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उस उमस एवं गर्मी से भरी मई के महीने में, शाम 5 बजे, सुब्रोजित बासु उर्फ़ मिकी, तीसरे क़त्ल की तैयारी कर रहा था। क़त्ल करते रहना कितना खतरनाक हो सकता है, उसे इस बात का पूरी तरह एहसास था। हालांकि पहले दो क़त्ल उसने खुद नहीं किये थे परंतु परोक्ष रूप में उन दोनों कत्लों में उसका पूरा हस्तक्षेप था। उसकी नजरों में उसकी आज की योजना पूरी तरह फूलप्रूफ थी लेकिन वक़्त और नसीब कब किसको धोखा दे दें, वो इस बात से कतई बेख़बर था।

13 मई मेरे लिए आखिरकार खुशकिस्मत दिन साबित हुआ था, इस दिन मैंने बतौर प्राइवेट डिटेक्टिव अपनी जिंदगी का पहला केस सॉल्व किया था। एक महीने की भागदौड़ से अंततः मुझको निजात मिल ही गयी थी। कुल मिलाकर करीब पचपन हज़ार रुपये मैंने अपने क्लाइंट से इस केस में वसूले थे। अगर खर्चे को निकाल दिया जाए तो भी तीस हज़ार रुपये बचत, पहले केस की एवज में कोई घाटे का सौदा नहीं था। मेरी प्राइवेट टीचिंग की जॉब से तो काफी अच्छा था, जो मैंने अभी दो महीने पहले ही छोड़ी थी, बशर्ते हर महीने कोई केस मिलता रहे। चूँकि आज कोई काम नहीं था इसलिये आज मेरा शाम तक आराम करने का मन था और देर शाम मथुरा के प्रसिद्ध मंदिरों का दर्शन करने का भी मन था। फिलहाल घडी में पाँच बजे हुए थे और मई के महीने की उमस मेरे होटल के कमरे में चलता हुआ फटेहाल AC भी कम नहीं कर पा रहा था। मेरे क्लाइंट की मार्फ़त इस होटल का अगले दिन बारह बजे तक का किराया एडवांस में चुकता था। महोली रोड पर स्थित गोवर्धन पैलेस नामक ये होटल एल शेप में बनी हुई औसतन तिमंजिला इमारत थी जो मुख्यतौर पर एक मैरिज होम थी। लेकिन इसकी दूसरी और तीसरी मंजिल बृजदर्शन को आये मुसाफिरों के लिए भी उपलब्ध थीं। मैं इस होटल के प्रवेशद्वार के दायीं तरफ तीसरी मंजिल स्थित एक कमरे में बैठा तीसरी बियर चुसक रहा था जो कि इस उमस भरे मौसम में मुझे गर्मी से फौरी तौर पर राहत दे रही थी। गर्मी की वजह से खाना खाने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी जो थोड़ा बहुत मैं खा रहा था वो बस बियर के साथ आये स्नैक्स थे। वक्तगुजारी के लिए मैं अपने कमरे की खिड़की पर बैठा अपनी शक्तिशाली दूरबीन से बाहर के नज़ारों का अवलोकन कर रहा था। आसमान में अचानक पीले बादल आ गये थे जो कुछ देर में आने वाली आँधी का घोतक थे। मैंने घड़ी पर निगाह डाली तो अभी 5:30 ही हुए थे। बाहर हवा तेज हो चुकी थी जो कमरे की