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दिल्ली में बारिश का मौसम भी अजीब तरह से आता है। जहाँ मौसम विभाग कहता है कि आज बारिश होगी, तो उस दिन न होकर २ दिन लेट-लतीफी के साथ, बिल्कुल दिल्ली पुलिस की तरह देर से ही पहुँचती है। दिल्ली शहर की इस विशेषता के साथ ही इसे कुछ उन शहरों में गिना जाता है – जो कभी सोते ही नहीं हैं। दिन-रात, सुबह-शाम-दोपहर, सर्दी-गर्मी-बरसात, यह शहर बस दौड़ता-भागता ही नज़र आता है।
रात के दो बज रहे थे – ऊपर से मूसलाधार बारिश – ऐसे मौसम में पालम विहार चौराहे की रोड नंबर २०१ पर, एक पान की दुकान का खुला होना अपने आप में आश्चर्य की बात थी। लेकिन यह आश्चर्य उस रास्ते से पहली बार गुजरने वालों को ही होता था। पूरे द्वारका में, एक यही पान की दुकान थी जो रात भर खुली रहती थी। वे मेडिकल शॉप, जो २४ घंटे खुले रहने का दावा करते हैं वो भी ऐसी बारिश में बंद हो जाया करते हैं। ऐसे में यह दुकान खुली थी और उन यात्रियों को बराबर सुविधा प्रदान कर रही थी जो तलब के शौक़ीन थे। पान की दुकान पर बैठा व्यक्ति पान की छटाई कर रहा था और दुकान में बज रहे टेप से निकलते गीत-संगीत की आवाज के साथ-साथ गाये-गुनगुनाये जा रहा था। उसी दुकान के ठीक सामने, एक पी.सी.आर. वैन बदस्तूर रात १० बजे से खड़ी थी। हर आधे घंटे के बाद वह वैन सायरन बजाते हुए निकल पड़ती थी और उस क्षेत्र के किसी हिस्से का चक्कर लगाकर वापिस उसी स्थान पर वापिस लौट आती थी। वह पनवाड़ी की दुकान उस चौक की खासियत थी इसलिए वह पी.सी.आर. वैन वहीं पर खड़ी होकर अपनी ड्यूटी को पूरा करती थी। पी.सी.आर. में बैठा एस.आई. अनिल शर्मा, सिगरेट का कश लगा रहा था और उसके साथ का हवलदार धर्मपाल तम्बाकू रगड़ रहा था।
अनिल शर्मा पनवाड़ी की दुकान की तरफ देखते हुए बोला – “धर्मपाल, एक कश लेगा क्या?”
धर्मपाल ने उसे तिरछी नज़रों से देखा और सड़ा हुआ मुँह बनाते हुए बोला – “तू तम्बाकू लेगा क्या?”
अनिल शर्मा ने उसकी बात सुनी तो उसने अपनी बगल का शीशा नीचा किया और थूककर बोला – “साले, मैं तम्बाकू खाऊँगा?”
“हाँ, मुझे पता है ‘गधे’ तम्बाकू नहीं खाते हैं?”
“क्या कहा साले?”
“जो तूने सूना साले।”
तभी उन्हें अपने वायरलेस पर आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने गौर से डिटेल सुनी और नोट की। जब सूचना समाप्त हो गयी तो अनिल शर्मा ने अपनी तरफ वाला ग्लास फिर नीचे किया और उस पनवाड़ी से चिल्लाकर कहा – “चौरसिया, हम लोग सेक्टर २८ में जा रहे हैं। उधर कोई चोरी हो गयी है। अभी आते हैं मामला निपटा के।” – इतना कहकर अनिल शर्मा ने पी.सी.आर वैन को राईट में लेते हुए रोड नंबर २२४ की ओर मोड़ दिया।
पीसीआर वैन रोड नंबर २२४ जो कि डाबरी-गुडगाँव रोड भी कहलाता है, से होती हुई गोल्फ कोर्स रोड के लिए बायीं ओर मुड़कर सेक्टर २८ के गेट पर पहुँची। उस गेट पर सोसाइटी की तरफ से नियुक्त एक सिक्योरिटी गार्ड अपने केबिन में बैठा ऊँघ रहा था। अनिल शर्मा ने हॉर्न बजाया तो वह गार्ड हकबकाते हुए, जाग गया और अपना रेनकोट पहनकर गेट खोलने के लिए दौड़ा।
