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आशा का अंकुर 

अनुकूले सति धातरि भवत्यनिष्टादपीष्टमविलम्बम् ।

पीत्वा विषमपि शंभुर् मृत्युंजयतामवाप तत्कालम् ॥

                                    (नीतिरत्नावली)

अस्तु, जब मैं दूध पी चुकी, तो मैंने क्या देखा कि जेलर साहब दो भले आदमियों के साथ मेरी कोठरी की ओर आ रहे हैं और उनके पीछे-पीछे एक आदमी दो कुर्सियाँ लिए हुए चला आ रहा है। मेरी कोठरी के आगे दालान में वे दोनों कुर्सियाँ डाल दी गईं और जेलर साहब ने मेरी ओर देखकर यों कहा,– “दुलारी, इन दोनों भले आदमियों में से जो काला चोगा पहिरे और बड़ा सा टोप लगाए हुए हैं, ये ही तुम्हारे बारिस्टर हैं और जो सादी पोशाक पहिरे और मुरेठा बांधे हुए हैं, ये सरकारी जासूस हैं। ये लोग जो कुछ तुमसे पूछें, उसका तुम मुनासिब जवाब देना। अभी बारह बजे हैं, और ये दोनों साहब पांच बजे तक, अर्थात्‌ पांच घंटे तक यहां ठहर सकेंगे। बस, जब ये लोग जाने लगेंगे,  तब यही आदमी, जो कुर्सियाँ लाया है, मुझे इत्तला कर देगा और तब मैं आकर इन दोनों साहबों को जेल से बाहर कर दूँगा।”

    बस, इतना मुझसे कह कर जेलर साहब ने उस आदमी की ओर देख कर यों कहा,– “रतन, तुम यहीं ठहरना और जब ये दोनों साहब जाने लगें तो मुझे तुरन्त खबर करना।”

    यों कह कर जेलर साहब तो वहां से चले गए, पर उनका आदमी रतन मेरी कोठरी के आगे वाले बरामदे में बंदूक कन्धे पर धर कर टहलने लगा। वे दोनों भले आदमी, अर्थात्‌ बैरिस्टर साहब और जासूस साहब एक-एक कुर्सी पर बैठ गए और मैं अपनी कोठरी में जंगले के पास खड़ी रही।

    मेरे साथ उन दोनों आदमियों की क्या-क्या बाते हुईं, उनके लिखने के पहिले मैं उन दोनों साहबों की सूरत शक्ल का कुछ थोड़ा सा बयान यहाँ पर किये देती हूँ।

    काले रंग का चोगा पहिरे और अंगरेजी टोप लगाए हुए जो बारिस्टर साहब थे, वे मेरे अन्दाज़ से चौबीस-पच्चीस बरस से जादे उम्र के कभी न होंगे! वे दुबले-पतले, खूब गोरे और लंबे कद के बड़े सुन्दर जवान थे और अभी तक उन्हें अच्छी तरह मूंछें नहीं आई थीं। और वे जो दूसरे जासूस साहब थे, वे खूब मोटे, कुछ नाटे कद के, सांवले रंग के और साठ बरस के बूढ़े पंजाबी मालूम होते थे। उनकी कानों पर खिंची हुई दाढ़ी और मूँछों के बाल बिल्कुल सफ़ेद हो गए थे और उनके मुखड़े के देखने से मन में उनके ऊपर बड़ी श्रद्धा होगे लगती थी।

    जब कहने ही बैठी हूँ, तब कोई भी बात मैं न छिपाऊंगी और अपनी जीवनी की सारी बातें खोलकर लिख डालूँगी। इससे इसके पढ़नेवाले चाहे मुझे किसी दृष्टि से देखें, पर मैं अपनी जीवनी की किसी बात को भी नहीं छिपाऊंगी। तो मेरे इस कहने का क्या अभिप्राय है? यही कि भाई दयालसिंहजी को देखकर मेरे मन में उनपर जैसी श्रद्धा हुई थी, वैसी ही बारिष्टर साहब को देखकर उनपर भक्ति भी हुई थी। वह भक्ति बड़ी पवित्र, बड़ी पक्की और बड़ी ही हृदयग्राहिणी थी। पर मुझे देखकर उनके मन में कैसे भाव का उदय हुआ था, इसे तो उस समय वे ही जान सकते थे। वे रह-रह कर मुझे सिर से पैर तक निरखते, भरपूर नजर गड़ाकर मेरी ओर देखते और मुँह फेर-फेर कर इस तरह ठंढी-ठंढी सांसे भरने लगते थे कि उसे मैं भली-भांति समझ सकती थी। अस्तु, अब उन बातों को अभी रहने देती हूँ।

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