमको तो दण्ड मिलना चाहिए क़ायदे से। वैसे चाणक्य नीति भी यही कहती है कि पैसों की मार से बेहतर कोई मार नहीं होती लोगों को कुछ सिखाने के लिए।

हमने तुरंत तीन पास बनवाए और टुरिस्ट वाला आचरण छोड़कर लोकल आचरण को तुरंत स्वीकार किया। वीकेंड पर नौकरी से सम्बंधित कहीं से कोई जवाब आने का कोई सवाल ही नहीं उठता था और वीकेंड पर सिडनी में प्रति व्यक्ति दो डॉलर की अपर कैप होती है सरकारी बस, ट्रेन और फ़ेरी में। इसे लगभग फ़्री कहा जा सकता है बिना किसी तकलीफ़ के। मेरी बेटी को सिडनी घुमाने के लिए यह दो दिन पर्फ़ेक्ट थे। मैं वीक डेज़ में जगहें ढूँढती कि उसे यहाँ घुमाए वहाँ ले जायें। लेकिन मेरी बेटी मरमेड है। उसे बीच के सिवा कुछ नहीं देखना। तो हर वीकेंड एक दिन हम बीच जाते। बीच तक पहुँचने के लिए हम ट्रेन करते और फिर फ़ेरी।

सफ़र का खूब मज़ा आता। मेरी बेटी बहुत ख़ुश होती। लहरों में उछल कूद मचाती और सर्फ़िंग करते लोगों को देखकर ख़ुश होती। एक बार तो मुझे लगने लगा था कि यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो मेरी बेटी सर्फ़र बनने को लालायित हो जाएगी। मैंने बीच से तरह-तरह के शँख और सीपी इकट्ठा की।

हम सुबह नाश्ता करके चलते और मैं दिन के लिए पराठे और सब्ज़ी बनाकर रख लेती और आधे लीटर के फ़्लास्क में चाय। एयरपोर्ट पर चाय का जो स्वाद मिला था उसके बाद तो ऐसी लानत भेजी हमने बाहर मिलने वाली चाय पर कि क्या बताएँ। मेरी बेटी को हंग्री जैक्स की हॉट चोक्लेट बहुत पसंद आयी तो उसके लिए बीच के पास से वो ले लेते थे। इसमें भी एक पेंच है।

हंग्री जैक्स की कोई तो स्कीम है कि उसके ऐप्प को मोबाइल में इंस्टॉल कर लें और वाइफ़ाई के ज़रिये कोई सर्वे कर दें तो एक कोड मिलता है जिससे उनके प्रोडक्ट पर छूट मिल जाती है। तो हमारा दिन आठ डॉलर में बीत जाता था। यह ग़रीबी के दिनों में बहुत बड़ी राहत की बात थी और मज़े की तो थी ही।

जेफ़्फ़ अक्सर हमारे साथ खाता था और खाने के बाद हम कार्ड्स खेलते थे। मुझे तो लगता है कि हम उसके साथ कार्ड्स खेलें इसीलिए वो हमारे साथ खाना खाता था और मेरी तारीफ़ें करता था। कार्ड्स खेलना मुझे उसने ही सिखाया।

एक रात उसने अपने दो दोस्तों को डिनर पर बुलाया और मैंने उस दिन उसकी सिखायी हुई थाई ग्रीन करी बनाई। वो किचन में बार-बार आता और मेरी कुछ मदद करता या कुछ बातें ही करता रहता। उसने नियम बना लिया था कि खाना मैं बनाऊँगी और सारे बर्तन वो साफ़ करेगा। वो परितोष को भी सिखाने की कोशिश करता कि किचन में हेमा की मदद किया करो। किचन अकेले हेमा का काम नहीं है।

वो मुझे बताता था कि उसने अपनी बेटी को आठ साल से उसके बर्तन धोने का काम दे दिया था। मुझसे कहता कि तुम्हारी बेटी तो नौ साल की है उसको सिखाओ। मैं कहती- ‘हाँ, सिखाऊँगी।’

उसका कहना था कि माता-पिता को बच्चों के साथ कड़क रहना चाहिये। उन्हें हार्श रीऐलिटी के लिए तैयार करना चाहिए। मैं उसकी बात सुनती थी लेकिन मानने को मेरा मन नहीं मानता था।

पहली वजह यह कि मैं जेफ़्फ़ के कड़क होने का नतीजा देख रही थी। उसके बच्चे उससे बात नहीं करते थे। अलग शहरों में रहते हैं, लेकिन सिडनी आएँ तो भी उससे नहीं मिलते थे। मुझे लगता था कि वो बच्चे जेफ़्फ़ के कड़क मिज़ाज का कारण कभी नहीं समझ सके। अब तो वो इंडिपेंडेंट अडल्ट हैं, लेकिन फिर भी जो भावनात्मक खरोचें बचपन में लगी हैं उन्हें भूल नहीं पा रहे हैं। ख़ुद जेफ़्फ़ भी तो अपने मम्मी-पापा से नफ़रत ही करने लगा था। यह तो उनके मरने के बाद और जब जेफ़्फ़ के अपने बच्चे उससे कतरा रहे हैं, तब वो अपने मम्मी-पापा की स्ट्रिक्टनेस को वैलिड कह पा रहा है।

इस कड़क अन्दाज़ से किसी भी माता-पिता ने क्या हासिल किया? अपने बच्चों से दूरियाँ! और बच्चों ने इस सख़्ती से क्या पाया?

