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सभ्यता के दूसरे छोर पर
अपने पैरों से एक गोरा
दबाए बैठा है
एक काले की गर्दन
और काला चिल्ला रहा है-
‘आई कांट ब्रीद-आई कांट ब्रीद’

सभ्यता के इस छोर पर
जन्मना स्वघोषित श्रेष्ठ
कुछ इस तरह से बुने बैठे हैं मायाजाल
जिसमें फंसा है अधिकतर का गला
बोला भी नहीं जाता उनसे
बोलें तो सुना नहीं जाते किसी से
बस गूंज रहा है गान-
‘अहम् ब्रह्मास्मि-अहं ब्रह्मास्मि’

सभ्यता के ऊपरी सिरे पर
पूँजीपति करता है अट्टहास
नीचे सिर्फ़ गूंज रहा है
मजदूरों का मौन पदचाप
पिसता है उनका शरीर
निचुड़ती है आत्मा
उससे टपकता है अमृत
पर नीचे को नहीं सीधे ऊपर को
पहुँचता है पूँजीपति के कंठ में
पूँजीपति डकारता है
और दुहराता है- ‘कर्मफल-कर्मफल’

सभ्यता के भीतरी हिस्सों में
पुरुष सिर्फ पुरुष हैं
पर स्त्री है ‘सेकेंड सेक्स’
और बाकी हैं ‘थर्ड जेंडर’
यह क्रम ही इस भीतर का बाहर भी है
यहाँ एक चौथा भी है
जो वैसे तो कहलाता ईश्वर है
पर है वह पुरुष ही
और कहता है-
‘सब मैंने बनाया है’

सभ्यता के निचले हिस्से में
है गहन अंधकार
वहाँ अभी नहीं पहुंची है कोई रोशनी
उन अंधेरों से निरंतर आती है चित्कार
जिसे सुने जाने की है दरकार
पर अभी सब मुँह फेरे खड़े हैं उससे
वह चित्कार भेद न दे सभ्यता का कवच
आओ इसलिए सब मिलकर गाओ-
‘ओम शांति-ओम शांति’

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आलोक मिश्रा

जन्म: 10 अगस्त 1984 शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र) पेशा: अध्यापन रुचि- समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता लेखन, कुछ पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, मगहर आदि में।
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