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बन्दिनी!

“प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ,

    विफलत्वमेति बहु साधनता।

 अवलम्बनाय दिनभर्तुरभून्न

    पतिष्यतः करसहस्रमपि ।।”

   (माघ:)

   मुझे चैतन्य जानकर रामदयाल ने कहा,–“ ओ कैदी औरत! अब उठ और कोठरी का दरवाजा खोल। देख तो सही, कि कितना दिन चढ़ आया है! कानपुर से कोतवाल साहब और पुलिस के बड़े साहब भी आ गए हैं और तुझे बुला रहे हैं।”

   यह सुनकर मैंने बाहर की ओर देखा तो क्या देखा कि दिन डेढ़ पहर के अंदाज चढ़ आया है, मेरी कोठरी के सामने एक मूढ़े पर एक अंगरेज बैठे हैं और कई लाल पगड़ीवाले उनके अगल-बगल और पीछे खड़े हैं! यह देखकर मैंने रामदयाल से कहा कि,– “साहब को भेजो।”

   मैंने देखा कि, मेरी बात सुनकर रामदयाल चौकीदार ने उन साहब बहादुर के सामने जाकर कुछ कहा, जिसे सुनकर वे मूढ़े पर से उठकर मेरी खिड़की के पास आए और बहुत ही मीठेपन के साथ यों कहने लगे,– “टुमारा नाम क्या है?”

   मैं बोली,–“दुलारी।”

   वे बोले,–“अ्रच्छा, डुलाड़ी! टुम अब डरवाजा खोल डो।”

   मैं बोली,–“बहुत अच्छा, मैं अभी दरवाजा खोलती हूँ; पर पहिले आप कृपा कर इस बात का मुझे विश्वास तो दिला दें कि, मेरी इज्ज़त-आबरू पर तो कोई जाँच न पहुंचेगी!

           वे बोले, “नेईं, कबी नेईं। टुमारा इज्जट कोई नेईं बिगाड़ने शकटा। ब्रिटिश का राज़ में औरट का इज्जट कोई नईं लेने शकटा। टुम बेखौफ डरवाजा खोलो।”

      यह सुनकर मैंने तुरन्त दरवाजा खोल दिया। बस, ज्योंही मैं दरवाजे के बाहर हुई, त्योंही साहब बहादुर ने कहा,–“ ओ औरट! टुम खून का अशामी है, इश वाशटे टुमको हठकड़ी पहनना होगा।”

      यह सुनकर मैंने कहा,–“नहीं, साहब! आप ऐसी बात न कहिए और मेरा बयान सुने बिना मुझे ऐसा इल्जाम मत लगाइए  क्योंकि मैंने कोई खून-ऊन नहीं किया है।”

      इस पर साहब बहादुर ने कहा,–“आलरट, टुम ठीक बोलटा हाय; पर जब टक टुम बेकसूर साबिट नहीं होगा, टब टक टुमको हठकड़ी पहरना व कैड में रहना होगा।”

      यह सुनकर मैंने अपने दोनों हाथ फैला दिए और साहब बहादुर का इशारा पाकर एक पुलिस अफसर ने मुझे हथकड़ी पहना दी। मुझे उसी समय यह मालूम हो गया था कि जिन्होंने मुझे हथकड़ी पहराई थी, वे कानपुर के कोतवाल थे।

      बस, फिर मैं तो चार सिपाहियों के पहरे में एक ओर खड़ी कर दी गई और साहब बहादुर और कोतवाल साहब उस कोठरी की ओर चले गए, जिसमें खून हुआ था।

      थोड़ी देर के बाद वे दोनों उस कोठरी से बाहर हुए और एक पेड़ की छाया में आकर साहब बहादुर तो एक मूढ़े पर बैठ गए और सिगार पीने लगे, और कोतवाल साहब एक चारपाई पर बैठकर मुझसे बोले,-“तुम अपना बयान लिखवाओ।”

      यह सुनकर भी जब मैं चुपचाप खड़ी रही, तब साहब ने मुझसे कहा,–“टुम बोलटा क्यों नेईं?”

      इस पर मैने यों कहा,–“साहब, हिन्दुस्तानियों के अत्याचारों को देखकर उन पर से मेरा सारा विश्वास उठ गया है। इसलिये जब तक आप ख़ुद कोई हुकुम न देंगे, तब तक मैं किसी दूसरे के कहने से कुछ भी न करूँगी।”

      मेरी बात सुनकर साहब जरा सा मुस्कुराए और कहने लगे,-“अच्छा बाट है। हम हुकुम डेटा है, टुम अपना बयान बोलो।”

      मैं बोली,–“बहुत अच्छा, सुनिए–”

      यों कहकर जो कुछ सच्ची बात थी, उसे मैं कहती गई और कोतवाल साहब झट-झट लिखते गए।

       बस, यहाँ तक कहकर मैंने उन साहब बहादुर की ओर देखकर यों कहा, जो बारिस्टर साहब और भाई दयालसिंहजी के बीच में बैठे हुए मेरा बयान लिख रहे थे,—“क्यों साहब! क्या मैं उस कहानी को फिर दुहराऊँ, जिसे कि मैंने अभी ऊपर सिलसिलेवार बयान किया है?”