दूसरी वजह यह कि दुनिया बहुत बुरी है, हार्श है यह भावना मैं मेरी बेटी में नहीं भरना चाहती। मैं उसके दिल की तरलता को ठोस नहीं करना चाहती। अगर दुनिया बुरी है, तो भी मैं घर में उसी दुनिया का सिम्युलेशन नहीं चलाना चाहती। मैं मेरी बेटी को सरल, कोमल और कन्सिडेरट ही बने रहने देना चाहती हूँ। उसकी दोस्त बनना चाहती हूँ। उसके ट्रस्ट सर्कल में रहना चाहती हूँ कि वो अपनी परेशानी मुझसे खुलकर कह सके। किसी डाँट, मार या लेक्चर के डर से ख़ुद को मुझसे छिपा ना ले। उसके अपने अनुभव उसे सिखाएँगे और बताएँगे कि दुनिया कैसी है। मैं किसी भी तरह के सोच के साँचे में उसे नहीं ढालना चाहती। मुझे इंसान की क़ाबलियत, इंसानियत और दुनिया पर भरोसा है। मेरी बच्ची अपनी नज़रों से दुनिया को देखे और ईश्वर उसे मिलने वाले बुरे अनुभवों से उसे सीखने और बेहतर बनने की सदबुद्धि दे। मैं अपनी बेटी के लिए यही प्रार्थना करती हूँ।

लीजिए, मुद्दे से भटक गयी मैं। हाँ, तो मैं बता रही थी कि मैंने थाई ग्रीन करी बनाई और जब हम खाने बैठे तो जो मेहमान आए थे उन्होंने मुझे चौंका ही दिया।

उस दिन पता चला कि आँखें सिर्फ़ देखती हीं नहीं वज़न भी कर लेती हैं। एक लड़का जब किसी लड़की को देखता है तो मन ही मन क्या-क्या कर गुज़रता है! हैरान हूँ!

वो मेहमान दोस्त लगभग साठ साल का था और वो मुस्कुराते हुए बोला- ‘यू मस्ट बी फ़ॉर्टीथ्री केज़ीस।’

मैं किस क़दर दंग रह गयी यह बताने को शब्द नहीं हैं मेरे पास। उसका अन्दाज़ा मेरे असल वज़न से आधा किलो ही ज़्यादा था! सहम गयी मैं कि और किन किन पेरामीटर्स पर नाप लिया होगा इसकी नज़रों ने मुझे? यहाँ की संस्कृति ऐसी है कि लोग उन्मुकत्ता से ऐसी बातें कर लेते हैं। भारत में जहाँ इन बातों को कहने की इतनी स्वतंत्रता नहीं है वहाँ भी तो लड़के यह सब कर लेते होंगे?

एक लड़की के नज़रिए से कहूँ तो किसी भी लड़के को देखकर बस एक ही कसौटी का इस्तेमाल होता है कि उसके पास होना सुरक्षित है या नहीं? लड़कों के ताड़ने की क़ाबलियत ग़ज़ब होती है! आय मस्ट अप्रीशीएट।

थोड़ा असहज होकर मैंने उससे दूरी रखते हुए खाना खाया और फिर कार्ड्स का खेल शुरू हुआ। खेल में एक जगह मैंने जान बूझकर कमज़ोर पत्ता फेंका ताकि मेरी बेटी जीत जाए। और यह काम मैंने इतनी सफ़ाई से किया था कि मेरे पति को शक़ नहीं हुआ। लेकिन जेफ़्फ़?

उसकी पारखी नज़रें ताड़ गयीं और उसने तुरंत कहा- ‘ट्राइइंग टू सेव यॉर डॉटर?’

मैं हैरत से उसे देखने लगी। मेरे पति ने कहा- ‘नो, आय थिंक शी इज़ कन्फ़्यूज़्ड। शी इज़ न्यू टू कार्ड गेम्ज़।’

मैं भी येडी बनने का नाटक कर ली। ओह! मैंने ग़लत पत्ता डाल दिया।

दरअसल, वो समय इतना गाढ़ा था कि मैं यही सोचती थी मेरी वजह से मेरे पति या मेरी बेटी ज़रा सा ख़ुश हो जाएँ तो मैं कुछ भी कर दूँ। इस सोच के चलते मैंने कई बार ऐसे काम किए जो मैं साधारण परिस्थिति में नहीं करती। उस समय इन दोनों के लिए मैं ज़रा भी कड़क नहीं बन पाती थी।

मेरे पति मीठे के बहुत शौक़ीन हैं। इण्डिया में मैं मेरे पति को लिमिटेड मीठा खाना अलाउ करती थी। धीरे-धीरे इतना हो गया कि वो ख़ुद ही मीठा लगभग छोड़ चुके थे। यहाँ आकर ऐसा मानसिक तनाव छाया रहता था उन पर कि मीठा खाने से कुछ देर तक तो अच्छा लगता था उन्हें। मैंने उनके मीठे खाने पर किसी भी तरह की रोक लगानी बन्द कर दी। महीने भर में चार किलो वज़न भी बढ़ गया उनका। शायद यह मीठे और डिप्रेशन का मिला जला असर था। तब मैं सोच लेती थी कि वज़न तो फिर घट जाएगा लेकिन अभी इस तनाव में अगर मीठे से राहत मिल रही है, तो ले लो।

जेफ़्फ़ की नज़रों से यह कुछ भी नहीं छिपता था। वो कहता था- ‘परितोष इज़ लकी टू हेव यू इन हिज़ लाइफ़। बट यू शुड नॉट स्पोईल योर हसबैंड एंड योर किड।’

मैं उससे कहती थी- ‘कुछ समय की बात है। वक़्त के साथ बदल जाऊँगी मैं भी। मौक़ापरस्त हूँ मैं।’

