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बुढ़ापे में चलने की ताकत भी कहाँ बची थी। पर नफीसा आज रुक भी तो नहीं सकती थी। आखिर उसने बड़ी मुश्किल और जद्दोजहद के बाद यह ठाना था। हाँफते लड़खड़ाते उसके कदम बस मंजिल तक पहुँचकर ही दम लेना चाहते थे। मंजिल….इसे लेकर भी तो नफीसा निश्चिंत नहीं थी। सोच रही थी….पता नहीं वहाँ पहुँचने पर क्या होगा ? देवर-देवरानी और उनके बच्चे उसे घर में घुसने भी देंगे या नहीं ? सोचते सोचते उसकी चाल कुछ धीमी हो जाती पर अगले ही पल यह सोचकर दूनी तेजी से चलने लगती कि माफी माँग लेगी तो उन्हें दया तो आ ही जायेगी। सालों के रिश्ते नातों की दुहाई देगी तो जरूर पिघल जायेंगे। ‘आखिर मेरी न सही अपने मरहूम भाई के रिश्ते की लाज तो रखेंगे ही। और न भी रखें तो पचास पचपन साल तक जहाँ की मिट्टी से लिपटकर रही, जहाँ के लोगों के सुख-दुख और खुशी- गम में अपने शौहर के साथ खड़ी रही वह गाँव तो नहीं ठुकरायेगा। लोग जरूर रहीम और रुखसार पर दबाव डालकर उसे वहाँ रहने देने को राजी कर लेंगे या कोई और व्यवस्था कर देंगे। अगर गाँव का हर घर अनाज के दस-दस दाने भी दे देगा तो गुजारा कर लूंगी पर अब लौटकर खानपुरा न आऊँगी। नैहर तब तक है जब तक माँ बाप हैं। ऐसे भाई भतीजे खुदा किसी को नसीब न करे…न जाने किस घड़ी में इन नासपिटों पर विश्वास करके अपना घर, अपनी मिट्टी छोड़कर…सब बेच गँवाकर इनके साथ आ गई थी।’

         दरअसल नफीसा जिस मंजिल की तरफ बढ़ रही थी, जिसे अपना घर और मिट्टी कहकर इज्जत नवाज रही थी उसे ही एक साल पहले उचटकर छोड़ आई थी और वह उसका ससुराल था। शौहर आबिद के चले जाने के बाद आखिर उस गाँव में उसके लिए रखा ही क्या था ? उसके बगैर गाँव-घर-बाग-बगीचे-रास्ते सब काटने को दौड़ते थे। बेऔलाद होने का गम ऊपर से ये बुढ़ापा, गरीबी, अकेलापन और गाँव के जर्रे जर्रे से जुड़ी आबिद की यादें नफीसा को जीने न देती थीं। देवर रहीम उसकी पत्नी रुखसार और उनके बच्चे तो सालों से अलग रह रहे थे। आबिद और नफीसा ने उनके बच्चों को अपनी औलादों की तरह ही प्यार दिया था। आमने-सामने दोनों परिवारों के घर थे। बच्चे, चच्चा चच्ची कह कहकर ज्यादातर आबिद और नफीसा के पास ही रहते थे। पर ये सब तब की बात है जब वो छोटे थे। अब तो वे जवान हो चुके थे। न जाने क्यों अपने माँ बाप की तरह ही उनकी नजर भी नफीसा और आबिद के घर- बकरियों और छोटे से बाग पर अड़ी हुई थी। बेऔलाद नफीसा और आबिद खुद ही उन्हें ये सब दे देते पर जीते- जी तो इस तरह सब कुछ लुटा नहीं सकते थे। लेकिन रहीम और रुखसार को इतना सब्र कहाँ था ? बच्चे भी उन दोनों के रंग में रंग चुके थे। जब तब बिना बात गाली- गलौज, लड़ाई- झगड़ा करते और कमजोर पाकर धमकाते रहते। आबिद ने भी ठान लिया था कि