गेट से अन्दर प्रवेश करते हुए हवलदार धर्मपाल ने उससे कुछ पूछा जिसके जवाब में उसने हाथ के इशारे से कुछ बताया। वैसे भी उस मूसलाधार बारिश में आदमी को आदमी की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी तो अक्लमंदी यही कहती है कि इशारे में बात करो। अनिल शर्मा ने धर्मपाल के दिशानिर्देश के अनुसार चलते हुए उस बिल्डिंग के सामने गाड़ी रोकी जिसमे चोरी की घटना घटी थी। उनकी गाड़ी पोर्च में पहुँची तो वे उतरकर लिफ्ट की ओर बढ़े। लिफ्ट से चौथे माले पर पहुँचकर उन्होंने फ्लैट नंबर ४०५ की कॉलबैल दबाई और साथ ही आवाज भी लगाई – “दिल्ली पुलिस।”
कॉलबैल के जवाब में एक महिला ने दरवाजा खोला जिसकी उम्र लगभग ३५ वर्ष रही होगी। उसने पीले रंग के गहरे गले का सूट पहना हुआ था जो उसके घुटने तक आ रहा था और उसी रंग की, उसी प्रिंट से मिलती-जुलती सलवार पहनी हुई थी जो कमर और एड़ी के करीब ही तंग थी और बाकी अंग में खुली-खुली सी थी।
“इतनी देर कैसे हो गयी आप लोगों को आने में?” – इतना कहकर उसने दरवाजा पूरी तरह से खोल दिया।
दोनों के अन्दर घुसते ही महिला ने दरवाजा बंद कर दिया। अनिल शर्मा और धर्मपाल ने अपने रेनकोट को खोलकर दरवाजे के करीब पड़ी एक रिक्त कुर्सी पर रख दिया। फर्श जो अभी तक साफ़-सुथरा था, धर्मपाल और अनिल शर्मा के जूतों के कारण वहाँ निशान बन गए और रेनकोट पर गिरी बारिश की बूँदें भी टप-टप करके फर्श को नहलाने लगीं। अनिल शर्मा ने जब ऐसा देखा तो बोला – “आई एम् सॉरी!”
धर्मपाल ने एक नोटपैड और पेन अनिल शर्मा के सामने सरका दिया। वह नोटपैड, लगभग २०-२१, ए४ साइज़ के लूज शीट्स से तैयार किया गया था, जिसके नीचे एक हार्डबोर्ड था जिसका इस्तेमाल परीक्षा के दौरान स्कूल में विद्यार्थी करते थे।
अनिल शर्मा ने महिला से मुखातिब होकर पूछा – “हाँ, बताइये क्या चोरी हो गया है?”
उस महिला ने बताया – “एक ‘मूर्ति’ चोरी हो गयी है।”
धर्मपाल महिला की बात सुनकर हंसने लगा और बोला – “लो दिल्ली पुलिस का काम अब ‘मूर्तियों’ को खोजना भी हो गया है।”
अनिल शर्मा ने उस ड्राइंग रूम नुमा कमरे में निगाह डाली तो पाया कि वह एक सुव्यवस्थित तरीके से सजा हुआ कमरा था। कमरे में ध्यान के मरकज की ३ अलमारियाँ थीं जिनमे शीशे के दरवाजे लगे थे और उन दरवाजों के पीछे कई मूर्तियाँ रखी हुई थीं। कुछ मूर्तियाँ टूटी-फूटी हुई थीं तो कुछ साबुत थीं। ऐसे में उसकी नज़र एक ‘नटराज’ की मूर्ति की ओर गयी।
महिला ने घृणा की दृष्टि से धर्मपाल को टेढ़ी नज़रों से देखते हुए बोला – “वह कोई मामूली मूर्ति नहीं थी। ‘झारखंड’ के कोयले की खदानों से ८० के दशक में वह मूर्ति पाई गयी थी जिसे बाद में ‘मिस्टर देबीप्रसाद परिदा’ ने खरीदा था। जिसकी कीमत आज के समय मार्किट में लगभग ३०-४० लाख रूपये है।”
“ये देबीप्रसाद परिदा कौन हैं?”
