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ताद्वशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोsपि तादृश: ।

सहायास्तादृशाश्चैव यादृशी भवितव्यता ॥

(नीतिविवेके)

थोड़ी ही देर पीछे ग्यारह बजे और जेलर साहब के साथ भाई दयालसिंहजी और बारिस्टर साहब आ पहुँचे। जेलर साहब ने मेरे कैदखाने का दरवाजा खोल दिया और वे तीनों उस कोठरी के बाहर खड़े हो गए। इन लोगों को देखकर मैं भी उठकर खड़ी हो गई थी।

मुझे वैसे ढंग से सिर झुकाए हुए खड़ी देखकर भाई दयालसिंहजी ने मुझसे यों कहा,– “बेटी, दुलारी! तुम्हारी सारी बातें जेलर साहब की जबानी मुझे अभी मालूम हुई हैं। तुमने जो कुछ कहा, वह बहुत ही ठीक कहा; पर यहाँ पर मैं एक ऐसी बात तुम्हें सुनाऊँगा, जिसे सुनकर तुम्हें कुछ संतोष होगा और तब फिर तुमको इतने व्रत या नियम करने की कोई आवश्यकता न रह जायेगी।”

मैंने पूछा,– ”तो वह बात कौन सी है?”

वे कहने लगे,– “क्या, यह बात तुम जानती हो कि तुम्हारे दूर के नाते के कोई चचा भी हैं?”

यह सुनकर मैने तुरन्त कहा,– “हाँ, हैं; वे कानपुर के पास ही एक गांव में रहते हैं और उनका नाम रघुनाथप्रसाद तिवारी है। एक बेर वे मेरे यहाँ आए थे, तब मैंने उन्हें देखा था; पर इस बात को बहुत दिन हो गए हैं। वे मेरे यहाँ किस काम के लिये आए थे, यह तो मुझे नहीं मालूम, पर इतना मुझे अच्छी तरह याद है कि एक दिन मेरे पिता के साथ उनकी बड़ी लड़ाई हुई थी और वे तनग कर चले गए थे। इस बात को आज आठ बरस हुए होंगे। बस, फिर तबसे न तो मैने उन्हें कभी देखा और न उनका कोई जिक्र ही अपने पिता के मुँह से सुना। अस्तु, तो इस समय आपने उनका जिकर क्यों किया?

वे बोले,– “सुनो, कहता हूँ। मैं तुम्हारे गाँव पर अभी कई दिन हुए, गया था और तुम्हारे चचा रघुनाथप्रसाद तिवारी से भी मिला था। उनकी जबानी, तथा उस गाँव के और-और लोगों की जबानी भी मुझे यह बात मालूम हुई कि, तुम्हारे पिता के मरने की खबर पाकर वे तुम्हारे घर आए। पर घर आने पर जब उन्हें यह मालूम हुआ कि, ‘तुम्हारे पिता गंगा में बहा दिए गए हैं और तुम खून के झमेले में फंस गई हो’; तब उन्होंने तुम्हारी आशा तो छोड़ दी और तुम्हारे पिता का पुत्तल-विधान कर के उनका विधिपूर्वक श्राद्ध किया। फिर श्राद्ध से निबटने पर एक-दो बार वे तुम्हारी टोह लेने कानपुर भी आए थे; पर जब उन्होंने यह देखा कि खून के जुर्म में तुम पूरे तौर से जकड़ गई हो, तो फिर वे तुम्हारे गाँव पर चले गए और तुम्हारे पिता के घर-द्वार और खेत पर अदालती कार्रवाई करके उन्होंने अपना कब्जा कर लिया। अब वे अपने गाँव को छोड़कर तुम्हारे पिता के घर में अपनी गृहस्थी के साथ आ बसे हैं और खेती-बारी करने लगे हैं। तुम्हारे पिता के साथ आठ बरस पहिले जो तुम्हारे चचा का झगड़ा हुआ था, उसकी बात भी वे मुझसे कहते थे। वह बात यही है कि वे अपने साले के लड़के के साथ तुम्हारा ब्याह कर देने के लिये बड़ा आग्रह कर रहे थे; पर तुम्हारे पिता ने उनकी वह बात नहीं मानी थी। बस, उस लड़ाई-झगड़े की जड़ यही थी। हाँ, तुम्हारे मुकदमे में जो उन्होंने कुछ भी पैरवी नहीं की, इस बात के लिए जब मैंने उन्हें बहुत फटकारा, तब उन्होंने अपनी गरीबी का हाल कहकर रोना प्रारंभ किया। फिर वे मेरे साथ तुमसे मिलने आना चाहते थे, पर यह समझकर मैं उन्हें अपने साथ नहीं लाया कि एक बेर इस बारे में तुमसे पूछ लूँ, तब उनसे तुम्हें मिलाऊँ। बस, मेरे इतने कहने-सुनने का मतलब केवल यही है कि तुम्हारे पिता का श्राद्ध इत्यादि हो गया है, इसलिये अब तुम उस बात की चिन्ता छोड़ो।

