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हत्या और आत्महत्या, हम इन दोनों शब्दों से भली-भांति परिचित हैं। दैनिक जीवन में, इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के जरिये, हम कई ऐसे अपराधिक घटनाओं के बारे में जानते हैं, जिसमे इन दोनों टर्म का इस्तेमाल होता है। क्राइम फिक्शन पढने वाले कई पाठकों को भी इसके बारे जानकारी होती है। आपने अक्सर देखा होगा कि अधिकतर रहस्य कथाओं में यह सवाल प्रमुखता से उठाया जाता है – ‘की जो अपराधिक घटना हुई है, जिसमे एक इंसान की मृत्यु हो गयी है, वो ह्त्या है या आत्महत्या’? चालाक अपराधी बड़ी चतुराई से पुलिस या जासूस को इस बिना पर गुमराह करने में सफल रहता है की ये हत्या, हत्या ना होकर आत्महत्या है| अब तथ्यों, परिस्थितियों और अपनी इन्वेस्टीगेशन के आधार पर यह नायक जासूस (पुलिस/प्राइवेट/आम आदमी) का कार्य होता है कि वो कैसे अपराधी की इस चतुराई को भांपकर असल तह तक पहुंचेI हम आपको बताने जा रहे हैं की जासूस या पुलिस ऑफिसर कैसे “हत्या और आत्महत्या” में भेद निकालता है। हम आपको बताएँगे की वह किन-किन बिन्दुओं पर विचार करता है और इस नतीजे पर पहुँचता है की – फलां मृत व्यक्ति हत्या किया गया है या उसने अपनी इहलीला स्वयं ही समाप्त की है।

कई बार, पुलिस ऑफिसर, डिटेक्टिव, मेडिकल एग्जामिनर, फॉरेंसिक एक्सपर्ट आदि को, कुछ गलतफहमियां हो जाती हैं जिसके कारण किसी अपराध को लेकर वे गलत नतीजे पर पहुँच जाते हैं। कई बार हमारे देश में, जब पुलिस को कॉल करके बताया जाता है की, फलां अपराध एक आत्महत्या है तो पुलिस मौकायेवारदात पर पहुँचने के बाद, उसे आत्महत्या का केस मान कर ही चलती है। वे उस केस को आत्महत्या का केस मानकर ही तहकीकात करते हैं और आगे जाकर केस बंद कर दिया जाता है। कमाल की बात यह है की, मानसिक रूप से किसी ऑफिसर द्वारा यह मान लिए जाने पर की फलां केस आत्महत्या का है, वे फॉरेंसिक टीम को बुलाने की भी जरूरत नहीं महसूस करते हैं। जैसे की अगर किसी व्यक्ति का शरीर, एक कमरे में, फांसी के फंदे में झूलता हुआ पाया जाता है और पुलिस को मिली कॉल के अनुसार वह आत्महत्या है तो, पुलिस इस केस को सामान्य आत्महत्या का ही केस मानती है जबकि ऐसा भी हो सकता है की हत्या को छुपाने के लिए, आत्महत्या का दिखावा किया जा रहा हो। पुलिस फोटोग्राफ़र को भी नहीं बुलाया जाता और न ही फॉरेंसिक को। ऐसे में जब मृतक का पोस्टमॉर्टेम किया जाता है और उससे मिले तथ्य से यह पता लगता है की केस हत्या का है तो पुलिस उस स्थिति में कुछ नहीं कर पाती क्यूंकि तब तक मौकायेवारदात पर मौजूद सभी सुरागों पर पानी फिर जाता है और केस में कोई प्रोग्रेस नहीं हो पाता। पुलिस इन बातों पर भी ध्यान नहीं देती की क्या मृतक अपने आपको चोट पहुंचाने में सक्षम था। जैसे की अगर किसी व्यक्ति की मौत पीठ पर चाक़ू लगने से हुई है तो उसे आत्महत्या का केस मनाना ही मुर्खता का प्रदर्शन है। पुलिस को मृतक के शरीर पर मौजूद चोटों के निशानों का भी अवलोकन करना चाहिए, वे निशान नए हैं या पुराने, इससे भी पुलिस को मदद मिल सकती है लेकिन भारत में इन बातों पर पुलिस द्वारा आरम्भ में ध्यान नहीं दिया जाता है।

किसी ऐसे अपराध जिसमे किसी व्यक्ति की असाधाराण मृत्यु हुई हो, उसकी तहकीकात करते समय पुलिस ऑफिसर या डिटेक्टिव को, पहले से कुछ मानकर नहीं चलना चाहिए। ऐसे केस के सभी तथ्यों को पहले पूरी तरह से जांच कर लेनी चाहिए तदोपरान्त उसके बारे में कोई अंतिम विचार को अपने मन के अन्दर जगह देनी चाहिए। लेकिन इन सभी बातों को दरकिनार करके इस बात पर ध्यान देना चाहिए की अगर किसी व्यक्ति की असाधाराण मृत्यु हुई हो तो उसे एक हत्या का केस मान कर ही चलना चाहिए जब तक की तथ्य यह साबित न कर दें की केस आत्महत्या का है। यह बात पुलिस को ही नहीं बल्कि आम जनता के जानकारी में भी आनी चाहिए, किसी भी असाधारण और असामयिक मृत्यु को वे हत्या समझ कर आगे बढ़ें। ऐसे मामले में हमारे देश में टेलीविज़न पर प्रासारित होने वाले कई कार्यक्रम जनता और पुलिस में जागरूकता फैला रहे हैं।

किसी भी आत्महत्या या हत्या के केस में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह होता है की मृत व्यक्ति के बारे में सभी जानकारियों को जुटाया जाए। इस बिंदु को – “विक्टिमोलोजी” कहा जाता है। इसमें मृत व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे में जानना होता है और साथ ही, वह कहाँ काम करता है, उसने कहाँ तक शिक्षा प्राप्त किया, उसके दोस्त कौन हैं और कैसे हैं, उसकी आदतें क्या है, उसके शौक़ क्या हैं, उसकी वैवाहिक स्थिति क्या है, उसके दूसरों के साथ सम्बन्ध कैसे हैं, उसके रिश्तेदार कौन-कौन हैं और उनसे उसका सम्बन्ध कैसा है, उसकी लैंगिकता क्या है (स्ट्रैट, बाई-सेक्सुअल, लेस्बियन, गे आदि), उसकी समाज में प्रतिष्ठा और प्रताप कैसा है, उसका आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है, उसे शराब या दुसरे नशीले पदार्थों की आदत तो नहीं है, उसकी शारीरिक हालत कैसी है और उसके पडोसी कौन-कौन हैं और उनका इतिहास क्या है, ये सभी जानकारियाँ विक्टिमोलोजी का हिस्सा होती हैं। इससे हत्या या आत्महत्या के मोटिव के बारे में जानकारी मिल सकती है और अगर हत्या है तो कातिल के बारे में भी जानकारी मिल सकती है।

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हत्या या आत्महत्या? #१
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