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अयाचित बन्धु

उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे |

राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ||

(चाणक्य:)

अस्तु, अब यह सुनिए कि कुर्सियों पर बैठ जाने पर उन नौजवान बैरिष्टर साहब ने मुझे सिर से पैर तक फिर अच्छी तरह निरख कर यों पूछा,–‘दुलारी तुम्हारा ही नाम है?”

मैंने धीरे से कहा,– “जी हां।”

वे बोले,—“ अच्छा तो, और कुछ पूछने के पहिले मैं अपना और अपने साथी का कुछ थोड़ा सा परिचय तुम्हें दे देना उचित समझता हूँ। यद्यपि हम लोगों का कुछ थोड़ा सा परिचय जेलर साहब तुमको दे भी गए है, पर तो भी मैं अपने ढंग पर अपना और अपने साथी का कुछ परिचय दे देना ठीक समझता हूँ। सुनो, ये मेरे साथी सरकारी जासूस हैं। ये जब बीस बरस के थे, तभी सरकारी जासूसी महकमे में भरती हुए थे, जिस बात को आज चालीस बरस हुए। अर्थात मेरे साथी की उम्र इस समय साठ बरस की है और ये बत्तीस बरस तक सरकारी नौकरी करके बड़ी नेकनामी के साथ पेन्शन लेकर अब अपने घर रहते हैं। इनका नाम भाई दयालसिंहजी है, ये पंजाबी सिक्ख हैं और इन्हें सरकार ने ‘रायबहादुर’ की पदवी से भी सम्मानित किया है। इनके चार लड़के हैं, और वे चारों युक्तप्रदेश के भिन्न-भिन्न जिलों में डिप्टी कलक्टरी के पद पर सुशोभित हैं। इनके सबसे छोटे लड़के भाई निहालसिंह से, जो आजकल प्रयाग के डिप्टी कलक्टर हैं,  मेरी बड़ी गहरी दोस्ती है और उन्हीं की बड़ी कृपा और प्रेरणा से उनके ये बूढ़े पिता भाई दयालसिंहजी इस बुढ़ौती की उम्र में अपने घर के सारे आराम को दूर रखकर इस जाड़े पाले में तुम्हारी भलाई के लिये यहाँ आए हैं। एक सप्ताह के लगभग हुआ होगा कि तुम्हारी विपत्ति का सारा हाल मुझे अपने मित्र भाई निहालसिंहजी डिप्टी कलक्टर से मालूम हुआ और उन्होंने मुझे ‘पायनियर’ अखबार दिखलाया, जिसमें तुम्हारे मुकदमे का पूरा हाल लिखा हुआ था। उसी समय उन्होंने मुझे तुम्हारे बचाने के लिये बहुत कुछ कहा और अपने इन्हीं बूढ़े पिता को तार देकर प्रयाग बुलाया। बस, इनके आ जाने पर मैं यहाँ आया और तुम्हारे मुकदमे के कुछ कागजात देखकर इन्हें तो यहीं छोड़ दिया और मैंने फिर इलाहाबाद वापस जाकर जज के फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी। इसके बाद मैं फिर यहाँ वापस आ गया और भाई दयालसिंहजी से मिला। तबतक इन्होंने भी अपनी मुनासिब कार्रवाई कर डाली,–अर्थात तुम्हारे मुकदमे के कुछ कागजात भलीभाँति देख डाले और जासूसी महकमे के बड़े अफसर से मिलकर उससे इस बात की इजाजत ले ली कि, “इस मुकदमे की जाँच में फिर से करूँ और जबतक मेरी जाँच का अखीर न हो ले, तबतक मुजरिम को आराम से रक्खा जाये।”  बस, जासूसी महकमे के बड़े अफ़सर ने इनके खातिरखाह इन्हें इस मुकदमे की जाँच करने का परवाना दे दिया और उसे पाकर ये अपनी कार्रवाई करने लगे। इतने ही में मैं यहाँ आ गया और इनसे मिला। फिर मजिस्ट्रेट से इजाजत लेकर आज हम-दोनों तुम्हारे पास आए हैं और इसलिये आए हैं कि तुम उन सातों खूनों के बारे में ठीक-ठीक हाल हमलोगों के आगे बयान कर जाओ। बस, जब तुम्हारा बयान हमलोग सुन लेंगे, तब तुम्हारे मुकदमे में भरपूर कोशिश कर सकेंगे।”