बंद खिड़की की वजह से मेरे लिए बेअसर थी। हल्की-हल्की बूँदाबाँदी भी शुरू हो चुकी थी। दूरबीन से बाहर झाँकते हुए अचानक मेरी निगाह होटल के प्रवेशद्वार से निकलते हुए एक महिला और पुरुष पर पड़ी जो कि बूँदाबाँदी की वजह से गेट पर कुछ देर खड़े रहे थे। बूँदाबाँदी अब हल्की बारिश में तब्दील हो चुकी थी जिसकी वजह से धूल अब बहुत कम उड़ रही थी। बाहर का दृश्य अब बिल्कुल साफ नजर आ रहा था। महिला के पैर बता रहे थे कि वो दोनों शायद पति-पत्नी थे।  महिला सफ़ेद सूट में थी जिसका दुपटटा उसने आँधी की वजह से अपने चेहरे पर लपेटा हुआ था जबकि पुरुष गोल गले की काली टीशर्ट और जीन्स में था उसकी कद-काठी और बलिष्ठ शरीर उसके रेसलर होने की चुगली कर रहा था। उन दोनों में एक बहस हो रही थी। हल्की बारिश में ही उन्होंने बाहर निकलना उचित समझा। उनकी मंजिल शायद होटल की पार्किंग थी जो कि होटल की मुख्य बिल्डिंग से करीब 150 मीटर दूर थी। मुख्य बिल्डिंग के सामने एक 150 मीटर लंबा लॉन था जो कि शादी वगैरह में सामूहिक भोज के काम आता होगा। राहदारी पर चलते समय उन दोनों में अनबन साफ़ नज़र आ रही थी। मेरी दिलचस्पी उनकी अनबन में नहीं बल्कि उस चेहरे में थी जो कि अब भी दुपटटे से आधा ढका हुआ था। अपनी दूरबीन में नजर गढ़ाए मैं केवल उस एक अदद चेहरे को देखने के लिए ही उन दोनों पर निगाह बनाये हुए था। दूरबीन की क्वालिटी की बाबत मुझे आज पता चला था। 150 मीटर की दूरी के बाबजूद भी मुझे वो दोनों और उन दोनों के बीच होती अनबन साफ़ दिखाई दे रही थी। वो दोनों पार्किंग में खड़ी अपनी कार में बैठ गए लेकिन अगली चार या पाँच मिनट तक कार वहां से टस से मस नहीं हुई। बारिश अब पहले से तेज हो चुकी थी। अचानक कार का पेसेंजर सीट वाला दरवाजा खुला और महिला कार से उतरकर सीधा होटल की ओर तेजी से दौड़ी चली आ रही थी। उसके दौड़ने की वजह या तो तेज बारिश में भीगने से बचना या उन दोनों के बीच की अनबन का झगड़े में तब्दील हो जाना थी, मेरे लिए कहना मुहाल था। दुपटटा अभी भी उस महिला के बालों और चेहरे को ढके हुए था। गेट तक आते-आते वो बारिश से पूरी तरह तर हो चुकी थी। अपनी शक्तिशाली दूरबीन की वजह से मुझे गीले सूट से चिपका हुआ उसका अन्तःवस्त्र भी साफ़ नज़र आ रहा था लेकिन अफ़सोस कि लगातार इतनी देर से देखते रहने के बाबजूद भी मैं उसका चेहरा देखने से महरूम रहा। महिला गेट से अंदर आ गयी थी उधर जब मैंने उनकी कार की तरफ नजर घुमाई तो कार को वहाँ से नदारद पाया।

