Close
Skip to content

साहित्य विमर्श एंड्रॉयड एप


0 0 वोट
पोस्ट को रेट करें

 अल्का लाम्बा की घड़ी ने २ बजे का अलार्म बजाया तो उसने बहुत मुश्किल से अपनी आँखे खोली। उसे डॉक्टर की सख्त हिदायत थी की वह अपनी दवाइयां वक्त से खाया करे। उसे हर 6 घंटे पर दवाई खाना पड़ता था। जब वह अपने घर पर होती थी तो अलार्म लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी क्यूंकि घर के एक ख़ास नौकर ने उसको जगाने की ड्यूटी बजानी होती थी। उसने बेडसाइड टेबल पर रखी हुई दवाई निकाली और पानी के ग्लास को उठा कर उस खिड़की की तरफ मुड़ी जो उसके बेड के सिरहाने की तरफ से चाँद का प्रकाश कमरे में पहुंचा रहा था। अचानक उसके हाथ से पानी का ग्लास छूट गया और इतनी तेज़ चीख निकली की रात के स्तब्ध वातावरण में उसने एक बम के धमाके सा काम किया। वह अपने कमरे से सीधे निकल कर सीढियों के रास्ते पहले पहले फ्लोर पर पहुंची फिर ग्राउंड फ्लोर पर फिर उसने मेन गेट खोल कर उस तरफ को दौड़ पड़ी जिस तरफ उसकी खिड़की थी। उसने अपनी खिड़की की तरफ देखा लेकिन उसका निशाना उसके कमरे की खिड़की नहीं बल्कि वह पेड़ था जो उसके खिड़की के एन सामने था। लेकिन उसकी आँखों का मरकज़ वह पेड़ नहीं बल्कि उसके ऊपर लटक रहा एक मानव शरीर था। अचानक उसे अपने पीछे किसी के होने का अहसास हुआ। अल्का लाम्बा ने पीछे मुड़ कर देखा तो पाया की सुजाता मेहरा खड़ी थी।

सुजाता मेहरा ने जैसे ही उस मानव शरीर को देखा, वह चिल्लाई – “चाचा जी!!!!!”

इस चीख में करुणा एवं वेदना दोनों का समावेश था। इसके साथ ही उसके आँखों में आंसू आ गए थे।

अल्का ने देखा की पीछे से करण रस्तोगी भी चलता हुआ आ रहा है। करण रस्तोगी ने भी पेड़ पर लटके उस मानव शरीर को देखा। तभी तीनों को पीछे किसी ने गिरने की आवाज सुनाई दी। माणिक चंदर “मेरठिया”, कोठी के पीछे के हिस्से की तरफ अँधेरे में आते वक़्त रास्ते में रखी एक रस्सी को ध्यान से नहीं देख पाया इसलिए वह लटपटा कर गिर गया था।

किसी तरह से करण और सुजाता ने उसे संभाला तो उसने पहला सवाल यही किया – “ओ.पी. को क्या हुआ?”

सुजाता ने पेड़ पर लटक रहे मानव शरीर को देखते हुए और रोते हुए बोला – “अंकल अब नहीं रहे।”

तभी करण ने कहा – “सुजाता, मुझे नहीं लगता की यह ओ.पी. का शरीर है। ऐसा लगता है की यह कोई पुतला है।”

सुजाता, अल्का और माणिक ने भी गौर से देखा तो अहसास हुआ की वह कोई मानव शरीर नहीं वरन कोई पुतला था। ऐसे में उन्हें अन्दर कोठी से कुत्ते के बोलने की आवाज़ सुनाई दे रहा था। उन्होंने देखा की एक साया उनकी तरफ बढ़ता हुआ आ रहा है। जब वह साया करीब पहुंचा तो उनके जान में जान आई। वह कोई और नहीं “ओ.पी. मेहरा या ओम प्रकाश मेहरा” था। ओम प्रकाश मेहरा को सभी ने उस पुतले के बाबत बताया तो उन्हें बहुत गुस्सा आया की किसी ने उनके घर में उनके मेहमानों और उनके साथ इतना भद्दा मजाक किया था। ओम प्रकाश मेहरा ने सभी मेहमानों और अपनी भतीजी से पूछा की क्या उनमे से किसी ने यह मजाक किया है लेकिन सभी ने इस बात का जवाब इनकार में ही दिया। ओम प्रकाश मेहरा को इस बात से बहुत गुस्सा आया की किसी ने उसके साथ ऐसा मजाक किया है इसलिए उसने इस घटना की खबर पुलिस को देने का निश्चय किया। ओम प्रकाश मेहरा कोठी के बैठक में मौजूद टेलीफोन तक पहुंचा। ओम प्रकाश मेहरा ने रिसीवर उठाया ही था की उसकी नज़र सोफे के पीछे वाली दीवार पर पड़ी जो अमूमन एक पेंटिंग से ढकी होती थी लेकिन इस वक़्त वहां पेंटिंग का नामोनिशान नहीं था। इतने देर में कोठी में मौजूद सभी व्यक्ति बैठक में आ चुके थे।