अपने खून पसीने से इकट्ठा की गई यह छोटी सी पूँजी वह इन्हें तो नहीं ही देगा। मरते वक्त भी उसने नफीसा से यही कौल ले ली थी। उसके जाने के कुछ दिनों के भीतर ही नफीसा ने गाँव के दुखहरन पंडित से कुछ पैसे लेकर घर तथा बाग उसे सौंप दिया और भतीजे शाहिद के साथ मायके खानपुरा जाने को तैयार हो गयी। आबिद की गमी में आया शाहिद यहीं रहकर लगातार नफीसा को ऐसा करने के लिये तैयार कर रहा था। कहता ‘फूफी यहाँ कौन है तुम्हारा ? वहाँ मैं, मेरी बीबी सायरा और बच्चे सब हैं। सब तुम्हारी देखभाल करेंगे। यहाँ का सब बेच दो। लाख- डेढ़ लाख तो मिल ही जायेंगे। तुम्हारे नाम बैंक में जमा करा दूँगा। जिंदगी बड़े आराम से कटेगी।’ गम की मारी नफीसा को भी यह बात जमती। पर पचास साल से उसकी जिंदगी से जुड़ा आबिद का ये गाँव छूट जायेगा…यह सोचकर ही घबरा जाती। आखिर में आबिद के गुजरने के बीस दिन बाद ही वह यह सब करने को तैयार हो गयी।

           दुखहरन पंडित को अपने खेतों से जुड़े आम के बाग को खरीदने का प्रस्ताव तो मुंह मांगी मुराद जान पड़ी। उसने नफीसा के घर और बाग की उम्मीद से ज्यादा कीमत दी। दो लाख रूपये, बकरियां, बर्तन, कपड़े और अन्य जरूरी सामान लेकर सुबह सुबह ही भतीजे के साथ नफीसा गांव से रुखसत हो गई। जाते वक्त वह बाग के पेड़ों से लिपटकर खूब रोई..रोते-रोते वहीं बैठ गई। भतीजा समझाता रहा। उसे लगा कहीं नफीसा जाने के फैसले से पलट न जाये। उसने समझाते हुए कहा ‘फूफी घर और बाग बिकने की खबर रहीम के घर वालों को पता चले इससे पहले यहां से निकल लो वरना वे बेवजह बवाल करेंगे।’ नफीसा ने खुद को संभाला और उठ खड़ी हुई।

           मायके पहुंचकर नफीसा को शुरू-शुरू के कुछ दिनों तक तो बहुत प्यार और इज्जत मिली पर कुछ दिनों बाद ही धीरे धीरे सब कुछ बदल गया। उसे लम्बे चौड़े वादे करके साथ लेकर आया शाहिद अपनी ही दुनिया में रहता।  नफीसा के खाने-पीने और जरूरतों की उसे कोई परवाह न रहती। उसकी पत्नी सायरा जो कुछ दिनों तक तो बहुत मीठा बोलती थी अब जीभ पर नीम और करेला लिए ही घूमती थी। जब जब नफीसा ने शाहिद से उन दो लाख रुपयों के बारे में जानना चाहा तो उसने कोई ना कोई बहाना बनाकर बात टाल दी। पहले तो वह कभी बैंक में पैसा जमा कर देने और कभी उसमें से जरूरत पड़ने पर कुछ खर्च हो जाने की बात करता। उसने तो नफीसा के साथ आई बकरियों को भी देखरेख ना हो पाने की बात कहकर बेच दिया। एक दिन इसी तरह नफीसा ने जब रुपयों के बारे में पूछा तो शाहिद फट ही पड़ा। वह गुर्रा कर बोला, ‘दो लाख ही थे, कोई करोड़ों का सौदा नहीं था जो कभी खत्म नहीं होगा। पैसे लिए हैं तभी तो दो वक्त की रोटी और रहने की जगह दी है। फूफी आइंदा इस बात पर मेरा दिमाग मत खाना। नहीं तो ठीक नहीं होगा।’ नफीसा ठगी सी रह गई। उसे समझ आ गया था कि उसने यहाँ आकर और इन्हें सारी पूँजी सौंपकर बहुत बड़ी गलती कर दी है। पर अब पछताकर भी क्या कर सकती थी ? सीने पर पत्थर रखकर और अपमान के घूंट पीकर वह जैसे-तैसे जिंदगी जिए जा रही थी। उसके साथ दिनोंदिन दुर्व्यवहार बढ़ता ही जा रहा था। शाहिद के बच्चे भी कहाँ उसकी सुनते थे। बच्चे अक्सर बड़ों के व्यवहार को देखकर ही सीखते हैं। अब्बू शाहिद और अम्मी सायरा के नक्शे कदम पर चलते हुए उनके बेटे सलीम और गयूम भी नफीसा को छेड़ते रहते। कभी उसकी बधनी छुपा देते तो कभी खाट खींचकर धूप में कर आते। उल्टी-सीधी आवाजें निकाल कर चिढ़ाते तो कभी बेवजह ताने मारते। हाँ शाहिद की छः साल की बेटी नायरा जो अपने भाइयों से छोटी थी, जरूर नफीसा को फूफी- फूफी कहकर साथ खेलती। घर में जो कुछ खाने में अच्छा बनता उसे अपने हिस्से में से छिपाकर नफीसा को लाकर देती। नफीसा भी उसे पाकर कुछ पल को अपना गम भूल जाती। पर शायरा को उनका साथ फूटी आँख न सुहाता। वक्त बेवक्त रूखा सूखा खाना नफीसा के खाट पर रख दिया जाता। कभी भी उसकी पसंद- नापसंद या कुछ अलग खाने का मन होने के बारे में नहीं पूछा जाता। अपमान और उपेक्षा से त्रस्त नफीसा अपने बीते जीवन को याद कर करके सुबक पड़ती…आबिद उसका कितना ख्याल रखता था। हर हफ्ते वे दोनों पास के बाजार में जाते और जरूरत का सामान खरीदते। लौटते वक्त कैसे आबिद नफीसा से बिना पूछे उसकी पसंद की जलेबी या रेवड़ी खरीद लेता। नफीसा इस गैर जरूरी खर्चे पर टोकती तो कहता…  ‘हमारे कौन से बच्चे हैं जो उनके लिए कमाकर छोड़ जाना है। जब तक जिंदा है मजे से जिएंगे।’ आबिद की यह बात याद कर नफीसा बड़बड़ा उठती… ‘खुद तो चले गए मजे मजे में। मुझे यहाँ जिल्लत की जिंदगी जीने को छोड़ गए..या खुदा मुझे भी क्यों ना उठा लिया उनके साथ ही।’

       आज जब आबिद को गुजरे पूरे एक साल हो गए थे, नफीसा सुबह से ही उसे याद करके उदास और गमजदा थी। वह चाहती थी कि आबिद के नाम से पास के मजार वाले फकीर को अनाज और कपड़े दे। पर कैसे ? उसे पूरा विश्वास था कि कपड़े तो दूर सायरा अनाज का एक दाना भी इस काम के लिए न देगी। ऊपर से चार बातें और सुनाएगी। वह तो उसे रोटी देने में ही किलसती है। इन्हें तो शायद आबिद की बरसी का दिन भी याद नहीं। याद होता तो शाहिद कल शाम ही जरूरी काम से दो-तीन दिन के लिए बिना इस बारे में कुछ बात किए कहीं चला न जाता। नफीसा को कुछ सूझ न रहा था। तभी नायरा उसके पास आकर बोली, ‘फूफी- फूफी, अम्मी रामेसर काका के बेटे के मुंडन में जा रही हैं। तुम भी जाओगी ?  नफीसा ने नन्हीं नायरा से पूछा, ‘क्या तुम भी जा रही हो ?’ नायरा उदास होकर बोली… ‘नहीं, अम्मी मुझे कहीं नहीं ले जाती। कहती है कि हम नाइनों को वहाँ बहुत काम होता है। कोई बैठने नहीं जा रही हूँ…औरतों को रंग महावर लगाना है, नाखून काटना है, कुछ और काम भी करना पड़ सकता है। तेरा ख्याल कौन रखेगा।..अम्मी आज खाना भी वहीं से लाएंगी। खाने को कुछ बनाया भी नहीं है।’