राजतन्त्र और लोकतन्त्र दो अलग प्रणालियाँ हैं, किसी सिस्टम की सुव्यवस्था को सुनिश्चित करने की। सिस्टम चाहे प्रान्त हो, राष्ट्र हो, कबीला हो या घर हो। इन दोनों ही तंत्रों में खूबियाँ और खामियाँ होती हैं। इन दोनों तंत्रों में एक दूसरे से वैचारिक मतभेद और टकराव भी होता है।

अमूमन भारतीय घरों में राजतन्त्र चलता है। पुरुष सर्वेसर्वा होता है। उसके पास निर्णय की शक्ति होती है और उसके कन्धों पर पूरे परिवार के हित अनहित का दायित्व होता है। कुछ प्रान्तों जैसे बंगाल में राजतन्त्र राजमाता के हाथों में होता है। कुछ घर होते हैं जहाँ लोकतन्त्र होता है।

मेरे घर में लोकतन्त्र चलता है। हर एक सदस्य हर एक निर्णय के लिए जिम्मेदार होता है। लिये गए निर्णय को ठीक से निभाने की जिम्मेदारी सबकी होती है। उस निर्णय के परिणाम अगर सुखद न हों तो किसी को ब्लेम गेम का सुख नहीं मिलता। जब हमने यहाँ आने का फ़ैसला लिया तो मिलकर लिया। हमारी बेटी को विदेश का रहन-सहन अच्छा लगेगा या नहीं, इस बारे में उसकी राय लेने के लिए हमने बहुत बड़ा कदम उठाया था।

उसे एक महीने के लिए पेरिस ले गए थे हम। जिससे वो कुछ तो अंदाज़ा लगा ही सके कि विदेश कैसा होता है और वो अपने दोस्त अपना स्कूल छोड़कर विदेश में रहना चाहेगी या नहीं। वो लगभग एक लाख का ख़र्च था जो हमने उठाया था। हम अपनी बेटी के लिए ही देश छोड़ रहे थे तो उसकी रज़ामंदी सबसे ज़रूरी थी।

सिडनी जाने का फ़ैसला भी इकट्ठा की गयी जानकारी के आधार पर मिल जुलकर लिया। हम महीने भर के सिडनी के ठन्डे रिस्पांस से व्यथित तो थे ही और दिमाग दौड़ा-दौड़ाकर थक भी रहे थे। लेकिन हम तीनों में से कोई भी इस फ़ैसले के लिए दूसरे को क़ुसूरवार नहीं ठहरा सकता था। डिप्रेशन के पलों में ऐसा लगता था कि कोई अब बस यह बता दे, क्या करना है? हम चुपचाप करते जायेंगे। हमारी निर्णय लेने की मानसिक शक्ति एक ब्रेक लेना चाहती थी। लोकतंत्र की ज़िम्मेदारी अब उठाना बहुत मुश्क़िल लगने लगा था।

ऐसे समय में मेरे पति के मेल्बर्न वाले मित्र देवदूत की तरह आये और उन्होंने एक दिन कहा- ‘यहाँ आ जाओ। नौकरी का भी यहीं हो जायेगा और बेटी के स्कूल का भी।’

सच? कैसा सा होता है न मन भी? जब जिसकी चाह हो वह मिल रहा हो, तो फिर से आकलन शुरू कर देता है। मेरे पति बहुत परेशान थे। मैं मेल्बर्न में नौकरी अपेक्षाकृत कम होने की बात जो कि उनकी जानकारी में पहले से ही थी दोबारा नहीं छेड़ना चाहती थी। लेकिन यह ज़रूर जानना चाहती थी कि वह फ़रिश्ता जो हमें सहारे के लिए हाथ बढ़ा रहा है। उसको ऐसी कौन सी जानकारी है? मेल्बर्न में नौकरी लग जाएगी, इसका विश्वास क्यूँ है?

मैंने अपने पति से उनका नंबर लिया और उन्हें फ़ोन किया।

उन्होंने कहा- ‘भाभी, कुछ मत सोचो, बस आ जाओ।’

उनके दिलासे और न्योते पर मैंने पूछ लिया- ‘वहाँ तो सिडनी से भी कम नौकरी हैं। फिर कैसे नौकरी लगेगी?’ और ठीक उसी समय दो ‘तंत्र’ एक अश्रव्य शंखनाद के साथ टकरा गए।

राजतन्त्र बोला- ‘भाभी, यह बात आप क्यूँ कर रहे हो? परितोष क्यूँ नहीं? सब ठीक तो है? मैं बाद में कॉल करता हूँ।’

मैं कुछ पल तो अवाक रही। पूरे परिवार के लिए जो निर्णय होना हो वह अकेले परितोष की जिम्मेदारी क्यूँ? और शायद मुझे अपमान महसूस हुआ कि उन्हें लगता है नौकरी की बातें मेरी समझ के परे हैं। या शायद उन्हें लगता है कि औरतों को घर गृहस्थी के ही काम से मतलब रखना चाहिए।

एक तरफ़ मेरे परेशान पति थे और उनके लिए आशा की किरण उनके ये दोस्त जिन्होंने पहले भी एक नौकरी के सिलसिले में मेल्बर्न बुलाया था। दूसरी तरफ़ मेरा आहत अहं था।

मेरे पति के यह दोस्त अपने घर के राजा हैं। “मेरा वचन ही है शासन” वाला रुतबा है उनका उनके घर में और वो हर पुरुष के लिए यही आदर्श मानते हैं। जो अपनी पत्नी से सलाह मशविरा करे वो उनकी नज़र में “जोरू का ग़ुलाम” है। उन्होंने मेरे पति को दबे स्वर में कहा भी- ‘कंट्रोल करो अपने परिवार को।’

“सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं।” अहा! कैसा अप्रतिम शौर्य, अदम्य साहस और धवल कीर्ति झलकती है सर कटा लेने में। सर कटाने के बाद फ़ैसला लेने वाले के लिए कुछ नहीं बचता- सत्य असत्य, मान अपमान और जीवन। सब ख़त्म। लेकिन सिर झुकाने वाला क्या कम साहसी है? अपने मान अभिमान को क्षत-विक्षत कर जीवन को चुन लेने वाला क्या शौर्य विहीन है? हाथ फैलाकर यह कहने में कहाँ कीर्ति है कि मेरी मदद करो। सिर झुकाने वाला आखिरी साँस तक उस एक फैसले के सत्य-असत्य, मान-अपमान और सही-गलत में उलझा रहता है।

उस समय मुझे व्यक्तिगत तौर पर समझ नहीं आ रहा था कि साहस किसमें है? अभिमान कहता- ‘मुझे बचाओ। मैं ही तुम हो। मैं ही स्वाभिमान हूँ।’

जब एक पत्नी मुझमें जागती तो कहती- ‘चांस लेने में क्या हर्ज़ है? जिस तरह तुम्हें उनकी बात से अपमान का एहसास हुआ। शायद उन्हें भी तुम्हारे सवाल ने अपमानित किया हो। हो सकता है उन्हें तुम्हारा सवाल उन पर संदेह लगा हो। कुछ बात न बनी तो लौट आयेंगे सिडनी। जून में तो वैसे भी चुनाव और फाइनेंशियल इयर एंड की वजह से कुछ नहीं होना तो चाहे जहाँ रहो। तो चलो, परितोष के लिए एक बदलाव हो जायेगा। दोस्तों के पास रहेंगे तो वही बहुत बड़ा सहारा हो जायेगा।’

एक व्यवहारिक बुद्धि डराती भी थी कि बहुत पास रहने से सम्बंध अक्सर बिगड़ जाते हैं। इस कठिन समय में क्या एक प्यारी दोस्ती को दाँव पर लगाना ठीक है? अगर यह रिश्ता भी उलझ गया तो? माया मिली न राम वाला हाल हो जायेगा। बड़ा असमंजस था हम दोनों के मन में। और वह मित्र भी कुछ तो आहत हो ही गए थे मेरे उस फ़ोन के बाद।

इस बीच एक बात और थी जो मेरे पति को व्यथित कर रही थी वो थी उनके सिडनी के मित्र की उदासीनता। वह इनके कॉलेज का दोस्त था। अच्छी बातचीत होती थी और जब से हम सिडनी आये थे उसने कन्नी सी काट ली। वह बहुत व्यस्त था उन दिनों। ऐसा भी ख़ुद को समझाते थे हम पर मन था कि बागी हुआ जाता था। ऐसी भी क्या व्यस्तता कि इतवार को भी घंटे भर की मुलाक़ात नहीं हो सकती? दोस्त है।

एक तरफ़ यह दोस्त था जो उसी शहर में होकर नहीं था और दूसरी तरफ़ यह दोस्त जो अपने शहर, अपने घर बुला रहा था। यह बुलावा कहीं न कहीं एक मरहम भी था। एक दोस्त ने घाव दिया और दूसरा मरहम दे रहा था। ऐसी ही होती है दोस्ती। कब अनजाने क्या हो जाता है? पता ही नहीं होता।

हम लोगों ने सिडनी से मेल्बर्न आने का फ़ैसला कर लिया और मेरे पति ने एक बार फिर अपने सिडनी वाले दोस्त को फ़ोन किया कि अब यहाँ से जा रहे हैं। यह एक तरह से शिकायती था। नाराज़गी का इज़हार भी था और दोस्ती का तकाज़ा भी था। इस बार आशा टूटी नहीं और वह मित्र अगली ही शाम को मिलने के लिए राजी हो गए।

हमारा वक़्त इतना बुरा चल रहा था कि मन में नकारात्मकता बड़ी जल्दी घुसपैठ कर जाती थी। ऐसा लगा कि हम जा रहे हैं यह जानकर कैसे समय निकल आया इनके पास और वो भी वीक डे में? हम दोनों ने सोचा हमें नहीं मिलना। पर फिर दोस्ती जीत गयी और हम उनसे अगली शाम को मिले। मिलने पर पता चला कि वह कहाँ इतना व्यस्त थे। उन्होंने यह भी बताया कि नौकरी मार्किट में, उनकी नज़र में, क्या हॉट चल रहा है? ढेरों बातें हुई। जब दो कॉलेज के दोस्त मिलें, तो बातों का भला क्या अंत? जब हमारी मुलाक़ात पूरी हुई, तो सारे शिकवे ख़त्म हो चुके थे और दोस्ती महक रही थी। बड़ी ख़ुशनुमा सी शाम थी वह। बड़े इंतज़ार के बाद आई थी। उस शाम ने यह भी सिखाया कि जब बुरा वक़्त चल रहा होता है तो इंसान किसी की जेन्यूयन बात में भी बहाना ढूँढ लेता है। दरअसल वक़्त कभी-कभी ठान लेता है कि हर तरह से तुमको निचोड़ कर देखेंगे।

हम सिडनी से चलने की तैयारी कर रहे थे और जेफ्फ़ कह रहा था- ‘जब भी ठीक नहीं लगे वहाँ तो बिंदास, बेधड़क यहाँ चले आना। किसी बुकिंग की ज़रुरत नहीं। मैं यहाँ नहीं भी हुआ, तो चाभी का इंतज़ाम करवा दूँगा।’

मन में आशा और निराशा के चितकबरे रंग लिए हम चल दिए थे मेल्बर्न की तरफ़। अजीब सी हालत थी। कभी दोस्तों पर इस तरह हक़ जताया नहीं था। समय-समय पर दोस्तों ने बहुत मदद की है।