ओम प्रकाश मेहरा ने पुलिस को फ़ोन किया – “हेल्लो, पुलिस कण्ट्रोल रूम…..मुझे एक चोरी की रिपोर्ट करनी है….मेरे कोठी से एक बेशकीमती पेंटिंग आज ही चोरी हो गयी है….8….मेहरा हाउस…सुन्दर नगर …….मैं…ओम प्रकाश मेहरा….ठीक है मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।”

इसी वार्तालाप के दौरान सभी को एहसास हुआ की वहां एक पुतले द्वारा किये गए मजाक के अलावा, पेंटिंग भी चोरी हुई है।

इंस्पेक्टर अभय शुक्ला अपने दल-बल के साथ 8, मेहरा हाउस, सुन्दर नगर पहुंचा। मेहरा हाउस, सुन्दर नगर की सबसे बड़ी कोठी थी, फार्म-हाउस के केंद्र में कोठी था जो चारो तरफ से वृक्षों से घिरा हुआ था। अभय शुक्ला ने कोठी में प्रवेश करने के लिए कदम बढाए ही थे की उसकी नज़र पेड़ पर लटके हुए एक पुतले पर पड़ी। इस नज़ारे को देखते हुए इंस्पेक्टर शुक्ला ने बैठक में कदम रखा। इंस्पेक्टर जैसे ही बैठक में घुसा एक कुत्ते के भौंकने की आवाज ने उसे चौंका दिया। सुजाता मेहरा ने उस कुत्ते के पास जाकर उसे शांत कराया। इंस्पेक्टर ने अपना आइडेंटिटी कार्ड सभी को दिखाया जिसे सभी ने देखा। करण रस्तोगी इंस्पेक्टर के करीब आया और उसने आइडेंटिटी कार्ड करीब से देखने की कोशिश की।

ओम प्रकाश मेहरा ने इंस्पेक्टर अभय शुक्ला का स्वागत करते हुए एवं अपना परिचय देते हुए कहा – “अरे…चोरी की वारदात के लिए आईपीएस ऑफिसर को आने की क्या जरूरत थी?”

अभय शुक्ला ने मेहरा का मंतव्य समझते हुए बोला – “मिस्टर मेहरा, मैं अभी ट्रेनिंग पीरियड में हूँ इसलिए ट्रेनिंग के लिए मुझे डिपार्टमेंट ने इस पद और थाने में पोस्टिंग दी है।”

ओम प्रकाश मेहरा – “ओह.. मैं समझ गया।”

“मिस्टर मेहरा, अब बताइये की यहाँ क्या वारदात हुई है।”

ओम प्रकाश मेहरा ने अल्का लम्बा से हुई घटना की शुरुआत करते हुए पेंटिंग की चोरी तक की बात इंस्पेक्टर को शब्द-ब-शब्द सुना दिया। इंस्पेक्टर ने एक कांस्टेबल को हेड-क्वार्टर फ़ोन करके फॉरेंसिक टीम और फोटोग्राफर को बुलाने के लिए कह दिया। उसके बाद इंस्पेक्टर ने पुतला देखने की फरमायश की तो सभी के साथ वे उस पेड़ के नीचे पहुंचे। इंस्पेक्टर ने एक कांस्टेबल को गाड़ी से टोर्च लाने को कहा। इंस्पेक्टर ने उस पुतले की तरफ टॉर्च की रौशनी पहुंचाई और ध्यान से पुतले को देखा।

इंस्पेक्टर बोला – “ह्म्म्मम्म…. मिस्टर मेहरा पुतले के ऊपर जो कपड़े मौजूद हैं वह किसके हैं?

सुजाता मेहरा बोल पड़ी – “यह अंकल के कपड़े हैं जिसे इन्होने कल डिनर के वक़्त पहना था।”

इंस्पेक्टर बोला – “ओह…समझा…। मिस्टर मेहरा, मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ की जिसने भी यह मजाक किया है वह इसी घर में मौजूद किसी व्यक्ति ने किया है।”

ओम प्रकाश मेहरा ने कहा – “अच्छा… आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?”

