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बारह साल बीत गए.

एक युग से पावागढ़ को घेरे हुए था- गुजरात का बादशाह महमूद बेगड़ा. वह परेशान और थका हुआ था.

एक दिन उसने अपने सेनापति से कहा- “लगता है कि हमें वापस ही लौटना पड़ेगा. यह हमारे लिये बड़े शर्म की बात होगी,”

सेनापति ने कुछ देर सोचा फिर गंभीर होकर कहा, “जहाँपनाह, जहां बहादुरी हार जाती है, वहां अक्ल से काम लेना चाहिए. मैंने सब व्यवस्था कर ली है.”

पावागढ़ पर महाराजा प्रतापसिंह चौहान का राज था. वह पताई रावत के नाम से विख्यात था. उसका एक नमकहराम साला था, सइया बाकलिया. सेनापति ने उसे ही लालच देकर अपनी ओर मिला लिया था.

बादशाह ने पूछा : “कैसे?”

“यह पावागढ़ के होने वाले नए महाराज सइया बाकलिया आपको बतायेंगे!” सेनापति ने अत्यन्त चापलूसी से कहा और एक अपरिचित व्यक्ति की ओर संकेत किया.

बेगड़ा ने प्रश्न भरी निगाह से बाकलिया की ओर देखा.

सेनापति ने फिर कहा, “यह पताई रावत के सगे साले हैं. ये हमें गुप्त रास्ता बतायेंगे. बिना गुप्त रास्ते को जाने हमें पावागढ़ को जीतने में बारह वर्ष और लग जायेंगे.

“हाँ, आलमपनाह !” बाकलिया ने कहा तो महमूद बेगड़ा ने बड़ी ही कृतज्ञता से बाकलिया की ओर देखा.

बाकलिया पावागढ़ का राजा बनने के लालच में अपना धर्म व कर्तव्य भूल गया. उसने एक रात पावागढ़ का गुप्त रास्ता बेगड़ा के सेनापति को बता दिया.

बादशाह की सेना किले में घुस गयी. जब पावागाढ़ के वीरों को इसका पता चला तो उन्होंने केसरिया बाना पहन लिया और दुश्मन से भिड़ गए. औरतें जौहर की ज्वाला में जलने लगीं.

सारा किला युद्ध की लपटों में जलकर भयानक हो उठा था.

महमूद बेगड़ा, सेनापति आलमशाह और बाकलिया किले में टहल रहे थे. चारों ओर वीरों के कटे हुए अंग बिखरे पड़े थे. कोई-कोई नर-मुंड तो हँसता हुआ लगता था.

एकाएक बादशाह चौंका. किले में एक मंदिर था. उस मंदिर के पास एक पीपल का पेड़ था, जिसके पास एक विशाल चिता जल रही थी. यही जौहर-स्थल था. उसमें सैकड़ों वीरांगनाएँ जल रही थीं.

बादशाह ने पूछा, “सेनापति! यह औरतें जल क्यों रही हैं?”

अपनी इज्जत और धर्म की हिफाज़त के लिए. इसे जौहर कहते हैं आलीजहाँ. जब वीर राजपूत और अन्य लोग यह जान लेते हैं कि अब हार पक्की है तब मर्द केसरिया बाना पहन लड़ते-लड़ते जान दे देते हैं और औरतें चिता में कूद जौहर कर लेती हैं.

सूर्य आकाश के बीचोंबीच चमक रहा था. कुछ यवन सैनिक मृत वीरों के गहने, कपड़े और दूसरी कीमती चीज़ें उठा रहे थे.

बादशाह ने बाकलिया की ओर तिरस्कार से देखा और व्यंग्य से कहा, “आपके भाईबंद केसरिया बाना पहन अपने वतन पर मर मिटे और आपने तो आज जरीदार अंगरखा पहन रखा है, दुधारी तलवार लटका रखी है, पगड़ी पर हीरे-मोतियों से जड़ा ‘सिरपेंच’ बाँध रखा है!”

बाकलिया कुछ समझा नहीं.

सेनापति मुस्कराकर बोला, “जहाँपनाह, आज बाकलिया साहब पावागढ़ के महाराजा बनेंगे न, यह सिंगार इन्होने इसीलिए किया है.”

अब बाकलिया प्रसन्नता में डूबकर बोला, “हाँ….हाँ…..आपने वायदा किया था कि आप मुझे पावागढ़ का राजा बनाएँगे.”

बादशाह ने गर्दन हिलाकर कहा, “लेकिन मैने तो आपसे यह कहा था कि मैं आपको सबसे उपर बिठाऊंगा…..और मैं अपने वायदे को ज़रूर पूरा करूँगा.”

“इसका मतलब तो यही है कि मैं अपने बहनोई की जगह राजा बनूँगा.” बाकलिया बोला.