मेरा एक्सीडेंट हुआ था तब हॉस्टल में मेरी दोस्त ने माँ की तरह मुझे महीने भर नहलाया और खाना खिलाया था। एक बार रोहिणी के एक दोस्त ने हफ़्ते भर के लिए अपने खाली घर में शरण दी थी। एक बार एक दोस्त ने अपनी बालकनी में हमारी गृहस्थी का सामान दो महीने तक बारिश पानी से सहेज कर रखा था। दिल्ली की झुलसती जून में ऑफिस से वापस आते हुए एक बार मेरे पति की तबियत अचानक बहुत बिगड़ गयी थी। तब एक दोस्त ने अपने घर में हमें ए सी वाला कमरा देकर खुद पंखे में रात बिताई थी।

दोस्तों और दोस्ती के बड़े फ़साने हैं मेरे पास, पर इस बार बात कुछ अलग थी। इतने बेबस और बेसहारा शायद हम कभी नहीं थे। न ही दोस्तों के बीच मतभेद की कोई चिंगारी ऐसे फूटी थी जैसे कि इस बार हुआ था। इस दोस्त से मैं पहली बार मिल रही थी और वह भी अकिंचन सी हालत में। इस बार मैं एक सशक्त महिला होने के साथ एक माँ भी थी।

एक माँ होना किस हद तक बेबस कर सकता है? यह ऐसे ही मौकों पर ज्यादा साफ़ दिखता है। ख़ुद तो हम परिस्थितियों और दोस्तों के हिसाब से खुद को ढाल लें पर बच्ची का? ना मैं उसे दुनियादारी की समझ दे सकूँ और ना दोस्ती में एहसान मिलने का असर बता सकूँ। उफ्फ, कितना मानसिक तनाव था? इतना कि मेल्बर्न पहुँचने पर जब बारिश ने हमारा स्वागत किया तो मुझे लगा आसमान भी रो रहा है। शायद यह संकेत है कि रुक जाओ।

लेकिन हम रुके नहीं और उस दोस्त के घर पहुँच गए। दोस्त ने जिस आत्मीयता से परितोष को गले लगाया और दोनों जिस बेतक्कुल्फी में एक दूसरे में मस्त हो गए, वह देखकर मेरा डर धीरे-धीरे समर्पण करने लगा। परितोष के मित्र ने उस दिन वर्क फ्रॉम होम ले रखा था। उस दोस्त की पत्नी भी नौकरी करती हैं। वह सुबह ही हम सबके लिए स्वादिष्ट पोहा बनाकर गयी थीं। उस दोस्त की एक छोटी सी प्यारी सी बेटी है। मेरी बेटी को उसे देखकर कैसी ख़ुशी हुई! महीने भर बाद उसे कोई बच्चा मिला था। ऐसा लगा कि सब कुछ कितना ठीक है। बिलकुल वही सब जिसकी चाहत में हम तीनों थे।

मेरे पति और मेरी बेटी को दोस्त मिल गए थे। मैं जब शाम को उनकी पत्नी से मिली तो ऐसा लगा कि मुझे भी एक दोस्त मिल गयी है। कितनी आत्मीय और कितनी प्यारी सहेली। जिस दिन हम मेल्बर्न पहुँचे, उसके अगले दिन हमारी शादी की 13वीं सालगिरह थी।

हमने उनके यहाँ खूब जमकर डांस पार्टी की और केक काटा गया। मेरी बेटी के लिए तो यह छप्पर फाड़ खुशियों की बरसात थी। महीनों से मुँह लटकाए, एक आकुलता से भरी अनिश्चितता में चल रहे थे और बर्बादियों के जश्न मनाने का ठीक-ठीक अभ्यास भी नहीं था। ऐसे में यह जश्न बड़ा ही ख़ास था। हम अकेले होते तो शायद यह भी न करते। घर पर पार्टी के बाद हम फिर रेस्तरां गए खाना खाने। उस दिन एक राज़ की बात खुली।

मुझे हमेशा कौतूहल होता था कि जेफ्फ़ रोज़ खाने की प्लेट क्यूँ गरम करता है खाने से पहले? उस दिन हम खाने की टेबल पर थे और हमारे सामने प्लेट रखी गयी गरमागरम। मैंने सवाल लिए हैरान आँखों से परितोष को देखा तो उन्होंने बताया कि डिशवाशर से अभी-अभी निकाली गयी है, इसलिए गरम है। ओह! अब मैं समझी थी। जेफ्फ़ के पास डिशवाशर नहीं था। वह होम मेड हेल्दी खाने में रेस्तरां का मज़ा लेने के लिए प्लेट गरम करता था। हम्म्म एक मुस्कान तैर गयी मेरे चेहरे पर।

मुझे अनायास ही मेरी मम्मी की एक बात याद आ गयी। मेरी मम्मी जब पहली बार पहाड़ से लखनऊ आईं तो उन्हें एक ही तरह के बताशे पता थे- मीठे बताशे। चीनी को पिघलाकर बनाये गए छोटे-छोटे गोल बताशे। लखनऊ में हमारी पड़ोसन आंटी ने एक दिन माँ से कहा कि पानी के बताशे खाकर उनका तालू छिल गया है। मेरी पहाड़ी मम्मी हैरान! मीठे बताशे में पानी डाल कर खाने से तालू कैसे छिलता है?