“देबीप्रसाद परिदा, एक समय में बहुत प्रसिद्ध ‘एंटीक कलेक्टर’ एवं धनी व्यक्ति थे। वे ‘हिमाचल प्रदेश’ की एक रियासत ‘मकलोडगंज’ के राजा के एकलौते वंशज हैं। खानदानी विरासत की कोई कमी नहीं थी लेकिन साथ ही सरकारी पैसा भी खूब आता था जिसे कि बाद में बंद कर दिया गया। वे ५ वर्ष पहले तक बहुत ही एक्टिव ‘एंटीक कलेक्टर’ रहे थे लेकिन एक बीमारी के कारण उन्होंने अपने इस शौक़ पर विराम लगा दिया था। उन्होंने लगभग अपनी सारी पूँजी अपने शौक़ में धौंक दी थी और जो बची थी वो उनकी बीमारी के इलाज़ में लग गई। आज के समय वे गुमनामी के अँधेरे में ‘इस घर’ में अपने अंतिम दिन बिता रहे हैं। एक समय ऐसा था जब, देश-विदेश से लोग उनके पास एंटीक मटेरियल लेकर आते थे और जो उन्हें पसंद आता था उसे वे खरीद लेते थे। आज के समय में अगर वे अपनी कलेक्शन को बेचें तो आराम से २०-२५ वर्ष गुजार सकते हैं लेकिन वो अपने कलेक्शन का एक आइटम भी बेचने को तैयार नहीं हैं।”
अनिल शर्मा ने कहा – ‘ये वो देबीप्रसाद परिदा हैं?”
“हाँ, वही हैं।”
“कहाँ हैं वो? हमें उनसे मिलना है।”
“आइये।”
वह महिला दोनों को अन्दर वाले कमरे में ले गयी तो वहाँ उन्होंने एक बूढ़े को व्हीलचेयर पर गर्दन झुकाए बैठे पाया। कमरे में आहट का आभास होते ही उस बूढ़े ने अपने चेहरे को ऊपर उठाया और लगभग प्रलाप करते हुए पूछा – “इंस्पेक्टर, मेरा नंदी मिला क्या?”
इससे पहले कि इंस्पेक्टर कुछ पूछता, उस महिला ने जवाब दिया – “दरअसल जो मूर्ति चोरी हुई है, वह भगवान् शिव के वाहन ‘नंदी’ की प्रतिरूप मूर्ति थी। अगर उसके आकार के बारे में बताऊँ तो उसका साइज़ 6 इंच होगा।”
“क्या आप ही ‘देबीप्रसाद परिदा’ हैं?”
“हाँ, ये ही देबीप्रसाद परिदा हैं और मैं इनकी पत्नी मालविका परिदा हूँ।”
धर्मपाल जो इतनी देर से बातों को सिर्फ सुन रहा था, वह अनिल शर्मा के करीब, उसके कानों के पास अपने होठों को ले जाकर बोला –“कमबख्त, ये तो बेटी या पोती की उम्र की है। पत्नी कैसे बन गयी?”
अनिल शर्मा ने उसकी बातों को अनसुना करके कहा – “देबीप्रसाद जी, जैसा कि आपकी पत्नी ने हमें बताया कि वह मूर्ति लगभग ‘४० लाख’ मूल्य की होगी तो क्या यह सच है?”
“हाँ, बिलकुल सच है।”
“क्या इससे भी अधिक मूल्य की कोई एंटीक आइटम है आपके पास?”
“हाँ, बाहर शेल्फ में एक ‘नटराज’ की मूर्ति है जिसका मूल्य १ करोड़ से ऊपर होगा।”
“ह्म्म्मम्म….” – कुछ सोचते हुए अनिल शर्मा ने पूछा – “क्या आपके कलेक्शन के सभी आइटम इंश्योर्ड हैं?”
“मुझे इसके बारे में कुछ याद नहीं है।” – उसने कुछ चिड़चिड़े भाव से कहा – “आप जल्द से जल्द मेरे नंदी को खोजिये।”
“क्या आप दोनों के सिवा इस फ्लैट में कोई तीसरा भी रहता है?”
“नहीं।” –मालविका ने जवाब दिया।
“क्या आज रात कोई अजनबी यहाँ आया था?”
“हाँ, आज रात एक डिलीवरी ब्वाय आया था।”
“डिलीवरी ब्यॉय? रात में डिलीवरी ब्वाय क्या करने आया था?”
“एक्चुअली मेरे पति को रात में ‘चाइनीज’ खाने का मन हुआ और जैसा कि आप देख रहे हैं इस उम्र में उनकी जिद बच्चों की जिद को क्रॉस कर देती है, इसलिए मैंने ‘सेक्टर २१’ में स्थित ‘चावला चाइनीज’ नामक रेस्टोरेंट में आर्डर किया था जिसके उपरान्त तकरीबन १ बजे हमें आर्डर डिलीवर करने के लिए ‘राजेश मखीजा’ नाम का डिलीवरी ब्वॉय आया था।”
“और?”