“क्यूंकि उस पुतले के शरीर पर मौजूद कपड़े आम पुतलों के कपड़े नहीं हैं। ये आपके कपड़े हैं इसलिए मैं इस आंकलन पर पहुँच सकता हूँ जिसने भी यह मजाक किया है वह इस घर में कल रात मौजूद था।”

“इंस्पेक्टर, घर में तो कल रात डिनर के वक़्त हम लोग ही मौजूद थे। हमारे अलावा तो कोई आया नहीं और कोई गया नहीं। मेरे नौकर भी रात का खाना बना कर डिनर से पहले ही चले गए थे इसलिए आप उनको सस्पेक्ट की गिनती में नहीं ले सकते।”

“ठीक है! पहले आप बताइये की यह पुतला आपके घर तक पहुंचा कैसे।”

“इंस्पेक्टर, यह पुतला मेरे घर में इसलिए मौजूद है क्यूंकि मेरी स्वर्गवासी पत्नी को पुतले बनाने का शौक़ था। उनमे से ही कुछ पुतले उसके स्टडी में सजाकर मैंने रखे हुए हैं।”

“हम्म्म्म… समझ गया। लेकिन मुझे यह समझ नहीं आया की किसी ने उस पेटिंग को क्यूँ चुराया। क्या वह बहुत कीमती था।”

“हाँ, वह बहुत कीमती और बहुत पुराना था। वह पेंटिंग मेरे पिताजी ने बहुत सस्ते में खरीदा था लेकिन आज उसकी कीमत करोड़ो में है।”

“वह पेंटिंग इतनी बेशकीमती थी इसके बारे में किस-किस को खबर थी।”

“यहाँ मौजूद सभी लोगों को उसके बारे में खबर थी और यह पहली बार था जब मैंने उस पेंटिंग की बेशकीमती की बाबत किसी को बताया था। यह बात मैंने यहाँ मौजूद सभी लोगों को कल डिनर के वक़्त बताया था।”

तभी माणिकचंद ‘मेरठिया’ बोल पड़ा – “ओ.पी. मैंने तो इसके बारे में नहीं सुना था। शायद तुमने यह तब बताया जब मैं बाथरूम गया हुआ था।”

ओम प्रकाश मेहरा बोला – “हाँ, तुम उस वक़्त यहाँ मौजूद नहीं थे।”

इंस्पेक्टर मेहरा ने ओम प्रकाश मेहरा से फिर सवाल किया – “मिस्टर मेहरा, आप एक सवाल का जवाब मुझे दीजिये की कल आम डिनर था या कुछ ख़ास बात थी जिसके कारण ये सभी यहाँ मौजूद थे।”

“कल रात का डिनर ख़ास था। यहाँ मौजूद जितने भी इंसान आपको नज़र आ रहे हैं सभी मेरे विरसे में हिस्सेदार थे। लेकिन हाल ही के कुछ दिनों में मुझे बिज़नस में बहुत घाटा हुआ इसलिए कल मैंने अपने विरसे में बदलाव किया जिसके अनुसार मेरी चल-अचल सम्पति की वारिस मेरी भतीजी होगी। यही बात बताने के लिए मैंने सभी को कल डिनर पर बुलाया था।”

“ठीक है, अब मैं बहुत कुछ समझ रहा हूँ। अब आप बारी-बारी से, सभी से मेरा परिचय कराइए।”

ओम प्रकाश मेहरा बोला – “ये मेरी भतीजी सुजाता मेहरा है। बाकी ये तीन मेरे बचपन के दोस्त हैं और मेरे सबसे करीबी हैं। ये अल्का लम्बा हैं…. पेशे से पत्रकार हैं….ये करण रस्तोगी…पेशे से मेरी ही तरह बिज़नसमेन हैं…और अभी रिटायर भी नहीं हुए हैं (हँसते ही)… ये माणिकचंद ‘मेरठिया’ हैं……ये महाशय लेखक हैं। कल रात का डिनर पहले से फिक्स था और ये सभी रात रूककर अगली सुबह जाने वाले थे।”

इंस्पेक्टर बोला – “ओके। जैसा मुझे पता चला है की अल्का जी की चीख सुनकर पूरा घर जग गया था।”

अल्का लम्बा बोली – “हाँ। मैं सुबह दो बजे अपनी दवाई लेने के लिए उठी थी।”

“क्या आपकी यह आदत यहाँ मौजूद सभी व्यक्ति जानते थे?”