भाईजी की ये बातें सुनकर कुछ देर तक तो मैं चुप रही, फिर यों कहने लगी,– “सचमुच, मेरे पिता का श्राद्ध हो गया, यह सुन कर मुझे बड़ा संतोष हुआ। वास्तव में, मेरे पिता के श्राद्ध करने का अधिकार मेरे चचा को ही था। सो, ऐसा करके उन्होंने बहुत ही अच्छा काम किया। क्योंकि मैं पुत्री हूँ, इसलिये मेरा किया हुआ श्राद्ध कदाचित शास्त्रानुकूल न होता। अस्तु, और यह बात सुनकर भी मुझे बड़ा संतोष हुआ कि मेरे चचा ने मेरे पिता की बची-बचाई जगह-जमीन पर दखल कर लिया; क्योंकि वे कुटुंबी हैं और गोत्री भी हैं, इसलिये मेरे पिता की सम्पत्ति के वे ही सच्चे अधिकारी हैं। सो, अधिकारी ने अपना अधिकार पाया, यह बहुत ही अच्छी बात हुई। क्योंकि शास्त्र के अनुसार अपने पिता की सम्पत्ति पर पुत्री का कोई अधिकार नहीं होता। खैर, यह सब तो हुआ, पर फिर भी आपलोगों से मैं हाथ जोड़कर यही विनती करती हूँ कि जबतक मैं फांसी से छुटकारा न पाऊँ और जेल से बाहर न होऊँ, तबतक आपलोग मुझे उसी अवस्था में पड़ी रहने दें, जिस दशा में कि मैं इतने दिनों से जेल में रह रही हूँ। बस, मेरी इस प्रार्थना को आप कृपाकर स्वीकार कीजिए, तभी मुझे सच्चा और हार्दिक सुख संतोष मिलेगा।”

इस पर बारिस्टर साहब तो कुछ भी न बोले, पर भाई दयालसिंहजी बड़ा आग्रह करने लगे। पर जब मैंने किसी तरह भी उनकी बात न मानी, तो उन्होंने बहुत दुखी होकर जेलर साहब से यों कहा कि, “अच्छा, साहब! जिसमें यह लड़की संतुष्ट हो, वही आप कीजिए।”

यह सुनते ही जेलर साहब ने पांच-चार कांस्टेबिलों को बुलाया और उनके आने पर जेलर साहब के हुक्म से सारी चीजें उस कोठरी में से हटा दी गईं। इसके बाद लोहे की बाल्टी में पानी और टीन का गिलास लाकर रख दिया गया। और दो नया, किन्तु साधारण कंबल भी मुझे दे दिया गया। इसके बाद उन्हीं दोनों कहारियों में से एक कहारी एक कोरी हंडिया में दूध ले आई, जिसे बाहर जाकर मैंने पी लिया। फिर जब मैं मुँह-हाथ धोकर अपनी कोठरी में लौट आई, तब जेलर साहब मेरी कोठरी का ताला खुला छोड़कर चले गए! मैंने देखा कि आज मेरी कोठरी के आगे कोई कांस्टेबिल नहीं टहल रहा है!!!

जेलर साहब के जाने पर मेरी कोठरी के बाहर दालान में भाई दयालसिंह और बारिस्टर साहब एक-एक कुर्सी पर बैठ गए और भाईजी के कहने से मैं अपनी कोठरी के अन्दर जमीन में बैठ गई।

मेरा ऐसा ढंग देखकर भाई दयालसिंहजी ने कहा,– “हैं, हैं! यह तुम क्या करती हो? ऐसे जाड़े-पाले में खाली धरती में क्यों बैठती हो?”

यह सुन और सिर झुकाकर मैंने ज़रा सा मुसकुराकर कहा,—“जी, एक तो मुझे सर्दी-गर्मी के झेलने का जन्म से ही अभ्यास पड़ा हुआ है, दूसरे इस जेल ने मुझे और भी ठोस बना दिया है।”

यों कहते-कहते मेरी दृष्टि बारिष्टर साहब की ओर गई तो मैंने क्या देखा कि वे मुँह फेरकर अपनी आँखें पोंछ रहे हैं। यह देखकर मुझे बड़ा अचंभा होने लगा कि, ‘हाय, मुझ अभागिन के लिये वे इतने दुखी क्यों हो रहे हैं!’

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