खैर, महीने भर बाद, संयोग से वह अपनी पड़ोसन के साथ सब्जी लेने गयी। रास्ते में पड़ोसन उन्हें एक ठेले के पास ले जाकर पूछती हैं, पानी के बताशे खाओगी? मेरी मम्मी ने हाँ की और ढूँढने लगी बताशे। वहाँ तो भूरे-भूरे, बड़े-बड़े खोखले लड्डू दिख रहे थे। हैरानी की हद तो तब हो गयी जब उसे फोड़कर उसमें उबला सफ़ेद चना और हींग मिर्च का नमकीन पानी भरकर मेरी मम्मी को मिला। वाक़ई उससे तो तालू छिल जाता है।

जैसे उस दिन मेरी मम्मी को दिव्य ज्ञान यकायक अनायास ही मिला “अच्छा! तो यह है पानी का बताशा! यानी कि गोलगप्पा।” बिलकुल वैसा ही मैं महसूस कर रही थी। अच्छा! डिशवाशर! हम्म्म। मुझे लगा मैं और मम्मी मिलकर झेंपते हुए ठहाके लगा रहे हैं। हम दोनों ही अपने-अपने समय में एक जैसे पहाड़ी और नासमझ साबित हुए। हा हा हा। मेरी बेटी भी मेरा यह कौतूहल, विस्मय याद रखेगी। शायद।

उस दिन जैसे सब दुःख दूर हो गए हमारे। ईश्वर उन तीनों पर हमेशा अपनी कृपा बनाये रखे। उनकी कमाई में हमेशा इतनी बरकत हो कि ज़रूरतमंदो को हमेशा सहारा मिल सके। सब कुछ सपने सा लग रहा था। उन्होंने बताया कि दो किलोमीटर पर एक स्कूल भी है। हम वहाँ गए और उन्होंने हमारी बेटी का दाखिला ले लिया बिना किसी दस्तावेज़ के।

यहाँ मेल्बर्न में कुछ स्कूल भी ऐसे हैं जो बिना दस्तावेज के बच्चों का दाखिला ले लेते हैं। जितनी ठोकरें खायीं थी उन सब पर कैसे मरहमपट्टी हो गयी! हम एक संपन्न घर में रह रहे थे बिना किराए के। मैंने उन्हें उनके घर खर्च में साझेदारी की बात कही तो भी उन्होंने साफ़ मना कर दिया।

हम उनके साथ एक दो घर देखने गए किराए के लिए, लेकिन किराए पर घर लेना भी एक जटिल प्रक्रिया है ऑस्ट्रेलिया में। किराए के लिए जो घर होते हैं उन्हें देखने का हफ़्ते में दो दिन शनिवार और इतवार को पंद्रह मिनट का समय बंधा होता है। आपको घर देखकर अपना आवेदन भरना होता है। आपके जैसे और भी कई लोग उसी समय घर देख रहे होते हैं। सामर्थ्य और ज़रुरत के हिसाब से मकानमालिक को थोड़ा ज्यादा किराया देकर रिझाने की कोशिश कर रहे होते हैं।

आवेदन भरने के लिए एक ऑनलाइन फॉर्म होता है। किराये पर घर मिलने के लिए मेरिट लिस्ट टाइप बनाई जाती है। जिसमें कुछ पैमानों पर आपको आँका जाता है, मसलन- आपकी नौकरी, आपकी नियमित कमाई, ऑस्ट्रेलियाई बैंक में आपके खाते में जमा राशि, ऑस्ट्रेलियाई ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, उम्र का प्रमाणपत्र इत्यादि। हमारे पास केवल पासपोर्ट और उम्र का प्रमाणपत्र था। तो जाहिर है हम सबसे कमजोर किरायेदार साबित हो रहे थे और घर हमे किसी हाल में नहीं मिलने वाला था।

हम अपने मित्र के यहाँ दो हफ़्ते रहे और फिर उन्होंने हमे एक घर दिलवाया किराए पर। यह घर क़ानूनी ढंग से किराये पर नहीं दिया जा सकता था।

लेकिन किसी इण्डियन का घर था और इण्डियन-इण्डियन खेल में हमें मिल गया। सरकार को बिना पता चले कि घर में मकानमालिक नहीं किरायेदार रह रहा है। साधारण परिस्थितियों में हम ऐसा ग़ैरक़ानूनी काम ना करते, लेकिन यहाँ आकर विवशता की हद हो गयी थी। हम किराया देने को तैयार थे लेकिन कोई हमसे लेने को तैयार नहीं था। airbnb कब तक चला सकते थे? दोस्त के घर कब तक टिके रहते?

हम बाईस जून को अपने नए किराये के घर में आ गए थे और खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहे थे। दो हफ़्ते से एहसान तले जीवन गुज़र रहा था। क़द पहले भी बहुत ऊँचा तो नहीं था लेकिन इस बोझ ने बौने होने का एहसास करा दिया था। सुबह उन दोनों पति पत्नी का नौकरी पर निकल जाना मेरे पति को अपने बेरोज़गार होने का तीखा एहसास करा देता था। हर सुबह अपने नियत समय पर एक डिप्रेस्सड ढंग से होती थी। नए घर में शिफ़्ट होने से एक तरह से आत्मनिर्भरता की तरफ़ एक बार फिर से चलने का एहसास हो रहा था हमें।

अगले दिन हमारी बेटी हमारे नए घर से पहली बार स्कूल गयी। हम तीनों पैदल चलते हुए दस मिनट में स्कूल पहुँच गए। स्कूल शुरू होने में अभी बीस मिनट थे। इस समय स्कूल पहुँचने पर ऐसा लगा कि पिछले दस मिनट में मैंने लगभग तीस साल का सफ़र तय कर लिया। मुझे अपना स्कूल सामने दिखाई दे रहा था, जहाँ बच्चे जल्दी पहुँचकर खेल रहे थे। जैसे इससे सामान्य और क्या दृश्य हो सकता है? कुछ बच्चों के माता-पिता उन्हें छोड़कर जा रहे थे तो कुछ बच्चे ख़ुद ही पैदल या सायकिल से आ रहे थे। स्कूल अपने समय से लगभग घंटा भर पहले खुल जाता है और बच्चे चाहें तो जल्दी आकर खेलें, कूदें और धूम मचाएं।