मालविका परिदा ने नज़रें झुकाकर कहा – “और मुझे लगता है कि मैंने मेन डोर खुला ही छोड़ा हुआ था।”
अनिल शर्मा गौर से मालविका परिदा को देखते हुए बोला – “आप हमें उस रेस्टोरेंट का नंबर दीजिये।” – फिर धर्मपाल की ओर मुड़ते हुए उसने कहा – “धर्मपाल, उस रेस्तोरेंट का नंबर लेकर कॉल करो और अगर कोई फ़ोन उठाये तो उनसे कहो कि ‘राजेश मखीजा’ को तुरंत यहाँ भेजे और अगर राजेश मखीजा वहाँ मौजूद न हो तो उस रेस्टोरेंट के मैनेजर को यहाँ आने के लिए कहो?” –इतना कहकर अनिल शर्मा उस कमरे से निकलकर बाहर के दरवाजे की तरफ चला गया।

दरवाजे का गहन अध्ययन करने के बाद उसे पता चला कि उस दरवाजे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई थी। अर्थात मालविका परिदा जो कह रही थी वह सच था। इतने देर में धर्मपाल अन्दर के कमरे से बाहर आते हुए बोला – “मैनेजर और राजेश मखीजा, दोनों ही आ रहे हैं।”
“गुड। वैसे धर्मपाल, तुम पता करो कि इस सोसाइटी में सेंधमारी एवं चोरी करते हुए कितने लोग पकड़े गए हैं। हो सकता है उनमे से ही कोई हो।”
“सर, थाने से अभी तक कोई पहुँचा क्यूँ नहीं? इन्वेस्टीगेशन का काम हमारे अंडर तो आता नहीं है। जब वो आयेंगे तभी पूछ लेंगे।” – धर्मपाल ने कहा।
“नहीं, अभी पता करो। जब तक वे नहीं आते हैं तब तक हम अपने दिमाग और स्किल पर चढ़ गई धूल को थोड़ा झाड़ तो सकते ही हैं।” –इतना कहते हुए वह मालविका की ओर मुड़ा – “आपके पति इस बारे में श्योर नहीं हैं कि उनके कलेक्शन के आइटम्स का इंश्योरेंस है कि नहीं। आपका इस बारे में क्या कहना है?”
“मेरे पति को शायद इस बारे में याद नहीं है लेकिन उनके कलेक्शन के वे आइटम जो ५ वर्ष पहले खरीदे गए थे वे इंश्योर्ड हैं। मैं इंश्योरेंस के पेपर आपको दिखाती हूँ।” – इतना कहकर वह एक ड्राअर में से कुछ डॉक्यूमेंट्स निकालकर दिखाने लगी।
अनिल शर्मा ने उन डाक्यूमेंट्स को देखा तो पाया कि ‘नंदी’ नामक एंटीक आर्टिकल जो चोरी हो गया था उसका इंश्योरेंस ३० करोड़ का था जबकि उसमे ‘नटराज’ के इंश्योरेंस के पेपर नहीं थे।
“क्या ‘नटराज’ की मूर्ति का इंश्योरेंस नहीं हुआ था?”
“हुआ था लेकिन बाद में उसके इंश्योरेंस का खर्च ज्यादा आने के कारण उसका इंश्योरेंस ड्राप कर दिया गया था।”
“आप इस अलमारी को लॉक करके नहीं रखती हैं?”
“नहीं।”
“क्यूँ?”
“क्यूँकि इन एंटीक मटेरियल की कीमत सिर्फ वही जानते हैं जो एंटीक के जानकार हैं और हमारा सम्बन्ध अब ‘इस दुनिया’ के किसी तीसरे इंसान से है नहीं इसलिए हम इसकी कोई आवश्यकता नहीं समझते हैं।”
इतनी देर में ही डोर बेल की आवाज आई तो धर्मपाल ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला। ‘राजेश मखीजा’ और उसके साथ आये मैनेजर ने अन्दर कदम रखा और प्रश्नवाचक
दृष्टि से दोनों पुलिसियों को देखा।
अनिल शर्मा ने ‘राजेश मखीजा’ से पूछा –“तुम जब अन्दर आये थे तो क्या यह दरवाजा खुला हुआ था?”
“मुझे इसके बारे में नहीं पता कि यह खुला हुआ था या नहीं क्योंकि मैं जब आया था तब दरवाजा चौखट से लगा हुआ था और मैडम ने ही आकर दरवाजा खोला था और पैकेट हासिल किया था।”
“क्या तुम कमरे के अन्दर नहीं घुसे थे?”