             कहते हैं ऐसे अकेलेपन में इंसान हर उस जगह उम्मीद के तार जोड़ लेता है जहाँ से थोड़ा सा भी अपनापन झलक जाए। नफीसा ने नायरा को गोद में उठाते हुए कहा ‘तू नाराज मत हो। मैं और तू फकीर बाबा के यहाँ चलेंगे।’ नायरा खुशी से उछल पड़ी- ‘सच’। नफीसा घबराते हुए उसके मुँह पर हाथ रख कर बोली ‘शोर मत कर। वरना तुम्हारी अम्मी हम दोनों को ही कहीं नहीं जाने देगी।’ नायरा समझ गई। नफीसा ने नायरा को समझाते हुए कहा कि ‘तुम्हें इसमें मेरी मदद करनी होगी। फकीर बाबा को देने के लिए कम से कम एक सेर चावल अम्मी के कमरे से झोले में भरकर लाना होगा। फकीर बाबा हमें दुआ देंगे। पर यह बात तुम्हारी अम्मी या किसी और को पता नहीं चलनी चाहिए वरना हम दोनों का क्या हाल होगा.. तुम्हें तो पता ही है।’ नायरा ने सर हिलाया जैसे सब समझ गई हो। जैसे ही सायरा घर से बाहर निकली नायरा उसके कमरे में जाकर झोले में चावल भर लाई। वैसे तो यह एक सेर से कुछ कम ही लग रहा था पर नफीसा को इतने से भी तसल्ली थी। अब दोनों मजार पर जाने को निकल पड़ी। पर जैसे ही दोनों ने गली में कदम रखा न जाने कहाँ से सलीम और गयूम आकर टपक पड़े। फूफी के हाथ में झोला देखकर सलीम जैसे सब कुछ भांप गया हो। चौदह साल की उम्र में ही उसमें सायरा और शाहिद की फितरत झलकने लगी थी। हमेशा नफे-नुकसान के नजरिए से ही बातें करता। सलीम ने झपट्टा मारकर नफीसा के हाथ से झोला यूँ झपट लिया जैसे कोई बाज अपना शिकार। जैसे ही उसने झोला फैलाया, चावल देखकर नफीसा को ऐसे देखा जैसे उसकी वर्षों से जारी चोर की तलाश पूरी हो गई हो। इससे पहले कि नफीसा उससे कुछ कहती, अपनी बात रखती या समझाती वह अपने रंग में उतर आया। बोला, ‘ तो यह काम करती हैं आप फूफी ? अपने ही घर में चोरी। सही सही बताओ कब से यह काम कर रही हो ?  चावल चुरा कर बेचने जा रहीं थी ना ? नफीसा ने हैरान परेशान होकर जवाब देना चाहा.. ‘नहीं मैं और नायरा तो..।’

‘अच्छा तो नायरा को भी आपने बहला-फुसलाकर इस काम में शामिल कर लिया है। पर यह तो छोटी है। आपको यह काम करते हुए शर्म नहीं आई ?’ सलीम तेजी से दहाड़ रहा था।  ‘और तू नायरा की बच्ची, अभी बुलाता हूँ अम्मी को और तेरी हड्डियां तुड़वाता हूँ। तभी कहूँ कि फूफी के आगे पीछे क्यों डोलती है। तुझे भी कुछ खाने पीने को दे देती होंगी अनाज बेचकर।’ सलीम की आवाज सुनकर आसपास के भी कुछ लोग वहाँ जमा हो गए। नफीसा को इतनी शर्म आज तक कभी महसूस न हुई थी। उसे लग रहा था कि ससुराल में रहीम और उसके परिवार ने क्या कुछ नहीं कहा पर ऐसा अपमान कभी अनुभव नहीं हुआ। औरतों के लिए मायके में लगा राई जैसा छोटा लांछन भी शायद ससुराल में मिले पहाड़ जैसे अपमान से ज्यादा असर करता है। नफीसा तो पूरी तरह बुत हो चली थी। वह पलट कर सलीम का जवाब भी नहीं दे पा रही थी। सलीम ने छोटे भाई गयूम को तुरंत अम्मी को बुलाकर लाने का फरमान दिया। अगले कुछ ही पल में बिजली की तेजी से माँ सायरा को लिए वह वहाँ हाजिर भी हो गया। सायरा को तो मानो महीनों से सीने में दफन भड़ास निकालने का मौका मिल गया हो। वह सीना पीट-पीटकर चिल्लाए जा रही थी, ‘हमने जिसे पनाह दी, गाढ़े में दो रोटी दी, सहूलियत दी वही मेरा घर दीमक की तरह चाटे जा रही थी। आखिर डायन भी दो घर छोड़कर वार करती है। फूफी तुमने ऐसा क्यों किया ? कब से कर रही हो यह सब ? मुझे शक तो तुम पर बहुत पहले से ही था, पर शाहिद तो भोले हैं, वो कहाँ मानते हैं मेरी बात। या खुदा ऐसी औरत क्यों हमारे हिस्से लाकर पटक दिया।’ शायरा ने बेटी नायरा को अपनी ओर खींचते हुए झिड़का, ‘तू बता चुड़ैल, इस उम्र में यही सब सीख रही है। मना किया था ना कि फूफी के साथ मत दिखना।’ जुटी हुई भीड़ में से भी किसी ने कहा, ‘बुढ़ापे में यह सब क्यों किया ? जिसने तुम्हें अपने घर में जगह दी उसी के घर में चोरी।’

       नफीसा को तो जैसे अब सुनाई देना भी बंद हो चुका था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसे पहाड़ से नीचे धकेल दिया हो और वह नीचे ही लुढ़कती जा रही हो। वह अब खुद से ही जूझ रही थी…आखिर उसने आबिद के जाने के बाद ही अपनी जान क्यों नहीं दे दी। न भी देती तो वहीं अपने घर अपने गांव अपनी जमीन में पड़ी रहती। दो वक्त की रोटी जैसे-तैसे मिल ही जाती। ये अपमान और जिल्लत तो ना मिलता। पिछले पचास साल से उसे और आबिद को गांव के हर घर, हर इंसान के खुशी गम में नाई और नाइन का काम करते हुए कितना मान मिला था। वहाँ हर किसी को उस गाँव से उसका रिश्ता तो याद ही होगा। नफीसा के मन में यह विचार आते ही मानो शरीर में फुर्ती और ताकत लौट आई हो। उसने वहाँ बिना कुछ कहे अपने कदम चैतापुर यानी ससुराल अपने आबिद के गांव की ओर बढ़ा दिए। उसने कुछ खाया पिया तो नहीं था पर इसकी परवाह भी आज नफीसा को नहीं थी, किसी और को तो होनी भी नहीं थी। खानपुरा से चैतापुर के बीच की सोलह कोस की दूरी नफीसा को पैदल ही नापना था। पिछली बार तो वहाँ से खानपुरा आते वक्त उसे महज तीन कोस ही चलना पड़ा था क्योंकि भतीजा साथ था। उसने पास के कस्बे से जीप की सवारी करा दी थी। पर अब उसका पचास रूपया किराया कहाँ से देगी ? लेकिन इस दूरी से घबराकर नफीसा अब लौट नहीं सकती थी। ऐसा लग रहा था जैसे आबिद की रूह उसे वहाँ से तुरंत वापस आने के लिए खुद ही कहने आई हो। नफीसा जितनी तेजी से कदम बढ़ा रही