दूरबीन वहीं एक तरफ रखकर मैंने जब घड़ी की तरफ निगाह डाली तो 5:45 का समय हो चुका था। इधर मेरी तीसरी बियर भी ख़त्म हो चुकी थी और उसका असर अब मुझ पर होने लगा था। मेरे मन में नहाने का विचार आया। कुछ देर अपने मोबाइल में जरूरी नोटिफिकेशन चैक करने के पश्चात् मैं सीधा अटैच्ड बाथरूम में दाखिल हो गया। फ्रेश होकर और नहाकर जब मैं बाथरूम से निकला तो बियर का असर कुछ कम हो गया था। आदतन निगाह जब घडी पर पहुंची तो 6:25 का समय था।

चूँकि कमरे से फिलहाल बाहर जाने का मेरा कोई मन नहीं था इसलिए मैं लोअर और टीशर्ट पहन ही रहा था कि अचानक नजदीक ही कहीं बजते पुलिस के सायरन ने मेरा तुरंत ध्यान खींचा। खिड़की से बाहर देखने पर मैंने पाया कि होटल के प्रवेशद्वार के बायीं तरफ थोड़ी दूर एक भीड़ जमा थी और उसके ऊपर दूसरी मंजिल पर एक खिड़की पूरी खुली हुई थी। वहीँ राहदारी में एक एम्बुलेंस भी खड़ी थी।मेरा मन एक अंजान आशंका से लरज गया। आनन फानन मैंने जीन्स और टीशर्ट पहनी, जैसे तैसे संवर सके अपने बाल सँवारे और तुरन्त नीचे की ओर भागा। नीचे पहुँच कर मुझे मालूम चला कि दूसरी मंजिल से एक महिला ने कूदकर ख़ुदकुशी कर ली है एम्बुलेंस के साथ आये डॉ ने उसकी मौत की पुष्टि की है। बारिश अब थम चुकी थी। भीड़ के नजदीक पहुँचने पर मुझे मालूम चला कि पुलिसवालों ने लाश का पंचनामा वगैरह करके लाश को एम्बुलेंस में रखवा दिया है ताकि जल्द से जल्द पोस्टमॉर्टम हो सके। लोकल पुलिस इसे सीधा सादा ख़ुदकुशी का केस मान चुकी थी। लोकल थाना नजदीक ही था इसलिए एक खबर पर पुलिस और एम्बुलेंस तुरंत वहाँ पहुंची थीं। मुझे मृतका की एक झलक तक नसीब नहीं हुई अलबत्ता गिरने की जगह पर थोड़ा खून जरूर नजर आ रहा था। वहीँ थोड़ी सी पूछताछ के बाद मुझे पता चला की लाश की शिनाख्त हो चुकी है और मृतका उसी होटल में अपने पति के साथ ठहरी हुई थी। मृतका का नाम प्रिया बासु था और उसके पति का नाम मिकी बासु था जो कि दिल्ली से मथुरा दर्शन के लिए आज ही आये थे। ठीक छः बजे मृतका ने अपनी खिड़की से छलांग लगाई है लेकिन उसे गिरते हुए किसी ने नहीं देखा। लॉन की घास काटने वाले माली ने जब उसके जमीन से टकराने की आवाज सुनी तो उसने सबको बुलाया। मृतका के पति को फोन किया जा चुका था। तभी राहदारी में एक कार दाखिल हुयी जिसे मैंने तुरंत पहचाना। ये वही कार थी जो अभी पैंतालीस मिनट पहले मेरी नजर के दायरे में थी यानि दोनों में झगड़ा इतना बढ़ गया था कि नौबत ख़ुदकुशी तक आ गयी थी। अपनी कार से उतर कर मृतका का खाविंद सीधा वहां मौजूद पुलिस अफसर के पास पहुँचा और पूछताछ करने लगा। उसके चेहरे पर फटकार बरस रही थी। अफसर की वर्दी पर लगे दो सितारे और उसके हाव-भाव दर्शा रहे थे कि वो नया भर्ती हुआ सब इंस्पेक्टर है। उसकी नेम प्लेट से मैंने उसका नाम पढ़ा ‘श्रीकांत गौतम’। नाम से मेरे जेहन में एक घंटी बजी…मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा और तुरंत पहचाना, ये तो मेरा पढ़ाया हुआ छात्र है। फेस बुक के माध्यम से मुझे पता तो था कि श्रीकांत पुलिस अफसर बन चुका है लेकिन उससे एक अर्से बाद मेरी मुलाकात ऐसे माहौल में होगी ये मेरी कल्पनाओं से परे था। मुझे अंदर ही अंदर एक ख़ुशी हुई। करीब पंद्रह मिनट तक मृतका का खाविंद श्रीकांत से उलझा रहा। जैसे ही श्रीकांत उससे फारिग हुआ मैं श्रीकांत के नजदीक पहुँचा। उसने मुझे तुरंत पहचाना और अभिवादन स्वरुप अपनी गर्दन हिलायी।

“और श्रीकांत कैसे हो?” मैंने उसके अभिवादन को स्वीकार करते हुए उससे पूछा।

“आपका आशीर्वाद है सर, बिल्कुल मज़े में हूँ। लेकिन आप यहाँ कैसे?”

