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69 Comments

  1. राजीव रोशन
    May 3, 2018 @ 10:38 pm

    कहानी बेहतरीन है।।भाषा शैली भी गजब पकड़ के साथ है। स्थान एवं भौगोलिक स्थितियों का शानदार इस्तेमाल किया है। किरदार भी बेहतरीन चुने हैं।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:16 pm

      धन्यवाद राजीव जी।

  2. दिग्विजय सिंह
    May 3, 2018 @ 10:47 pm

    बेहतरीन कहानी….एक बार शुरू करने के बाद तो जैसे लेखक के दिखाए दृश्यों में खो जाता है पाठक…भाषाशैली सहज आंचलिक है जिसपर लेखक की बेहतरीन पकड़ है , किरदार भी बहुत बढ़िया से चुने गए है, कहानी अपने सरल प्रवाह में कई जटिल मुद्दों को छूती है, बाकी कोतवाल साहब सब पर भारी हैं….कोतवाल साहब जिंदाबाद

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:17 pm

      दिग्विजय जी धन्यवाद
      आपकी टिप्पणी मेरे लिए उत्साह वर्धक है।

  3. vickky
    May 3, 2018 @ 11:09 pm

    बेहद मस्त कहानी ??

  4. vickky
    May 3, 2018 @ 11:15 pm

    मस्त कहानी ?? सजनो के सजन

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:20 pm

      ☺☺?? धन्यवाद

  5. Raghvendra Singh
    May 3, 2018 @ 11:45 pm

    ग़ज़ब की किस्सागोई । बनारस का होने के कारण एक अलग सा अपनत्व लगा । मुख्यमंत्री से परिचय और उनसे मिलकर बाहर निकलने के बाद का विवरण सचमुच जान डाल देता है । बेहद सजीव चित्रण है रामलखन सिंह का और क्या अंदाज है उनके न्याय का ।
    लेखक को नमन साधुवाद , अरसे बाद एक दिल को छू लेने वाली , गुदगुदाती कहानी परोसने के लिये

  6. वेद प्रकाश
    May 4, 2018 @ 12:18 am

    बेहतरीन

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:21 pm

      धन्यवाद वेद जी

  7. राशीद
    May 4, 2018 @ 1:13 am

    एक बार में पठनीय कहानी, लेखक श्री यादव जी को साधुवाद । कहानी का प्रवाह अद्भुत रहा, कोतवाल साहब ने दिल जीत लिया । लेखक की अन्य कहानियों की प्रतीक्षा रहेगी ।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:22 pm

      धन्यवाद राशीद जी

  8. मनी चहल
    May 4, 2018 @ 6:01 am

    सिस्टम का बहुत ही सटीक वर्णन किया है। कोतवाल साहब छाये हूए है पूरी कहानी मे। बहुत दिलचस्प कहानी।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:23 pm

      धन्यवाद चहल जी

  9. alok verma
    May 4, 2018 @ 7:07 am

    बेहतरीन

  10. Hareesh Gupta
    May 4, 2018 @ 8:09 am

    वाह… बहुत ही बढ़िया।
    हल्की फुल्की मनोरंजक कहानी, बांधे रखती है। चरित्रों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया गया है। कोतवाल रामलखन तो ग़ज़ब के किरदार हैं। किसी भी किरदार से अरुचि नही होती, पूरी कहानी पढ़ने के दौरान एक आनंद का भाव बना रहा। शानदार

  11. Hareesh Gupta
    May 4, 2018 @ 8:23 am

    सिस्टम पर बड़ी ही सरल भाषा में गहरा कटाक्ष किया गया है।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:24 pm

      ☺?? धन्यवाद गुप्ता जी

  12. अनूप कुमार शर्मा
    May 4, 2018 @ 8:41 am

    आज बहुत समय पश्चात कोई अच्छी हिंदी कहानी पढ़ने को मिली है। लेखक बहुत बहुत शुभकामनाओं व सराहनाओं के पात्र हैं। उम्मीद है कि आगे भी उनकी लेखनी की मिठास व जीवन के सबक ऐसे ही मिलते रहेंगे…