       यह सुनकर साहब ने कहा,–‘नेई , अब डुबारा उस बाट के कहने का कोई जरूरट नेई है। टुम खूब ठीक टरह से अपना बयान बोला। बस, इसी टौर से बराबर बोलना ठीक होगा। चलो, आगे बोलो।”

        इसपर–“बहुत अच्छा”—कहकर मैंने यों कहा,–

        बस, जब मेरा सारा बयान लिखा जा चुका, तब वहाँ पर के छओं चौकीदारों का बयान लिया और लिखा गया। उन चौकीदारों का बयान मैंने भी सुना था और उसके सुनने से मुझे बड़ा आश्चर्य इस बात का हुआ था कि दियानत हुसैन और रामदयाल सरीखे भले आदमियों ने भी हलफ लेकर न जाने क्यों, बहुत कुछ झूठा ही बयान लिखवाया!!! पर ऐसा उन्होंने क्यों किया, इसे मैं इस समय तो नहीं समझी, पर पीछे समझ गई थी।

        इन सभों ने अपने बयान में जो कुछ कहा था, उसका खुलासा मतलब यही है कि, “यह औरत एक बैलगाड़ी पर चढ़कर यहाँ आई थी, पर इसके साथ थानेदार अब्दुल्ला की क्या-क्या बातें हुई, उन्हें हमलोग नहीं जानते। हाँ, इतना हमलोग जानते हैं कि इस औरत को उस (उंगली से दिखलाकर) कोठरी में बंद करके अब्दुल्ला हींगन चौकीदार के साथ उसी बैलगाड़ी पर इस औरत के गाँव की ओर चले गए थे। क्योंकि हमलोगों ने यह सुना था कि, “शायद यह औरत अपने घर में पाँच खून कर आई है!!!’ सो, हमसब थानेदार के हुकुम-मुताबिक इस औरत का पहरा देने लगे। इस जगह इस औरत ने जो यह कहा है कि, ‘रामदयाल ने मुझे दूध पिलाया और फिर रामदयाल और दियानत हुसैन ने मुझसे अब्दुल्ला और हींगन की बहुत सी शिकायत की।’ यह बात इस औरत की सरासर झूठ है। क्योंकि इस औरत के साथ न तो किसी ने किसी किस्म की बातचीत ही की और न दूध ही पिलाया। दूध तो क्या, पानी भी इसे किसी ने नहीं पिलाया। हाँ, पहरा जरूर देते रहे। फिर रात को अब्दुल्ला और हींगन इक्के पर लौटे, इसलिये यह बात हमलोग नहीं जान सके कि इस औरत की वह बैलगाड़ी क्या हुई! खैर, जब थानेदार घर लौट आए और खाना-वाना खाकर शराब पीने लगे, तब उन्होंने हम छओं चौकीदारों को यह हुक्म दिया कि,–“अब तुमसब अपनी-अपनी कोठरी में जाकर आराम करो। क्योंकि अब मैं उस कैदी औरत का इजहार लूँगा और उससे उन खूनों को कबूल कराऊँगा। इसमें मुमकिन है कि वह औरत खूब शोर-गुल मचावे, मगर तुमलोग इसकी चीख-चिल्लाहट सुनकर यहाँ मत आना और अपनी कोठरी में ही रहना। यहाँ मेरे पास सिर्फ हींगन रहेगा।” बस, थानेदार का ऐसा हुकुम सुनकर हमलोग तो अपनी कोठरी में चले गए। फिर जब इस औरत ने जाकर इस खून की बात कही, तब हमलोगों ने मारे जल्दी के इस औरत को तो अपनी ही कोठरी में बन्द कर दिया और अब्दुल्ला और हींगन के मारे जाने की रिपोर्ट करने कादिरबख्श और रामदयाल को कानपुर भेजा।”

        बस, उन छओं का यही बयान था!!!