जवाब में मैंने उसे वहां अपनी मौजूदगी की वजह तफ्सील से बतायी साथ में यह भी बताया कि अभी कुछ देर पहले मियाँ बीबी के बीच हुए झगडे का मैं चश्मदीद था। फिर इस घटना के बारे में मैंने श्रीकांत से पूरे तथ्य जानने चाहे।

श्रीकांत ने मुझे अपने साथ आने का इशारा किया। मैं, श्रीकांत, मिकी और दो सिपाही हम सब ऊपर दूसरी मंजिल पर स्थित मिकी के कमरे पर पहुँचे। कमरा अंदर से लॉक था। मास्टर चाबी से खुलवाने पर कमरा बिल्कुल सही हालत में पाया गया। प्रिया का दुपट्टा वहीँ बेड पर पड़ा था। कमरे में एक सरसरी नजर डालने के बाद हम सब नीचे आ गए। मिकी अपनी गाड़ी में सवार होकर एम्बुलेंस के पीछे चला गया।

फिर श्रीकांत ने केस की बाबत मुझे जो बताया वो संक्षिप्त में इस प्रकार था।  मृतका और उसका शौहर आज दोपहर को ही मथुरा और वृन्दावन घूमने दिल्ली से आये थे। शौहर का नाम सुब्रोजित वासु था लेकिन उसके जानने वाले सब उसको मिकी के नाम से पुकारते थे। उसकी दिल्ली में एक गारमेंट शॉप थी। मिकी एक राष्ट्रस्तरीय रेसलर भी था और रेसलिंग में कई व्यक़्क्तिगत पदक भी जीत चुका था। प्रिया आजकल कुछ डिप्रेसन में थी जिसकी वजह से वो उसे घुमाने लाया था। होटल से दोनों शॉपिंग के लिए निकल रहे थे कि दोनों में अचानक झगड़ा शुरू हो गया और कार तक पहुँचते ही झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रिया कार से उतर कर होटल में आ गयी और मिकी अकेला ही शॉपिंग के लिए निकल गया। फ़ोन पर उसे पता चला कि प्रिया ने खिड़की से कूदकर ख़ुदकुशी कर ली है तो वो तुरंत यहाँ लौट आया।

“तुम्हारा विवेक क्या कहता है?” मैंने श्रीकांत से जानना चाहा।

“सर, सीधा सा ख़ुदकुशी का केस है और सारी चीजें कल पोस्टमॉर्टम के बाद साफ़ हो जाएंगी।”

“ख़ुदकुशी करने वाले कभी दूसरी मंजिल से छलांग नहीं लगाते।” मेरे इतना कहते ही मुझे उसकी निगाहों में शंशय की एक हल्की सी झलक प्रतीत हुयी। तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी, उसने फोन उठाया और बात करने लगा। बात करने के बाद उसने मुझे बताया कि उसके एक अफसर का फ़ोन था तो उसे फ़ौरन जाना था। उसने अपना फोन नम्बर मुझे दिया और मेरा नम्बर अपने फ़ोन में सेव करके कहा। “सर इस केस पर आपसे कल चर्चा करूँगा तब तक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी आ जायेगी।” इतना कहकर उसने मुझसे विदा ली।

मथुरा घूमकर में देर रात होटल पहुँचा और अपने कमरे में आकर लेट गया। बीते हुए घटनाक्रम की रील मेरे दिमाग में अपने आप चल रही थी। नींद ने कब मुझे अपनी आगोश में ले लिया मुझे पता ही नहीं चला। अगले रोज मेरे बजते हुये फोन ने मुझे नींद से जगाया। घड़ी में देखा तो नौ बजने वाले थे। फोन श्रीकांत का था। उसने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी है और मौत गर्दन की हड्डी टूटने की वजह से हुयी है। डॉ ने मौत का समय भी 5:30 और 6:15 के बीच का निर्धारित किया है। लेकिन उसके मुझे फोन करने की असल वजह ये थी कि वो मुझे अपने साथ लंच के लिए आमंत्रित करना चाहता था। उसके आमंत्रण को मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसने ठीक बारह बजे मुझे पिक करने के लिए गाड़ी भेजने का वायदा किया और फोन काट दिया।