“नहीं, मैं कमरे के अन्दर नहीं घुसा था।”
अनिल शर्मा ने मालविका परिदा की तरफ देखा – “मालविका जी, आपने पैकेट लेकर क्या किया था?”
“मैं, पैकेट लेकर सीधे अन्दर वाले कमरे में चली गयी थी जहाँ मेरे पति ‘इंडिआना जोंस’ नामक मूवी देख रहे थे। मैं उस मूवी को हज़ारों बार देख चुकी हूँ लेकिन मुझे हर बार मजबूरन देखना पड़ता है क्योंकि मेरे पति ऐसा ही चाहते हैं।”
“आपकी शादी कब हुई थी?”
इस सवाल को सुनकर वह एक बार झिझकी फिर बोली – “लगभग ५ वर्ष पहले। जब मिस्टर परिदा बीमार हुए थे तब हॉस्पिटल से इनकी तीमारदारी और लगातार देखभाल के लिए मुझे अपॉइंट किया गया था। बाद के कुछ महींनों में ही मिस्टर परिदा मेरे द्वारा की गयी देखभाल से बहुत खुश हुए थे और मुझे परमानेंट अपने साथ रहने के लिए कहा था। लेकिन समाज आसानी से इस रिश्ते को स्वीकारता नहीं इसलिए समाज में बदनामी से बचने के लिए मिस्टर परिदा ने विधिवत मुझसे विवाह कर लिया था।”
“आपको कब पता चला कि ‘नंदी’ घर से चोरी हो गया है?”
“जब मूवी खत्म हुई तो मैं इस कमरे में किसी काम से आई तो दरवाजा खुला देखा। मेरे मन में शंका उत्पन्न हुई। इसलिए मैंने अलमारी में एक-एक आर्टिकल को देखा जिसके बाद मुझे ‘नंदी’ के मिस हो जाने के बारे में पता चला। तत्काल मैंने १०० नंबर पर कॉल किया और साथ ही अपने पति को भी बताया।”
इतनी देर से खड़े, राजेश मखीजा ने प्रतिवाद किया – “लेकिन सर मैं इस दरवाजे से अन्दर, इस फ्लैट में घुसा ही नहीं था। मैं तो आर्डर डिलीवरी करके तुरंत खड़े पैर वापिस चला गया था क्योंकि यह रेस्टोरेंट का आखिरी आर्डर था और मुझे रेस्टोरेंट पहुँचकर दिन भर का हिसाब देकर घर भी जाना था।”
धर्मपाल के फ़ोन की घंटी बजी तो उसने सुना। सुनने के बाद उसने अनिल शर्मा के कान में कहा – “साहब, इधर के सेंधमारों की हिस्ट्री यह बताती है कि वह उन्हीं चीजों पर हाथ फेरते हैं जो उन्हें महँगी नज़र आती है।”
उसी वक़्त, नीचे दिल्ली पुलिस का सायरन सुनाई दिया। धर्मपाल ने कहा – “आ गए थाने वाले।”
“हाँ, आदतन देर से आये। क्योंकि अब मुझे पता चल गया है कि चोरी किसने की है।”

नोट – प्रतियोगियों एवं पाठकों, अब आपको यह बताना है की ‘नंदी मूर्ति’ को किसने चुराया? अगर आप उस अपराधी को खोज निकालते हैं तो उसी के आधार पर आप इन्हीं किरदारों के साथ ऊपर लिखी कहानी को आगे बढ़ाइए जिसमे इस बात का जिक्र हो की चोरी कब, कैसे और क्यों किया। इस भाग में आप जिन तथ्यों, सुरागों एवं सूत्रों का प्रयोग करके अपराधी को खोज निकाला है उन्हीं के द्वारा आगे की “कहानी” प्रस्तुत कीजिये जिसे हम ‘फाइनल चैप्टर’ कहते हैं। आपको अपने हिस्से की कहानी को अधिक से अधिक 1000 शब्दों में कहना है। प्रतियोगी इस बात का ध्यान रखें की आप किसी नए किरदार,घटना, सूत्र, सुराग एवं तथ्य को ‘फाइनल चैप्टर’ में नहीं इस्तेमाल करेंगे, सिर्फ ऊपर दिए गए कहानी में मिले सूत्रों, सुरागों और तथ्यों के द्वारा ही “फाइनल चैप्टर” में अपनी कहानी कहनी है।

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नंदी की चोरी (मिस्ट्री ऑफ़ द मंथ – अप्रैल 2017)
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