        उन सब चौकीदारों के ऐसे झूठे बयानों को सुनकर मैं तो दंग रह गई, पर लाचार थी, क्योंकि उनके उन झूठे बयानों के ऊपर जो मैंने उजुर किया था, वह सुना नहीं गया! तब मैंने मन ही मन यह सोचा कि कदाचित ये लोग दूध पिलाने और अब्दुल्ला और हींगन की बुराई करने की बात इसलिए स्वीकार नहीं करते कि ‘कहीं वैसी बात मान लेने में उन्हीं लोगों को लेन के देने न पड़ जायें।’ किन्तु उनकी जिस कोठरी में मैं खुद घुस गयी थी, और भीतर से मैंने कुंडी चढ़ाकर बन्दूक दिखाई थी, उस बात को ये लोग क्यों नहीं सकारते? कदाचित, उन सभों को इस बात की लज्जा होगी कि, एक औरत ने इन छः हट्टे-कट्टे जवानों के कान काटे! अस्तु, जो कुछ हो, परंतु उस थाने पर मेरा स्वयं आना, मेरी बैलगाड़ी का गायब होना और फिर अब्दुल्ला और हींगन के कतल होने की खुद खबर देना इत्यादि बातों को उन चौकीदारों ने जरूर सकारा था। खैर, जितना उन सभों ने सकारा, उतना ही सही!

         अस्तु, इसके बाद कानपुर के कोतवाल साहब ने मेरी ओर् देखकर यों कहा,–“दुलारी, तुम्हारे घर में पाँच लाशें पाई गईं और वे कानपुर चालान की गईं। गो, उन पाँच खूनों- बल्कि यहाँ के भी दो खून उनमें शामिल कर देने से उन सात खूनों—का चश्मदीद गवाह तो कोई नहीं है, मगर हिरवा के गला घोंटने की बात तुमने खुद मंजूर की है, इससे ऐसा हो सकता है कि बाकी के छओ खून भी तुम्हारे ही किए हुए हों! क्योंकि अभी तुमने अपने बयान में यहाँ के चौकीदारों को भरी हुई बन्दूक दिखला कर गोली मार देने की बात कही है और जांच करने से यह बात भी मालूम हुई है कि यह बन्दूक भरी हुई है! सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि जहाँ पर तुम बैठी थी, वहाँ पर तुम्हारे कहने के मुताबिक एक नंगी तलवार भी धरी हुई मिली है। इन हालातों के देखने सुनने से यह बात साफ तौर से मालूम होती है कि तुम बड़ी जर्रार औरत हो और मौका पाकर और अपनी आबरू का ख्याल करके तुमने ये सात-सात खून खुद कर डाले हैं! कर तो डाले हैं, तुमने सात खून, पर अब चालाकी करके छः खूनों के बारे में तो तुम दूसरे ढंग की बातें कहती हो और सिर्फ हिरवा के खून की बात कबूल करती हो। सोभी इस ढंग से, कि जिसमें उस खून का भी जुर्म तुम पर न लग सके। वाकई, तुम एक निहायत जबरदस्त और होशियार औरत हो, तभी तो बड़ी दिलेरी का काम कर गुजरी हो! इसलिये अब तुम कानपुर के मजिष्ट्रेट के आगे पेश की जाओगी और वहाँ से जो कुछ होना होगा, सो होता रहेगा।”

       अरे, कोतवाल साहब की इस अनोखी बात को सुन कर मैं तो दंग रह गई! हाय, मेरा बयान कुछ नहीं, और उनका “तर्क” सब कुछ! सच है, जिसके हाथ में ‘दंड’ देने की शक्ति है, वह सब कुछ कर सकता है! निदान, मैंने कोतवाल साहब के साथ बहुत कुछ तर्क-वितर्क किया,–उन अंगरेज अफसर से भी बहुत कुछ कहा-सुना, पर मेरी बातों पर किसी ने कान ही न दिया! तब मैंने झुँझला कर उन साहब बहादुर से यों कहा,–“साहब, आप मेरे कहने पर क्यों नहीं ध्यान देते? यदि आप मेरे बयान पर खूब अच्छी तरह गौर करेंगे, तो यह बात आपको भली-भांति मालूम हो जाएगी कि, ‘मैंने जो कुछ भी कहा है, उसमें झूठ का लवलेश भी नहीं है।” देखिए, सुनिए और सोचिए कि यदि मैं हिरवा के गला घोंटने की बात स्वयं नहीं कहती तो आप क्या करते? मैंने तो उस समय क्रोध के आवेश में बदहवास होकर उसका गला दबाया था, कुछ उसके खून करने की मेरी इच्छा थोड़े ही थी। परंतु, यदि वह मर ही गया, तो उस खून के करने का अपराध मुझ पर कैसे लगाया जाता है? क्या उस समय मैं अपने आपे में थी, जो मुझे दोषी ठहराया जाता है? फिर अपनी इज्जत-आबरू के बचाने की गरज से यदि अनजानते में वैसा काम मुझसे हो ही गया, तो उसका दंड मुझे क्यों दिया जाएगा? मैं यह नहीं जानती कि आपके आईन-कानून में क्या लिखा है, पर खून करने की बात मैं कभी भी कबूल नहीं कर सकती, क्योंकि खून करने की इच्छा से मैंने हिरवा का गला नहीं दबाया था। खैर, जो कुछ हो, या आपलोग मेरी बातों का चाहे जैसा अर्थ लगावें, पर धर्मतः मैं निष्पाप हूँ और एक हिरवा को छोड़कर बाकी के छओं आदमियों के शरीर में तो मैंने उंगली भी नहीं लगाई है। आपका कानून मुझे चाहे जैसा दंड ड़े, पर इस बात का मुझे पूरा-पूरा भरोसा है कि परमात्मा मुझे अवश्य निष्पाप जान कर अपनी गोद में स्थान देगा।”