ठीक सवा बारह बजे मैं और श्रीकांत ब्रजवासी होटल में लंच टेबल पर आमने सामने बैठे हुए थे। कुछ औपचारिक बातों के बाद हमारी बातें इस केस की तरफ मुड़ चुकीं थी। श्रीकांत ने मिकी के बारे में कल शाम को ही दिल्ली पुलिस से जानकारी मांगी थी और जवाब में जो मेल आया था उसके अनुसार मिकी स्वभाव का बेहद मिलनसार और ठन्डे दिमाग का मालिक था। हालाँकि प्रिया से उसकी अनबन चलती रहती थी। ये अनबन प्रिया की बीमारी की वजह से थी। दोनों की शादी को तीन साल हो चुके थे लेकिन दोनों अभी बेऔलाद थे। हालाँकि इन तीन सालों में प्रिया का दो बार अबॉर्शन हो चुका था और इसी वजह से प्रिया डिप्रेशन में थी।

“लेकिन ख़ुदकुशी करने के लिए कोई दूसरी मंजिल से क्यों कूदेगा? इससे तो मरने के चांस बहुत कम होंगे। मैंने तो प्रिया को उसकी ख़ुदकुशी से कुछ देर पहले ही देखा था। अगर उसे ख़ुदकुशी करनी ही थी तो वो अपने दुपटटे का फंदा लगा सकती थी। उसका दुपटटा भी उनके कमरे में मौजूद पाया गया था।” मैंने श्रीकांत से कहा।

“सर अब मरने वाले को तो मरना है, चाहे लटक कर मरे या कूदकर और पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट भी तो ख़ुदकुशी की तरफ इशारा कर रही है।”

“तुम्हारे पास लाश की कोई फोटो है?

“फ़िलहाल तो नहीं। लेकिन अभी पाँच मिनट में आ सकती है।”

“मंगवाओ।”

मेरे इतना कहते ही श्रीकांत ने एक फोन किया और दूसरे ही मिनट उसके फोन में लाश की तस्वीरें आ गईं थीं। उसने तस्वीरें मुझे दिखाईं। पहली तस्वीर में लाश पेट के बल जमीन पर पड़ी हुई थी और सर के नीचे खून था जो कि बारिश के पानी में बह रहा था। मैंने फोटो को ज़ूम किया। लेकिन कुछ नतीजा न निकला। श्रीकांत ने मुझे बताया कि लाश इसी स्थिति में पायी गयी थी। दूसरी तस्वीर में लाश पीठ के बल थी और उसके फटे माथे में से खून रिसता हुआ दिखाई दे रहा था जो कि घाव की एवज में काफी कम अनुपात में था। शायद बारिश की वजह से धुल गया हो, मैंने मन ही मन सोचा। मैंने स्वभावानुसार इस फोटो को भी ज़ूम किया। जिस चेहरे को देखने की खातिर कल मैं मरा जा रहा था आज मैं उसी मरे हुए चेहरे को देख रहा था। सरसरी तौर पर देखने पर तो मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ लेकिन जब मैंने फोटो को गौर से देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। ये साफ-साफ क़त्ल का केस था। क़त्ल कैसे हुआ मेरी समझ में आ चुका था।

“इस समय मिकी कहाँ होगा?” मैंने श्रीकांत से पूछा।

“अभी तो वो हॉस्पिटल होगा। लाश क्लेम कर रहा होगा या कागजी करवाई पूरी करा रहा होगा। क्यों?”

“श्रीकांत, अभी किसी को होटल भेजकर एक बात का पता कराओ।”

मैंने श्रीकांत को जरूरी निर्देश दिए। 10 मिनट बाद होटल से जो जवाब आया वो मेरी क़त्ल की थ्योरी की पुष्टि करता था। मैंने श्रीकांत को अपनी योजना समझाई और उसको तुरंत मिकी को हिरासत में लिए जाने का आदेश देने को कहा। अगले पांच मिनट बाद श्रीकांत के पास फोन आया कि मिकी को हिरासत में लिया जा चुका है। हमने अपना लंच जल्दी से निबटाया और वहां से सीधा होटल पहुँचे। होटल के रिसेप्शन से हमने जरूरी जानकारी ली  और सीधा दूसरी मंजिल स्थित एक दूसरे कमरे में पहुंचे। वहाँ ठहरे मुसाफिर से हमने पाँच मिनट पूछताछ की। पूछताछ करने के बाद उस मुसाफिर को हमने लोकल थाने से बुलाये दो सिपाहियों के हवाले किया और होटल से तुरंत थाने पहुंचे। मिकी को हमने दो सिपाहियों से घिरा हुआ अंदर कमरे की एक कुर्सी पर बैठा हुआ पाया।

हमको देखते ही उसने तुरंत श्रीकांत से कहा, “मुझे इस तरह बंदी बनाने का क्या औचित्य है?