चिता की आग एकदम भड़क गयी.

बादशाह और दूसरों ने देखा कि चिता की लकडियाँ ढह गयी हैं. तभी एक बारह-तेरह साल की लडकी भागती हुई आई. उसे देखते ही बाकलिया ने व्यग्रता से कहा, “जहाँपनाह, यह मेरी लाडेसर बेटी है.”

फिर उसने स्नेह भरे स्वर में अपनी बेटी से कहा, “आ मेरी लाड़ली…….देख! मैं राजा बन गया हूँ. अब तू राजकुमारी कहलाएगी. तू रथ पर बैठेगी और हाथी-घोड़ों की सवारी करेगी. आ…..मेरे नयनों की पुतली……आ!”

बाकलिया उसे अपनी गोद में लेने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा, वैसे ही वह किशोरी सिंहनी की तरह गरजकर बोली, “मुझे हाथ मत लगाइए, पिता जी !”

बाकलिया चौंक गया, “परंतु क्यों मेरी लाड़ली?”

“मैं माँ का सन्देश लेकर आयी हूँ. उसने कहलाया है कि तुम्हारे पिताजी आस्तीन के सांप हैं, हजारों नारियों के सुहाग को लूटने वाले यमराज हैं, हजारों भाई-बंधुओं व कुटुंब-कबीलों की ह्त्या करने वाले कसाई हैं. वे चांडाल और पापी हैं, जिन्होंने अपनी बहन के सुहाग को लूटा है. मैं आज ऐसे नीच की पत्नी कहलाकर अपने को जीतेजी मरा हुआ जान रही हूँ. जिस धरती का अन्न खाया, पानी पिया और जिस पर सोये, उसी सुंदर धरती को तुम्हारे बाप ने लाशों से सजा दिया. धिक् है ऐसे प्राणी को ! मैं उससे सारे सम्बन्ध तोड़ती हूँ!”

“नहीं बेटी…….नहीं!”

“पिताजी, मैं और मेरी माँ जौहर कर रहे हैं, एक देशद्रोही और नीच आदमी की मैं बेटी नहीं कहलाना चाहती.”

यह कहकर वह वापस लौट चली. बाकलिया जोर से चिल्लाया, “रुक जा, मेरी बेटी रुक जा ! मैं राजा हो गया हूँ…..सबसे ऊँचा !”

“घबराएँ नहीं !” बादशाह ने कहा.

बाकलिया ने आकुल स्वर में कहा, “मेरी पत्नी और मेरी बेटी भी जौहर की ज्वाला में कूद रही हैं….”

“चिंता न करिए………..हम आपको सबसे ऊपर बिठाएँगे……..उसके लिए इतना बलिदान तो करना ही पड़ता है!” बादशाह ने मुस्कराकर कहा.

वे लोग थोड़ा और आगे बढ़े. सामने एक चौदह साल का लड़का हाथ में कटार लिए मरा पड़ा था. उसके शरीर पर अनेक घाव थे. उसे देखते ही बाकलिया फूट-फूटकर रो पड़ा.

“क्या बात है?” बादशाह ने पूछा.

“जहाँपनाह, यह मेरा बेटा है. युद्ध करते-करते मर गया.”

“कोई बात नहीं!” बादशाह ने लापरवाही से कहा.

हाय! मेरा इकलौता बेटा भी बलिदान हो गया!” बाकलिया ने आह भरी.

बादशाह ने उसकी पीठ पर हाथ रखकर कहा, “तो क्या हुआ? आप तो पावागढ़ के राजा बनेंगे…..हमें आपको सबसे ऊंचा बिठाना है……एकदम सबसे ऊपर……सेनापति! इस गद्दार की गर्दन धड़ से अलग करके सभी लाशों के ऊपर रख दो. हमने वायदा किया था कि इसे सबसे ऊपर बिठाएँगे…..सब लाशों के ऊपर….”

“नहीं……नहीं! ” बाकलिया चीखा.

“कुत्ते…! जो अपने भाइयों का नहीं हो सकता, वह हमारा कैसे हो सकता है? बहन का सुहाग लूटने वाले लुटेरे ! हम तुझ जैसे कमीने पर दया नहीं कर सकते.”

बाकलिया बादशाह के पाँव पकड़ कर रोने लगा, “नहीं……नहीं……मुझे मत मारिये! “

पर बादशाह के संकेत पर सेनापति के आदमियों ने बाकलिया का सिर धड़ से अलग कर दिया. बादशाह ने कहा, “इस गद्दार का शव सब शवों के ऊपर रखना……हमारा वायदा है ना!”

वैसा ही हुआ.

फिर बादशाह ने सिर झुकाकर जौहर की ज्वालाओं को नमस्कार किया और सेनापति को साथ ले आगे बढ़ गया,

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