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The Inductive and Deductive Reasoning in Crime investigation 1

 

क्राइम फिक्शन के सभी सैदाइयों को दिल से नमस्कार।

आप सभी ने कई बार देखा होगा और गौर भी किया होगा की सर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का किरदार, सुनील जब भी मौकायेवारदात पर पहुँचता है तो वहां देखे गए तथ्यों के अनुसार क़त्ल के होने का सूरत-ए-अहवाल या खाका खींच देता है। वह यह बात या तो रमाकांत को बताता है या प्रभुदयाल को। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है की पुलिस की लाइन ऑफ़ एक्शन और सुनील की लाइन ऑफ़ एक्शन एक ही रही हो।

ऐसा ही आप सभी ने देखा होगा की, सुनील हर उपन्यास के अंत में तथ्यों, तर्कों और विश्लेषणों के आधार पर एक कहानी सुनाता है जो की तर्कपूर्ण लगता है, जिससे कि हत्यारा या मुजरिम आसानी से पकड़ा जाता है। इस कहानी में सुनील अपनी खोजबीन और तहकीकात को तो शामिल करता ही है साथ ही कल्पनाओं के आधार पर कुछ बातें उस बिंदु से आगे की भी कह देता है। सुनील इस कहानी में प्रभुदयाल से मिली मटेरियल ज्ञान का भी इस्तेमाल करता है – जैसे की फॉरेंसिक रिपोर्ट, फिंगर प्रिंट्स रिपोर्ट, बैलेस्टिक रिपोर्ट आदि। इस तरह से सुनील की इस कहानी में कुछ उसके अपने तर्क के साथ-साथ, तहकीकात से जुडी सत्य बातों का भी समावेश होता है।

दोस्तों उपरोक्त दोनों ही पंक्तियाँ जिस ओर इशारा करती हैं उसे – Inductive और Deductive रीजनिंग कहते हैं। अपराधिक तहकीकातों में इस विधा का खूब इस्तेमाल किया जाता है। अब तो दुनिया भर में इस विधा को विश्वविद्यालाओं में पढाया भी जाता है। Inductive और Deductive रीजनिंग के सिद्धांत लगभग १५० वर्षों से अपराधिक तहकिकातों में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। इस सिद्धांत का इस्तेमाल पारंपरिक अपराधों जैसे क़त्ल, चोरी, डकैती, धोखाधड़ी और सेंधमारी आदि के तहकीकात एवं जांच के लिए किया जाता रहा है। लेकिन अब इस सिद्धांत के इस्तेमाल का भी विस्तार हुआ है और सीरियल किलर, वहशी दरिन्दे, ड्रग डीलर्स और संगठित अपराधों के खात्मे और तहकीकात के लिए भी किया जाने लगा है। सन २००१ में अमेरिका में हुए आतंकवादी गतिविधियों के बाद, इस सिद्धांत का हस्तक्षेप अन्तराष्ट्रीय और राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों के लिए भी किया जाने लगा है।

कमाल की बात यह है कि “Inductive और Deductive रीजनिंग” का सबसे पहले इस्तेमाल या सबसे पहले यह दुनिया के सामने, सर आर्थर कानन डोयले द्वारा लाया गया था। सर आर्थर कानन डोयले के पहले उपन्यास, जिसमे उन्होंने शर्लाक होल्म्स जैसे प्रसिद्ध किरदार का पदार्पण किया था – “The Study in Scarlet (१८९२)” में पहली बार इस विधा का इस्तेमाल करते हुए दिखाया था। अगर आप सभी ने इस उपन्यास को पढ़ा हो तो देखेंगे की शर्लाक होल्म्स जब पहली बार डॉ. वाटसन से मिलता है तो उसके बारे कई बातें सिर्फ उसके हाव-भाव को देखकर बता देता है। शर्लाक होम्स की कहानियों ने इस विधा को एक नया आयाम दिया और इसको प्रसिद्धि भी दिलाई जिसके कारण पूरा विश्व इसे आज अपना रहा है। सिर्फ पुलिस जैसे संगठित सेना ही नहीं बल्कि प्राइवेट क्षेत्र के कई सुरक्षा एजेंसी एवं प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर इस विधा का बखूबी इस्तेमाल करते हैं।

क्राइम इन्वेस्टीगेशन में पहली बार Inductive और Deductive रीजनिंग के सिद्धांत का इस्तेमाल सन १८८८ में किया गया जब पूर्वी लन्दन में वाइट चैपल में कुछ क़त्ल हुए जिसे वाइट चैपल मर्डर भी कहा जाता है। दोस्तों इस मर्डर को जिस व्यक्ति ने अंजाम दिया था वो आज तक पकड़ा नहीं गया और उसे उस समय लोग ‘जैक- द रिपर’ के नाम से पुकारते थे। ये सिलसिलेवार कत्लों का सिलसिला था जो चलता ही जा रहा था। लन्दन पुलिस के एक सर्जन ने पहली बार Inductive और Deductive रीजनिंग के सिद्धांत का इस्तेमाल करते हुए अपराध में मिले सबूतों का अच्छी तरह से अध्ययन किया। इसमें डॉ. ने घाव का प्रकार, अपराध की भौगोलिक स्थिति और जैक-द रिपर के पीड़ितों का भी अध्ययन किया। इससे पुलिस को यह मदद मिल पायी की जैक- द रिपर का अगला शिकार कौन होगा और कहाँ होगा, इसका कुछ कुछ ज्ञान हो गया था। हालांकि लन्दन पुलिस इस सिलसिलेवार कत्लों के रहस्य को कभी नहीं हल कर पायी। लेकिन इस सिद्धांत के इस्तेमाल से कई सस्पेक्ट्स संदेह के घेरे में जरूर आये थे।