जवाब में श्रीकांत ने अपनी पुलिसिया टोन में कहा, “तुम पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है।”

“क्या सुबूत है तुम्हारे पास? वो तो ख़ुदकुशी का केस है।”

“सुबूत भी देंगे। पहले ये बताओ कि डॉली को जानते हो? मेरे इतना पूछते ही मिकी का चेहरा पीला पड़ गया।

मैंने बोलना जारी रखा, “तुम्हारा चेहरा बता रहा है मिकी कि तुम डॉली को अच्छी तरह से जानते हो और तुमको ये भी पता चल गया होगा कि हम भी अब सब जानते हैं। वैसे बहुत अच्छा प्लान बनाया था एक क़त्ल को ख़ुदकुशी साबित करने के लिए तुमने। लेकिन तुम्हारी बदकिस्मती कि तुम अपने प्लान में कामयाब न हो पाए। ये केवल तुम्हारी बदकिस्मती ही थी कि इधर तुम्हारा प्लान परवान चढ़ रहा था और उधर बारिश न जाने कहाँ से आ गयी। अगर बारिश नहीं आती तो तुम साफ़ साफ़ बच निकलते। तुम्हारी योजना वाकई फूलप्रूफ थी। प्रिया का क़त्ल तो तुम 5:30 से पहले ही कर चुके थे। चाहे लाश भले ही छः बजे बरामद हुई हो। हैं न?”

“हाँ! किया है मैंने प्रिया का क़त्ल। चढ़ा दो मुझे फांसी पर।” वो चिल्ला रहा था और रो भी रहा था।

उसे उसी कमरे में छोड़कर हम बाहर ऑफिस में आ गए। श्रीकांत पर अब सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसने मुझसे बेसब्र लहजे में पूछा। “सर बताओ तो, आखिर ये माज़रा क्या है?”

“श्रीकांत, इसने अपनी प्रेमिका डॉली की मदद से अपनी पत्नी प्रिया का क़त्ल किया है। प्रिया को मथुरा लाने का उद्देश्य उसको घुमाना नहीं बल्कि उसका क़त्ल करना था। मिकी ने दिल्ली से होटल गोवर्धन पैलेस में दो कमरे बुक कराये। गोवर्धन पैलेस इसलिए क्योंकि एक तो ये होटल लगभग ख़ाली रहता है और दूसरा ये पुलिस स्टेशन के नजदीक भी है। नजदीकी पुलिस स्टेशन होने की वजह से पुलिसिया कार्यवाही जल्दी होती और ये जल्दी फारिग हो जाता।एक कमरे में ये प्रिया के साथ ठहरा था व दूसरे कमरे में इसकी प्रेमिका डॉली। दोनों के लिए इसने एक जैसा सफ़ेद सूट ख़रीदा और शाम लगभग 5:30 से कुछ 10 मिनट पहले ही प्रिया की गर्दन तोड़ दी जो कि बतौर रेसलर इसके लिए मामूली बात थी। आगे की प्लानिंग के अनुसार इसने तुरंत डॉली को अपने कमरे में बुलाया और दोनों वहां से पति-पत्नी की तरह निकले। होटल के गेट पर पहुंचकर इन दोनों ने झगड़ने का नाटक शुरू कर दिया और कार तक पहुँचते-पहुँचते इनका नाटक अपनी चरमसीमा तक पहुँच गया। डॉली कार से उतरकर सीधा मिकी के कमरे में पहुँची लेकिन इस दौरान उसने पूरा ख्याल रखा था कि दुपटटा उसके चेहरे पर रहे ताकि कोई उसे पहचान न सके और मिकी अपनी कार में सवार होकर होटल से दूर चला गया। अब जो भी इन दोनों को देखता वो सीधा ही इस निष्कर्ष पर पहुँचता कि दोनों मियाँ बीबी आपस में झगड़ रहे हैं और झगडे के फलस्वरूप बीबी गाड़ी से उतरकर होटल लौट आयी है। इधर मिकी के कमरे में पहुंचकर डॉली ने अपने और प्रिया के सूट आपस में बदले और अपनी आमद के सारे निशान मिटाये फिर प्रिया की लाश को उठाया और खिड़की से नीचे फैंक दिया। प्रिया को नीचे फैंक कर डॉली सीधा अपने कमरे में पहुँच गयी। दरवाजे का बिल्ट इन लॉक खुद ब खुद लॉक हो गया जो इस बात की पुष्टि करता था कि  प्रिया के आने के बाद वहाँ कोई नहीं आया।  देखने में इनका प्लान बेहद सीधा लेकिन वाकई लाजबाब था। जो भी सोचता वो सीधा यही सोचता कि मियाँ बीबी का झगड़ा हुआ, बीबी लौट आयी। बेचारी डिप्रेशन में तो थी ही आत्महत्या कर बैठी। इनको अपने प्लान की कामयाबी पर इतना भरोसा था कि डॉली ने होटल में ही डेरा जमाये रखा। ”