मैं तो बारिस्टर साहब की इतनी लंबी चौड़ी वक्तृता सुनकर सन्नाटे में आ गई। मैंने मन ही मन यह सोचा कि जब ये मुझ जैसी एक साधारण स्त्री के सामने एक ही सांस में बे रोक टोक इतना बक गए तो फिर अदालत के हाकिमों के सामने कितना और किस तेजी के साथ बोलते होंगे! अस्तु, मैं मन ही मन यही सब बातें सोच-सोच कर चकित हो रही थी कि मुझे चुपकी देखकर उन बूढ़े जासूस महाशय ने मुझसे यों कहा,–

    “दुलारी! सुनो बेटी!  ये बारिस्टर साहब यद्यपि मेरे सबसे छोटे लड़के के दोस्त और उसी के हमउम्र भी हैं,  परन्तु इनकी विद्या, बुद्धि और वाग्मिता बहुत ही बढ़ी चढ़ी है। यद्यपि अभी दो ही बरस हुए कि ये विलायत से बैरिस्टरी पास कर के यहाँ आकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपना काम करने लगे हैं, पर इतने ही थोड़े दिनों में इन्होंने वे काम किए हैं कि जिनके कारण हाईकोर्ट के बड़े-बड़े नामी वकील-बारिस्टरों में इनकी धाक सी बंध गई है, हाईकोर्ट के जज लोग भी इनका लोहा मान गए हैं और अबतक जिन-जिन मुकदमों को इन्होंने हाथ में लिया, उन-उन में ये पूरे-पूरे कामयाब हो चुके हैं। मेरे लड़के के बहुत आग्रह करने से, और साथ ही यह भी जानकर कि तुम इन्हीं की जाति की लड़की हो, ये इस बात पर तुल गए हैं कि तुम्हें अपने भरसक जरूर ही फांसी से बचायेंगे। आगे जगदीश्वर ने जो कुछ तुम्हारे भाग्य में लिखा होगा, वही होगा। अस्तु, अब तुमसे यही कहना है कि एक बेर तुम अपनी सारी कहानी हमलोगों के आगे कह जाओ। बस, उसके सुन लेने पर हमलोग अपनी राय कायम करेंगे और यदि तुम्हारे बचने की कुछ भी आशा की जायेगी  तो जी जान से परिश्रम करके तुम्हें बेदाग बचा लेने की कोशिश करेंगे।”

      बूढ़े जासूस भाई दयालसिंहजी की मीठी बातें सुनकर उन पर मेरी बड़ी श्रद्धा हुई और मैंने उनकी ओर देखकर यों कहा,– “महाशयजी, मुझसे जो कुछ आपलोग सुनना चाहते हैं, वे सारी बातें तो मेरे बयान में आ ही चुकी हैं और उन्हें आपलोग देख भी चुके हैं, फिर अब उन बातों के अलावे नई बात मैं क्या कहूँगी, जिसे आपलोग सुनना चाहते हैं? ”

 उन्होंने कहा,– “हाँ, यह सब ठीक है और तुम्हारे इजहार की पूरी-पूरी नकल भी मेरे पास मौजूद है; पर फिर भी एक बार हमलोग तुम्हारी कहानी तुम्हारे ही मुँह से सुनना चाहते हैं। यद्यपि जो इजहार तुमने पुलिस अफसर और मजिस्ट्रेट के आगे दिए थे, बिलकुल वही बयान तुमने जज के आगे भी किया और इस ढंग से किया कि तुम्हारे उन तीनों बयानों में रत्ती भर भी फरक नहीं पड़ा है। तो भी इस समय हमलोग तुम्हारा बयान फिर लिया चाहते हैं और यह देखा चाहते हैं कि अब, इस समय के तुम्हारे बयान के साथ तुम्हारे पहिले के बयान किए हुए वे तीनों बयान मिलते हैं, या उनमें और इस समय के बयान में कुछ फर्क पड़ता है।”

यह सुनकर मैंने पूछा,–‘ तो इतनी कोशिश आपलोग क्यों कर रहे हैं?”