मुझे अच्छी तरह याद है कि इण्डिया में जब मैं अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने जाती थी, तो बड़ी हिदायत थी स्कूल की तरफ़ से कि बच्चे समय पर ही आयें। समय से पहले स्कूल पहुँचने पर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल की नहीं होगी। वैसे तो स्कूल ने सभी दाईयाँ और चपरासी पुलिस जाँच करवाने के बाद ही रखे हैं, लेकिन फिर भी दुर्घटना से सावधानी भली। स्कूल टाइम पर बच्चे अध्यापिका की निगरानी में, CCTV वाले रास्ते से होते हुए, CCTV वाले क्लास रूम में पहुँचा दिए जाते हैं। अब वह CCTV की गोद में सुरक्षित हैं। स्कूल में अगर किसी बच्चे को बाथरूम भी जाना है, तो दो बच्चे साथ जायेंगे। क्यूँकि वाशरूम में CCTV नहीं लगा सकते न?

छुट्टी के बाद भी अभिभावक आयें और बच्चों को सीधे घर ले जाएँ। स्कूल में खेल मैदान होता है और झूले भी होते हैं। लेकिन वह सब अभिभावकों को एडमिशन के समय रिझाने को होते हैं। बच्चे तो शायद ही कभी वहाँ खेल पाते हैं। क्यूँकि अब बच्चे केवल मांस का लोथड़ा हो चुके हैं, जिन पर गिद्धों और बाज़ों की नज़रें गड़ी रहती हैं। ऐसे असुरक्षित माहौल में बच्चों का सर्वांगीण विकास किस तरह हो रहा है? प्रभु ही जाने। सभ्यता के किस सोपान को चढ़ रहे हैं हम भारतीय? शायद कोई नहीं जानता।

यहाँ आकर मुझे स्कूल का वही पुराना अपने बचपन वाला रूप स्वरुप फिर से दिखाई दिया। यहाँ बच्चे अपना बचपन बिना डरे जी रहे हैं। कक्षाओं में कोई CCTV नहीं है। गार्ड्स पर कोई संदेह नहीं है। बच्चों के लिए स्कूल एक दूसरा घर है, जहाँ वह पूरी तरह सुरक्षित हैं।

उस दिन, हम दोनों पति-पत्नी ने वह संतोष पाया कि जितने भी कष्ट उठाये अब तक और जितने भी आगे उठाने हों, ऐसा लगा वह सब सहर्ष उठाना ही ईश्वर को धन्यवाद करने के सही तरीका है। हमारी बेटी को यही माहौल देने के लिए तो हमने अपनी मिट्टी से उखड़ने का फ़ैसला लिया था। मेरे पति में उस दिन ऐसी उर्जा और सकरात्मकता का संचार हुआ कि वह अगले कई महीनों तक यहाँ संघर्ष बिना किसी शिक़ायत और बिना किसी फ़रियाद के कर लें।

हम लोग बेटी के साथ क्लास के बाहर खड़े थे कि प्रधानाचार्य आये और नये छात्र का स्वागत किया। फिर बोले- “इट इज़ अ बिग डे फ़ॉर यू। डू यू वॉंट मी टू क्लिक अ फ़ोटो ऑफ़ यू थ्री?” और बोलते ही उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। मेरे पति के फ़ोन से हमारी फ़ोटो खींची और मेरी बेटी को लेकर उसकी कक्षा में चले गये।

हर रोज़ हम दोनों अपनी बेटी को स्कूल छोड़कर आते और फिर मेरे पति अपनी पढ़ाई में लग जाते। सिडनी के दोस्त ने जो नयी बातें बताई थी नौकरी के बारे में उनपर अमल किया। यह उसी सलाह का और मेरे पति की ईमानदार कोशिशों का नतीजा था कि जून होने के बावजूद मेरे पति को सिडनी, मेल्बर्न और ब्रिस्बेन से इंटरव्यू के बुलावे आने लगे। मेरे पति का खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से जाग उठा और उन्होंने पूरे उत्साह से अपनी तैयारी और तेज़ कर दी।

जगह बदलना किस तरह दुनिया को बदल देता है यह जानना हो तो सबसे बड़ी घुमक्कड़ “पृथ्वी” को देखना चाहिये। घूमती हुई किसी जगह पहुँचती है, तो पेड़ों पर पतझड़ होता है। और जब घूमती हुई एक ख़ास जगह पर पहुँचती है तो पौधों पर फूल खिल उठते हैं और धरा रंग और ख़ुशबू से नहा उठती है। इस बदलाव के लिए पृथ्वी सतत गतिमान रहती है। हमने भी जगह बदली तो दुनिया में बदलाव लाज़मी था, लेकिन अब समय रंग और ख़ुशबू का था।

दस जुलाई को मेरे पति को उनकी पहली नौकरी मिली। यह एक कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी थी। साथ में जो दोस्त आये थे इण्डिया से और जो उनसे भी दो चार महीने पहले से आये हुए थे, वो सब अभी भी बेरोज़गारी के दौर से गुज़र रहे थे। लोग यहाँ पिछले सात महीनों से बिना नौकरी के संघर्षशील थे। एक जानकार दस महीने के संघर्ष के बाद इण्डिया लौट गये। यह सब जानने के कारण हमारी मन:स्थिति ऐसी थी कि हम दोनों को जब फ़ोन पर यह सूचना मिली तो हम दोनों एक दूसरे को देखते रहे। न ख़ुशी न गम। बस गुमसुम। यक़ीन नहीं हुआ कि जो सुना है वह सच है।