द्वितीय विश्व युद्ध में सीआईए ने अडोल्फ हिटलर को समझने के लिए इस विधा का इस्तेमाल किया था। न्यू-यॉर्क में “मैड बॉम्बर” नाम के व्यक्ति को पकड़ने के लिए एक डॉ. ने पुलिस की सहायता की थी और इस सिद्धांत का प्रयोग करते हुए ही इस केस में सफलता पायी थी। इस व्यक्ति ने १९४० से १९५० तक न्यू-यॉर्क के कई इमारतों को बम से उड़ा दिया था।

इस सिद्धांत के क्राइम इन्वेस्टीगेशन में सफलता के कारण FBI ने एक प्रोग्राम बनाया, जिसकी टीम ने मिलकर कई सफल तहकीकात किये। जॉन डगलस नाम के इन्वेस्टिगेटर ने एटलांटा में इसी सिद्धांत का इस्तेमाल करते हुए एक सीरियल किल्लिंग का पर्दा फाश किया था। इसके बाद से इस सिद्धांत को बहुत सफलता मिली और इसने बहुत नाम कमाया। Inductive और Deductive रीजनिंग के सिद्धांत ने अपराध एवं न्याय प्रणाली में एक क्रांति का काम किया और इसका मुतावातर इस्तेमाल होता रहा। वर्तमान में इस सिद्धांत का इस्तेमाल जासूसी अन्वेषण, आतंकवादी गतिविधियों और काउंटर इंटेलिजेंस के लिए भी किया जाता है।

Inductive रीजनिंग अनुमान के आधार पर निकाले गए अवलोकनों का समूह होता है। यह एक काल्पनिक कार्यप्रणाली है। किसी एक इवेंट या एक व्यक्ति की विशेषताओं एवं अवलोकनों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है और फिर उस सूचना को आधार मान कर भविष्य में होने वाली समान घटना के साथ जोड़ा जाता है और निष्कर्ष निकाला जाता है। इस सिद्धांत का यह फायदा होता है की इसमें किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती और न ही फॉरेंसिक विज्ञान की जानकारी की जरूरत होती है। यह किसी इन्वेस्टिगेटर को किसी घटना या व्यक्ति के इर्द गिर्द एक सिद्धांत रचने की खुली छुट देता है जो की थोड़े समय के लिए ही होता है। सीरियल किलर या आतंकवादी आक्रमणों के खिलाफ यह सिद्धांत अधिक कारगर सिद्ध होता है। लेकिन साथ ही इसका नुकसान यह होता है कि जो सुचना इकट्ठी की जाती है वह सिमित दायरों तक ही होती है जिससे कभी कभी परिणाम सही नहीं निकलता है। चूँकि, यह भूतकाल में इकट्ठे किये गए जानकारियों के आधार पर कार्य करता है इसलिए इसमें गलतियाँ होने की सम्भावना अधिक होती है।

वहीँ Deductive रीजनिंग में एक इन्वेस्टिगेटर मौकायेवारदात और उस से जुड़े सभी बिन्दुओं के लक्षण पर विचार करता है और साथ ही साथ सभी पाए गए सबूतों को गौर में लाता है। वहीँ deductive रीजनिंग के लिए फॉरेंसिक विज्ञान से आये नए निष्कर्षों को, पहले किये अवलोकनों से जोड़ा जाता है जिससे परिणाम में सफलता मिलने की अधिक संभावना होती है।

आप सभी ने लेख की पहली दो पंक्तियाँ जो पढ़ी हैं वो आपको deductive रीजनिंग का ही नतीजा दिखाती है। इसमें पहली पंक्ति deductive रीजनिंग की पहले स्तर को दर्शाती है जिसमे इन्वेस्टिगेटर सिर्फ मौकायेवारदात को देख कर एक अनुमान के अनुसार अपराध का एक खाका खींचता है। जबकि दूसरी पंक्ति में फॉरेंसिक विज्ञान के निष्कर्षों का प्रयोग करके, प्रथम स्तर के अनुमान के साथ मिलाया जाता है और एक बेहतर निष्कर्ष निकाला जाता है जो अपराधी के करीब ही पहुँचती है।

Deductive रीजनिंग के आपको कई उदाहरण आपको क्राइम फिक्शन उपन्यासों में देखने को मिल सकता है।

वहीँ, inductive रीजनिंग के उदाहरण आप सर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के उपन्यास “नया दिन नयी लाश”  में देख सकते हैं जिसमे एक सीरियल किलर की कहानी है।

सन १९९० में पेन्सिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय में पहली बार इस विधा पर कोर्स शुरू किया गया और आज तक वह चल भी रहा है। भारत में इस विधा की शुरुआत की गयी है या नहीं यह जानने की जरूरत है। हालांकि मेरा सोचना है कि भारतीय पुलिस और सेना में इस प्रकार के प्रोग्राम चलाये जाने चाहिए ताकि अपराध से देश को मुक्त करने में पुलिस और सेना और अधिक सही दिशा में काम कर सके।

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