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:25 pm

      ☺?? धन्यवाद , आपकी बातें मेरे लिए प्रोत्साहन का कार्य करेंगी।

  13. Harishanker
    May 4, 2018 @ 8:56 am

    बहुत ही उम्दा। ऐसा लग जैसे में स्वयं कहानी का पात्र हूँ। जिस जीवंतता से कहानी का वर्णन हुआ है, असल कोई जवाब नहीं।
    ढेरों बधाइयाँ।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:25 pm

      ☺?? धन्यवाद

  14. Vidyadhar Yagnik
    May 4, 2018 @ 9:55 am

    एकदम ज़ोरदार

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:26 pm

      ☺?? धन्यवाद याज्ञिक जी

  15. शरद श्रीवास्तव
    May 4, 2018 @ 9:59 am

    कथ्य और शिल्प के साथ साथ समकालीन विसंगतियों को समेटे हुए एक बहुत ही उम्दा कहानी। कुन्दन जी का नाम पहली बात सुना लेकिन ऐसे ही लिखते रहें। कहन शैली जैसे कि प्रेमचंद की परंपरा हो और सरल शब्दावली में यूपी का पुलिसिया अंदाज़ बहुत ही बेहतरीन है। कोतवाल साहब द्वारा मुख्यमंत्री महोदय से सभी का बढ़ा चढ़ा कर परिचय कराना और फिर मौलाना के प्रतिवाद पर कोतवाल साहब का कथन:- तो का बताते बे? सर ये सड़क छाप मौलवी है। कुंजड़ों की बस्ती के मदरसे में अलिफ बे ते सिखाता है…….. । कोतवाल साहब का यह बेधड़क अंदाज़ हमेशा याद रहेगा। लेखक को उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग का काफी सूक्ष्म अनुभव प्रतीत होता है। साधुवाद

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:27 pm

      ☺?? बहुत धन्यवाद श्रीमान।

  16. अरुण कुमार
    May 4, 2018 @ 10:13 am

    हिन्दी साहित्य से कट रहे पाठकों को पुनः हिन्दी की तरफ खींच लाने वाली कहानी। व्यवस्था का सहज, सरस और सटीक चित्रण।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:27 pm

      क्या बात है अरुण जी। इस कमेन्ट का शुक्रिया।

  17. PUNEET KUMAR DUBEY
    May 4, 2018 @ 10:31 am

    bahut hi umda kahani laga hi nahi ki ye kalpnik kahani Kundan ji ko bahut bahut dhanyavad

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:28 pm

      बहुत ही सुंदर कमेन्ट। धन्यवाद

  18. Nar Singh
    May 4, 2018 @ 10:40 am

    वर्तमान स्थिति में पुलिस और नेताओं के संबंधों की बानगी प्रस्तुत करती एक फुलब्राइट स्कालर की रोचक कहानी।आज भी पुलिस इंस्पेक्टर राम लखन सिंह जैसे पात्र ढूंढने पर मिल जांयेंगे।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:29 pm

      ☺?? धन्यवाद जनाब। बड़ी बात कही आपने।

  19. वीर
    May 4, 2018 @ 10:41 am

    उम्दा !!! समय के अनुकूल और आज के हालात पर चोट करती . कुन्दन को ढेर सारी बधाई.
    अगली कहानी का भी इंतज़ार होगा .