मेरे पति ने कहा- ‘मेल आने दो। फिर…।’ मैंने भी गंभीरता से हामी भरी। तीन दिन तक हम इस ख़बर को अपने मन में लिए रहे। किसी को नहीं बताया। अपने मम्मी पापा को भी नहीं। पहले तसल्ली तो कर लें कि ठीक सुना था। वो तीन दिन कितने लम्बे थे यह हम ही जानते हैं।

तीन दिन बाद उन्होंने मेरे पति को ऑफिस बुलाया और कुछ जानकारियां मांगी। इन जानकारियों की पुलिस जाँच होने के बाद ही कॉन्ट्रैक्ट पेपर मिलने थे। वैसे तो जीवन में कभी कुछ ऐसा किया नहीं कि इस जाँच में कुछ गलत आता लेकिन फिर भी हमारे मुस्कुराने की कोशिश करते होंठों पर हमारी ही शक की गंभीर नज़रें पड़ती और होंठ सिमट जाते। पुलिस की जाँच में पंद्रह दिन लग जायेंगे ऐसा पता चला था।

पाँच दिन बाद मैंने अपने पति से कहा- ‘घर पर सब परेशान हैं हमें लेकर। उन्हें बता देते हैं।’

मेरे पति बोले- ‘यार कुछ अटक गया तो उन बुड्ढों को फिर ओवर एक्टिंग से रोक नहीं पाओगे। पता नहीं BP कहाँ जायेगा उनका? संभाल पायेंगे वह?’

अजब सा असमंजस था। हम ख़ुद इतने धक्के और हिचकोले खा चुके थे इन ढाई महीनों में कि हर बात से डर लगता था। ख़ुद माता-पिता हैं, तो बच्चे को परेशान देखकर कैसी मनोदशा होती है यह भी अच्छी तरह जान गए थे। सबसे बढ़कर यह कि हम अपने बच्चे के लिए कुछ कर नहीं सकते, ये असमर्थता और मायूसी कितनी घातक छुरी होती है इसका अनुभव ले चुके थे। दुःखी रहना, शांत रहना अगर लम्बा खिंच जाए तो शायद उतना नहीं रुलाता जितना कि बीच में किसी उम्मीद का आना और फिर लुप्त हो जाना दुःख को और घनीभूत कर देता है। मेरे पति हमारे बुड्ढे माता-पिता को इसी घनीभूत पीड़ा से बचाने के लिए उन्हें बताना नहीं चाहते थे नौकरी की अधपकी बात।

हम दोनों तो किसी तरह इस बात को हज़म कर लेंगे आख़िर ये फ़ैसला हमारा था तो परिणाम की भयावहता भी हमें ही उठानी होगी। लेकिन जिन बूढ़ों ने हमें रोकने की भरपूर कोशिश की थी और हमारा मार्गदर्शन की कोशिश की थी उन्हें किस बात की सज़ा देते हम?

कितने भी बड़े और समझदार हो जाएँ हम, लेकिन मन का एक कोना हमेशा बच्चा बने रहना चाहता है। हमेशा अपने माँ-पापा का स्नेह भरा हाथ अपने सिर पर चाहता है। वो पैर चाहता है जिन्हें पकड़कर बैठे तो लगे कि दुनिया हमारी पकड़ में है। वो आवाज़ सुनना चाहता है जो कहे बेटा सब ठीक हो जाएगा। माता-पिता बूढ़े और अशक्त हो जाएँ तो भी मन में उनकी वो सशक्त और पालनहार छवि धुँधली नहीं होती। जब मन बहुत डरा हुआ हो तो उन्हीं की गोद में मुँह छुपा लेने को मचलता है। हमारी समझदारी पर भी हमारा बचपन हावी हो गया और कुछ देर बाद मेरे पति ने अपने घर पर बताया और मैंने अपने घर पर।

हम दोनों के मम्मी पापा की आवाज़ें बता रही थीं कि इस ख़बर का उन्हें कब से इंतज़ार था। हम लोग सामने होते तो शायद वह हमें मारे ख़ुशी के चूम ही लेते। मन बल्लियों उछल रहा था उनका। ढेरों आशीर्वाद दिए उन्होंने और फिर वही जो मेरे पति ने कहा था- “हाई BP” चिंता शुरू उनकी।

“बेटा, यह पुलिस इतना टाइम क्यूँ लेती है? तब तक किसी और को तो नहीं मिल जाएगी यह नौकरी?” ऐसे ही और कई सवाल।

पर कुछ भी कहिये उस दिन हमने जाना कि ख़ुशी पूरी होना क्या होता है। अकेले तो हम मुस्कुरा भी नहीं पा रहे थे और मम्मी-पापा को बताते ही कैसे सारा बोझ सा उतर गया। हम निर्भीक ढ़ंग से मुस्कुरा रहे थे। हम खुश हो रहे थे।

कुछ ही समय में मेरे पति को तीन परमानेंट नौकरी ऑफर हो गयीं। ईश्वर की असीम कृपा रही और सब कुछ बेहतर हो गया। कोरोना लॉक्डाउन से पहले मेरे पति रोज़ ऑफिस जाते थे। जिस रूटीन को वह तरस गए थे। वह उन्हें मिल गया है। ऑफिस जाते हुए लोगों को कैसी हसरत से देखते थे मेरे पति? यह मैंने उन तीन महीनों के दौरान देखा था। अब जीवन गाड़ी वापस पटरी पर आ गयी है।

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हेमा बिष्ट

हेमा बिष्ट

हेमा अभी मेल्बर्न में रहती हैं और प्रतिष्ठित पुरस्कार "Orange Flower Award 2021 for writing with social impact" की विजेता हैं। लेखन के अलावा हेमा गाने और क़ुदरत की ख़ूबसूरती को कैमरे में क़ैद करने की शौक़ीन हैं।
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