“हाँ! मैंने जैसे ही खिड़की से बाहर नज़र डाली मुझे ओ.पी. का लटकता हुआ शरीर दिखाई दिया। मुझे ऐसा लगा की ओ.पी. ने आत्महत्या कर ली है क्यूंकि कल रात ही इसने बताया था की इसे बिज़नस बहुत नुकसान हुआ था। मैं अपने कमरे से निकल कर कोठी के उस हिस्से की तरफ गयी जिधर मेरी खिड़की खुलती थी। धीरे-धीरे बाकी सभी भी बाहर निकल कर आ रहे थे ताकि जान सके की क्या हुआ था। मैं तो डर के मारे लटके हुए शरीर को देख रही थी जबकि सुजाता मेरे पीछे आई और उसके बाद करण भी आ गया। उसके पीछे माणिकचंद आ रहा था लेकिन अँधेरे के कारण वह किसी रस्सी में फंस कर गिर गया था।”

इंस्पेक्टर ने माणिकचंद ‘मेरठिया’ की तरफ देखा जो एक हाथ से बार-बार अपने बाएं पैर को सहला रहा था।

इंस्पेक्टर बोला – “बहुत ज्यादा लगी है?”

मेरठिया ने दुखभरे लहजे में बोला – “बहुत ज्यादा! मैं बहुत डरा हुआ भी हूँ?”

इंस्पेक्टर बोला – “मेरे ख्याल से आप उस रस्सी में फंस कर गिरे थे जिसका इस्तेमाल उस पुतले को लटकाने के लिए किया गया था। अच्छा, ये बताइये की आप सभी में से किसको यह पता लगा की पेड़ पर लटकाया हुआ शरीर असली नहीं है।”

सुजाता बोली – “वह करण… करण अंकल थे जिन्होंने सबसे पहले हमें यह बताया जबकि हम सभी यही उसे असली शरीर ही समझ रहा था क्यूंकि वहां बहुत अँधेरा था जिसके कारण साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।”

इंस्पेक्टर ओम प्रकाश मेहरा की तरफ मुड़ा और बोला – “मिस्टर मेहरा, इन सभी घटनाओं के वक़्त आप कहाँ थे।”

ओम प्रकाश मेहरा बोला – “मेरी तबियत ठीक नहीं रहती है इसलिए मुझे बिस्तर से उठने और नीचे पहुंचने में बहुत वक़्त लग गया। यहाँ पहुँचने के बाद मुझे इस घटना के बारे में पता चला। उसके बाद मैंने पुलिस फ़ोन करने के लिए बैठक की तरफ गया।”

“ठीक है, मिस्टर मेहरा चलिए अब बैठक में ही चलते हैं। कृपया आप सभी भी चलिए।”

जैसे ही इंस्पेक्टर बैठक के अन्दर पहुंचा बैठक में मौजूद कुत्ता फिर भौंक पड़ा। वह चुप ही नहीं हुआ जब तक की सुजाता मेहरा ने उसको चुप नहीं कराया।

ओम प्रकाश मेहरा बोले – “भगवान् के लिए सुजाता इस कुत्ते का कुछ करो। जब से मैं जगा हूँ तब से ये बैठक में भौंके जा रहा है। जब मैं पुलिस को फ़ोन कर रहा था तब भी ये भौंके जा रहा था जिसके कारण मुझे दुसरे तरफ की आवाज भी सुनाई ने दे रही थी। जब भी यह तुम्हारे अलावा किसी और को देखता है भौंकने लगता है। तुम्हें इसे ट्रेन करने की जरूरत है।

सुजाता बोली – “अंकल, इंस्पेक्टर को हमारी घरेलु समस्याओं के बारे में नहीं जानना है?”

ओम प्रकाश मेहरा ने बोला – “ओह! हाँ! जैसे ही मैंने फ़ोन का रिसीवर उठाकर दीवार के उस तरफ नज़र मारी मैंने पाया की पेंटिंग गायब थी।”

तब तक पुलिस के फॉरेंसिक टीम और फोटोग्राफर दोनों ही कोठी के बाहर आ चुके थे।

ओम प्रकाश मेहरा बोला – “इंस्पेक्टर, क्या आप सभी कमरों की तलाशी लेंगे?”

इंस्पेक्टर बोला – “कायदे से तो तलाशी लेना ही पड़ेगा। लेकिन आपका घर बहतु बड़ा है जिसके हिसाब से मैं सोचता हूँ की तलाशी न ही लूँ।”

“लेकिन….”

“क्यूंकि…आपके घर से पेंटिंग किसने चुराया है इसके बारे में बताने के लिए अब मुझे घर की तलाशी लेने की जरूरत नहीं है।”

To be continued….

                          

0 0 वोट
पोस्ट को रेट करें

सबस्क्राइब करें
सूचित करें
guest
0 टिप्पणियाँ
इनलाइन प्रतिक्रिया
सभी टिप्पणियाँ देखें

.

द स्टोलेन आर्ट  
0
आपके विचार महत्वपूर्ण हैं। कृपया टिप्पणी करें। x
()
x