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:32 pm

      वीर जी ☺?? धन्यवाद

  20. R.A.MEENA
    May 4, 2018 @ 12:41 pm

    Nice story this is reality in our society
    Thanks

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:33 pm

      बहुत ही सूक्षम दृष्टि। धन्यवाद

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:34 pm

      बहुत ही सूक्षम दृष्टि धन्यवाद

  21. परमजीत
    May 4, 2018 @ 1:42 pm

    शानदार। गजब की भाषा शैली और प्रस्तुतिकरण।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:34 pm

      ☺?? धन्यवाद परमजीत भाई

  22. निशि कान्त
    May 4, 2018 @ 1:54 pm

    बहुत ही बढ़िया कहानी , पुलिस के काम करने के तरीके का सजीव चित्रण की कैसे खाने के लिए सब कुछ ले लेना और साथ में दुत्कारना और मंत्री जी के सामने छोटे लोगो का परिचय बढ़ा चढ़ा के देना और काम हो जाने पर अपनी रंगत दिखाना, कोतवाल साहब का ये रौब तथा होटल का बिल काम करने के लिए घूमने के लाजवाब उपाय। लिखने का सलीका ऐसा जैसे की हम अदृश्य हो के सारी घटना से हूबहू हो रहे हो।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:35 pm

      निशिकांत। आपने बड़ी बात कह दी।

  23. Aravindakshan G
    May 4, 2018 @ 2:25 pm

    Kya baat hai . Very well written. Glimpses of Sri Lal Shukla ji. Keep it up.

  24. अनुराग
    May 4, 2018 @ 2:28 pm

    एक बेहतरीन व्यंग्य…..परसाई व शुक्ल साहब के नक़्शे क़दम पे? ऐसे ही लिखते रहिए यादव जी।

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:32 pm

      ☺?? धन्यवाद अनुराग जी

  25. कनु वर्मा
    May 4, 2018 @ 2:30 pm

    अरे कुन्दन भाई ! मजा आ गवा
    मुंह में कचोड़ी जलेबी का स्वाद !
    ओर समसदवा का बाटी चोखा मटन!
    कोतवाल साहब का तरीका बहुत पसंद आया
    लिखते रहें!

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:32 pm

      ☺?? धन्यवाद मैडम

  26. आनंद कुमार सिंह
    May 4, 2018 @ 2:39 pm

    गजब की कहानी। मजा आ गया। क्या भाषा, क्या पकड़। लाजवाब।

  27. सुनील कुमार
    May 4, 2018 @ 2:55 pm

    लाजवाब कुन्दन!??

  28. Sunil Yadav
    May 4, 2018 @ 2:57 pm

    Kundan. You hit the bull’s eye. Maza aa gaya.

  29. mahendra singh
    May 4, 2018 @ 3:01 pm

    इतने हलके फुलके अंदाज़ में इतनी शानदार कहानी
    पढ़ते हुवे दिलो दिमाग से कोई बोझ सा हटता हुआ महसूस होता है
    कथा प्रवाह बहुत सहज गति से अपनी यात्रा करता है और पाठक को अपने साथ बहा ले जाता है और फ़िर उतनी ही नजाकत से वापिस किनारे पे उतार देता है

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:31 pm

      ☺?? धन्यवाद

  30. Raghavendra
    May 4, 2018 @ 3:07 pm

    Kundan ji, Ramlakhan daroga kee kahani bahut mast likhi hai aapne…Plz continue to write….

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:30 pm

      ☺?? धन्यवाद राघवेन्द्र जी

  31. सुरेन्द्र सिंह
    May 4, 2018 @ 3:13 pm

    पुलिस विभाग की 18 साल की दारोगा की नौकरी में मैंने कई रामलखन जैसे चरित्र देखे लेकिन यह वास्तव में बेजोड़ है। इस कहानी से मुझे पुलिस की कई बातों का खुलासा हुआ। आजकल के नेतागिरी और पुलिस तथा मीडिया के गठजोड़ को समग्रता से यह कहानी चित्रित करती है। किसी वरिष्ठ अधिकारी के ऐसे अनूठे लेखन से आश्चर्य हुआ। धन्यवाद श्रीमान