उन्होंने कहा,–“सिर्फ तुम्हारे बचाने के लिये।”

मैंने पूछा,–“मेरे बचाने से आपलोगों को क्या लाभ होगा?”

उन्होंने कहा,– “एक अमूल्य प्राण के बचाने से बढ़कर संसार में और कोई लाभ हई नहीं।”

यह सुनकर मैंने यों कहा,– “किन्तु मैं अपने इस तुच्छ और अधम प्राण के बचाने की कोई आवश्यकता नहीं समझती।”

उन्होंने कहा,– “तुम अभी निरी नादान लड़की हो, तभी ऐसा कह रही हो। सुनो, मनुष्य को चाहिए कि अपने प्राण के बचाने के लिये जहाँ तक हो सके, पूरी-पूरी कोशिश करे। यदि उपाय के रहते भी कोई अपने प्राण बचाने का यत्न न करेगा तो उसे निश्चय ही आत्महत्या करने का पाप लगेगा।”

जरा सा मुसकुराकर मैंने कहा,– “आपका कहना बिलकुल ठीक है, पर मेरी समझ में तो यह आता है कि जिस अधम नारी को सात-सात खून करने के अपराध लगाए गए, उसका संसार से उठ जाना ही ठीक है, क्योंकि मुझ जैसी घृणित स्त्री यदि जेल से छूटेगी भी, तो वह फिर संसार में कहाँ खड़ी होगी, किस तरह लोगों को अपना काला मुँह दिखलावेगी और किसकी सरन गहेगी? आपलोगों को कदाचित यह बात मेरे इजहार के देखने से भलीभाँति मालूम हो गई होगी कि इस संसार में अब मेरा कोई नहीं है। मैं कुमारी हूँ और सात-सात खून करने के अपराध में जेल की कालकोठरी में पड़ी हुई भरपूर सांसत भोग रही हूँ। अब इस दशा को पहुँचकर भी, यदि मैं किसी भांति छूट जाऊँ तो मेरे छूटने से संसार की क्या भलाई होगी और मुझ “खूनी औरत” को कौन अपनावेगा? तब मेरी यह दशा होगी कि मैं समाज से दुरदुराई जाकर इधर-उधर की ठोकरें खाती हुई भीख मांगती डोलूँगी और न जाने कैसे-कैसे घोर संकटों का सामना करूँगी। ऐसी अवस्था में डस घृणित जीवन से इस फांसी की तख्ती को मैं करोड़ गुना अच्छी समझती हूँ। इसलिये आपलोगों से मैं हाथ जोड़ कर यह विनती करती हूँ कि आपलोग मुझे बचाकर और भी घोरातिघोर दु:खसागर में यों डुबाने का प्रयत्न न करें और मुझे सुख से मरने दें। आपलोगों ने जो निःस्वार्थ भाव से मेरे लिये इतना कुछ किया, इसी के लिये में हृदय से आप लोगों की कृतज्ञ हूँ और असंख्य धन्यवाद आपलोगों को देती हूँ।”

     बस, इतना कहते-कहते मैं फूट-फूट कर रोने लगी और देर तक रोया की।  फिर बारिस्टर साहब और जासूस साहब के बहुत कुछ समझाने पर मेरा चित्त कुछ शान्त हुआ और जासूस भाई दयालसिंहजी ने यों कहा,– “दुलारी, मैं समझता हूँ कि तुम बड़ी समझदार लड़की हो, इस लिये इन व्यर्थ की बातों को तुम अपने जी से दूर करो और अपना चित्त ठिकाने करके मेरे आगे अपनी कहानी जरा दुहरा डालो।”