“लेकिन क़त्ल का कोई उद्देश्य भी तो होगा।”

“है न। दूसरी मोहब्बत। वैसे जैसा कि डॉली ने मुझे होटल में बताया था कि प्रिया और मिकी की अनबन रहने का कारण मिकी की लड़का पैदा होने की चाहत थी। इसी कारण प्रिया का इसने दो बार जबर्दस्ती अबॉर्शन कराया था जिसके कारण प्रिया डिप्रेशन में थी। इन दोनों के बीच डिप्रेशन की वजह से अनबन नहीं रहती थी बल्कि अनबन की वजह से डिप्रेशन था।”

“यानी मिकी एक नहीं बल्कि तीन कत्लों का गुनाहगार है।”

“तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हाँ।”

“लेकिन सर एक बात बताइये, फोटो को देखते ही आप इस नतीजे पर कैसे पहुँच गए कि ये एक क़त्ल है?”

“भाई, दूसरी मंजिल से कूदकर की गयी ख़ुदकुशी तो वैसे ही मेरे गले नहीं उतर रही थी। लेकिन इनके पास इसके सिवाय कोई चारा भी नहीं था क्योंकि प्रिया को अकेले फंदे पर टाँग दे इतना दम डॉली में था ही नहीं। और जैसा कि मैंने तुमको बताया था कि मैं अपनी दूरबीन से इनको जाते हुए देख रहा था। तब जब डॉली उर्फ़ प्रिया कार से उतरकर दौड़कर होटल की तरफ आ रही थी तो बारिश की वजह से गीले सफ़ेद सूट में से मुझे उसकी नीली अंगिया की झलक दिखाई दी थी। लेकिन जब मैंने प्रिया की लाश की फोटो को ज़ूम किया तो देखा अंगिया लाल रंग की है। बस मैं तुरंत समझ गया कि क्या खेल रचा जा चुका है।”

“वाह सर! आपने तो इस केस को बहुत ही आसानी से हल कर दिया।”

“भाई, सही बताऊँ तो इस केस को हल करने में मेरा कोई खास योगदान नहीं है। ये तो बस इत्तेफ़ाक़न हल हुआ है। वैसे अगर मिकी का दुर्भाग्य इस केस के हल होने की मुख्य वजह बना।”

“आज भी मथुरा रुकोगे क्या सर?”

“नहीं भाई, आज तो अपने घर जाऊँगा। अभी शाम चार बजे की ट्रेन है जो मुझे मथुरा से सीधा हाथरस उतारेगी।”

“सर जब आपने मुझे पढ़ाया था तब भी मैं आपका कायल था और आज भी आपने मुझे अपना कायल बना लिया।”

“शुक्रिया श्रीकांत। खैर अब मुझे चलना चाहिए।” इतना कहकर मैं सीट से उठ खड़ा हुआ।

“सर मैं रेलवे स्टेशन तक आपको छुड़वाने का प्रबंध करता हूँ।” श्रीकांत ने तुरंत अपने ड्राइवर से गाड़ी लाने को कहा।

 

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बदकिस्मत क़ातिल (लेखक : सुनीत शर्मा)
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