    • कुन्दन यादव
      May 4, 2018 @ 3:30 pm

      ☺?? धन्यवाद एसएचओ साहब।

  32. राजकुमार सिंह
    May 4, 2018 @ 4:41 pm

    बहुत ही शानदार कथा। उत्तर प्रदेश के हर पुलिस स्टेशन में ऐसे रामलखन मिल जाएंगे। बहुते व्यावहारिक हैं सभी पात्र। धर्म, जाती, राजनीति, प्रशासन, मान्यताएँ और मानवीय कमजोरियों का मणिकांचन संयोग है। हम भी बनारसी ठहरे सो कहेंगे की एकदम चकाचक हौ गुरु।

  33. Kul Bhushan Chauhan
    May 4, 2018 @ 6:30 pm

    कमाल कहानी है.
    एक ही बार में पढ़ ली.
    बिना पूरी पढ़े रहा नहीं गया.
    कमाल का करैक्टर है कोतवाल राम लखन सिंह.
    बधाई.

  34. पराग डिमरी
    May 4, 2018 @ 6:58 pm

    श्रीलाल.शुक्ल जी को स्मरण करा दिया।
    गजब की कथा,गति और दिलचस्पी. है चना. मे।
    सोचने के लिए बहुत. देर तक. मस्तिष्क में घटनाएं घूमती रहेंगी।
    लेखक का आभार आधुनिक. हिंदी लेखन पर।

  35. दीपक मौर्य
    May 4, 2018 @ 8:53 pm

    बढ़िया कहानी। कई जगह पर कोतवाल साब मुस्कुराने पर मजबूर करते है पर उनका असिस्टेंट उसके योगदान को भी न भूला जाए। कहानी up की होने से एक अलग सा अपनत्व लगा। बढ़िया अगली कहानी का इंतज़ार रहेगा।

  36. Pramod Singh lushwah
    May 5, 2018 @ 1:33 pm

    Behad samsamyik. Laga ki Rag Darbari ka naya aur laghu Roop padh reha Hoon.
    Lilhte rahein Yuhin

  37. Eeshita
    May 5, 2018 @ 4:07 pm

    लेखक की रचना एक प्रकार से आज कि प्रशासनिक गतिविधियों का संक्षेप में वर्णन है। बहुत ही उम्दा कहानी। शुभ कामनाओं सहित। अगली रचना के इंतजार में।

  38. संदीप शुक्ला
    May 6, 2018 @ 12:04 pm

    मुझे तो कोतवाल रामलखन सिंह के किरदार में मनोज बाजपेयी नज़र आये… परमहंस के किरदार में राजपाल यादव.

  39. सच्चिदानंद
    May 7, 2018 @ 9:05 am

    कहानी मजेदार दमदार एवं रसदार है, कहानी में आंचलिकता एवं सटीकता का जो संगम मिलता है वो महान कथाकार प्रेमचंद की इयाद दिलाता है, यह कहानी वर्तमान समय में राजनीति एवं पुलिस के संबंधों को भी बताता है, आपकी लेखनी से ऐसे ही रचनाओं का सृजन होते रहे, धन्यवाद महोदय ….

  40. श्रीधरम
    May 17, 2018 @ 4:03 pm

    कुंदन जी के पास अनुभव का विस्तृत दायर है और समृद्ध भाषा की ताकत भी, रोचकता उनकी कहानी को गतिमान बनाती है। पाठक को और क्या चाहिए। बहुत बहुत बधाई।

  41. Amrendra Nath Tripathi
    May 17, 2018 @ 11:58 pm

    रोचक अंदाज में सुन्दर कहानी कही है। लोकानुभव से समोयी। अच्छा लगा पढ़ कर। आगे भी ऐसे अवसर आते रहें।

  42. Prakash Patel
    May 21, 2018 @ 6:23 am

    Good job

  43. संदीप शुक्ला
    December 23, 2018 @ 1:05 am

    कहानी के बारे में बाद में कहूंगा…लेकिन अगर इसे कभी celluloid पर उकेरा जाता तो कोतवाल साहब के किरदार के लिए ओम पुरी से बेहतर कोई नही होता..कोतवाल साहब का दबंग किरदार मन को छू गया, परमहंस जैसा चेला मिलना मुश्किल आजकल के दौर में.

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