थी उससे कहीं ज्यादा तेजी से उसका मन पीछे की जिंदगी की पैमाइश कर रहा था। आबिद के साथ चैतापुर में बीता एक एक लम्हा उसे याद आ रहा था। न जाने क्यों इन यादों में कोई कड़वाहट या गम के पल नहीं थे। नफीसा को बीता हुआ समय आज के मुकाबले हर मायने में बेहतरीन जान पड़ रहा था। कैसे गांव की हर शादी, जन्म, मुंडन सभी में वह और आबिद अपने नाई और नाइन का फर्ज निभाते थे। किसी ने आज तक उन्हें कभी अपमानित नहीं किया। भले ही नेग में कहीं कम या कहीं ज्यादा मिला हो पर इज्जत और काम की कद्र हर जगह मिली। रहीम जरूर इन सब से जलन रखता था क्योंकि उसे कम घरों में इस काम के लिए बुलाया जाता था। ‘पर था तो आबिद का भाई ही उसकी बातें ना जाने क्यों इतनी बुरी नहीं लगती थी जितना इन अपना कह कर ठगने वालों की।’ नफीसा सोचते हुए चले जा रही थी।

     धूप सर पर चढ़ आई थी। आधा दिन बीत रहा था। न जाने कितनी दूर अभी भी चलना पड़ेगा। शुक्र है कि सड़क के किनारे पेड़ लगे हैं वरना सूरज तो आग ही उगल रहा है। बुढ़ापे की हड्डियां बीच बीच में अपनी स्थिति का आभास भी करा रही थीं। चलते-चलते नफीसा को सड़क का यह छोटा चौराहा कुछ जाना पहचाना लगा। ‘अरे यह तो वही चौराहा है जहाँ के बाजार से मैं और आबिद बकरियां खरीद कर ले गए थे। कितने खुश थे ना हम उस दिन। आबिद को कितना पसंद था बकरी की छाती से निकला ताजा गर्म दूध।’ सोचते-सोचते आबिदा के पैर पहली बार ठिठक से गए। सहसा उसे चलने का ध्यान आया और फिर उसी जोश से वह चल पड़ी। हालाँकि पिंडलियों और जांघों में दर्द अब ज्यादा ही जोर मार रहा था पर नफीसा के पास इसकी चिंता करने का समय नहीं था। वह जल्दी से जल्दी बस चैतापुर पहुँच जाना चाहती थी। उसे आबिद ने बताया था कि यह चौराहा गांव से आठ कोस दूर है। ‘अभी तो आधी दूरी ही तय हुई है और दोपहर भी उतरने को है।’ नफीसा यह सोच कर कुछ और ही जोर मार कर चलने लगी। चलते चलते वह फिर सोचने लगी कि उसका घर तो गांव के बिल्कुल बाहर ही है और पहुँचते पहुँचते शाम तो हो ही जाएगी। ‘चलो गांव में कल सुबह चली जाऊँगी।’ तभी ख्याल आया कि अपना घर अब है कहाँ ? वह तो बिक गया है। कहीं रहीम ने अपने घर में रहने की  जगह न दी तो ? कहीं रुखसार और बच्चे अभी भी घर और बाग न मिलने की कसक से उससे नाराज ही हुए तो क्या होगा ? ‘कोई बात नहीं उसी समय गाँव में सेठ गुलाम अली के घर चली जाऊंगी रात तो बिना किसी झंझट के वह रुकने ही देंगे। बाकी सुबह देखी जाएगी। सभी आबिद को बहुत मानते थे, मुझे भी प्यार करते थे…जरूर कोई ना कोई पनाह देगा। आबिद का गाँव मुझे जरूर अपनी आगोश में लेगा।’