      इसपर मैं कुछ कहना ही चाहती थी कि इतने ही में जेलर साहब वहाँ आ गए और उन्होंने जासूस साहब और बारिस्टर साहब की ओर देखकर यों कहा,– “क्यों, साहबों चार तो बज गये और अब सिर्फ एक घण्टा यहाँ पर आपलोग और ठहर सकते हैं, क्योंकि पांच बजे के बाद फिर यहाँ पर कोई भी नहीं रह सकता।”

      यह सुन कर अपने जेब में से एक कागज निकाल कर भाई दयालसिंहजी ने जेलर साहब के हाथ में दिया और कहा—“लीजिए, इसे पढ़कर मुझे वापस कीजिए।”

      यह सुन और उस कागज को अपने हाथ में ले तथा पढ़ने के बाद उसे लौटाकर जेलर साहब ने बड़ी नम्रता से भाई दयालसिंहजी से कहा,– “ओहो! तो अबतक इस हुक्मनामे को आपने मुझे दिखाया क्यों नहीं? खैर, यह आपके बड़े साहब का हुक्मनामा है और इसपर मजिस्ट्रेट साहब की भी सिफ़ारिश है। बस, अब आप तनहा, या अपने किसी साथी के साथ जबतक चाहें, जेल के अंदर रह सकते, और जब चाहें, तभी आकर कैदी से बातचीत कर सकते हैं।”

       जेलर साहब की बातें सुनकर मैं मन ही मन भाई दयालसिंहजी की ताकत का अन्दाजा लगाने लगी और उन्होंने जेलर साहब से कहा,– “लेकिन फिर भी, अब इस समय हमलोग जाते हैं। कल हमलोग सुबह ग्यारह बजे आवेंगे और शाम तक रहकर इस कैदी औरत (मेरी तरफ इशारा करके) का इजहार लिखेंगे।”

       यों कहकर भाई दयालसिंहजी उठ खड़े हुए और उनके साथ ही साथ बारिस्‍टर साहब भी खड़े हो गए। फिर वे दोनों जेलर साहब के साथ चले गए और जेलर का वह आदमी “रतन” उन कुर्सियों को उठाकर ले गया।

       वे दोनों जब चले गए, तब मेरे मन में तरह-तरह के खयाल उठने लगे, और मेरे सिर में ऐसे-ऐसे चक्कर आने लगे कि मैं फिर बैठी न रह सकी और अपना माथा पकड़कर धरती में लेट गई। कब तक मैं उस हालत में रही, इसकी तो मुझे कुछ सुध नहीं रही, पर जब दीया बले एक कांस्टेबिल के आकर मुझे पुकारा तो मैं चैतन्य हुई।          फिर वह कांस्टेबिल मुझे दूध देने लगा, पर उस समय मेरा जी इतना बेचैन हो रहा था कि मुझसे वह भी न पीया गया। हाँ, मैंने थोड़ा सा ठंढा पानी जरूर पी लिया और इसके बाद मैं धरती में पड़े हुए कम्बल पर पड़ रही। सारी रात मैंने बड़े बुरे-बुरे सपने देखे और सबेरे जब मुझे एक कांस्टेबिल ने आकर खूब जगाया, तब कहीं मेरी नींद खुली।

        सबेरे दो हथियार बंद कांस्टेबिल और चार कैदी औरतों के साथ जाकर मैं मामूली कामों से छुट्टी पा आई और फिर अपनी कोठरी में बैठी हुई जासूस और बारिस्टर की बातों पर गौर  करने लगी। मैंने मन ही मन यों सोचा कि,  ‘वास्तव में जासूस भाई दयालसिंहजी बड़ी भारी ताकत रखते हैं और मेरे वे बारिष्टर साहब भी खूब ही बोलना जानते हैं। अतएव यह खूब सम्भव है कि ये दोनों ज़बरदस्त आदमी जब एक हुए हैं, तब अवश्य ही मुझे छुड़ा लेंगे; परन्तु फांसी या जेल से छुटकारा पाकर मैं क्या करूँगी, कहाँ जाऊँगी, किसके द्वार पर खड़ी होऊँगी और कौन मुझे अपनावेगा?’

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