       मैं इतनी बातें ऐसी तेजी और इतने क्रोध के साथ कह गई कि उसे देख सुन कर साहब बहादुर और कोतवाल साहब एक दूसरे की ओर देख और आपस में कुछ अंग्रेजी में बातचीत करके हँस पड़े! फिर साहब बहादुर ने मेरी ओर देखकर यों कहा,–“डेखो, डुलारी! यह खून का मामला है। इसमें हम कुछ नेई करने शकटा। तुमको मजिष्ट्रेट साहब का शामने जरूर जाना होगा। फिर वहाँ पर टुम अपना जो कुछ कहना हो, शो बाट कहना। अगर टुमारा टकडीर में अच्छा होगा, टो टुम छूट भी शकटा है। इस बाशटे इस वकट टुम को थाने पर जाकर हाजत में रहना होगा।”

      मैं बोली,–“अच्छा साहब! मुझे जो कुछ कहना था, उसे मैं कह चुकी। अब आपके जो जी में आवे, सो आप कीजिए॥ मैं भी अब इस बात को देखूँगी कि संसार में ‘धर्म’ और ‘सत्य’ नाम के भी कोई पदार्थ हैं, या अब इस जगत में सोलहों आने कलिकाल का ही दौरदौरा हो रहा है!!!”

      मेरी इन बातों का जवाब कुछ भी नहीं मिला!!!

      बस, फिर मैं तो एक बैलगाड़ी पर चार कांस्टेबिलों के पहरे में कानपुर रवाने की गई और साहब बहादुर और कोतवाल साहब वहीं रह गए। यहाँ पर एक बात और भी समझ लेनी चाहिए। वह यह है कि अब जिस बैलगाड़ी पर मैं कानपुर जा रही थी, वह दूसरी थी, मेरी न थी। तो, मेरी क्या हुई? यह मैं नहीं जानती, क्योंकि इसके विषय में मुझसे किसी ने कुछ भी नहीं कहा।

       कानपुर लाई जाकर मैं कोतवाली की एक तंग कोठरी में बन्द की गई। उस समय दीया बल चुका था। मेरे साथ जो चार कांस्टेबिल आए थे, वे सब कानपुर के थे, उस गाँव के नहीं थे।

       एक घड़ी पीछे एक कांस्टेबिल ने आकर मुझसे यह पूछा कि,–“तुझे कुछ खाना-पीना है?”

       इस पर “नहीं” कह कर मैंने उसे विदा किया और कोठरी में पड़े हुए कंबल के ऊपर मैं पड़ रही।

       मुझे आज सारे दिन का कोरा उपवास था और कल रामदयाल का दिया हुआ केवल दूध मैंने पीया था। फिर भी उस कांस्टेबल को मैंने लौटा दिया और कुछ भी न खाया। यह क्यों? भला, अब इसका जवाब मैं क्या दूँ? मेरे पास यदि उस बात का कोई जवाब है तो केवल यही है कि उस समय भी मैं अपने आपे में न थी और पगली की तरह रह-रह कर चिहुँक उठती थी। मुझे रह-रह कर अपनी माता की शोचनीय मृत्यु, अपने पिता का यों ही नदी में बहाया जाना, हिरवा का मरना, कालू इत्यादि का आपस में कट मरना, अब्दुल्ला और हींगन का परस्पर लड़ मरना और मुझे इन सात-सात खूनों का अपराध लगाया जाना-इनमें से प्रत्येक बात ऐसी थी, जो मेरे कलेजे को एकदम से मीसे डालती थी।

      सो, बस, देर तक मैं उस कंबल पर पड़ी-पड़ी तरह-तरह के सोच-विचारों में डूबती-उतराती रही। उसके बाद मुझे नींद आ गई, पर उस नींद में भी मुझे चैन न मिला, वरन बड़े बुरे-बुरे सपने दिखाई देने लगे!!!

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