       इसी जद्दोजहद और विचारों की नदी में बहती जा रही नफीसा ने ध्यान दिया कि अब तक तरेर रहा सूरज अब मंद होने लगा है। उसकी लालिमा से आसमान का एक सिरा सुर्ख हुआ जा रहा है। चैतापुर से पहले पड़ने वाला गाँव भी तो आ गया है। अरे यह तो वही डॉक्टर की दुकान जहाँ से अंतिम बार नफीसा दौड़ते हुए बीमार आबिद के लिए दवा लेकर गयी थी। नामुराद डॉक्टर ने न जाने क्या दवा दी थी जिसे मुँह में डालते ही आबिद की सांस रुक गई थी। यहां से बमुश्किल पाँच सौ मीटर ही तो आबिद और नफीसा का प्यारा बाग है। उफ! अब वह नफीसा का कहाँ रहा। अरे ये उस बाग के पेड़ ही तो दिख रहे हैं। परिंदे उसी ओर उड़े जा रहे हैं। नफीसा भी परिंदों की भांति उड़कर पहुंच जाना चाहती थी पर अब तो एक-एक कदम उठाना भारी पड़ रहा था। ऐसा लग रहा था सांसें साथ छोड़ देंगी। प्यास से हलक सूख चुका था। ‘बाग के पास वाले नल से पानी पीऊँगी। वहीं पास ही तो रहीम का घर है। अब तो समझो पहुँच ही गयी।’ नफीसा यह सोचते और खुद को खींचते हुए बाग तक पहुँची। सब पेड़ वैसे ही हरे भरे थे। हवा में झूम रहे थे। ऐसा लग रहा था कि खुशी में नाच रहे हों और पूछ रहे हों कि, ‘कहाँ चली गई थीं नफीसा हमें छोड़कर, चलो आ गई हो तो सब ठीक हो गया है।’ नफीसा ने बाग में पहुँचकर जैसे ही एक पेड़ को छुआ उसका गला भर आया। वह फिर वैसे ही रोना चाह रही थी जैसे जाते वक्त इन पेड़ों से लिपट कर रोई थी। पर वह चाहकर भी रो नहीं पा रही थी। उसकी आंखें, हाथ, पैर अब सब जवाब दे चुके थे। वह वहीं पेड़ से टिककर बैठ गई। उसने वहीं से उचक कर देखा कि आबिद और उसका घर दिखाई दे रहा है। अभी वह वैसे ही है जैसे उसने उसे छोड़ा था। उसे ऐसा लगा जैसे आबिद वहीं से उसकी ओर आ रहा है और कह रहा है ‘नफीसा तुम आ गईं । अच्छा किया, अब हम दोनों मिलकर पहले की तरह अपने घर, अपने बाग, अपने गाँव में रहेंगे।’ अभी तक थकान और प्यास से निठाल हो चुकी नफीसा का चेहरा दमकने लगा था। उसकी खुली आंखें एक टक अपना घर निहारे जा रही थीं। गाय- भैंसो को चराकर उन्हें अपने साथ लिए लौट रहे गाँव के कुछ लड़कों ने ऐसे पेड़ के सहारे किसी को बैठे देखा तो पास आकर जानना चाहा। उनमें से एक चौंककर बोला, ‘अरे चच्ची तुम कब आईं ? यहाँ क्यों बैठी हो ? रहीम चाचा को बुला दें क्या ?’ पर नफीसा कुछ बोल नहीं रही थी। उसके चेहरे पर अब असीम शांति थी। शक होने पर एक लड़के ने जैसे ही उसे छूआ उसका शरीर नीचे जमीन पर लुढ़क गया। नफीसा अपने आबिद के पास पहुँच चुकी थी।

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आलोक मिश्रा

जन्म: 10 अगस्त 1984 शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र) पेशा: अध्यापन रुचि- समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता लेखन, कुछ पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, मगहर आदि में।
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